मामले के मुख्य तथ्य (Key Highlights)
- पति का दावा:पति ने अदालत के सामने इंस्टाग्राम चैट्स के प्रिंटआउट्स पेश करते हुए दावा किया कि उसकी पत्नी एक वकील के साथ व्यभिचार के संबंध में है, इसलिए CrPC की धारा 125(4) [अब BNSS की धारा 144(4)] के तहत वह गुजारा भत्ता पाने की हकदार नहीं है।
- ‘Living in Adultery’ का कानूनी अर्थ:हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि कानून में दिए गए शब्द “व्यभिचार में रहना” (Living in Adultery) का अर्थ किसी निरंतर, आदत बन चुकी या जारी व्यभिचारी जीवनशैली से है।अदालत ने कहा:“यहां तक कि अगर अनसत्यापित चैट्स को देखा भी जाए, तो बिना शारीरिक निकटता या सहवास के ठोस सबूतों के केवल सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर किए गए टेक्स्ट मैसेज कानूनी रूप से यह साबित करने के लिए पूरी तरह अपर्याप्त हैं कि पत्नी लगातार ‘व्यभिचार में रह रही है’।”
- छिटपुट घटना या बातचीत व्यभिचार नहीं:कोर्ट ने आगे जोड़ा कि यह शब्द किसी एक छिटपुट घटना या केवल बातचीत/बातचीत के आदान-प्रदान, पेशेवर संबंधों या निराधार संदेहों को अपने अंदर शामिल नहीं करता।
- इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य (Section 65B) की कमी:अदालत ने यह भी नोट किया कि डिजिटल साक्ष्य में हेरफेर की संभावना रहती है, इसलिए भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 65-B (अब भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 2023 / BSB की धारा 63) के तहत अनिवार्य प्रमाण पत्र (Certificate) प्रस्तुत करना आवश्यक होता है, जो पति ने पेश नहीं किया था।
प्रयागराज: वैवाहिक संबंधों में सोशल मीडिया चैट्स के विधिक मूल्य, इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों की ग्राह्यता और दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 125 [अब भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 144] के तहत पत्नी को भरण-पोषण (Maintenance) से वंचित करने के लिए “व्यभिचार में रहने” (Living in Adultery) के विधिक मानकों पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक स्पष्ट और व्यावहारिक फैसला सुनाया है।
पत्नी के पक्ष में दिए गए भरण-पोषण आदेश को चुनौती दी थी
न्यायमूर्ति जय कृष्ण उपाध्याय की एकल पीठ ने पति द्वारा दायर उस पुनरीक्षण याचिका (Revision Petition) को खारिज कर दिया, जिसमें उसने फैमिली कोर्ट द्वारा पत्नी के पक्ष में दिए गए भरण-पोषण आदेश को चुनौती दी थी। पति का मुख्य तर्क था कि उसकी पत्नी एक वकील के साथ इंस्टाग्राम पर बातचीत करती है और उसके साथ व्यभिचारी रिश्ते में है, इसलिए वह कानूनन गुजारा भत्ता पाने की हकदार नहीं है। उच्च न्यायालय ने इन अप्रमाणित इंस्टाग्राम चैट्स को कानूनी रूप से पूरी तरह अपर्याप्त मानते हुए फैमिली कोर्ट का भरण-पोषण आदेश बरकरार रखा। उच्च न्यायालय ने व्यवस्था दी है कि केवल सोशल मीडिया पर संदेशों के आदान-प्रदान या चैटिंग के आधार पर किसी पत्नी पर लगातार व्यभिचार में रहने का आरोप नहीं मढ़ा जा सकता, जब तक कि शारीरिक निकटता (Physical Intimacy) या साथ रहने (Cohabitation) का कोई ठोस और संपुष्टिकारक साक्ष्य पेश न किया जाए।
उच्च न्यायालय के प्रमुख विधिक निष्कर्ष एवं न्यायिक टिप्पणियां
