मुख्य बिंदु और अदालती निर्णय (Key Highlights)
- CIRP व्यक्ति-विशेष का नहीं, सामूहिक मामला (‘In Rem’) है:सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि एक बार जब NCLT दिवालिया याचिका स्वीकार कर लेता है, तो यह मामला केवल याचिकाकर्ता और कंपनी के बीच का व्यक्तिगत विवाद नहीं रह जाता। यह एक ‘Proceeding in Rem’ बन जाता है जिसमें सभी लेनदार, घर खरीदार और हितधारक शामिल होते हैं।पीठ ने कहा:“याचिका दायर करने वाला लेनदार केवल प्रक्रिया को ट्रिगर करने वाला होता है, वह CIRP का मालिक नहीं है। इसलिए मूल आवेदक की अनुपस्थिति या उसकी धोखाधड़ी के बावजूद रिज़ॉल्यूशन प्रक्रिया जारी रह सकती है।”
- धोखाधड़ी करने वाले पर कार्रवाई बनाम अन्य का हित:अदालत ने माना कि यदि शुरुआती आवेदन फर्जी पाया जाता है, तो NCLT उस मिलीभगत करने वाले आवेदक को प्रक्रिया से बाहर कर सकता है और IBC की धारा 65 (Section 65 of IBC) के तहत उस पर जुर्माना/कार्रवाई कर सकता है। लेकिन सिर्फ इस वजह से पूरी प्रक्रिया को रद्द करना अन्य निर्दोष लेनदारों और घर खरीदारों के साथ अन्याय होगा।
- मामले की पृष्ठभूमि:गुरुग्राम के ‘ग्रीनोपोलिस’ प्रोजेक्ट में एक ऑपरेशनल क्रेडिटर ने ₹30 करोड़ के बकाए का दावा कर CIRP शुरू कराया था। बाद में जांच में पता चला कि कंपनी के जिन निदेशकों ने यह देनदारी स्वीकार की थी, वे वास्तव में ऑफिस बॉय और पैंट्री बॉय थे जिन्हें कंपनी के काम का कोई ज्ञान नहीं था। NCLT और NCLAT ने इसे धोखाधड़ी मानकर पूरी CIRP रद्द कर दी थी, जिसे अब सुप्रीम कोर्ट ने पलट दिया है।
- NCLT के लिए निर्देश:सुप्रीम कोर्ट ने मामला वापस NCLT को भेजा है और निर्देश दिया है कि वह कमिटी ऑफ क्रेडिटर्स (CoC), रिज़ॉल्यूशन प्रोफेशनल (RP) और घर खरीदारों के पक्ष को सुनकर यह तय करे कि कंपनी को उबारने के लिए CIRP जारी रखना कितना आवश्यक है।
नई दिल्ली: दिवाला और शोधन अक्षमता संहिता, 2016 (IBC) के तहत कॉर्पोरेट दिवाला समाधान प्रक्रिया (CIRP) की मूल प्रकृति, धोखाधड़ीपूर्ण याचिकाओं के विधिक प्रभाव और घर खरीदारों (Homebuyers) सहित वास्तविक लेनदारों के अधिकारों के संरक्षण पर सुप्रीम कोर्ट ने अत्यंत युगांतरकारी फैसला सुनाया है।
न्यायमूर्ति पी.एस. नरसिम्हा और न्यायमूर्ति आलोक अराधे की खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि एक बार जब धारा 7 या धारा 9 के तहत दिवाला याचिका NCLT द्वारा स्वीकार (Admit) कर ली जाती है, तो वह प्रक्रिया केवल आवेदक और देनदार का निजी विवाद नहीं रह जाती, बल्कि यह सर्वव्यापी विधिक कार्यवाही (Proceedings in rem) बन जाती है। अदालत ने राष्ट्रीय कंपनी विधि अपीलीय अधिकरण (NCLAT) के उस आदेश को निरस्त कर दिया जिसने गुरुग्राम के प्रसिद्ध ‘ग्रीनपोलिस’ (Greenopolis) आवासीय प्रोजेक्ट से जुड़े पूरे CIRP को रद्द कर दिया था। शीर्ष अदालत ने मामले