हाईकोर्ट की कड़ी टिप्पणियां और प्रशासनिक निर्देश
हाईकोर्ट ने रजिस्ट्री की इस घोर लापरवाही को गंभीरता से लेते हुए रजिस्ट्रार जनरल को कड़े निर्देश जारी किए:
- न्यायिक आदेशों की पवित्रता: कोर्ट ने कहा कि समय-सीमा तय करने वाले आदेश कोई खाली औपचारिकताएं नहीं हैं। इनका समय पर पालन न होना न्याय व्यवस्था के उद्देश्य को विफल कर देता है।
- केस-मॉनिटरिंग सिस्टम का ऑडिट: रजिस्ट्रार जनरल को मौजूदा केस-मॉनिटरिंग तंत्र की समीक्षा करने, प्रक्रियात्मक खामियों को दूर करने और भविष्य में प्राथमिकता वाले मामलों की समयबद्ध लिस्टिंग सुनिश्चित करने का निर्देश दिया गया।
- प्रशासनिक कार्रवाई: यदि प्रणाली की जांच के दौरान कोई चूक पाई जाती है, तो कानूनी तौर पर प्रशासनिक स्तर पर उचित सुधारात्मक कदम उठाए जाएं।
चंडीगढ़: अदालती आदेशों के अनुपालन में प्रशासनिक रजिस्ट्रियों की घोर लापरवाही, न्यायिक समय-सीमाओं के उल्लंघन और मुकदमों के दशकों तक लंबित रहने से न्याय वितरण प्रणाली पर पड़ने वाले विपरीत प्रभाव पर पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने सख्त आत्मनिरीक्षण और सुधारात्मक रुख अपनाया है।
न्यायमूर्ति संदीप मौदगिल की एकल पीठ ने पंजाब सरकार में स्वीपर-कम-चौकीदार, स्वीपर और चौकीदार के चतुर्थ श्रेणी पदों पर 1997 में हुई भर्ती को चुनौती देने वाली दो संबद्ध याचिकाओं का निस्तारण करते हुए यह टिप्पणियां कीं। अदालत ने पाया कि लगभग तीन दशकों के असाधारण और अस्पष्टीकृत विलंब के कारण कई चयनित अभ्यर्थी पदोन्नत हो चुके हैं, सेवानिवृत्त हो चुके हैं अथवा उनकी मृत्यु हो चुकी है, जिसके चलते नियुक्तियां अंतिम रूप धारण कर चुकी हैं और याचिकाएं अब निष्फल (Infructuous) हो चुकी हैं। उच्च न्यायालय ने भविष्य में ऐसी चूकों को रोकने के लिए रजिस्ट्रार जनरल को केस-मॉनिटरिंग तंत्र का ऑडिट करने का निर्देश दिया है। उच्च न्यायालय ने अपनी ही रजिस्ट्री द्वारा वर्ष 2000 में खंडपीठ द्वारा पारित उस न्यायिक आदेश का 16 वर्षों तक पालन न किए जाने पर “गंभीर चिंता” (Grave Concern) व्यक्त की है, जिसमें याचिका को एक वर्ष के भीतर सुनवाई के लिए सूचीबद्ध (List) करने का स्पष्ट निर्देश दिया गया था।
उच्च न्यायालय के प्रमुख विधिक निष्कर्ष एवं न्यायिक टिप्पणियां
1. न्यायिक समय-सीमाओं की पवित्रता और वादियों का विश्वास: न्यायमूर्ति संदीप मौदगिल ने रजिस्ट्री द्वारा अदालती आदेशों की अनदेखी पर तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा:
“न्यायिक आदेश—विशेष रूप से वे जो मामलों को सूचीबद्ध करने या उनके निस्तारण के लिए समय-सीमाएं (Timelines) तय करते हैं—कोई खोखली औपचारिकताएं (Empty Formalities) नहीं हैं। उनकी पवित्रता उनके निष्ठापूर्ण क्रियान्वयन में ही निहित है। ऐसे निर्देशों का अनुपालन सुनिश्चित करने में विफलता न केवल उन आदेशों के अंतर्निहित उद्देश्य को पराजित करती है, बल्कि समयबद्ध न्यायनिर्णयन को एक छलावा (Illusion) बनाकर न्याय वितरण प्रणाली में वादकारियों के विश्वास को नष्ट करने की क्षमता रखती है।”