1. सोशल मीडिया चैट व्यभिचार का सबूत नहीं: न्यायमूर्ति जय कृष्ण उपाध्याय की एकल पीठ ने सोशल मीडिया संदेशों की विधिक सीमा स्पष्ट करते हुए कहा:“तर्क के लिए यदि इन असत्यापित चैट्स की सामग्री पर विचार भी कर लिया जाए, तो किसी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर महज टेक्स्ट संदेश (Mere text messages), शारीरिक निकटता (Physical Intimacy) या सहवास (Cohabitation) के पुष्टिकारक साक्ष्य के बिना, कानूनी रूप से यह स्थापित करने के लिए पूरी तरह से अपर्याप्त हैं कि पत्नी निरंतर ‘व्यभिचार में रह रही है’ (Living in Adultery)।”
2. ‘व्यभिचार में रहने’ (Living in Adultery) का वास्तविक विधिक अर्थ: अदालत ने CrPC की धारा 125(4) / BNSS की धारा 144(4) की व्याख्या करते हुए कहा:
- ‘व्यभिचार में रहना’ किसी आकस्मिक, छिटपुट या एक बार की चूक (Single, Fleeting Lapse) को नहीं दर्शाता।
- यह एक निरंतर, जारी और आदतन व्यभिचारी आचरण (Continuous, Ongoing and Habitual Course of Adulterous Conduct) को प्रकट करता है।
- अदालत ने जोर देकर कहा:“इसे केवल बातचीत के संपर्कों, पेशेवर संबंधों या निराधार संदेहों (Unsubstantiated Suspicions) से नहीं निकाला जा सकता। एक पति द्वारा भरण-पोषण के दावे को दहलीज पर ही खारिज कराने के लिए स्पष्ट, ठोस और अकाट्य साक्ष्य पेश किया जाना अनिवार्य है।”
3. धारा 65-B प्रमाणपत्र का अभाव: डिजिटल साक्ष्य अस्वीकार्य
- अदालत ने यह भी रेखांकित किया कि डिजिटल डेटा में छेड़छाड़ की संभावनाओं को देखते हुए इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य को भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 65-B [अब भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 2023 की धारा 63] के कड़े मानकों के अनुरूप अनिवार्य वैधानिक प्रमाण पत्र के साथ पेश किया जाना चाहिए।
- वर्तमान मामले में, पति ने इंस्टाग्राम चैट के केवल सामान्य प्रिंटआउट पेश किए थे और कानूनन अनिवार्य धारा 65-B का प्रमाण पत्र संलग्न नहीं किया था, जिसके कारण वे साक्ष्य के रूप में स्वतः अग्राह्य हो गए।
मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि
- फैमिली कोर्ट का भरण-पोषण आदेश:
- फैमिली कोर्ट ने पत्नी की दयनीय वित्तीय स्थिति और वैवाहिक दायित्वों को देखते हुए पति को अपनी पत्नी को मासिक भरण-पोषण देने का आदेश दिया था।
- पति की दलील और इंस्टाग्राम चैट्स:
- पति ने इस आदेश के खिलाफ हाईकोर्ट में याचिका दायर कर दावा किया कि पत्नी CrPC की धारा 125(4) के तहत भरण-पोषण से अयोग्य (Disentitled) है क्योंकि वह “व्यभिचार में जीवन यापन” कर रही है।
- अपने आरोप के समर्थन में पति ने इंस्टाग्राम के कुछ मैसेज स्क्रीनशॉट्स/प्रिंटआउट्स पेश किए, जिनमें कथित तौर पर पत्नी और एक स्थानीय वकील के बीच संवाद दर्ज था।
- अदालत का फैसला:
- उच्च न्यायालय ने पाया कि पति के पास चैटिंग के अलावा दोनों के बीच किसी शारीरिक संबंध या सहवास का कोई स्वतंत्र गवाह या प्रमाण नहीं है।
- डिजिटल साक्ष्य का कानूनी सत्यापन न होने और आरोपों के अत्यधिक कमजोर होने के कारण अदालत ने पति की याचिका खारिज कर दी।
विधिक एवं विधायी विश्लेषण
- BNSS धारा 144(4) [पूर्ववर्ती CrPC धारा 125(4)]:
- कानून के अनुसार, कोई भी पत्नी अपने पति से भरण-पोषण या अंतरिम गुजारा भत्ता प्राप्त करने की हकदार नहीं होगी यदि:
- वह व्यभिचार में रह रही हो (Living in adultery); अथवा
- बिना किसी पर्याप्त कारण के अपने पति के साथ रहने से इनकार करती हो; अथवा
