Saturday, October 3, 2026
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CCTV Function: थानों में लगे CCTV कैमरे साल के 365 दिन 24×7 चालू रहना अनिवार्य; खराबी होने पर GD में प्रवेश-निकासी दर्ज हो और पूछताछ के बाद रसीद दी जाए

अदालत की मुख्य टिप्पणियां और कानूनी सिद्धांत (Key Highlights)

  • CCTV कैमरों का महत्व:अदालत ने थानों में CCTV प्रणालियों की उपयोगिता पर जोर देते हुए कहा:“थाने में CCTV की उपयोगिता अत्यधिक महत्वपूर्ण है। यह ऐसा साक्ष्य है जो पुलिस को झूठे आरोपों से बचाता है और साथ ही यह उनके उन असंवैधानिक व extra-judicial तरीकों का भी पर्दाफाश करता है जहां पुलिस नागरिकों के अधिकारों का हनन करती है।”
  • CCTV खराब होने पर वैकल्पिक व्यवस्था:
    • यदि उपकरण में कोई तकनीकी खराबी आती है, तो थाना प्रभारी (SHO) का कर्तव्य है कि वह इसे तुरंत ठीक कराए या उच्च अधिकारियों को सूचित करे।
    • CCTV बंद रहने की स्थिति में पुलिस को जनरल डायरी (GD) में किसी भी व्यक्ति के आने और जाने के समय का अनिवार्य रूप से इंद्राज (Entry) करना होगा।
    • पूछताछ के बाद छोड़े गए व्यक्ति या उसके परिजनों से लिखित रसीद/हस्ताक्षर लेने होंगे कि वह अपनी मर्जी से अपनी मर्जी के समय थाने से बाहर जा रहा है।
  • भारतीय साक्ष्य अधिनियम (BSA) की धारा 119 के तहत प्रतिकूल निष्कर्ष:अदालत ने कहा कि यदि किसी व्यक्ति को अवैध हिरासत में रखने के समय की CCTV फुटेज उपलब्ध नहीं है और न ही कोई लिखित रिकॉर्ड (GD Entry) मौजूद है, तो भारतीय साक्ष्य अधिनियम (BSA) की धारा 119 (स्पष्टीकरण [g]) के तहत पुलिस के खिलाफ प्रतिकूल निष्कर्ष (Adverse Inference) निकाला जाएगा। कोर्ट यह मानकर चलेगा कि याची का अवैध हिरासत का दावा सही है।

प्रयागराज: पुलिस थानों के भीतर नागरिकों के संवैधानिक व मौलिक अधिकारों के संरक्षण, हिरासत में होने वाले दुर्व्यवहार, अवैध निरोध (Illegal Detention) और पुलिस थानों में सीसीटीवी कैमरों के अनिवार्य संचालन पर इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने एक युगांतरकारी और नजीर योग्य फैसला सुनाया है। उच्च न्यायालय की खंडपीठ ने व्यवस्था दी है कि राज्य के प्रत्येक पुलिस थाने में स्थापित CCTV कैमरे वर्ष के 365 दिन और 24 घंटे (24×7) निरंतर चालू रहने अनिवार्य हैं।

न्यायमूर्ति अतुल श्रीधरन और न्यायमूर्ति दिवेश चंद्र सामंत की खंडपीठ ने उत्तर प्रदेश के देवरिया जिले के गौरी बाजार थाने में चार नागरिकों को अवैध रूप से बंधक बनाए रखने के मामले में यह सख्त आदेश पारित किया। अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि किसी व्यक्ति को थाने में अवैध रूप से रखने की अवधि का सीसीटीवी फुटेज गायब मिलता है और पुलिस के पास कोई लिखित दस्तावेजी साक्ष्य नहीं है, तो अदालत भारतीय साक्ष्य अधिनियम (BSA) की धारा 119 (इलस्ट्रेशन [g]) के तहत पुलिस के खिलाफ प्रतिकूल निष्कर्ष (Adverse Inference) निकालेगी और यह मान लेगी कि हिरासत पूरी तरह गैर-कानूनी थी।