2. तीन दशक बाद नियुक्तियों को अस्थिर नहीं किया जा सकता: अदालत ने 16 फरवरी 2026 की नवीनतम स्थिति रिपोर्ट (Status Report) का संज्ञान लेते हुए कहा:
“यह अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है कि लगभग तीन दशकों के असाधारण और अनुत्तरित विलंब के बाद, उन नियुक्तियों को फिर से खोलने और अस्थिर (Unsettle) करने के लिए न्यायिक प्रक्रिया का सहारा लिया जा रहा है, जिन्होंने बहुत पहले ही पर्याप्त स्तर पर अंतिम रूप (Finality) प्राप्त कर लिया है।”
3. पक्षपात के आरोपों पर मात्र संदेह साक्ष्य का विकल्प नहीं:
- चयन प्रक्रिया में मनमानेपन और ‘पिक एंड चूज’ (Pick and Choose) के आरोपों पर अदालत ने कहा कि बदनियती (Mala fides) के आरोपों के लिए ठोस और पुख्ता साक्ष्य की आवश्यकता होती है:“मात्र संदेह (Mere suspicion), चाहे वह कितना भी गहरा क्यों न हो, कभी भी मनमानेपन के पुख्ता प्रमाण का स्थान नहीं ले सकता।”
मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि एवं 16 वर्षों की न्यायिक देरी का घटनाक्रम
- 1997 की चतुर्थ श्रेणी भर्ती:
- पंजाब सरकार ने चतुर्थ श्रेणी (स्वीपर, चौकीदार आदि) के पदों के लिए भर्ती प्रक्रिया शुरू की थी, जिसमें साक्षात्कार जून 1997 में आयोजित किए गए थे।
- याचिकाकर्ताओं (शेशो रानी, बूटा सिंह आदि) ने चयन प्रक्रिया को चुनौती देते हुए आरोप लगाया कि तीन दिनों के भीतर लगभग 3,000 उम्मीदवारों का साक्षात्कार लेकर अपात्र लोगों को चुना गया।
- राज्य सरकार ने स्पष्ट किया कि कुल 1,442 उम्मीदवार उपस्थित हुए थे और चयन समिति ने योग्यता और उपयुक्तता के आधार पर निष्पक्ष चयन किया था।
- 13 जुलाई 2000 का खंडपीठ आदेश:
- उच्च न्यायालय की खंडपीठ ने 13 जुलाई 2000 को रिट याचिका को नियमित सुनवाई के लिए स्वीकार (Admit) किया और रजिस्ट्री को स्पष्ट निर्देश दिया कि इसे एक वर्ष के भीतर (Within one year) अंतिम सुनवाई हेतु सूचीबद्ध किया जाए।
- 2016 तक रजिस्ट्री की निष्क्रियता:
- रजिस्ट्री ने इस बाध्यकारी न्यायिक आदेश का पालन नहीं किया और फाइल को 16 वर्षों तक दबाए रखा।
- याचिका को पहली बार 16 साल बाद 25 अप्रैल 2016 को अदालत के समक्ष सूचीबद्ध किया गया, जहां वकीलों के उपस्थित न होने के कारण इसे गैर-हाजिरी में निष्फल मानकर खारिज कर दिया गया।
- 1 अगस्त 2016 को जब यह तथ्य सामने आया कि देरी में याचिकाकर्ताओं की कोई गलती नहीं थी, तो अदालत ने उस आदेश को वापस लेते हुए याचिका को मूल नंबर पर बहाल (Restored) किया।
प्रशासनिक सुधार: रजिस्ट्रार जनरल को सुधारात्मक ऑडिट का आदेश
उच्च न्यायालय ने मामले का निस्तारण करने से पूर्व रजिस्ट्री की कार्यप्रणाली को दुरुस्त करने के लिए निम्नलिखित प्रशासनिक निर्देश जारी किए:
- केस-मॉनिटरिंग सिस्टम का ऑडिट: रजिस्ट्रार जनरल को निर्देश दिया गया कि वे मौजूदा केस-मॉनिटरिंग तंत्र (Case-monitoring mechanisms) का व्यापक ऑडिट करें और यह जांचें कि प्राथमिकता और समय-सीमा वाले न्यायिक आदेशों के अनुपालन में कहां प्रक्रियात्मक चूक हो रही है।
