अदालत के मुख्य निष्कर्ष और कानूनी तर्क (Key Observations)
- आशंकाएँ काल्पनिक और अमान्य:न्यायमूर्ति श्रीशानंद ने कहा कि यह आशंका पूरी तरह से काल्पनिक और कानून में अमान्य है कि सह-आरोपी के दोष स्वीकार करने से अन्य आरोपियों का पक्ष कमजोर होगा। यहाँ तक कि आपराधिक षड़यंत्र (Conspiracy) के मामलों में भी अभियोजन पक्ष को अन्य आरोपियों का दोष स्वतंत्र साक्ष्यों से सिद्ध करना अनिवार्य है।
- वैधानिक लाभ से वंचित नहीं किया जा सकता:अदालत ने माना कि धारा 265E के तहत दिए गए वैधानिक अधिकार का उपयोग करने से एक सह-आरोपी दूसरे सह-आरोपी को नहीं रोक सकता।
- प्ली बार्गेनिंग और सरकारी गवाह (Approver) में अंतर:हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि CrPC की धारा 306 के तहत सरकारी गवाह (Approver) बनने वाले आरोपी की कानूनी स्थिति प्ली बार्गेनिंग चाहने वाले आरोपी से बिल्कुल अलग होती है:
- प्ली बार्गेनिंग (धारा 265E): आरोपी मुकदमा पूरा होने से पहले अपना अपराध स्वीकार कर कम सजा की मांग करता है।
- सरकारी गवाह (धारा 306): आरोपी पूरे मामले का सच उजागर करने की शर्त पर पूर्ण क्षमादान (Pardon) का दावा करता है।
- प्रोबेशन (Probation): यह लाभ केवल दोषसिद्धि (Conviction) के बाद ही दिया जाता है।
बेंगलुरु: दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) के अध्याय XXI-A [अब भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 का अध्याय XXII] के तहत ‘प्ली बारगेनिंग’ (दोष स्वीकार कर सजा में रियायत का समझौता), संयुक्त विचारण (Joint Trial) में सह-आरोपियों के निष्पक्ष बचाव के अधिकार और सरकारी गवाह (Approver) की तुलना में इसके विधिक दर्जे पर कर्नाटक हाईकोर्ट ने अत्यंत महत्वपूर्ण विधिक व्यवस्था दी है।
न्यायमूर्ति वी. श्रीशानंद की एकल पीठ ने 16 सितंबर 2026 के अपने फैसले में अभियुक्त चित्तथद दास द्वारा दायर याचिका को खारिज करते हुए यह व्यवस्था दी। याचिकाकर्ता ने ट्रायल कोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसके तहत तीन सह-अभियुक्तों को प्ली बारगेनिंग का लाभ उठाने की अनुमति दी गई थी और उनके खिलाफ आरोपों को हटा दिया गया था। उच्च न्यायालय ने याचिकाकर्ता की इस आशंका को पूरी तरह काल्पनिक और कानूनी रूप से आधारहीन (Hypothetical and Untenable in Law) करार दिया।उच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि यदि किसी मामले में कुछ सह-अभियुक्त धारा 265E के तहत अपना अपराध स्वीकार कर प्ली बारगेनिंग का वैधानिक लाभ लेते हैं, तो इससे शेष अभियुक्तों के मुकदमे को लड़ने और अपना बचाव करने के अधिकार पर कानूनन कोई प्रतिकूल प्रभाव (Prejudice) नहीं पड़ता।
उच्च न्यायालय के प्रमुख विधिक निष्कर्ष एवं न्यायिक टिप्पणियां
1. ‘अभियोजन का दायित्व समाप्त नहीं होता; स्वतंत्र साक्ष्य अनिवार्य’ न्यायमूर्ति वी. श्रीशानंद ने आपराधिक न्यायशास्त्र के बुनियादी सिद्धांतों को रेखांकित करते हुए स्पष्ट कहा:
“सह-आरोपियों द्वारा प्ली बारगेनिंग के तहत अपराध स्वीकार कर लेने मात्र से अभियोजन पक्ष (Prosecution) शेष बचे अभियुक्तों के विरुद्ध अपने आरोपों को साबित करने के वैधानिक दायित्व से मुक्त नहीं हो जाता।