उच्च न्यायालय के प्रमुख विधिक निष्कर्ष एवं न्यायिक टिप्पणियां

1. थाने में CCTV कैमरे की दोहरी भूमिका: ‘बचाव की ढाल भी और अपराध का प्रमाण भी’ न्यायमूर्ति अतुल श्रीधरन और न्यायमूर्ति दिवेश चंद्र सामंत की खंडपीठ ने पुलिस थानों में निगरानी कैमरों के महत्व को रेखांकित करते हुए कहा: “थाने के भीतर सीसीटीवी (CCTV) प्रणाली की उपयोगिता अत्यंत महत्वपूर्ण है और इसे कम करके नहीं आंका जा सकता। यह ऐसा साक्ष्य प्रदान करती है जो पुलिस को ज्यादतियों (Police Excesses) और कानून से भटकाव के झूठे आरोपों से बचा सकती है; और साथ ही यह उन मामलों में उनके कृत्यों को कटघरे में खड़ा करने का अकाट्य प्रमाण भी बनती है जहां पुलिस कानून का उल्लंघन करते हुए गैर-न्यायिक तौर-तरीकों का सहारा लेती है और साथी नागरिकों के संवैधानिक अधिकारों को कुचलती है।”

2. CCTV बंद होने पर क्या करे पुलिस? (जनरल डायरी और लिखित रसीद की अनिवार्यता): अदालत ने माना कि तकनीकी या इलेक्ट्रॉनिक उपकरण खराब हो सकते हैं, परंतु उसका डाउनटाइम (Downtime) न्यूनतम होना चाहिए और थाना प्रभारी (SHO) को बिजली या तकनीकी खराबी को तुरंत ठीक कराने और उच्चाधिकारियों को सूचित करने के कदम उठाने चाहिए। यदि कैमरे बंद हों, तो पुलिस को निम्नलिखित अनिवार्य प्रोटोकॉल का पालन करना होगा:

  • जनरल डायरी (GD) में समयबद्ध प्रविष्टि: पूछताछ के लिए लाए गए प्रत्येक संदिग्ध व्यक्ति के थाने में प्रवेश की सटीक तारीख व समय जीडी में दर्ज किया जाए, और उसके थाना परिसर से बाहर जाने की तारीख व समय भी दर्ज हो।
  • लिखित रसीद (Receipt on Release):“अत्यधिक सावधानी (Abundans Cautela) के तौर पर, पुलिस को सलाह दी जाती है कि वह पूछताछ के लिए बुलाए गए व्यक्ति या उसके निकटतम परिजन से एक लिखित रसीद ले, जिसमें यह स्पष्ट दर्ज हो कि वह व्यक्ति थाने से जाने के लिए स्वतंत्र है। साथ ही उस व्यक्ति से यह पृष्ठांकन (Endorsement) भी लिया जाए कि वह अपनी मर्जी से थाना छोड़ रहा है, जिस पर उसकी रिहाई की तारीख और सटीक समय अंकित हो। जहां तक किसी अपराध में औपचारिक रूप से गिरफ्तार व्यक्ति का संबंध है, उसका गिरफ्तारी मेमो (Memo of Arrest) पर्याप्त होगा।”

3. फुटेज न होने पर पुलिस के खिलाफ ‘प्रतिकूल निष्कर्ष’ (BSA की धारा 119): अदालत ने दो-टूक कहा कि सीसीटीवी फुटेज न होने का लाभ पुलिस को नहीं, बल्कि पीड़ित को मिलेगा: “ऐसे मामले में जहां उस अवधि का सीसीटीवी फुटेज उपलब्ध नहीं है जब व्यक्ति को अवैध रूप से हिरासत में रखने का आरोप है, और पुलिस के पास यह साबित करने के लिए कोई दस्तावेजी रिकॉर्ड नहीं है कि उसे किस तारीख और समय पर थाने से छोड़ा गया था, तो भारतीय साक्ष्य अधिनियम (BSA) की धारा 119 (इलस्ट्रेशन [g]) [जो पूर्ववर्ती साक्ष्य अधिनियम की धारा 114(g) के समान है—अर्थात ‘जो साक्ष्य पेश किया जा सकता था और नहीं किया गया, वह पेश किए जाने पर उस व्यक्ति के प्रतिकूल होता जिसने उसे छिपाया’] पुलिस पर पूरी तरह लागू होगी, और अदालत यह मानने के लिए पूर्णतः न्यायसंगत होगी कि याचिकाकर्ता का अवैध हिरासत का दावा सही है।”

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मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि एवं पुलिसिया मनमानी

