मुख्य संकेतक और अदालती टिप्पणियां (Key Highlights)
- कानून की वैधता बरकरार:हाईकोर्ट ने माना कि दिल्ली नियम, 2009 का नियम 22(3)(1) मूल अधिनियम (Senior Citizens Act, 2007) की धारा 22 और 32 से अपनी शक्तियां प्राप्त करता है। अदालत ने कहा:“2009 के नियमों का नियम 22(3)(1) वरिष्ठ नागरिकों या माता-पिता को भरण-पोषण न मिलने और दुर्व्यवहार के कारण होने वाले कष्टों को दूर करने के लिए राहत प्रदान करता है। इस प्रावधान को संविधान के अधिकारों से परे (Ultra Vires) घोषित नहीं किया जा सकता।”
- साझा घर में रहने का अधिकार बनाम बुजुर्गों का शांतिपूर्ण जीवन:याचिकाकर्ता (बहू) ने तर्क दिया था कि वरिष्ठ नागरिक अधिनियम में बेदखली का स्पष्ट उल्लेख नहीं है और यह घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम, 2005 (DV Act) के तहत उसके ‘साझा घर’ (Shared Household) में रहने के अधिकार का उल्लंघन करता है।हाईकोर्ट ने इस तर्क को खारिज करते हुए कहा कि साझा घर में रहने का अधिकार निरपेक्ष (Absolute) नहीं है और इसे सास के शांतिपूर्वक जीने के अधिकार के साथ संतुलित किया जाना चाहिए।
- मामले के तथ्य:कोर्ट ने पाया कि याचिकाकर्ता बहू एक स्नातकोत्तर शिक्षिका (Postgraduate Teacher) के रूप में कार्यरत है, उसकी पर्याप्त आय है और उसके पास एक अलग घर भी उपलब्ध है। इन परिस्थितियों को देखते हुए डिविजनल कमिश्नर द्वारा पारित बेदखली के आदेश को सही ठहराया गया।
नई दिल्ली: वरिष्ठ नागरिकों के जीवन और संपत्ति की सुरक्षा, बुजुर्ग माता-पिता के शांति से जीने के मौलिक अधिकार तथा घरेलू हिंसा अधिनियम (DV Act) के तहत बहू के ‘साझा घर में निवास के अधिकार’ (Right to Shared Household) के बीच कानूनी संतुलन पर दिल्ली हाईकोर्ट ने युगांतरकारी फैसला सुनाया है।
मुख्य न्यायाधीश देवेंद्र कुमार उपाध्याय और न्यायमूर्ति तेजस कारिया की खंडपीठ ने दिल्ली माता-पिता और वरिष्ठ नागरिक भरण-पोषण एवं कल्याण नियमावली, 2009 के नियम 22(3)(1) की वैधता को चुनौती देने वाली याचिका को खारिज कर दिया। खंडपीठ ने माना कि यह नियम मूल केंद्रीय अधिनियम की धारा 22 और 32 से अपनी विधायी शक्ति प्राप्त करता है और यह किसी भी प्रकार से अधिकार क्षेत्र से बाहर (Ultra Vires) या असंवैधानिक नहीं है। इसके साथ ही अदालत ने एक कामकाजी शिक्षिका बहू को अपनी वृद्ध सास के मकान को खाली करने के संभागीय आयुक्त के आदेश को बरकरार रखा। उच्च न्यायालय की खंडपीठ ने उन वैधानिक नियमों की संवैधानिक वैधता को पूरी तरह बरकरार रखा है, जो बुजुर्ग माता-पिता को जिला मजिस्ट्रेट (DM) या संभागीय आयुक्त (Divisional Commissioner) के समक्ष आवेदन देकर अपनी संपत्ति से बच्चों, बहू या कानूनी वारिसों को बेदखल (Evict) कराने का अधिकार देते हैं।
उच्च न्यायालय के प्रमुख विधिक निष्कर्ष एवं न्यायिक टिप्पणियां
1. बेदखली के नियम का विधायी उद्देश्य: ‘बुजुर्गों की पीड़ा कम करना’ मुख्य न्यायाधीश देवेंद्र कुमार उपाध्याय और न्यायमूर्ति तेजस कारिया की खंडपीठ ने नियम 22(3)(1) के उद्देश्य को स्पष्ट करते हुए कहा:
“दिल्ली माता-पिता और वरिष्ठ नागरिक भरण-पोषण एवं कल्याण नियमावली, 2009 का नियम 22(3)(1)(i) एक वरिष्ठ नागरिक या बुजुर्ग माता-पिता को भरण-पोषण न मिलने (Non-maintenance) और उनके साथ होने वाले दुर्व्यवहार व प्रताड़ना (Ill-treatment) के कारण होने वाले कष्टों को दूर करने और उनकी पीड़ा को कम करने के लिए प्रत्यक्ष कानूनी राहत प्रदान करता है।
उक्त चर्चा के आलोक में, याचिकाकर्ता द्वारा 2009 के नियमों के नियम 22(3)(1)(i) और (iv) के प्रावधानों पर दी गई कानूनी चुनौती पूरी तरह विफल होती है, जिसे खारिज किया जाता है।”
