उच्च न्यायालय की महत्वपूर्ण टिप्पणियां
अदालत ने माना कि पति द्वारा लगाए गए मारपीट और अपमान के आरोप साबित नहीं हो सके। बिना साबित हुए आरोपों को जोड़कर क्रूरता नहीं माना जा सकता।
हाईकोर्ट ने फर्टिलिटी ट्रीटमेंट से गुजरने वाली महिला के शारीरिक और मानसिक कष्ट पर विशेष जोर देते हुए कहा: “विवाह को केवल संतानोत्पत्ति के एकमात्र उद्देश्य तक सीमित नहीं किया जा सकता। केवल इसलिए कि किसी जोड़े के बच्चा नहीं है, किसी जीवनसाथी को वैवाहिक संबंध में असफल नहीं माना जा सकता।”
- इलाज का दर्द सहना शादी बचाने की प्रतिबद्धता है:पीठ ने कहा कि फर्टिलिटी इलाज में हार्मोनल इंजेक्शन, बार-बार स्कैन, खून की जांच, शारीरिक दर्द और मानसिक तनाव शामिल होता है। जब एक पत्नी इन सब तकलीफ़ों को सहकर भी बच्चा पैदा करने का प्रयास करती है, तो इसे किसी भी सूरत में वैवाहिक रिश्ते को त्यागना या पति के प्रति क्रूरता नहीं कहा जा सकता।
- अस्पताल के गलियारों का दर्द:अदालत ने अत्यंत भावुक और व्यावहारिक टिप्पणी करते हुए कहा:“यद्यपि निसंतान रहने का भावनात्मक दुख दोनों पक्ष महसूस करते हैं, लेकिन फर्टिलिटी इलाज का शारीरिक कष्ट महिला को अकेले सहना पड़ता है। अस्पताल के गलियारे में बहाए गए आंसू, मेडिकल रिपोर्ट आने से पहले की घबराहट और इलाज का दर्द महज तलाक की याचिका के आरोप बनकर नहीं रह सकते।”
- लंबे समय से अलग रहने पर रुख:अदालत ने इस तर्क को भी खारिज कर दिया कि लंबे समय से अलग रहना अपने आप में क्रूरता या शादी का पूरी तरह टूट जाना (Irretrievable Breakdown of Marriage) मान लिया जाए, क्योंकि पत्नी लगातार साथ रहने की इच्छा व्यक्त कर रही थी।
चेन्नई: वैवाहिक संबंधों के पवित्र उद्देश्य, हिंदू विवाह न्यायशास्त्र, बांझपन/निसंतानता (Childlessness) के आधार पर मानसिक क्रूरता के आरोपों और प्रजनन उपचार (Fertility Treatment) से गुजरने वाली महिलाओं के शारीरिक व भावनात्मक संघर्ष पर मद्रास हाईकोर्ट ने अत्यंत संवेदनशील और प्रगतिशील फैसला सुनाया है।
कथित क्रूरता के आधार पर विवाह विच्छेद (तलाक) की मांग
न्यायमूर्ति जी.आर. स्वामीनाथन और न्यायमूर्ति एम.डी. सुमति की खंडपीठ ने पति द्वारा दायर उस सिविल विविध अपील (CMA) को खारिज कर दिया, जिसमें उसने कथित क्रूरता के आधार पर विवाह विच्छेद (तलाक) की मांग की थी। अदालत ने फैमिली कोर्ट के उस आदेश को पूरी तरह बरकरार रखा, जिसने पति की तलाक अर्जी को नामंजूर कर दिया था। पीठ ने दो-टूक कहा कि अस्पताल के गलियारों में बहे आंसू, लगातार इंजेक्शनों और मेडिकल जांचों का दर्द सहकर भी परिवार बसाने की आस रखने वाली महिला पर वैवाहिक बंधन तोड़ने का लांछन नहीं लगाया जा सकता। उच्च न्यायालय की खंडपीठ ने स्पष्ट व्यवस्था दी है कि केवल गर्भधारण करने में असमर्थ होना (Inability to Conceive) कानूनन क्रूरता नहीं माना जा सकता और संतान न होने के लिए पत्नी को वैवाहिक गलती (Matrimonial Fault) का दोषी नहीं ठहराया जा सकता।
उच्च न्यायालय के प्रमुख विधिक निष्कर्ष एवं न्यायिक टिप्पणियां
1. ‘विवाह केवल संतान पैदा करने का साधन नहीं है’ न्यायमूर्ति जी.आर. स्वामीनाथन और न्यायमूर्ति एम.डी. सुमति की खंडपीठ ने विवाह संस्था के मूल मर्म को स्पष्ट करते हुए कहा:
“विवाह को केवल संतानोत्पत्ति (Procreation) के एकमात्र उद्देश्य तक सीमित नहीं किया जा सकता। किसी भी जीवनसाथी को केवल इसलिए वैवाहिक रिश्ते में ‘विफल’ (Failed) नहीं माना जा सकता क्योंकि दोनों के कोई संतान नहीं हुई। संतान न होना अपने आप में कभी क्रूरता (Cruelty) की श्रेणी में नहीं आ सकता और पति-पत्नी द्वारा गर्भधारण न कर पाने की असमर्थता को पत्नी का कोई वैवाहिक दोष (Matrimonial Fault) नहीं बनाया जा सकता।”
