याचिकाकर्ता के मुख्य तर्क (Key Highlights of the Plea)
- BNSS की धारा 18(6) का उल्लंघन:याचिकाकर्ता का तर्क है कि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS), 2023 की धारा 18(6) के अनुसार, जहाँ नियमित अभियोजन अधिकारी कैडर (Regular Prosecutorial Cadre) मौजूद है, वहाँ लोक अभियोजकों और अतिरिक्त लोक अभियोजकों की नियुक्ति उसी कैडर से की जानी चाहिए। कैडर से बाहर नियुक्ति केवल तभी की जा सकती है जब योग्य उम्मीदवार उपलब्ध न हों।
- दिल्ली में योग्य कैडर की मौजूदगी:याचिका में कहा गया है कि दिल्ली में पहले से ही एक क्रियाशील अभियोजन कैडर मौजूद है जिसमें योग्य अधिकारी उपलब्ध हैं। 2 अप्रैल 2026 की अधिसूचना में ऐसा कोई निष्कर्ष या रिकॉर्ड दर्ज नहीं किया गया है कि कैडर में योग्य उम्मीदवार अनुपलब्ध हैं। इसके बावजूद 15% कोटा तय करके कैडर के समानांतर भर्ती का रास्ता खोला गया है।
- संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 का उल्लंघन:याचिका में आरोप लगाया गया है कि यह अधिसूचना मनमानी, अनुचित और संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) तथा अनुच्छेद 16 (सार्वजनिक रोजगार में अवसर की समानता) का उल्लंघन करती है।
- अदालती कार्यवाही पर प्रभाव:अल्पकालिक संविदात्मक नियुक्तियों और डेपुटेशन पर बाहर से आए अधिकारियों को स्थानीय अदालती प्रथाओं व अभियोजन प्रक्रियाओं का अनुभव नहीं होता। इससे मुकदमों में देरी, अकुशलता और प्रक्रियात्मक अनियमितताएं होंगी, जिसका खामियाजा पीड़ितों को भुगतना पड़ेगा।
नई दिल्ली: आपराधिक न्याय प्रणाली की रीढ़ माने जाने वाले अभियोजन निदेशालय की स्वतंत्रता, नियमित अभियोजक कैडर की अनदेखी और अतिरिक्त लोक अभियोजकों (APPs) के पदों को प्रतिनियुक्ति (Deputation) व अल्पकालिक अनुबंध (Short-term Contract) के आधार पर भरने की वैधता पर दिल्ली हाईकोर्ट ने संज्ञान लिया है।
मुख्य न्यायाधीश देवेंद्र कुमार उपाध्याय और न्यायमूर्ति तेजस कारिया की खंडपीठ ने अधिवक्ता शिप्रा मिश्रा द्वारा दायर जनहित याचिका पर यह आदेश पारित किया। याचिका में दिल्ली सरकार द्वारा 2 अप्रैल 2026 को जारी उस अधिसूचना को चुनौती दी गई है, जिसमें अतिरिक्त लोक अभियोजकों (APPs) के पदों को 85% पदोन्नति (Promotion) और 15% प्रतिनियुक्ति/संविदा (Deputation/Contractual Engagement) के माध्यम से भरने की व्यवस्था की गई है। अदालत ने मामले की अगली सुनवाई 4 नवंबर 2026 को नियत की है। उच्च न्यायालय ने दिल्ली सरकार की उस अधिसूचना के खिलाफ दायर एक जनहित याचिका (PIL) पर राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली सरकार (GNCTD) को औपचारिक नोटिस जारी कर दो सप्ताह के भीतर जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है।
याचिका में उठाए गए प्रमुख विधिक व संवैधानिक आधार