- वे दोनों आपसी सहमति से अलग रह रहे हों।
- न्यायशास्त्र में “व्यभिचार में रहने” का अर्थ किसी अन्य व्यक्ति के साथ एक समानांतर दांपत्य या अर्ध-वैवाहिक सहवास (Quasi-permanent adulterous relationship) स्थापित करना है, न कि केवल किसी मित्र या परिचित से चैट करना।
- कानून के अनुसार, कोई भी पत्नी अपने पति से भरण-पोषण या अंतरिम गुजारा भत्ता प्राप्त करने की हकदार नहीं होगी यदि:
- डिजिटल साक्ष्य की विश्वसनीयता:
- सुप्रीम कोर्ट के अर्जुन पंडितराव खोतकर बनाम कैलाश कुशनराव गोरंट्याल (2020) निर्णय के अनुसार, द्वितीयक इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड (जैसे प्रिंटआउट, सीडी, पेन ड्राइव) को धारा 65-B(4) प्रमाणपत्र के बिना अदालत में साक्ष्य के रूप में स्वीकार नहीं किया जा सकता।
विधिक विवरण
- केस संदर्भ: पुनरीक्षण याचिकाकर्ता (पति) बनाम उत्तरदाता (पत्नी) [आपराधिक पुनरीक्षण याचिका – इलाहाबाद उच्च न्यायालय]
- पीठ: न्यायमूर्ति जय कृष्ण उपाध्याय (एकल पीठ)
- निर्णय की तिथि: अक्टूबर 2026
- विधिक प्रतिनिधित्व:
- याचिकाकर्ता (पति) की ओर से: अधिवक्ता देवदीप मालवीय
- उत्तरदाता (पत्नी) की ओर से: अधिवक्ता आशुतोष उपाध्याय
- प्रासंगिक कानून एवं विधिक धाराएं:
- भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS):
- धारा 144(1) एवं 144(4) [पूर्ववर्ती दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (CrPC) की धारा 125(1) व 125(4) — व्यभिचार में रहने पर भरण-पोषण का निषेध]
- भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 2023 (BSA):
- धारा 63 [पूर्ववर्ती भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 की धारा 65-B — इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य की ग्राह्यता हेतु अनिवार्य प्रमाण पत्र]
- भारत का संविधान – अनुच्छेद 21 (गरिमापूर्ण जीवन और सामाजिक सुरक्षा का अधिकार)
- भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS):
- संबद्ध ऐतिहासिक न्यायिक नजीरें:
- कस्तूरी बनाम रामस्वामी (मद्रास हाईकोर्ट) एवं विभिन्न सुप्रीम कोर्ट नजीरें — ‘धारा 125(4) के तहत “व्यभिचार में रहना” एक निरंतर और आदतन आचरण को दर्शाता है; एक बार की बातचीत या संदिग्ध आचरण गुजारा भत्ता रोकने के लिए पर्याप्त नहीं है।’
- अर्जुन पंडितराव खोतकर बनाम कैलाश गोरंट्याल (2020, 3-जज बेंच) — ‘इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड की ग्राह्यता के लिए धारा 65-B का प्रमाणपत्र अनिवार्य वैधानिक पूर्व-शर्त है।’
- अंतिम निर्णय: आपराधिक पुनरीक्षण याचिका पूरी तरह खारिज; इंस्टाग्राम चैट के आधार पर व्यभिचार का दावा अस्वीकार; फैमिली कोर्ट का भरण-पोषण आदेश यथावत बरकरार।
Direct Message: मामले का संक्षिप्त विवरण (At A Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | इलाहाबाद उच्च न्यायालय (Allahabad High Court) |
| पीठ | न्यायमूर्ति जय कृष्ण उपाध्याय |
| पति का तर्क | इंस्टाग्राम (Instagram) पर एक वकील के साथ बातचीत के प्रिंटआउट पेश कर पत्नी पर व्यभिचार का आरोप लगाया और गुजारा भत्ता देने से इनकार किया। |
| संबंधित कानून | CrPC की धारा 125(4) / BNSS की धारा 144(4) – व्यभिचार में रहने पर भरण-पोषण से इनकार |
| अदालत का फैसला | पति की याचिका खारिज; इंस्टाग्राम चैट व्यभिचार साबित करने के लिए पूरी तरह अपर्याप्त हैं। |

