Friday, September 25, 2026
HomeLaw Firms & Assoc.Court Fee: वाद, प्रतिदावे या अपील के समझौते से निपटारे पर कोर्ट...

Court Fee: वाद, प्रतिदावे या अपील के समझौते से निपटारे पर कोर्ट फीस की पूरी वापसी पक्षकारों का मूल वैधानिक अधिकार है; अलग अर्जी लगाने की जरूरत नहीं

हाईकोर्ट का मुख्य आदेश और निर्देश

  1. कोर्ट फीस की वापसी मौलिक वैधानिक अधिकार (Statutory Entitlement): पीठ ने कहा कि कोर्ट फीस एक्ट की धारा 16 में दिल्ली सरकार द्वारा किए गए संशोधन के बाद, मामला सुलझने पर कोर्ट फीस की वापसी एक वैधानिक अधिकार है:“जब भी कोई मामला सिविल प्रक्रिया संहिता (CPC) की धारा 89 का सहारा लेकर या बिना सहारा लिए आपसी समझौते से सुलझता है, तो अदालत को केस का निपटारा करते समय पूरी कोर्ट फीस रिफंड करने का निर्देश देना चाहिए। इसके लिए अदालत स्वयं एक प्रमाण पत्र जारी करे, ताकि पक्षकारों को अलग से चक्कर न लगाने पड़ें।” — दिल्ली हाईकोर्ट
  2. समयबद्ध (Time-bound) रिफंड प्रक्रिया: अदालत ने दिल्ली सरकार (GNCTD) को निर्देश दिया कि वह प्रशासनिक कदम उठाए ताकि जैसे ही पक्षकार कोर्ट द्वारा जारी प्रमाण पत्र प्रस्तुत करें, उन्हें एक निश्चित समय-सीमा के भीतर फीस की राशि वापस मिल जाए।
  3. सभी जिला अदालतों को सर्कुलर भेजने का आदेश: हाईकोर्ट ने इस आदेश को दिल्ली के सभी प्रधान जिला एवं सत्र न्यायाधीशों (Principal District and Sessions Judges) को भेजने का निर्देश दिया है ताकि सभी अधीनस्थ अदालतें इस प्रक्रिया का पालन करें।

नई दिल्ली: दिल्ली हाईकोर्ट ने मुकदमों के वैकल्पिक समाधान, मध्यस्थता/सुलह के माध्यम से विवादों के सौहार्दपूर्ण निपटारे को बढ़ावा देने, और कोर्ट फीस रिफंड से जुड़ी प्रक्रियागत जटिलताओं को समाप्त करने पर एक अत्यंत महत्वपूर्ण विधिक फैसला सुनाया है।

न्यायमूर्ति अनिल क्षेत्रपाल और न्यायमूर्ति भारत पराशर की खंडपीठ ने निर्देश दिया है कि समझौते के आधार पर मामले का निस्तारण करते समय अदालतों को अलग से अर्जी मांगने के बजाय आदेश के साथ ही सीधे ‘रिफंड सर्टिफिकेट’ (Refund Certificate) जारी करना चाहिए। अदालत ने इस आदेश को राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली के सभी प्रधान जिला एवं सत्र न्यायाधीशों (Principal District and Sessions Judges) को प्रसारित करने का भी निर्देश दिया है ताकि अधीनस्थ अदालतों में एकरूपता लाई जा सके। उच्च न्यायालय ने स्पष्ट रूप से व्यवस्था दी है कि जब भी किसी दीवानी वाद (Suit), प्रतिदावे (Counter-claim) या अपील (Appeal) का निपटारा पक्षकारों के बीच आपसी समझौते (Amicable Settlement) के आधार पर होता है, तो जमा की गई संपूर्ण कोर्ट फीस की वापसी पक्षकारों का “मूल वैधानिक अधिकार” (Substantive Statutory Entitlement) है।

उच्च न्यायालय के प्रमुख विधिक निष्कर्ष एवं बाध्यकारी निर्देश

1. ‘कोर्ट फीस रिफंड मूल वैधानिक हक, अलग अर्जी की बाध्यता समाप्त’: खंडपीठ दिल्ली सरकार द्वारा कोर्ट फीस अधिनियम की धारा 16 में किए गए विधायी संशोधन का विश्लेषण करते हुए खंडपीठ ने अपने आदेश में दर्ज किया: “पूर्वोक्त के आलोक में, जब भी किसी मामले का निपटारा सिविल प्रक्रिया संहिता (CPC) की धारा 89 में संदर्भित किसी भी माध्यम को लागू करके या उसके बिना (स्वतंत्र समझौते से) किया जाता है, तो अदालत मामले का निपटारा करते समय कोर्ट फीस की वापसी का स्वतः निर्देश देगी। अदालत दावे/प्रतिदावे के संबंध में कोर्ट फीस की पूरी राशि वापस प्राप्त करने के लिए पक्षकारों को अधिकृत करने वाला एक प्रमाणपत्र (Refund Certificate) भी जारी करेगी, जिससे पक्षकारों द्वारा ऐसा रिफंड मांगने के लिए अलग से कोई औपचारिक आवेदन करने की आवश्यकता समाप्त हो जाएगी।”