को पुनः NCLT को सौंपते हुए धोखाधड़ी करने वाले लेनदार को बाहर कर ऋणदाताओं की समिति (CoC) और घर खरीदारों के व्यापक हित में दिवाला प्रक्रिया जारी रखने पर नए सिरे से विचार करने का आदेश दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने व्यवस्था दी है कि यदि किसी कॉर्पोरेट देनदार (Corporate Debtor) के खिलाफ दिवाला प्रक्रिया शुरू कराने वाली मूल अर्जी बाद में कपटपूर्ण और दुर्भावनापूर्ण (Fraudulent and Collusive) पाई जाती है, तब भी पूरी CIRP को स्वतः रद्द या समाप्त नहीं किया जा सकता।
सुप्रीम कोर्ट के प्रमुख विधिक निष्कर्ष एवं न्यायिक सिद्धांत
1. ‘प्रारंभिक लेनदार केवल ट्रिगर है, प्रक्रिया का मालिक नहीं’ न्यायमूर्ति पी.एस. नरसिम्हा और न्यायमूर्ति आलोक अराधे की खंडपीठ ने स्पष्ट किया:
*”दिवाला प्रक्रिया शुरू करने वाला लेनदार केवल एक उत्प्रेरक/ट्रिगर करने वाला लेनदार (Triggering Creditor) होता है, न कि संपूर्ण कॉर्पोरेट दिवाला समाधान प्रक्रिया (CIRP) का स्वामी या मालिक (Proprietor)। एक बार जब दिवाला आवेदन स्वीकार कर लिया जाता है, तो यह कार्यवाही उस लेनदार और कॉर्पोरेट देनदार के बीच का निजी विवाद नहीं रह जाती। यह ‘प्रोसीडिंग्स इन रेम’ (Proceedings in rem) में परिवर्तित हो जाती है, जिसमें वित्तीय लेनदारों, घर खरीदारों, परिचालन लेनदारों और अन्य सभी हितधारकों का सामूहिक निकाय शामिल हो जाता है। अतः समाधान प्रक्रिया मूल आवेदक की अनुपस्थिति में भी सुचारू रूप से जारी रह सकती है।”*
2. पूरी प्रक्रिया रद्द करने के बजाय कपटी आवेदक को बाहर करे NCLT:
- खंडपीठ ने माना कि हालांकि NCLT के पास धोखाधड़ी से प्राप्त आदेश को वापस लेने (Recall) का अधिकार है, परंतु इसका यह अर्थ नहीं है कि पूरी समाधान प्रक्रिया का ही अंत कर दिया जाए।
- अदालत ने विधिक व्यवस्था दी:
- NCLT धोखाधड़ी और मिलीभगत में शामिल आवेदक को प्रक्रिया से तुरंत बाहर (Exclude) कर सकता है।
- न्यायाधिकरण संहिता की धारा 65 (धोखाधड़ी या दुर्भावनापूर्ण इरादे से दिवाला प्रक्रिया शुरू करने पर कठोर जुर्माना) के तहत दोषी पक्षों के विरुद्ध दंडात्मक कार्यवाही शुरू कर सकता है।
- इसके बाद NCLT स्वतंत्र रूप से यह तय करेगा कि क्या कॉर्पोरेट देनदार के समाधान और अन्य लेनदारों (विशेषकर घर खरीदारों) के व्यापक हित में CIRP को जारी रखना आवश्यक है या नहीं।
3. समाधान पेशेवर और CoC के व्यावसायिक विवेक (Commercial Wisdom) की भूमिका:
- अदालत ने निर्देशित किया कि NCLT को यह निर्णय लेते समय अंतरिम/समाधान पेशेवर (RP) को सुनना चाहिए, ऋणदाताओं की समिति (CoC) के व्यावसायिक विवेक (Commercial Wisdom) और विचारों को संज्ञान में लेना चाहिए तथा अन्य हितधारकों की बात सुननी चाहिए:“अधिनिर्णायक प्राधिकारी (NCLT) का यह प्राथमिक कर्तव्य है कि वह यह सुनिश्चित करे कि कार्यवाहियां शुचिता और पारदर्शिता के साथ संपन्न हों और संहिता के मूल उद्देश्य—यानी कंपनी का पुनरुद्धार और हितधारकों के अधिकारों की रक्षा—को पूरा किया जा सके।”
मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि: ‘ग्रीनपोलिस’ प्रोजेक्ट और प्यून-पेंट्री बॉय की मिलीभगत
- थ्री सी शेल्टर्स और ग्रीनपोलिस प्रोजेक्ट:
- विवाद गुरुग्राम के सेक्टर 89 स्थित ‘ग्रीनपोलिस’ (Greenopolis) आवासीय परियोजना से जुड़ा है, जिसे मेसर्स थ्री सी शेल्टर्स प्राइवेट लिमिटेड (Three C Shelters Pvt Ltd) द्वारा विकसित किया जा रहा था। इस परियोजना में सैकड़ों घर खरीदारों की जीवनभर की पूंजी फंसी हुई थी।
- 2020 में CIRP की शुरुआत:
- वर्ष 2020 में ‘स्ट्रेट एज कॉन्ट्रैक्ट्स प्राइवेट लिमिटेड’ (Straight Edge Contracts Pvt Ltd) ने लगभग ₹30 करोड़ के कथित परिचालन ऋण (Operational Debt) का दावा करते हुए IBC की धारा 9 के तहत दिवाला याचिका दायर की थी, जिसे NCLT ने स्वीकार कर CIRP शुरू कर दिया था।
- धोखाधड़ी और कपट का पर्दाफाश (मरीचिका ऋण):
- बाद में NCLT की जांच में सनसनीखेज तथ्य सामने आए कि यह दिवाला प्रक्रिया देनदार और परिचालन लेनदार के बीच मिलीभगत और कपट का परिणाम थी।
- NCLT ने पाया कि थ्री सी शेल्टर्स के निदेशक बनकर देनदारी स्वीकार करने वाले दो व्यक्ति वास्तव में कंपनी के ऑफिस बॉय और पेंट्री बॉय थे, जिन्हें कंपनी के मामलों की कोई जानकारी ही नहीं थी।
- ₹30 करोड़ का परिचालन ऋण पूरी तरह एक ‘मरीचिका’ (Mirage) था, जिसे केवल इसलिए गढ़ा गया था ताकि CIRP शुरू कराकर धारा 14 के तहत मोरटोरियम (Moratorium) का संरक्षण लिया जा सके और घर खरीदारों व रेरा (RERA) द्वारा की जा रही कानूनी कार्यवाहियों को ठप किया जा सके।
- NCLAT का आदेश और सुप्रीम कोर्ट में अपील:
- कपट साबित होने पर NCLT और बाद में अपीलीय अधिकरण (NCLAT) ने पूरे CIRP को ही निरस्त कर दिया। इसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की गई, जिसमें दलील दी गई कि धोखाधड़ी सिद्ध होने के बाद भी निर्दोष घर खरीदारों और अन्य वास्तविक लेनदारों को अधर में नहीं छोड़ा जाना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट का अंतिम निर्देश: CIRP बहाल, NCLT को नए सिरे से फैसला लेने का आदेश
सुप्रीम कोर्ट ने NCLAT के आदेश को पलटते हुए निम्नलिखित निर्देश जारी किए:
- NCLAT का आदेश निरस्त: अपीलीय अधिकरण द्वारा CIRP को पूरी तरह रद्द करने का फैसला खारिज किया जाता है और मामला NCLT के समक्ष बहाल (Restored) किया जाता है।
- NCLT का स्वतंत्र परीक्षण: NCLT ग्रीनपोलिस प्रोजेक्ट के स्वामित्व, घर खरीदारों के हितों और उनके द्वारा अपनाए गए अन्य वैधानिक उपायों को ध्यान में रखकर यह निर्णय ले कि क्या समाधान प्रक्रिया को आगे बढ़ाना न्यायोचित है।
- त्वरित निस्तारण: यदि NCLT प्रक्रिया जारी रखने का फैसला करता है, तो CIRP को बिना किसी अनावश्यक विलंब के अत्यंत त्वरित गति से पूरा किया जाए।