2. फर्टिलिटी उपचार का शारीरिक व मानसिक कष्ट: ‘अस्पताल के गलियारों के आंसू’ खंडपीठ ने प्रजनन उपचार (Fertility Treatment) के दौरान एक महिला द्वारा झेली जाने वाली असीम पीड़ा और मनोवैज्ञानिक दबाव को कानूनी रिकॉर्ड पर दर्ज करते हुए भावुक व यथार्थवादी अवलोकन किया: “यद्यपि निसंतान रहने का भावनात्मक दर्द दोनों पति-पत्नी साझा करते हैं, परंतु प्रजनन उपचार के प्रत्यक्ष शारीरिक परिणाम (Physical Consequences) स्वयं महिला को अकेले झेलने पड़ते हैं। ऐसे उपचारों में हार्मोनल इंजेक्शन, बार-बार स्कैन, अंतहीन रक्त परीक्षण, इनवेसिव प्रक्रियाएं, शारीरिक असहजता, गहरी चिंता और आशा व निराशा के बारंबार चक्र शामिल होते हैं। जब एक पत्नी, इसमें शामिल शारीरिक और भावनात्मक कठिनाइयों को भली-भांति जानते हुए भी, एक बच्चे को जन्म देने और अपने वैवाहिक संबंध को बचाने की आशा में स्वेच्छा से ऐसे दर्दनाक उपचार से गुजरती है, तो उस आचरण को किसी भी सूरत में विवाह का परित्याग या पति के प्रति क्रूरता नहीं माना जा सकता।
अस्पताल के गलियारों में बहे आंसू (Tears shed in a hospital corridor), मेडिकल रिपोर्ट आने से पहले की चिंता, उपचार के दौरान झेला गया असहनीय दर्द और एक प्रयास से दूसरे प्रयास तक संजोई गई उम्मीदों को वैवाहिक मुकदमों में महज क्रूरता के आरोपों में तब्दील नहीं किया जा सकता।”
3. ‘अप्रमाणित आरोपों का जमावड़ा कभी सिद्ध क्रूरता नहीं बनता’
- पति द्वारा लगाए गए अपमान, चप्पल-झाड़ू से मारपीट और मंगलसूत्र (थाली) उतारकर फेंकने के आरोपों पर अदालत ने फैमिली कोर्ट के निष्कर्षों की पुष्टि करते हुए कहा कि ये आरोप रिकॉर्ड पर किसी विश्वसनीय साक्ष्य द्वारा साबित नहीं हुए हैं।
- अदालत ने विधिक सिद्धांत दोहराया:“यद्यपि क्रूरता का परीक्षण वैवाहिक रिश्ते को समग्रता में देखकर किया जाना चाहिए, परंतु ‘अप्रमाणित आरोप, चाहे वे कितने भी इकट्ठे क्यों न कर लिए जाएं’ (Unproved allegations, when accumulated), स्वतः ही सिद्ध क्रूरता नहीं बन जाते।“
4. लंबे अलगाव के आधार पर तलाक से इनकार:
- पति के इस तर्क को भी अदालत ने खारिज कर दिया कि चूंकि वे लंबे समय से अलग रह रहे हैं, इसलिए ‘विवाह के अपरिवर्तनीय टूटन’ (Irretrievable Breakdown of Marriage) के आधार पर तलाक दे दिया जाना चाहिए।
- अदालत ने रेखांकित किया कि पत्नी ने कभी भी वैवाहिक बंधन को नहीं त्यागा है और वह आज भी अपने वैवाहिक जीवन को पुनः शुरू करने और साथ रहने की निरंतर इच्छा व्यक्त कर रही है।
मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि
- विवाह और प्रारंभिक संबंध:
- दोनों का विवाह जून 2007 में पारंपरिक हिंदू रीति-रिवाजों के अनुसार हुआ था।
- शादी के कई वर्षों बाद भी जब कोई संतान नहीं हुई, तो आपसी तनाव शुरू हुआ।
- पति द्वारा लगाए गए आरोप:
- पति ने आरोप लगाया कि पत्नी उस पर बेवजह शक करती थी, काम से देर से लौटने पर अपमानित करती थी और वैवाहिक सहवास से इनकार करती थी।
- पति का आरोप था कि जून 2016 में पत्नी ने सार्वजनिक रूप से उसे नपुंसक (Impotent) कहा, चप्पलों और झाड़ू से उस पर हमला किया, अपना थाली (मंगलसूत्र) उतार फेंका, शादी की तस्वीरें फाड़ दीं और हमेशा के लिए ससुराल छोड़कर चली गई।
- पत्नी का विधिक बचाव:
- पत्नी ने सभी आरोपों को सिरे से खारिज किया।