1. BNSS, 2023 की धारा 18(6) के वैधानिक अधिदेश का खुला उल्लंघन: याचिकाकर्ता की ओर से पेश वकीलों ने दलील दी कि संसद द्वारा अधिनियमित भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) की धारा 18(6) [पूर्ववर्ती CrPC धारा 24(6)] स्पष्ट रूप से यह अनिवार्य करती है कि जहां राज्य में अभियोजन अधिकारियों का एक नियमित कैडर मौजूद हो, वहां लोक अभियोजक (PP) और अतिरिक्त लोक अभियोजक (APP) की नियुक्ति केवल और केवल उसी नियमित कैडर के अधिकारियों में से ही की जानी चाहिए।
- कानून में एकमात्र अपवाद यह है कि जब राज्य सरकार की राय में उस कैडर में कोई उपयुक्त व्यक्ति नियुक्ति के लिए उपलब्ध न हो।
- याचिका में रेखांकित किया गया कि दिल्ली में पूरी तरह सक्रिय और योग्य सहायक लोक अभियोजकों (APPs/Prosecuting Officers) का नियमित संवर्ग मौजूद है। इसके बावजूद अधिसूचना में कहीं भी यह दर्ज नहीं किया गया कि कैडर के अधिकारी अनुपलब्ध हैं।
2. अभियोजन सेवा में समानांतर प्रवेश द्वार (Parallel Route of Entry): याचिका में आरोप लगाया गया है कि 15% का कोटा बनाकर सरकार ने नियमित कैडर को दरकिनार करते हुए अभियोजन सेवा में पिछले दरवाजे से समानांतर प्रवेश का मार्ग तैयार किया है: “आक्षेपित अधिसूचना पूरी तरह मनमानी, अनुचित और भारत के संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 का उल्लंघन करती है। ‘अल्पकालिक संविदात्मक नियुक्ति’ (Short-term contractual engagement) की व्यवस्था केवल भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 18(6) में निहित विधायी अधिदेश को विफल और दरकिनार (Circumvent) करने का एक प्रशासनिक हथकंडा है।”
3. पीड़ितों के अधिकारों पर प्रतिकूल प्रभाव और अदालती प्रक्रिया में अक्षमता का खतरा: याचिका में प्रतिनियुक्ति पर बाहरी व्यक्तियों को लाने के गंभीर व्यावहारिक खतरों को रेखांकित किया गया: “स्थानीय अदालती कार्यप्रणाली, क्षेत्रीय जांच प्रक्रियाओं और अभियोजन नियमों से अनभिज्ञ प्रतिनियुक्तियों (Deputationists) का मनमाना प्रवेश अंततः अक्षमता, कार्यवाहियों में देरी और प्रक्रियात्मक अनियमितताओं को जन्म देगा। इससे पीड़ितों के निष्पक्ष न्याय के अधिकारों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा और आपराधिक न्याय प्रणाली में जनता का विश्वास कमजोर होगा।”
मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि
- 2 अप्रैल 2026 की अधिसूचना:
- दिल्ली सरकार के गृह विभाग द्वारा एक अधिसूचना जारी की गई, जिसमें अतिरिक्त लोक अभियोजकों (APPs) के भर्ती और सेवा नियमों में संशोधन किया गया।
- इसके तहत कुल रिक्तियों में से 85% पद नियमित पदोन्नति द्वारा और 15% पद केंद्रीय/अन्य राज्य सेवाओं से प्रतिनियुक्ति या वकीलों के अल्पकालिक संविदात्मक अनुबंध द्वारा भरे जाने का प्रावधान किया गया।
- जनहित याचिका (PIL) के माध्यम से चुनौती:
- अधिवक्ता शिप्रा मिश्रा ने इसे उच्च न्यायालय में चुनौती देते हुए कहा कि अभियोजक राज्य की ओर से स्वतंत्र, निष्पक्ष और संस्थागत रूप से सुरक्षित अधिकारी के रूप में कार्य करते हैं।
- अल्पकालिक ठेके या मनमानी प्रतिनियुक्ति पर नियुक्त वकीलों में संस्थागत जवाबदेही और सेवा सुरक्षा का अभाव होता है, जिससे अभियोजन तंत्र की निष्पक्षता प्रभावित होती है।
विधिक एवं विधायी विश्लेषण: क्या कहता है कानून?
- भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 18(6):
- “जहां किसी राज्य में अभियोजन अधिकारियों का कोई नियमित काडर विद्यमान है, वहां राज्य सरकार केवल ऐसे व्यक्तियों में से ही लोक अभियोजक या अपर लोक अभियोजक नियुक्त करेगी, जो ऐसे काडर के गठित करने वाले व्यक्तियों में से हों: परंतु जहां राज्य सरकार की यह राय है कि ऐसे काडर में से कोई उपयुक्त व्यक्ति ऐसी नियुक्ति के लिए उपलब्ध नहीं है…”
- यह वैधानिक सुरक्षा इसलिए जोड़ी गई थी ताकि कार्यपालिका अपनी पसंद के वकीलों को राजनीतिक या प्रशासनिक आधार पर मनमाने ढंग से नियमित अभियोजक के पदों पर न बिठा सके।
- संविधान के अनुच्छेद 14 और 16:
- कैडर में सेवारत योग्य अधिकारियों के पदोन्नति के वैध अवसरों (Legitimate Expectation of Promotion) को मनमाने प्रशासनिक आदेशों से छीना नहीं जा सकता।
विधिक विवरण
- केस संदर्भ: शिप्रा मिश्रा बनाम राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली सरकार [जनहित याचिका (W.P.(C)) – दिल्ली उच्च न्यायालय]
- पीठ: मुख्य न्यायाधीश देवेंद्र कुमार उपाध्याय और न्यायमूर्ति तेजस कारिया (खंडपीठ)
- विधिक प्रतिनिधित्व:
- याचिकाकर्ता की ओर से: अधिवक्ता डॉ. हेमंत गुप्ता, रोनी जॉन एवं आकाश अग्रवाल
- प्रतिवादी दिल्ली सरकार की ओर से: अधिवक्ता अवनीश अहलावत, तानिया अहलावत, नितेश कुमार सिंह, अलीज़ा आलम एवं मोहनीश सहरावत
- प्रासंगिक कानून एवं विधिक धाराएं:
- भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS):
- धारा 18 (लोक अभियोजक एवं अतिरिक्त लोक अभियोजक की नियुक्ति का वैधानिक ढांचा)
- धारा 18(6) (नियमित अभियोजक कैडर से ही नियुक्ति की वैधानिक अनिवार्यता) [समतुल्य: पूर्ववर्ती CrPC धारा 24(6)]
- धारा 20 (अभियोजन निदेशालय की स्थापना एवं शक्तियां)
- भारत का संविधान:
- अनुच्छेद 14 (विधि के समक्ष समानता एवं मनमानेपन पर रोक)
- अनुच्छेद 16 (सार्वजनिक नियोजन के मामलों में अवसर की समानता)
- अनुच्छेद 226 (उच्च न्यायालय का रिट क्षेत्राधिकार)
- भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS):
- संबद्ध न्यायिक सिद्धांत व नजीरें:
- के.जे. जॉन बनाम राज्य (सुप्रीम कोर्ट) — ‘अभियोजक की स्वतंत्रता और नियमित कैडर की प्राथमिकता आपराधिक विचारण की शुचिता के लिए अनिवार्य है।’
- दिल्ली अभियोजन अधिकारी संघ बनाम दिल्ली सरकार — ‘राज्य सरकार को नियमित कैडर के अधिकारियों की पदोन्नति और सेवा शर्तों की रक्षा करनी चाहिए और मनमानी संविदा व्यवस्था से बचना चाहिए।’
- वर्तमान स्थिति: दिल्ली सरकार को दो सप्ताह के भीतर विस्तृत जवाब (Counter Affidavit) दाखिल करने का निर्देश; मामले की अगली सुनवाई 4 नवंबर 2026 को नियत।
Short Term: मामले का संक्षिप्त विवरण (At A Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | दिल्ली उच्च न्यायालय (Delhi High Court) |
| पीठ | मुख्य न्यायाधीश देवेंद्र कुमार उपाध्याय एवं न्यायमूर्ति तेजस कारिया |
| याचिकाकर्ता | अधिवक्ता शिप्रा मिश्रा (Advocate Shipra Mishra) |
| विपक्ष | दिल्ली राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र सरकार (Govt of NCT of Delhi) |
| चुनौतीपूर्ण अधिसूचना | 2 अप्रैल 2026 की अधिसूचना (85% पद पदोन्नति से और 15% पद डेपुटेशन/अनुबंध से भरने का प्रावधान) |
| संबंधित कानून | भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS), 2023 की धारा 18(6) |

