आय और वित्तीय बोझ से जुड़े मुख्य तर्क (Key Arguments)
- आय का गलत आकलन:हाईकोर्ट ने पिता की कमाने की क्षमता ₹2.25 लाख प्रति माह आंकी थी। हालांकि, पिता ने अपनी वित्तीय स्थिति का हवाला देते हुए एफिडेविट के जरिए बताया कि उसकी शुद्ध मासिक आय ₹94,175 है और वार्षिक आय ₹15.25 लाख है। उसने तर्क दिया कि हाईकोर्ट के पास पूरी अवधि के लिए उच्च आय का समर्थन करने वाले वर्षवार दस्तावेज नहीं थे।
- आय का 74% हिस्सा भरण-पोषण में:पिता के अनुसार, घरेलू हिंसा अधिनियम (DV Act) के तहत वह अपनी पूर्व पत्नी को पहले से ही ₹20,000 प्रति माह दे रहा है। यदि बच्चे के लिए ₹50,000 और जोड़े जाते हैं, तो कुल देय राशि ₹70,000 प्रति माह हो जाती है, जो उसकी वास्तविक शुद्ध आय का लगभग 74.3% है।
- ‘रजनेश बनाम नेहा’ फैसले का हवाला:पिता ने सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक निर्णय रजनेश बनाम नेहा (Rajnesh v. Neha) का हवाला देते हुए कहा कि भरण-पोषण का निर्धारण आवेदन की तारीख पर संबंधित पक्ष की वास्तविक आय और परिस्थितियों के आधार पर होना चाहिए, न कि सालों बाद आंकी गई काल्पनिक आय पर।
- पिछला भुगतान और बदलती परिस्थितियां:याचिका में बताया गया कि वह 2016 से अब तक बच्चे पर लगभग ₹50 लाख खर्च कर चुका है, जिसमें सेंट जेवियर्स स्कूल की फीस भी शामिल है। इसके अलावा, 2018 में उसकी नौकरी छूटने और हालिया मेडिकल खर्चों जैसे बदलावों को ध्यान में नहीं रखा गया।
नई दिल्ली: वैवाहिक विवादों में गुजारा भत्ता निर्धारण के विधिक सिद्धांत, वास्तविक आय बनाम उपार्जन क्षमता (Earning Capacity) का अंतर, और भरण-पोषण आवेदन की तिथि से एक दशक पुराने बकाए (Arrears) की एकमुश्त वसूली के वित्तीय भार पर सुप्रीम कोर्ट ने विचार करने पर सहमति जताई है।
पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय के आदेश के खिलाफ नोटिस
न्यायमूर्ति के.वी. विश्वनाथन और न्यायमूर्ति अरुण पल्ली की खंडपीठ ने 30 सितंबर 2026 को याचिका पर सुनवाई करते हुए प्रतिवादियों को नोटिस जारी किया। अदालत ने याचिकाकर्ता पिता के वकील की इस दलील को भी रिकॉर्ड पर लिया कि यदि बेटे को पूर्व में अदा की जा रही ₹20,000 की मासिक राशि और स्कूल फीस को समायोजित (Adjust) किया जाए, तो उसकी ओर से कोई बकाया शेष नहीं बचता है। शीर्ष अदालत ने मामले की अगली सुनवाई 30 अक्टूबर 2026 को तय की है। सुप्रीम कोर्ट ने एक पिता द्वारा दायर विशेष अनुमति याचिका (SLP) पर सुनवाई करते हुए पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय के उस आदेश के खिलाफ नोटिस जारी किया है, जिसके तहत नाबालिग बेटे के लिए मासिक गुजारा भत्ता बढ़ाकर ₹50,000 प्रति माह कर दिया गया था और इसे 4 फरवरी 2016 (अर्जी की मूल तिथि) से भूतलक्षी प्रभाव से देय घोषित किया गया था।
सुप्रीम कोर्ट के समक्ष उठाए गए मुख्य विधिक व वित्तीय आधार
1. वास्तविक आय बनाम अनुमानित आय: ‘सालों बाद का आकलन 10 साल पीछे से लागू नहीं हो सकता’ याचिकाकर्ता पिता की मुख्य कानूनी आपत्ति आय के मूल्यांकन के तरीके पर है:
- हाईकोर्ट का आकलन: पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने पुनरीक्षण क्षेत्राधिकार (Revisional Jurisdiction) में पिता की उपार्जन क्षमता का अनुमान ₹2.25 लाख प्रति माह आंका।
- पिता का दस्तावेजी साक्ष्य: पिता ने आय शपथ-पत्र (Income Affidavit), आयकर रिटर्न (ITR) और फॉर्म-16 पेश कर दलील दी कि उसकी वास्तविक शुद्ध मासिक आय (Net Monthly Income) मात्र ₹94,175 है और उसकी वार्षिक परिलब्धियां रिकॉर्ड पर ₹15.25 लाख थीं।
- विधिक सिद्धांत: याचिका में तर्क दिया गया कि किसी विशिष्ट अवधि के लिए भरण-पोषण का निर्धारण उस समय की वास्तविक आय और वित्तीय परिस्थितियों के आधार पर होना चाहिए, न कि वर्षों बाद भविष्य में की गई अनुमानित आय को एक दशक पुरानी पिछली तारीख (2016) से एकसमान रूप से थोप दिया जाए।
2. रजनेश बनाम नेहा के दिशा-निर्देशों का खुला उल्लंघन: पिता ने सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक निर्णय रजनेश बनाम नेहा (2020) का हवाला देते हुए सवाल उठाया:
- क्या आवेदन की तिथि से भरण-पोषण तय करते समय, आवेदन के वर्षों बाद आंकी गई आय को आधार बनाया जा सकता है?
- सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया था कि भरण-पोषण का निर्धारण पक्षकारों की वास्तविक जीवनशैली, देनदारियों और चुकाने की वास्तविक क्षमता (Paying Capacity) के बीच यथार्थवादी संतुलन होना चाहिए, न कि दंडात्मक।
3. शुद्ध आय का 74% भरण-पोषण में जाना: अत्यधिक वित्तीय बोझ याचिका में पिता के ऊपर कुल वित्तीय दायित्वों का ब्योरा दिया गया:
- घरेलू हिंसा अधिनियम (DV Act) के तहत अलग रह रही पत्नी को देय: ₹20,000 प्रति माह।
- हाईकोर्ट द्वारा बेटे के लिए बढ़ाया गया गुजारा भत्ता: ₹50,000 प्रति माह।
- कुल मासिक दायित्व: ₹70,000 प्रति माह, जो पिता की प्रमाणित शुद्ध मासिक आय (₹94,175) का लगभग 74.3 प्रतिशत बैठता है।
- याचिका में कहा गया कि 2018 में नौकरी समाप्त होने (Termination), चिकित्सा व्यय और अन्य व्यक्तिगत देनदारियों के बाद शेष 25% राशि में स्वयं का जीवन यापन करना असंभव है।
मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि: फैमिली कोर्ट से सुप्रीम कोर्ट तक का सफर
- फैमिली कोर्ट का आदेश (25 मई 2023):
- फैमिली कोर्ट ने पिता को निर्देश दिया था कि वह बेटे के लिए ₹20,000 प्रति माह गुजारा भत्ता और उसकी शैक्षिक फीस का वहन करे।
- हाईकोर्ट द्वारा भारी वृद्धि (23 जुलाई 2026):
- दोनों पक्षों ने फैमिली कोर्ट के आदेश के खिलाफ पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट में पुनरीक्षण याचिकाएं दायर की थीं।
- हाईकोर्ट ने 23 जुलाई 2026 के फैसले में भरण-पोषण की राशि को सीधे ₹20,000 से बढ़ाकर ₹50,000 प्रति माह कर दिया और इसे 4 फरवरी 2016 से प्रभावी कर दिया।
- पिता द्वारा पूर्व में किए गए भुगतानों का दावा:
- पिता ने दलील दी कि उसने 2016 से अब तक सेंट जेवियर्स स्कूल (St Xavier’s School) की फीस के अलावा बेटे के कल्याण के लिए लगभग ₹50 लाख का भुगतान विभिन्न किस्तों और अदालती आदेशों के तहत पहले ही कर दिया है, जिसे हाईकोर्ट ने नजरअंदाज कर दिया।