2. मूल कानून और प्रत्यायोजित विधान (Delegated Legislation) की वैधता:
- याचिकाकर्ता की यह दलील खारिज कर दी गई कि वरिष्ठ नागरिक अधिनियम, 2007 में संसद ने सीधे तौर पर ‘बेदखली’ (Eviction) शब्द का प्रयोग नहीं किया है, अतः राज्य सरकार नियम बनाकर निष्कासन का अधिकार नहीं दे सकती।
- खंडपीठ ने व्यवस्था दी:
- अधिनियम की धारा 22 राज्य सरकार को वरिष्ठ नागरिकों के जीवन और संपत्ति की व्यापक सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए उपाय निर्धारित करने का सीधा अधिकार देती है।
- अधिनियम की धारा 32 राज्य सरकार को इस कानून के उद्देश्यों को प्रभावी बनाने के लिए नियम बनाने (Rule-making power) की विस्तृत विधायी शक्ति सौंपती है।
- अतः जीवन और संपत्ति की रक्षा में अवैध या प्रताड़ित करने वाले कब्जेदारों (चाहे वे अपने ही बच्चे या बहू हों) को संपत्ति से बाहर निकालना एक स्वाभाविक और अनिवार्य उपाय है।
3. साझा घर (Shared Household) का अधिकार बनाम वरिष्ठ नागरिक की शांति:
- अदालत ने घरेलू हिंसा अधिनियम, 2005 (DV Act) के तहत बहू के साझा घर के अधिकार और वरिष्ठ नागरिक अधिनियम, 2007 के टकराव पर स्पष्ट किया:
- किसी महिला का साझा घर में निवास का अधिकार पूर्ण या असीमित (Not Absolute) नहीं है।
- इसे बुजुर्ग सास या ससुर के शांतिपूर्ण, सुरक्षित और गरिमापूर्ण जीवन जीने के मौलिक अधिकार के समानांतर तौलना होगा। वरिष्ठ नागरिकों को अपने ही घर में प्रताड़ना सहने के लिए विवश नहीं किया जा सकता।
मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि: शिक्षिका बहू बनाम वृद्ध सास
- वैवाहिक पृष्ठभूमि और विवाद:
- याचिकाकर्ता पूनम का विवाह वर्ष 1996 में वरिष्ठ नागरिक (सास) के पुत्र के साथ हुआ था और उनके दो बच्चे हैं।
- वैवाहिक कलह और विवादों के बाद पूनम ने घरेलू हिंसा से महिला संरक्षण अधिनियम (DV Act) के तहत मामला दायर कर अपनी सास की संपत्ति में अपने निवास के अधिकार की सुरक्षा मांगी।
- सास द्वारा बेदखली का आवेदन:
- लगातार प्रताड़ना और कलह से आहत होकर सास ने 2009 के नियमों के तहत जिला मजिस्ट्रेट के समक्ष बेदखली की अर्जी लगाई।
- हालांकि फरवरी 2021 में डीएम ने अर्जी खारिज कर दी थी, परंतु अपील में दिल्ली के संभागीय आयुक्त (Divisional Commissioner) ने जुलाई 2022 में सास की अपील स्वीकार करते हुए पूनम को परिसर खाली करने (Vacate the premises) का स्पष्ट निर्देश दिया।
- हाईकोर्ट के समक्ष चुनौती और अदालत का अवलोकन:
- पूनम ने संभागीय आयुक्त के आदेश और बेदखली नियमों दोनों को असंवैधानिक बताते हुए हाईकोर्ट में चुनौती दी।
- उच्च न्यायालय ने पाया कि पूनम एक परास्नातक शिक्षिका (Postgraduate Teacher – PGT) के रूप में सरकारी/मान्यता प्राप्त सेवा में कार्यरत हैं, उनका एक अच्छा और स्वतंत्र वेतन है, और उनके पास रहने के लिए एक अलग मकान भी उपलब्ध है।
- ऐसी स्थिति में, एक स्वतंत्र आय और वैकल्पिक आवास रखने वाली बहू को अपनी बुजुर्ग सास के घर पर जबरन काबिज रहने की अनुमति नहीं दी जा सकती।
विधिक एवं संवैधानिक सिद्धांत: DV Act बनाम Senior Citizens Act
- विशेष कानूनों में सामंजस्य (Harmonious Construction):
- सुप्रीम कोर्ट ने एस. वनिता बनाम उपायुक्त, बेंगलुरु अर्बन (2020) के ऐतिहासिक फैसले में स्पष्ट किया था कि वरिष्ठ नागरिक अधिनियम, 2007 की धारा 3 अन्य कानूनों पर प्रभावी (Overriding Effect) होने का प्रावधान रखती है।
- हालांकि घरेलू हिंसा कानून की धारा 17 के तहत महिला के अधिकारों की भी अनदेखी नहीं की जा सकती, परंतु जहां महिला के पास वैकल्पिक आवास या पर्याप्त वित्तीय साधन उपलब्ध हों और वरिष्ठ नागरिक प्रताड़ना का शिकार हो रहे हों, वहां बुजुर्गों के जीवन और संपत्ति की रक्षा को प्राथमिकता दी जाएगी।