- संस्थागत तंत्र का सुदृढ़ीकरण: उच्च न्यायालय के समयबद्ध लिस्टिंग आदेशों के कड़े अनुपालन को सुनिश्चित करने के लिए एक प्रभावी और सुव्यवस्थित संस्थागत निगरानी ढांचा (Effective Institutional Mechanism) विकसित किया जाए।
- कमियों को दूर करने की कार्रवाई:“यदि इस समीक्षा के दौरान मौजूदा प्रणाली में कोई भी चूक या कमी पाई जाती है, तो कानून के अनुसार प्रशासनिक स्तर पर उचित सुधारात्मक कदम (Remedial Measures) उठाए जाएंगे। इस निर्णय की एक प्रति आवश्यक अनुपालन हेतु रजिस्ट्रार जनरल के समक्ष रखी जाए।”
विधिक विवरण
- केस संदर्भ: शेशो रानी व अन्य बनाम पंजाब राज्य व अन्य [सिविल रिट याचिका संख्या 9582/2000 एवं संबद्ध याचिका – पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय]
- पीठ: न्यायमूर्ति संदीप मौदगिल (एकल पीठ)
- निर्णय की तिथि: अक्टूबर 2026
- प्रासंगिक संवैधानिक व प्रशासनिक प्रावधान:
- भारत का संविधान:
- अनुच्छेद 226 (उच्च न्यायालय का रिट क्षेत्राधिकार)
- अनुच्छेद 21 (त्वरित न्याय और शीघ्र सुनवाई का अधिकार – Right to Speedy Trial/Justice)
- अनुच्छेद 229 (उच्च न्यायालय के अधिकारियों और कर्मचारियों पर मुख्य न्यायाधीश का प्रशासनिक नियंत्रण)
- पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय नियम एवं आदेश (High Court Rules and Orders – लिस्टिंग और केस ट्रैकिंग प्रक्रियाएं)
- भारत का संविधान:
- संबद्ध न्यायिक सिद्धांत व नजीरें:
- हुसैनआरा खातून बनाम गृह सचिव, बिहार राज्य (सुप्रीम कोर्ट) — ‘समयबद्ध और त्वरित न्याय संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मौलिक अधिकार का अभिन्न अंग है; प्रशासनिक देरी न्याय के मूल उद्देश्य को समाप्त करती है।’
- ई.पी. रोयप्पा बनाम तमिलनाडु राज्य (सुप्रीम कोर्ट) — ‘मनमानेपन और पक्षपात के आरोपों को केवल बयानों से नहीं बल्कि प्रत्यक्ष और पुख्ता साक्ष्यों द्वारा साबित किया जाना चाहिए।’
- अशोक कुमार यादव बनाम हरियाणा राज्य (सुप्रीम कोर्ट) — ‘सार्वजनिक चयनों में अंतिम रूप पा चुकी नियुक्तियों को अत्यधिक विलंब के बाद परेशान नहीं किया जाना चाहिए जब तक कि बड़े पैमाने पर धोखाधड़ी सिद्ध न हो।’
- अंतिम निर्णय: 26 वर्षों के विलंब और नियुक्तियों के अंतिम रूप प्राप्त करने के कारण याचिकाएं निष्फल (Infructuous) घोषित कर निस्तारित; रजिस्ट्रार जनरल को केस लिस्टिंग प्रणाली के प्रशासनिक ऑडिट और अनुपालन तंत्र को दुरुस्त करने का अनिवार्य निर्देश।
Delay In Listing: मामले का संक्षिप्त विवरण (At A Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय |
| पीठ | न्यायमूर्ति संदीप मौदगिल |
| मूल विवाद | पंजाब में स्वीपर-कम-चौकीदार, स्वीपर और चौकीदार की नियुक्तियों को चुनौती देने वाली याचिकाएँ। |
| रजिस्ट्री की लापरवाही | 13 जुलाई 2000 को 1 साल में सूचीबद्ध करने का निर्देश मिला, लेकिन मामला पहली बार 25 अप्रैल 2016 को पेश हुआ (16 साल बाद)। |
| अदालत का फैसला | याचिका निष्प्रभावी (Infructuous) घोषित की गई; रजिस्ट्रार जनरल को केस-मॉनिटरिंग सिस्टम का ऑडिट करने का निर्देश। |

