Saturday, October 3, 2026
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Child Welfare: बच्चे के जीवन में कोई भी माता-पिता केवल एक अतिथि या आगंतुक नहीं होते; अदालतों को कस्टडी मामलों में ‘मुलाकात’ शब्द को Parenting Time से बदलना चाहिए

मुख्य संकेतक और अदालती टिप्पणियां (Key Highlights)

  • ‘विज़िटेशन’ बनाम ‘पेरेंटिंग टाइम’ की अवधारणा:अदालत ने कहा कि ‘विज़िटेशन’ शब्द यह गलत संदेश देता है कि एक माता/पिता बच्चे का मुख्य हिस्सा है और दूसरा केवल एक मेहमान है। न्यायमूर्ति कन्नेगंती ने कहा:“अदालतें अक्सर गैर-कस्टडी वाले माता-पिता के समय को ‘विज़िटेशन’ कहती हैं। यह शब्द यह गलत संदेश देता है कि एक माता-पिता बच्चे के जीवन का हिस्सा हैं, जबकि दूसरा केवल मिलने आता है। बच्चे को इस शब्द से रिश्ता नहीं समझना चाहिए, जो किसी मेहमान के लिए इस्तेमाल होता है। इसे ‘पेरेंटिंग टाइम’ कहना इस साधारण सच को स्वीकार करता है कि कोई भी माता-पिता बच्चे के जीवन में आगंतुक नहीं होता।”
  • कस्टडी मामलों में कोई निश्चित फॉर्मूला नहीं:हाईकोर्ट ने निचली अदालत द्वारा पिता को 50% छुट्टियों और नियमित फोन कॉल का समय देने के आदेश पर रोक लगाते हुए कहा कि पारिवारिक विवादों में कोई एक निश्चित फॉर्मूला (Straitjacket Formula) लागू नहीं किया जा सकता। प्रत्येक मामले का फैसला उसके विशिष्ट तथ्यों और परिस्थितियों के आधार पर होना चाहिए।
  • परेन्स पेट्रिए (Parens Patriae) क्षेत्राधिकार:कोर्ट ने स्पष्ट किया कि कस्टडी मामलों में अदालत को ‘परेन्स पेट्रिए’ (राज्य/अदालत द्वारा अभिभावक की भूमिका निभाना) क्षेत्राधिकार का उपयोग करते हुए माता-पिता के आपसी विवादों के बजाय बच्चे के कल्याण (Welfare of the Child) को सर्वोपरि रखना चाहिए।
  • वकीलों से अपील:पीठ ने कस्टडी मामलों में वकीलों से संयम और सहयोग की अपील करते हुए कहा:“पक्षकारों के बीच जो आक्रामकता हम देखते हैं, वह वकीलों में नहीं होनी चाहिए। आइए मिलकर उनकी समस्याओं का समाधान करें, उनके लिए और समस्याएं न खड़ी करें।”

बेंगलुरु: पारिवारिक विवादों में बच्चों की अभिरक्षा (Child Custody), गैर-संरक्षक माता-पिता (Non-custodial parent) के अधिकारों और न्यायिक शब्दावली के मनोवैज्ञानिक प्रभाव पर कर्नाटक हाईकोर्ट ने अत्यंत संवेदनशील और युगांतरकारी विधिक व्यवस्था दी है।

न्यायमूर्ति ललिता कन्नेगंती की एकल पीठ ने उस मामले की सुनवाई करते हुए यह टिप्पणी की, जहां ट्रायल कोर्ट ने बच्चे के 3 महीने की उम्र से अलग रह रहे पिता को अचानक सप्ताहांत, आधी स्कूल की छुट्टियां और व्हाट्सएप पर 30 मिनट की वीडियो कॉल की कस्टडी दे दी थी। उच्च न्यायालय ने ट्रायल कोर्ट के आदेश को बच्चे के मानसिक कल्याण के विपरीत और अव्यवहारिक मानते हुए छुट्टियों की 50% कस्टडी पर रोक लगा दी और धीरे-धीरे संबंध विकसित करने के लिए सीमित समय निर्धारित किया। उच्च न्यायालय ने कहा कि अदालतों को बाल अभिरक्षा के मामलों में पारंपरिक रूप से इस्तेमाल किए जाने वाले शब्द ‘विजिटेशन’ (Visitation / मुलाकात) को बदलकर ‘पेरेंटिंग टाइम’ (Parenting Time / अभिभावकत्व समय) करना चाहिए, क्योंकि कोई भी माता-पिता अपने ही बच्चे के जीवन में महज एक ‘आगंतुक’ या ‘मेहमान’ नहीं हो सकते।