यहां तक कि आपराधिक षड्यंत्र (Conspiracy) के आरोपों वाले मामलों में भी, अभियोजन को शेष अभियुक्तों के अपराध को स्वतंत्र एवं ठोस साक्ष्य (Cogent Evidence) के बल पर ही साबित करना होगा। आपराधिक न्यायशास्त्र के इन सुस्थापित सिद्धांतों को केवल इसलिए कमजोर या शिथिल (Diluted) नहीं किया जा सकता क्योंकि कुछ अभियुक्तों ने प्ली बारगेनिंग का विकल्प चुना है।”
2. सह-अभियुक्त अन्य आरोपियों को वैधानिक लाभ लेने से नहीं रोक सकता:
- अदालत ने दो-टूक व्यवस्था दी कि कानून द्वारा प्रदत्त कोई भी अधिकार किसी अन्य पक्षकार की सहमति पर निर्भर नहीं करता:“एक सह-आरोपी किसी अन्य सह-आरोपी को CrPC की धारा 265E [वर्तमान BNSS की धारा 293] के तहत प्ली बारगेनिंग का वैधानिक लाभ प्राप्त करने से रोक नहीं सकता।”
3. सरकारी गवाह (Approver) बनाम प्ली बारगेनिंग (Plea Bargaining) का विधिक अंतर: अदालत ने CrPC की धारा 306 (सशर्त क्षमादान देकर सरकारी गवाह बनाना) और धारा 265E (प्ली बारगेनिंग) के बीच के मौलिक कानूनी अंतर को स्पष्ट किया:
- सरकारी गवाह (धारा 306 CrPC): जब कोई आरोपी सरकारी गवाह (Approver) बनता है, तो वह अन्य अभियुक्तों के खिलाफ अभियोजन के गवाह के रूप में गवाही देता है और उसके बयान का उपयोग अन्य सह-आरोपियों को दोषी ठहराने के लिए किया जा सकता है।
- प्ली बारगेनिंग (धारा 265E CrPC): प्ली बारगेनिंग में ऐसा नहीं होता। यह पूरी तरह अभियुक्त और अदालत/अभियोजन के बीच का एक व्यक्तिगत प्रक्रियात्मक समझौता है, जिसके तहत आरोपी केवल अपने हिस्से का अपराध स्वीकार कर विचारण पूरा होने से पहले कम सजा की मांग करता है। उसका यह स्वीकारोक्ति बयान अन्य सह-आरोपियों के खिलाफ साक्ष्य के रूप में स्वतः प्रयोग नहीं किया जा सकता।
- प्रोबेशन से अंतर: अदालत ने यह भी रेखांकित किया कि परिवीक्षा (Probation) का लाभ केवल दोषसिद्धि (Conviction) के बाद ही विचारणीय होता है, जबकि प्ली बारगेनिंग विचारण के संपन्न होने से पहले ही दोष स्वीकार करने और सजा का निर्धारण करने की प्रक्रिया है।
मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि: चित्तथद दास की चुनौती
- ट्रायल कोर्ट की कार्यवाही:
- ट्रायल कोर्ट के समक्ष आपराधिक मामले में कई आरोपी मुकदमे का सामना कर रहे थे।
- विचारण के दौरान तीन सह-आरोपियों ने दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 265B के तहत आवेदन दायर कर प्ली बारगेनिंग का विकल्प चुना।
- ट्रायल कोर्ट ने वैधानिक प्रक्रिया का पालन करते हुए तीनों को धारा 265E के तहत राहत दी और उनके खिलाफ मूल आरोपों का निस्तारण करते हुए आरोप हटा दिए।
- सह-आरोपी की याचिका:
- शेष बचे आरोपी चित्तथद दास ने ट्रायल कोर्ट के इस आदेश के खिलाफ कर्नाटक उच्च न्यायालय में याचिका दायर की।
- दास का मुख्य तर्क था कि चूंकि यह मामला कथित मिलीभगत और षड्यंत्र से जुड़ा है, इसलिए सह-आरोपियों द्वारा अपराध स्वीकार करने से उसके अपने बचाव (Defence) पर प्रतिकूल असर पड़ेगा और अदालत के मन में उसके खिलाफ पूर्व-धारणा बन सकती है।
- हाईकोर्ट का निष्कर्ष:
- उच्च न्यायालय ने पाया कि कानून में प्ली बारगेनिंग के तहत दर्ज की गई स्वीकारोक्ति केवल उसी आरोपी तक सीमित रहती है जिसने इसे स्वीकार किया है।
- इसका प्रभाव सह-आरोपियों के स्वतंत्र विचारण पर नहीं पड़ता और अभियोजन को शेष आरोपियों के विरुद्ध अपना पूरा मामला नए सिरे से साक्ष्यों के साथ साबित करना होगा।
विधिक एवं विधायी विश्लेषण: क्या कहता है कानून?