  • गौरी बाजार थाने का मामला: याचिकाकर्ताओं—महेंद्र गौर और तीन अन्य—ने याचिका दायर कर आरोप लगाया था कि उन्हें देवरिया के गौरी बाजार थाने की पुलिस ने बिना किसी एफआईआर, सम्मन या वैधानिक आधार के कई दिनों तक थाने में गैर-कानूनी ढंग से बंद (Illegal Confinement) करके रखा।
  • पुलिस अधीक्षक (SP) की रिपोर्ट में खुलासा:
    • पुलिस अधीक्षक की जांच रिपोर्ट में सामने आया कि जिस दिन इन चार नागरिकों को थाने में बैठाया गया था, उस दिन का सीसीटीवी फुटेज सिस्टम में उपलब्ध ही नहीं था।
    • संबंधित थाना अध्यक्ष (SHO) डॉ. महेंद्र कुमार ने सीसीटीवी कैमरे खराब होने या बिजली गुल होने की कोई सूचना अपने उच्चाधिकारियों को नहीं दी थी और न ही बिजली आपूर्ति बहाल कराने का कोई प्रयास किया था।
  • अदालत द्वारा SHO की माफी खारिज:
    • आरोपी एसएचओ डॉ. महेंद्र कुमार ने अदालत के समक्ष अपनी चूक को “कथित भूल” (Oversight) बताते हुए माफी की गुहार लगाई।
    • अदालत ने इसे खारिज करते हुए कहा कि यह कार्यपालिका के बेलगाम अतिरेक (Executive Overreach) का प्रत्यक्ष उदाहरण है, जहां पुलिस अधिकारी ने याचिकाकर्ताओं के मौलिक अधिकारों को बेरहमी से कुचला (Ridden roughshod on the rights of the petitioners) है।

अदालत का दंडात्मक आदेश: मुआवजा और सर्विस बुक में एंट्री

खंडपीठ ने एसएचओ को अवैध हिरासत का प्रत्यक्ष रूप से दोषी ठहराते हुए निम्नलिखित सख्त निर्देश जारी किए:

  1. मुआवजे का भुगतान:
    • राज्य सरकार अवैध रूप से हिरासत में रखे गए तीन नागरिकों को ₹20,000-₹20,000 का मुआवजा तत्काल अदा करे।
    • चौथे व्यक्ति को, जिसे दो दिनों तक अवैध हिरासत में रखा गया था, ₹5,000 का मुआवजा दिया जाए।
  2. दोषी पुलिसकर्मियों के वेतन से वसूली:
    • राज्य सरकार विभागीय जांच कराकर मुआवजे की यह पूरी राशि दोषी पुलिस अधिकारियों (विशेषकर संबंधित एसएचओ) के व्यक्तिगत वेतन से वसूल (Recover from salary) करे।
  3. सर्विस रिकॉर्ड में प्रतिकूल प्रविष्टि:
    • अदालत ने निर्देश दिया कि इस मामले में पुलिस अधिकारी के आचरण के संबंध में उच्च न्यायालय द्वारा व्यक्त की गई गंभीर नाराजगी और प्रतिकूल टिप्पणियों को संबंधित एसएचओ की आधिकारिक सेवा पुस्तिका (Service Book) में अनिवार्य रूप से दर्ज किया जाए।

विधिक एवं संवैधानिक सिद्धांत

  • परमवीर सिंह सैनी निर्णय का सख्त क्रियान्वयन:
    • सर्वोच्च न्यायालय ने परमवीर सिंह सैनी बनाम बलजीत सिंह (2020) में देश के सभी थानों में प्रवेश द्वार, हवालात, कॉरिडोर, रिसेप्शन और पूछताछ कक्षों में अनिवार्य रूप से नाइट विजन और ऑडियो-वीडियो रिकॉर्डिंग युक्त सीसीटीवी कैमरे लगाने तथा कम से कम 18 महीने (न्यूनतम 1 वर्ष) का डेटा बैकअप रखने का निर्देश दिया था।
    • इलाहाबाद उच्च न्यायालय का यह फैसला इस सिद्धांत को सुदृढ़ करता है कि सीसीटीवी को निष्क्रिय रखना पुलिस द्वारा मानवाधिकार उल्लंघनों पर पर्दा डालने का बहाना नहीं बन सकता।
  • संविधान का अनुच्छेद 21 व 22:
    • किसी भी नागरिक को विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया के बिना हिरासत में नहीं लिया जा सकता।
    • हिरासत में लिए जाने के 24 घंटे के भीतर नजदीकी न्यायिक मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश करना अनुच्छेद 22(2) के तहत एक अनुल्लंघनीय मौलिक अधिकार है। थाने में ‘अनौपचारिक पूछताछ’ के नाम पर नागरिकों को बैठाए रखना शुद्ध रूप से असंवैधानिक और अवैध है।