उच्च न्यायालय के प्रमुख विधिक निष्कर्ष एवं न्यायिक टिप्पणियां

1. ‘विजिटेशन’ की जगह ‘पेरेंटिंग टाइम’: शब्दावली में मनोवैज्ञानिक बदलाव की आवश्यकता न्यायमूर्ति ललिता कन्नेगंती ने कस्टडी मामलों में प्रयुक्त होने वाली शब्दावली के मनोवैज्ञानिक प्रभाव को रेखांकित करते हुए कहा: *”अदालतें अक्सर उस समय को दर्शाने के लिए ‘विजिटेशन’ (Visitation) शब्द का उपयोग करती हैं जो बच्चा अपने गैर-संरक्षक माता-पिता के साथ बिताता है। यद्यपि यह शब्द अत्यंत प्रचलित है, परंतु यह एक दुर्भाग्यपूर्ण संकेत देता है कि माता या पिता में से केवल एक ही बच्चे के जीवन का वास्तविक हिस्सा है जबकि दूसरा केवल उससे मिलने आता है। किसी भी बच्चे को अपने रिश्तों को ‘विजिटेशन’ जैसे शब्द के माध्यम से समझने के लिए मजबूर नहीं किया जाना चाहिए, जो किसी ऐसे व्यक्ति के लिए उपयोग किया जाता है जो केवल एक अतिथि (Guest) की तरह आता है और चला जाता है। बच्चे बड़ों के आचरण और कभी-कभी अदालतों के शब्दों से यह समझते हैं कि वे किससे संबंधित हैं। इसे ‘पेरेंटिंग टाइम’ (Parenting Time) कहना इस सरल सत्य को मान्यता देता है कि बच्चे के जीवन में कोई भी माता-पिता आगंतुक (Visitor) नहीं होते।“*

2. पारिवारिक मुकदमों में वकीलों से अपील: ‘पक्षकारों की आक्रामकता वकीलों में न दिखे’ अदालत ने बाल अभिरक्षा और वैवाहिक विवादों में वकालत कर रहे अधिवक्ताओं से सहयोग की अपील की: “जो आक्रामकता (Aggression) हम मुकदमों के पक्षकारों में देखते हैं, वह वकीलों के आचरण में नहीं दिखनी चाहिए। आइए हम सब मिलकर उनकी समस्याओं को सुलझाने का प्रयास करें; उनके लिए और अधिक समस्याएं खड़ी न करें।”

3. कोई सीधा या तयशुदा फॉर्मूला (Straitjacket Formula) नहीं हो सकता:

  • उच्च न्यायालय ने कहा कि यद्यपि ट्रायल कोर्ट ने कर्नाटक हाईकोर्ट द्वारा पूर्व में निर्धारित ‘संयुक्त अभिभावकत्व योजना’ (Joint Parenting Plan) का अनुसरण किया, परंतु ऐसी योजनाओं को प्रत्येक मामले के विशिष्ट तथ्यों और परिस्थितियों को तौलने के बाद ही लागू किया जाना चाहिए:“अदालतों का यह यांत्रिक दृष्टिकोण बच्चे के सर्वोत्तम हित में नहीं है। विशेष रूप से पारिवारिक विवादों और बाल अभिरक्षा मामलों में कोई एक तयशुदा फॉर्मूला नहीं हो सकता। चूंकि अदालतें माता-पिता और बच्चों की भावनाओं और जिंदगियों से निपटती हैं, इसलिए सब कुछ प्रत्येक मामले के तथ्यों पर निर्भर करता है। जहां पिता बच्चे के साथ नियमित संपर्क में हो, वह एक अलग परिस्थिति है; परंतु जहां वर्षों से कोई संपर्क न रहा हो, वहां अलग दृष्टिकोण आवश्यक है।”