- उसने दस्तावेजी साक्ष्य पेश किए कि उसे गर्भाशय में रसौली (Uterine Fibroid) की गंभीर समस्या थी, जिसके लिए उसने जटिल सर्जरी कराई थी और संतान प्राप्त करने तथा वैवाहिक जीवन को बचाने के लिए लंबे समय तक कष्टकारी चिकित्सीय व हार्मोनल उपचार लिया था।
- फैमिली कोर्ट का फैसला:
- फैमिली कोर्ट ने पाया था कि पति मारपीट और परित्याग के आरोपों को साबित करने में पूरी तरह विफल रहा और पत्नी का इलाज कराना यह दर्शाता है कि वह रिश्ता बचाना चाहती थी। फैमिली कोर्ट ने तलाक की अर्जी खारिज कर दी थी, जिसके खिलाफ पति हाईकोर्ट पहुंचा था।
विधिक एवं सामाजिक न्यायशास्त्र: प्रजनन अधिकार और विवाह की प्रकृति
- हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 13(1)(ia) (क्रूरता का दायरा):
- क्रूरता ऐसा आचरण होना चाहिए जिससे दूसरे पक्षकार के मन में यह उचित आशंका पैदा हो जाए कि उसके साथ रहना हानिकारक या खतरनाक होगा।
- शारीरिक या जैविक अक्षमता (जैसे स्वाभाविक बांझपन या गर्भधारण न होना), जो किसी व्यक्ति के वश में नहीं है, कानूनन क्रूरता का कृत्य (Act of Cruelty) नहीं हो सकती।
- संविधान का अनुच्छेद 21 एवं महिला की शारीरिक स्वायत्तता:
- किसी महिला का मातृत्व या प्रजनन स्वास्थ्य उसकी शारीरिक स्वायत्तता (Bodily Autonomy) और गरिमा का हिस्सा है।
- वैवाहिक संविदा में संतान पैदा न कर पाने को विधिक विफलता मानना पितृसत्तात्मक धारणा को बढ़ावा देना होगा, जिसे आधुनिक संवैधानिक अदालतें मान्यता नहीं दे सकतीं।
विधिक विवरण
- केस संदर्भ: अपीलकर्ता (पति) बनाम प्रतिवादी (पत्नी) [सिविल विविध अपील (CMA) – मद्रास उच्च न्यायालय]
- पीठ: न्यायमूर्ति जी.आर. स्वामीनाथन और न्यायमूर्ति एम.डी. सुमति (खंडपीठ, मद्रास उच्च न्यायालय)
- निर्णय की तिथि: अक्टूबर 2026
- विधिक प्रतिनिधित्व:
- अपीलकर्ता (पति) की ओर से: अधिवक्ता आर. मुरली
- प्रतिवादी (पत्नी) की ओर से: अधिवक्ता एस. वैदुर्य
- प्रासंगिक कानून एवं विधिक धाराएं:
- हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 (HMA, 1955):
- धारा 13(1)(ia) (क्रूरता के आधार पर विवाह विच्छेद)
- धारा 13(1)(ib) (परित्याग / Desertion)
- भारत का संविधान – अनुच्छेद 21 (गरिमापूर्ण जीवन और प्रजनन स्वायत्तता का अधिकार)
- हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 (HMA, 1955):
- संबद्ध ऐतिहासिक न्यायिक नजीरें:
- समर घोष बनाम जया घोष (2007, सुप्रीम कोर्ट 3-जज बेंच) — ‘मानसिक क्रूरता की अवधारणा में सामान्य वैवाहिक उतार-चढ़ाव या शारीरिक अक्षमताएं शामिल नहीं हैं; क्रूरता जानबूझकर किया गया गंभीर आचरण होना चाहिए।’
- नवीन कोहली बनाम नीलू कोहली (सुप्रीम कोर्ट) — ‘केवल अलग रहने की अवधि ही तलाक का स्वतः आधार नहीं बन सकती जब तक कि दोनों पक्षों में सुलह की सभी संभावनाएं समाप्त न हो गई हों और दूसरा पक्ष निर्दोष न हो।’
- अंतिम निर्णय: पति की अपील पूरी तरह खारिज; फैमिली कोर्ट द्वारा तलाक याचिका अस्वीकार करने का फैसला बरकरार; पत्नी के पक्ष में निर्णय।
Breakdown of Marriage: मामले का संक्षिप्त विवरण (At A Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | मद्रास उच्च न्यायालय (Madras High Court) |
| पीठ | न्यायमूर्ति जी.आर. स्वामीनाथन एवं न्यायमूर्ति एम.डी. सुमति |
| विवाद | पति द्वारा निसंतानता (Childlessness) और क्रूरता के आधार पर तलाक की मांग। |
| पत्नी का पक्ष | बच्चा पैदा करने के लिए कठिन और दर्दनाक मेडिकल इलाज/फर्टिलिटी ट्रीटमेंट से गुजरी। |
| अदालत का फैसला | पति की तलाक याचिका खारिज; निसंतानता या गर्भधारण न होना क्रूरता नहीं है। |