2. दिल्ली सरकार को समयबद्ध भुगतान और प्रशासनिक तंत्र बनाने का निर्देश

  • अदालत ने संज्ञान लिया कि रिफंड का अदालती आदेश होने के बावजूद सरकारी खजाने (Treasury) और राजस्व विभाग से वास्तविक भुगतान प्राप्त करने में पक्षकारों को महीनों तक चक्कर काटने पड़ते हैं।
  • इस विसंगति को दूर करने के लिए खंडपीठ ने निर्देश दिया:“दिल्ली सरकार के स्थायी वकील (सिविल) से अनुरोध किया जाता है कि वे संबंधित राजस्व व प्रशासनिक प्राधिकारियों से यह सुनिश्चित कराएं कि इस प्रकार के सभी मामलों में सर्टिफिकेट प्रस्तुत किए जाने पर समयबद्ध तरीके से रिफंड जारी करने के आवश्यक प्रशासनिक कदम उठाए जाएं, ताकि अदालतों में इसके लिए अनावश्यक मुकदमेबाजी को टाला जा सके।”

3. सीपीसी की धारा 89 का दायरा: केवल मध्यस्थता ही नहीं, निजी समझौता भी शामिल

  • खंडपीठ ने साफ किया कि कोर्ट फीस वापसी का लाभ केवल लोक अदालत या आधिकारिक मध्यस्थता केंद्र (Mediation) के जरिए हुए फैसलों तक सीमित नहीं है।
  • यदि पक्षकार अदालत के बाहर आपसी बातचीत से भी किसी निष्पक्ष और वैध समझौते पर पहुंचते हैं और वाद वापस लिया जाता है, तब भी वे पूरी कोर्ट फीस वापस पाने के समान रूप से हकदार हैं।

Also Read; Delhi Govt: असिस्टेंट पब्लिक प्रॉसिक्यूटर भर्ती में 3 साल के वकालत अनुभव की अनिवार्यता मनमानी; नए वकीलों को भी मिले मौका, PIL को सभी जरूर पढ़ें

मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि

  • व्यावसायिक विवाद और अपील: यह मामला ‘हाईटेक एंटरप्राइजेज’ (Hitech Enterprises) और ‘मॉडर्न कंस्ट्रक्शन कंपनी दिल्ली’ (Modern Construction Company Delhi) के बीच एक व्यावसायिक अपील से जुड़ा था।
  • समझौता और रिफंड की मांग: अपील लंबित रहने के दौरान दोनों पक्षों ने आपसी सहमति से विवाद को पूरी तरह सुलझा लिया और मामले के निस्तारण के साथ ही अपीलकर्ता ने जमा की गई लाखों रुपये की कोर्ट फीस वापस करने की प्रार्थना करते हुए विविध आवेदन दायर किया।
  • अदालती निर्णय: हाईकोर्ट ने अपील का निस्तारण करते हुए पूरी कोर्ट फीस की वापसी का प्रमाणपत्र जारी किया और इस संबंध में एक सामान्य विधिक व्यवस्था निर्धारित की।

विधिक विवरण

  • केस संदर्भ: हाईटेक एंटरप्राइजेज बनाम मॉडर्न कंस्ट्रक्शन कंपनी दिल्ली [RFA / विधिक विविध आवेदन – दिल्ली उच्च न्यायालय]
  • विधिक प्रतिनिधित्व:
    • अपीलकर्ता (हाईटेक एंटरप्राइजेज) की ओर से: अधिवक्ता परवीन कुमार अग्रवाल एवं पीयूष बिस्वास
    • प्रतिवादी (मॉडर्न कंस्ट्रक्शन) की ओर से: अधिवक्ता सुमित के. बत्रा
  • प्रासंगिक कानून एवं सांविधिक प्रावधान:
    • कोर्ट फीस अधिनियम, 1870 (Court Fees Act, 1870) की धारा 16 (दिल्ली राज्य संशोधन द्वारा प्रतिस्थापित – समझौते पर फीस की पूर्ण वापसी)
    • सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (CPC) की धारा 89 (अदालत के बाहर विवादों का निपटारा – मध्यस्थता, सुलह, लोक अदालत और मध्यस्थता मंच)
    • सिविल प्रक्रिया संहिता का आदेश XXIII नियम 3 (वाद का समझौता व वापसी)
  • संबद्ध न्यायिक सिद्धांत व नजीरें:
    • द नूतन को-ऑपरेटिव बैंक लिमिटेड (सुप्रीम कोर्ट) एवं सुलह प्रोत्साहन न्यायशास्त्र — ‘अदालतों पर मुकदमों के अत्यधिक बोझ को कम करने और वैकल्पिक समाधान को प्रोत्साहित करने के लिए कोर्ट फीस रिफंड के प्रावधानों का उदारतापूर्वक और पक्षकारों के हित में निर्वचन किया जाना चाहिए।’
  • पीठ: न्यायमूर्ति अनिल क्षेत्रपाल और न्यायमूर्ति भारत पराशार (दिल्ली उच्च न्यायालय)
  • निर्देश: आदेश की प्रति दिल्ली की सभी जिला अदालतों (District Judiciary) में तत्काल अनुपालन हेतु भेजी गई।

Court Fee: मामले का संक्षिप्त विवरण (At a Glance)

विवरणजानकारी
संबंधित अदालतदिल्ली उच्च न्यायालय (Delhi High Court)
पीठ के न्यायाधीशन्यायमूर्ति अनिल खेत्रपाल एवं न्यायमूर्ति भारत पराशर
मामलाHitech Enterprises v. Modern Construction Company Delhi
मुख्य कानूनी आधारकोर्ट फीस एक्ट (दिल्ली संशोधन) की धारा 16 और CPC की धारा 89
हाईकोर्ट का मुख्य निर्देशसमझौते के आधार पर केस का निपटारा करते समय कोर्ट खुद फीस वापसी का प्रमाण पत्र (Certificate) जारी करे
RELATED ARTICLES

Most Popular

Patna
overcast clouds
23.1 ° C
23.1 °
23.1 °
94 %
10kmh
100 %
Fri
27 °
Sat
30 °
Sun
32 °
Mon
31 °
Tue
33 °

Recent Comments