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मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि एवं ट्रायल कोर्ट का आदेश

  • लंबे समय से अलगाव: पति और पत्नी वर्ष 2017 से अलग रह रहे थे। 9 वर्षीय बालक जन्म के बाद से ही पूरी तरह अपनी मां की देखरेख और अभिरक्षा में रह रहा था।
  • पिता से संपर्क का अभाव: पिता ने बच्चे को तब देखा था जब वह मात्र 3 महीने का था। इसके बाद से पिता और बच्चे के बीच कोई वास्तविक शारीरिक या भावनात्मक संपर्क नहीं था।
  • घरेलू हिंसा और तलाक: फैमिली कोर्ट ने दोनों पक्षों को तलाक की डिक्री प्रदान की थी और पत्नी के पक्ष में घरेलू हिंसा अधिनियम के तहत राहत आदेश भी पारित किया गया था।
  • ट्रायल कोर्ट का अव्यवहारिक आदेश:
    • इन विषम परिस्थितियों के बावजूद ट्रायल कोर्ट ने पिता को सप्ताहांत पर सुबह 11:00 बजे से शाम 7:00 बजे तक मिलने, गर्मी, सर्दी, दशहरा और दिवाली की 50% छुट्टियों में अपने साथ रखने तथा एक दिन छोड़कर शाम 7:30 से 8:30 बजे के बीच 30 मिनट व्हाट्सएप कॉल करने की अनुमति दे दी थी।
    • मां ने इस आदेश को अव्यवहारिक और बच्चे के मानसिक स्वास्थ्य के लिए हानिकारक बताते हुए उच्च न्यायालय में चुनौती दी।

उच्च न्यायालय द्वारा सुधार और अंतरिम व्यवस्था

अदालत ने स्पष्ट किया कि 9 साल के बच्चे को अचानक 50% छुट्टियों के लिए ऐसे व्यक्ति के पास भेजना जिसे उसने 3 महीने की उम्र के बाद कभी नहीं देखा, बच्चे के लिए गहरा आघात हो सकता है:

  1. कॉल की बाध्यता अव्यवहारिक: अदालत ने कहा कि फोन पर 30 मिनट तक बात करने के लिए बच्चे को एक जगह बांधकर बैठाना व्यावहारिक नहीं है।
  2. छुट्टियों की कस्टडी पर रोक: ट्रायल कोर्ट के उस आदेश पर रोक लगा दी गई जिसके तहत पिता को छुट्टियों का 50% समय दिया गया था।
  3. क्रमिक परिचय का नया समय: अदालत ने पिता को बच्चे से जान-पहचान और भावनात्मक जुड़ाव बनाने के लिए दो दिनों के लिए सुबह 10:00 बजे से दोपहर 2:00 बजे तक ‘पेरेंटिंग टाइम’ की अनुमति दी।
  4. अदालत का ‘पेरेंस पैट्रिए’ (Parens Patriae) दायित्व: अदालत ने दोहराया कि माता-पिता के आपसी विवाद चाहे जो भी हों, बच्चे को दोनों का प्यार पाने का अधिकार है, लेकिन यह प्रक्रिया जल्दबाजी में नहीं बल्कि क्रमिक और बच्चे की मानसिक सुविधा के अनुसार पूरी की जानी चाहिए।