विधिक विवरण
- केस संदर्भ: ऑरिस बनाम राकेश कुमार गुप्ता व अन्य [सिविल अपील – भारत का सर्वोच्च न्यायालय]
- पीठ: न्यायमूर्ति पी.एस. नरसिम्हा और न्यायमूर्ति आलोक अराधे
- आदेश की तिथि: 30 सितंबर 2026
- विधिक प्रतिनिधित्व:
- अपीलकर्ताओं की ओर से: वरिष्ठ अधिवक्ता सी.ए. सुंदरम एवं वरिष्ठ अधिवक्ता रामजी श्रीनिवासन
- प्रतिवादियों की ओर से: वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी, कृष्णन वेणुगोपाल, नलिन कोहली, अनुपम लाल दास, सौरभ कृपाल एवं गोपाल शंकरनारायणन
- प्रासंगिक कानून एवं विधिक धाराएं:
- दिवाला और शोधन अक्षमता संहिता, 2016 (IBC, 2016):
- धारा 9 (परिचालन लेनदार द्वारा CIRP शुरू करने का आवेदन)
- धारा 14 (अधिस्थगन / Moratorium की घोषणा)
- धारा 18 एवं 25 (अंतरिम समाधान पेशेवर और आरपी के कर्तव्य)
- धारा 21 (ऋणदाताओं की समिति – CoC का गठन)
- धारा 65 (कपटपूर्ण या दुर्भावनापूर्ण इरादे से दिवाला प्रक्रिया शुरू करने पर वित्तीय दंड)
- भारत का संविधान – अनुच्छेद 142 (पूर्ण न्याय करने की असाधारण शक्ति)
- दिवाला और शोधन अक्षमता संहिता, 2016 (IBC, 2016):
- संबद्ध ऐतिहासिक न्यायिक नजीरें:
- स्विस रिबन प्राइवेट लिमिटेड बनाम भारत संघ (2019, सुप्रीम कोर्ट) — ‘आईबीसी के तहत प्रवेश आदेश के बाद कार्यवाही द्विपक्षीय (In personam) न रहकर सर्वव्यापी (In rem) बन जाती है और इसका प्राथमिक उद्देश्य कॉर्पोरेट अस्तित्व को बचाना है।’
- पायनियर अर्बन लैंड एंड इंफ्रास्ट्रक्चर लिमिटेड बनाम भारत संघ (2019, सुप्रीम कोर्ट) — ‘आईबीसी के तहत घर खरीदार (Allottees) वित्तीय लेनदार हैं और समाधान प्रक्रिया में उनके निवेश व आवास के अधिकारों की रक्षा सर्वोपरि है।’
- एस्सार स्टील इंडिया लिमिटेड (CoC) बनाम सतीश कुमार गुप्ता (सुप्रीम कोर्ट) — ‘ऋणदाताओं की समिति (CoC) का व्यावसायिक विवेक न्यायनिर्णयन का सर्वोच्च मार्गदर्शक सिद्धांत है।’
- अंतिम परिणाम: NCLAT का निरस्तीकरण आदेश रद्द; NCLT के समक्ष CIRP बहाल; कपटी आवेदक को अलग कर घर खरीदारों के कल्याणार्थ प्रक्रिया जारी रखने पर नए सिरे से निर्णय लेने का निर्देश।
Commercial Wisdom: मामले का संक्षिप्त विवरण (At A Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court of India) |
| पीठ | न्यायमूर्ति पी.एस. नरसिम्हा एवं न्यायमूर्ति आलोक अराधे |
| संबंधित कंपनी/प्रोजेक्ट | थ्री सी शेल्टर प्राइवेट लिमिटेड (Three C Shelters Pvt Ltd – ग्रीनोपोलिस प्रोजेक्ट, गुरुग्राम) |
| कानूनी मुद्दा | क्या धोखाधड़ी से शुरू की गई CIRP प्रक्रिया को NCLT पूरी तरह रद्द करने के लिए बाध्य है? |
| अदालत का फैसला | NCLAT के आदेश को रद्द किया; धोखाधड़ी करने वाले लेनदार को बेदखल कर NCLT को CIRP जारी रखने पर विचार करने का निर्देश दिया। |