- दोनों पक्षों के बीच 1 जून 2020 को तलाक की डिक्री (Divorce Decree) भी पारित हो चुकी है।
सुप्रीम कोर्ट से मांगी गई राहत
पिता ने अपनी विशेष अनुमति याचिका में निम्नलिखित प्रमुख प्रार्थनाएं की हैं:
- हाईकोर्ट द्वारा बढ़ाई गई ₹50,000 की मासिक राशि को या तो पूरी तरह रद्द किया जाए या यथार्थवादी स्तर तक घटाया जाए।
- यदि कोई वृद्धि रखी भी जाती है, तो उसे 2016 की पुरानी तारीख के बजाय वर्तमान/भविष्य की तारीख (Prospective Effect) से लागू किया जाए।
- 2016 से अब तक स्कूल फीस और मासिक भरण-पोषण के रूप में चुकाई गई लगभग ₹50 लाख की राशि का विधिवत समायोजन (Adjustment) किया जाए।
विधिक विवरण
- केस संदर्भ: विशेष अनुमति याचिका (सिविल) [पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट के निर्णय दिनांक 23 जुलाई 2026 के विरुद्ध]
- पीठ: न्यायमूर्ति के.वी. विश्वनाथन और न्यायमूर्ति अरुण पल्ली (सर्वोच्च न्यायालय)
- आदेश की तिथि: 30 सितंबर 2026
- विधिक प्रतिनिधित्व:
- याचिकाकर्ता (पिता) की ओर से: अधिवक्ता सुमित गहलोत, एडवोकेट-ऑन-रिकॉर्ड (AoR) मुकेश कुमार (साथ में अधिवक्ता मंजू गहलोत, तरवेंद्र ठाकरान, मीनाक्षी सूद एवं सनी चौधरी)
- प्रासंगिक कानून एवं विधिक धाराएं:
- हिंदू दत्तक तथा भरण-पोषण अधिनियम, 1956 (HAMA) की धारा 20 (संतान और आश्रितों का भरण-पोषण)
- दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा 125 [समतुल्य: भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 144] (आश्रितों के गुजारा भत्ते का दावा)
- घरेलू हिंसा से महिला संरक्षण अधिनियम, 2005 की धारा 20 (मौद्रिक राहत)
- भारत का संविधान – अनुच्छेद 136 (सर्वोच्च न्यायालय की विशेष अनुमति याचिका अधिकारिता)
- संबद्ध ऐतिहासिक न्यायिक नजीरें:
- रजनेश बनाम नेहा (2020, सुप्रीम कोर्ट) — ‘भरण-पोषण न तो इतना कम होना चाहिए कि आश्रित विपन्नता में चला जाए और न ही इतना दंडात्मक या अत्यधिक होना चाहिए कि भरण-पोषण देने वाले पति/पिता पर असहनीय वित्तीय बोझ बन जाए; आय शपथ-पत्र और वास्तविक देनदारियों का संतुलन अनिवार्य है।’
- कल्याण डे चौधरी बनाम रीता डे चौधरी (सुप्रीम कोर्ट) — ‘पति की कुल शुद्ध आय का लगभग 25% हिस्सा पत्नी के लिए एक न्यायसंगत और उचित भरण-पोषण माना जाता है; 70-75% का निर्धारण असामान्य और अत्यधिक है।’
- वर्तमान स्थिति: सुप्रीम कोर्ट ने प्रतिवादियों को नोटिस जारी किया; वाद-व्यय जमा करने के संबंध में निर्देश पारित; विस्तृत कानूनी तर्कों पर अंतिम सुनवाई 30 अक्टूबर 2026 को होगी।
Child Maintenance: मामले का संक्षिप्त विवरण (At A Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court of India) |
| पीठ | न्यायमूर्ति के.वी. विश्वनाथन एवं न्यायमूर्ति अरुण पल्ली |
| हाईकोर्ट का फैसला | पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट का 23 जुलाई 2026 का निर्णय (भरण-पोषण ₹20,000 से बढ़ाकर ₹50,000 किया)। |
| मुख्य विवाद | वर्षों पुरानी तारीख (2016) से बढ़ी हुई दर पर भरण-पोषण लागू करने और आय के गलत आकलन को चुनौती। |
| अगली सुनवाई | 30 अक्टूबर 2026 |