विधिक एवं संवैधानिक सिद्धांत

  • ‘बच्चे का सर्वोत्तम कल्याण’ (Welfare of the Child is Paramount):
    • हिंदू अल्पसंख्यक और संरक्षकता अधिनियम, 1956 की धारा 13 तथा अभिभावक और प्रतिपाल्य अधिनियम, 1890 (Guardians and Wards Act) के तहत अभिरक्षा विवादों में माता-पिता के कानूनी अधिकारों पर बच्चे का शारीरिक, मानसिक और नैतिक कल्याण सर्वोपरि होता है।
  • पेरेंस पैट्रिए क्षेत्राधिकार (Parens Patriae Jurisdiction):
    • अदालतें नाबालिग बच्चों के संरक्षक के रूप में कार्य करती हैं। जब माता-पिता के अहं का टकराव बच्चे के विकास में बाधक बनता है, तो अदालत को एक निष्पक्ष अभिभावक की भूमिका निभानी होती है।

विधिक विवरण

  • केस संदर्भ: रिट याचिका (पारिवारिक विवाद / बाल अभिरक्षा) – कर्नाटक उच्च न्यायालय, मुख्य पीठ Bengaluru
  • पीठ: न्यायमूर्ति ललिता कन्नेगंती (एकल पीठ)
  • विधिक प्रतिनिधित्व:
    • याचिकाकर्ता (पत्नी/मां) की ओर से: अधिवक्ता अनीता अब्राहम
    • प्रतिवादी (पति/पिता) की ओर से: अधिवक्ता अनुश्री ए.
  • प्रासंगिक कानून एवं विधिक प्रावधान:
    • संरक्षक और प्रतिपाल्य अधिनियम, 1890 (Guardians and Wards Act, 1890) की धारा 7, 12 एवं 25
    • हिंदू अल्पसंख्यक और संरक्षकता अधिनियम, 1956 की धारा 13 (नाबालिग का कल्याण ही सर्वोपरि विचार)
    • भारत का संविधान – अनुच्छेद 226/227 (उच्च न्यायालय की असाधारण रिट एवं पर्यवेक्षी शक्तियां)
  • संबद्ध ऐतिहासिक न्यायिक नजीरें:
    • गौरव जैन बनाम भारत संघ (सुप्रीम कोर्ट) — ‘कस्टडी मामलों में बच्चे के सर्वोत्तम हित का सिद्धांत अंतरराष्ट्रीय बाल अधिकार सम्मेलन (UNCRC) के अनुरूप लागू होता है।’
    • रोजी जैकब बनाम ए. चक्रवर्ती (1973, सुप्रीम कोर्ट) — ‘बाल अभिरक्षा का फैसला केवल कानूनी संविदा या संपत्ति के बंटवारे की तरह नहीं बल्कि जीवित मानवीय भावनाओं और बच्चे के मानसिक संतुलन को देखकर किया जाना चाहिए।’
    • यशमिता गौरव लूल्ला बनाम राज्य (बॉम्बे/सुप्रीम कोर्ट) — ‘गैर-संरक्षक माता-पिता को बच्चे से अचानक जबरन नहीं मिलाया जा सकता; परिचय क्रमिक और स्वाभाविक वातावरण में होना चाहिए।’
  • अंतिम निर्देश: ‘विजिटेशन’ के स्थान पर ‘पेरेंटिंग टाइम’ शब्दावली अपनाने का सुझाव; ट्रायल कोर्ट का 50% छुट्टियों का आदेश स्थगित; पिता को क्रमिक रूप से सुबह 10 से दोपहर 2 बजे तक सीमित पेरेंटिंग टाइम की अनुमति।

Child Welfare: मामले का संक्षिप्त विवरण (At A Glance)

विवरणजानकारी
संबंधित अदालतकर्नाटक उच्च न्यायालय (Karnataka High Court)
पीठन्यायमूर्ति ललिता कन्नेगंती (Justice Lalitha Kanneganti)
मूल मुद्दा9 वर्षीय बच्चे की कस्टडी और पिता के मुलाकात के अधिकार (Visitation Rights)
मुख्य सुझाव‘विज़िटेशन टाइम’ शब्द को ‘पेरेंटिंग टाइम’ से बदला जाए।
मुख्य सिद्धांतबाल कस्टडी मामलों में कोई निश्चित नियम (Straitjacket Formula) नहीं हो सकता; बच्चे का कल्याण सर्वोपरि है।
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