विधिक विवरण

  • केस संदर्भ: महेंद्र गौर व 3 अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य व 2 अन्य [आपराधिक रिट याचिका – इलाहाबाद उच्च न्यायालय]
  • पीठ: न्यायमूर्ति अतुल श्रीधरन और न्यायमूर्ति दिवेश चंद्र सामंत (खंडपीठ)
  • विधिक प्रतिनिधित्व:
    • याचिकाकर्ताओं की ओर से: अधिवक्ता अर्चित कुमार श्रीवास्तव एवं प्रीति चौधरी
    • राज्य (उत्तर प्रदेश सरकार) की ओर से: अपर शासकीय अधिवक्ता (AGA)
  • प्रासंगिक कानून एवं विधिक धाराएं:
    • भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 2023 (BSA):
      • धारा 119 (इलस्ट्रेशन [g]) [पूर्ववर्ती भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 की धारा 114(g) — साक्ष्य दबाने पर प्रतिकूल उपधारणा / Adverse Inference]
    • भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS):
      • धारा 35 एवं धारा 57 (गिरफ्तारी की प्रक्रिया और 24 घंटे से अधिक पुलिस हिरासत में न रखने की बाध्यता)
      • धारा 172 (जनरल डायरी में प्रत्येक घटना व आगमन-प्रस्थान के अंकन का दायित्व)
    • भारत का संविधान:
      • अनुच्छेद 21 (प्राण एवं दैहिक स्वतंत्रता का अधिकार)
      • अनुच्छेद 22(1) व 22(2) (गिरफ्तारी के आधार जानने और 24 घंटे के भीतर मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश किए जाने का मौलिक अधिकार)
  • संबद्ध ऐतिहासिक न्यायिक नजीरें:
    • परमवीर सिंह सैनी बनाम बलजीत सिंह (2020, सुप्रीम कोर्ट) — ‘देश के सभी पुलिस थानों और जांच एजेंसियों (CBI, NIA, ED) के कार्यालयों में 24×7 चालू रहने वाले CCTV कैमरे लगाना अनिवार्य है।’
    • डी.के. बसु बनाम पश्चिम बंगाल राज्य (1997, सुप्रीम कोर्ट) — ‘हिरासत में यातना रोकने के लिए गिरफ्तारी और हिरासत के कड़े दिशानिर्देश तथा मेमो तैयार करने की अनिवार्यता।’
    • रुदुल साह बनाम बिहार राज्य (1983, सुप्रीम कोर्ट) — ‘राज्य द्वारा अवैध हिरासत में रखे गए नागरिक को सार्वजनिक कानून के तहत मौद्रिक मुआवजा (Monetary Compensation) दिया जाना संवैधानिक कर्तव्य है।’
  • अंतिम निर्णय: याचिका स्वीकार; थानों में 24×7 सीसीटीवी का संचालन अनिवार्य; 4 नागरिकों को मुआवजा प्रदान करने, दोषी एसएचओ से राशि वसूलने और उसकी सर्विस बुक में प्रतिकूल टिप्पणी दर्ज करने का आदेश।

CCTV Function: मामले का संक्षिप्त विवरण (At A Glance)

विवरणजानकारी
संबंधित अदालतइलाहाबाद उच्च न्यायालय (Allahabad High Court)
पीठन्यायमूर्ति अतुल श्रीधरन एवं न्यायमूर्ति दिवेश चंद्र सामंत
मामलामहेंद्र गौर व 3 अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य व 2 अन्य
मुख्य बिंदुथानों में CCTV कैमरों का निरंतर संचालन और अवैध हिरासत पर पुलिस की जिम्मेदारी।
मुआवजापीड़ितों को कुल ₹65,000 मुआवजा; दोषी SHO की तनख्वाह से वसूली का आदेश।
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