- CrPC की धारा 265E [वर्तमान BNSS की धारा 293]:
- जब अदालत इस निष्कर्ष पर पहुंचती है कि प्ली बारगेनिंग का आवेदन स्वेच्छा से दिया गया है, तो वह पक्षों को बैठक कर मामले के संतोषजनक निस्तारण (Mutually Satisfactory Disposition) का अवसर देती है।
- इसके तहत अदालत पीड़ित को मुआवजा तय करने के बाद, आरोपी को न्यूनतम सजा के आधे या एक-चौथाई हिस्से का दंड देकर अथवा परिवीक्षा पर रिहा करके मामले का निस्तारण कर सकती है।
- साक्ष्य विधि के तहत सुरक्षा:
- CrPC की धारा 265K [वर्तमान BNSS की धारा 299]: प्ली बारगेनिंग के आवेदन में आरोपी द्वारा दिए गए बयानों या तथ्यों का उपयोग किसी अन्य प्रयोजन के लिए नहीं किया जा सकता।
- भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 30 के तहत भी सह-अभियुक्त की स्वीकारोक्ति केवल एक अत्यंत कमजोर संपुष्टिकारक साक्ष्य मानी जाती है, न कि प्रत्यक्ष ठोस साक्ष्य।
विधिक विवरण
- केस संदर्भ: चित्तथद दास बनाम कर्नाटक राज्य व अन्य [आपराधिक याचिका – कर्नाटक उच्च न्यायालय, प्रधान पीठ Bengaluru]
- पीठ: न्यायमूर्ति वी. श्रीशानंद (एकल पीठ)
- निर्णय की तिथि: 16 सितंबर 2026
- प्रासंगिक कानून एवं विधिक धाराएं:
- दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (CrPC):
- अध्याय XXI-A (प्ली बारगेनिंग – धारा 265A से 265L)
- धारा 265E (प्ली बारगेनिंग के तहत सजा का निर्धारण और मामले का निस्तारण) [समतुल्य: भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 293]
- धारा 265K (स्वीकारोक्ति बयानों का अन्य मामलों में उपयोग वर्जित) [समतुल्य: BNSS की धारा 299]
- धारा 306 (सह-अभियुक्त/सरकारी गवाह को क्षमादान) [समतुल्य: BNSS की धारा 343]
- धारा 482 (उच्च न्यायालय की अंतर्निहित शक्तियां) [समतुल्य: BNSS की धारा 528]
- अपराधी परिवीक्षा अधिनियम, 1958 (Probation of Offenders Act, 1958) की धारा 4
- दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (CrPC):
- संबद्ध न्यायिक सिद्धांत व नजीरें:
- स्टेट ऑफ गुजरात बनाम नटवर हरजीवानभाई ठाकोर (सुप्रीम कोर्ट) — ‘आपराधिक न्यायप्रणाली में मुकदमों के शीघ्र निस्तारण और सुधारवादी दृष्टिकोण के तहत प्ली बारगेनिंग एक महत्वपूर्ण वैधानिक उपकरण है।’
- हरिचरण कुर्मी बनाम बिहार राज्य (सुप्रीम कोर्ट संविधान पीठ) — ‘सह-आरोपी की स्वीकारोक्ति स्वयं ठोस साक्ष्य नहीं है; यह केवल अन्य स्वतंत्र साक्ष्यों से पुष्ट होने पर अदालत के विश्वास को सहारा दे सकती है, लेकिन अकेले इसके दम पर किसी अन्य आरोपी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता।’
- अंतिम निर्णय: आपराधिक याचिका खारिज; ट्रायल कोर्ट द्वारा तीन सह-आरोपियों को प्ली बारगेनिंग का लाभ देने का आदेश बरकरार; शेष आरोपी (याचिकाकर्ता) के खिलाफ स्वतंत्र साक्ष्यों के आधार पर विचारण जारी रखने का निर्देश।
Plea Bargaining: मामले का संक्षिप्त विवरण (At A Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | कर्नाटक उच्च न्यायालय (बेंगलुरु) |
| न्यायाधीश | न्यायमूर्ति वी. श्रीशानंद |
| याचिकाकर्ता | चित्तथड़ दास (Chittathad Das) |
| मूल विवाद | याचिकाकर्ता ने ट्रायल कोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी थी जिसमें तीन सह-आरोपियों को प्ली बार्गेनिंग की अनुमति देकर उनके खिलाफ आरोप हटा दिए गए थे। |
| अदालत का फैसला | याचिका खारिज; सह-आरोपी को प्ली बार्गेनिंग का लाभ लेने से रोका नहीं जा सकता और न ही इससे अन्य का बचाव प्रभावित होता है। |