- अनुच्छेद 21 (बुजुर्गों की गरिमा और शांतिपूर्ण जीवन):
- अपनी जीवनभर की कमाई से बनाए गए मकान में अपने जीवन के अंतिम पड़ाव पर शांति से रहना वरिष्ठ नागरिकों का अनुच्छेद 21 के तहत गारंटीकृत अधिकार है। बच्चे या रिश्तेदार संपत्ति पर कोई जन्मजात या निर्विवाद कब्जा नहीं कर सकते।
विधिक विवरण
- केस संदर्भ: पूनम बनाम संभागीय आयुक्त, राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली सरकार व अन्य [रिट याचिका (सिविल) – दिल्ली उच्च न्यायालय]
- पीठ: मुख्य न्यायाधीश देवेंद्र कुमार उपाध्याय और न्यायमूर्ति तेजस कारिया (खंडपीठ)
- विधिक प्रतिनिधित्व:
- याचिकाकर्ता (पूनम) की ओर से: अधिवक्ता मीरा कौरा पटेल, रितिका सैनी, ज़ैनब हुसैन, वरुण मुदगिल एवं सार्थक मालवीय
- दिल्ली सरकार की ओर से: स्थायी वकील (सिविल) समीर वशिष्ठ एवं अधिवक्ता वैशाली गुप्ता
- प्रतिवादियों की ओर से: अधिवक्ता आकांक्षा कौल, अमन साहनी, सिमरन खुराना, मनीषा अग्रवाल नारायण, अदिति सिंह, शिवेन वर्मा एवं ऋषभ मिस्त्री
- प्रासंगिक कानून एवं विधिक धाराएं:
- माता-पिता और वरिष्ठ नागरिक भरण-पोषण एवं कल्याण अधिनियम, 2007 (Senior Citizens Act, 2007):
- धारा 3 (अधिनियम का अधिभावी प्रभाव / Overriding effect)
- धारा 22 (वरिष्ठ नागरिकों के जीवन और संपत्ति की सुरक्षा हेतु राज्य सरकार के उपाय)
- धारा 32 (राज्य सरकार की नियम बनाने की शक्ति)
- दिल्ली माता-पिता और वरिष्ठ नागरिक भरण-पोषण एवं कल्याण नियमावली, 2009:
- नियम 22(3)(1) (संपत्ति से अनाधिकृत या प्रताड़ित करने वाले बच्चों/उत्तराधिकारियों की बेदखली की प्रक्रिया)
- घरेलू हिंसा से महिला संरक्षण अधिनियम, 2005 (DV Act, 2005):
- धारा 17 एवं 19 (साझा घर में निवास का अधिकार और निवास आदेश)
- भारत का संविधान:
- अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार)
- अनुच्छेद 21 (गरिमापूर्ण जीवन और बुजुर्गों का शांति से जीने का अधिकार)
- अनुच्छेद 226 (उच्च न्यायालय का रिट क्षेत्राधिकार)
- माता-पिता और वरिष्ठ नागरिक भरण-पोषण एवं कल्याण अधिनियम, 2007 (Senior Citizens Act, 2007):
- संबद्ध न्यायिक सिद्धांत व नजीरें:
- एस. वनिता बनाम उपायुक्त, बेंगलुरु अर्बन (2020, सुप्रीम कोर्ट) — ‘घरेलू हिंसा कानून के तहत साझा घर के अधिकार और वरिष्ठ नागरिक कानून के तहत बेदखली के अधिकारों के बीच सामंजस्यपूर्ण संतुलन अनिवार्य है; यदि बहू के पास वैकल्पिक साधन हैं तो वरिष्ठ नागरिक की संपत्ति की रक्षा की जाएगी।’
- सनी पॉल बनाम राज्य (दिल्ली हाईकोर्ट) — ‘वरिष्ठ नागरिक अधिनियम के तहत बेदखली की शक्तियां जिला प्रशासन में निहित हैं ताकि बुजुर्गों को उनके ही घर में दुर्व्यवहार से बचाया जा सके।’
- अंतिम निर्णय: नियम 22(3)(1) की वैधता बरकरार; याचिकाकर्ता बहू की याचिका खारिज; सास के पक्ष में पारित निष्कासन (Eviction) आदेश की पुष्टि।
Senior Citizen: मामले का संक्षिप्त विवरण (At A Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | दिल्ली उच्च न्यायालय (Delhi High Court) |
| पीठ | मुख्य न्यायाधीश देवेंद्र कुमार उपाध्याय एवं न्यायमूर्ति तेजस कारिया |
| चुनौतीपूर्ण नियम | दिल्ली माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों का भरण-पोषण एवं कल्याण नियम, 2009 का नियम 22(3)(1) |
| संबंधित अधिनियम | माता-पिता और वरिष्ठ नागरिक भरण-पोषण एवं कल्याण अधिनियम, 2007 (धारा 22 और 32) |
| अदालत का फैसला | याचिका खारिज; बेदखली के नियम को वैध ठहराया और बहू को मकान खाली करने का आदेश बरकरार रखा। |

