मुख्य बिंदु और अदालती टिप्पणियां (Key Highlights)
- कर्मचारियों और न्यायिक अधिकारियों की भारी कमी:अदालत ने आंकड़ों का हवाला देते हुए बताया कि सितंबर 2026 तक इलाहाबाद हाईकोर्ट की रजिस्ट्री और यूपी की जिला न्यायपालिका में कुल 10,352 पद खाली पड़े हैं:
- जिला अदालत कर्मचारी: 28,552 स्वीकृत पदों में से 7,834 पद खाली।
- न्यायिक अधिकारी: 4,625 स्वीकृत पदों के मुकाबले केवल 2,603 अधिकारी कार्यरत (1,122 पद रिक्त)।
- हाईकोर्ट रजिस्ट्री: 1,396 पद रिक्त।
- भर्ती में देरी: अगस्त 2026 में हुई उच्चतर न्यायिक सेवा (HJS) की परीक्षा का परिणाम लंबित है, और अगस्त 2023 के बाद से सिविल जज (जूनियर डिवीजन) के लिए कोई नई भर्ती आयोजित नहीं की गई है।
- संस्थानीकृत मंच का अभाव:अदालत ने कहा कि मुख्य न्यायाधीश और विभिन्न समितियों द्वारा लिए गए फैसलों के मिनट्स कभी फुल कोर्ट के साथ साझा नहीं किए गए। ऐसे में न्यायाधीशों के पास न्यायिक आदेशों के माध्यम से इन मुद्दों को उठाने के अलावा कोई आंतरिक संस्थागत मंच नहीं बचा है।
प्रयागराज: देश के सबसे बड़े उच्च न्यायालय—इलाहाबाद उच्च न्यायालय—की प्रशासनिक कार्यप्रणाली, मुख्य न्यायाधीशों के अनियंत्रित विशेषाधिकारों और अधीनस्थ न्यायपालिका में रिक्तियों के कारण पैदा हुए गंभीर प्रक्रियात्मक ठहराव (Procedural Stagnation) पर उच्च न्यायालय के एक वर्तमान न्यायाधीश ने अभूतपूर्व और अत्यंत बेबाक न्यायिक व्यवस्था दी है। न्यायमूर्ति विनोद दिवाकर ने निचली अदालतों में मुकदमों के अत्यधिक विलंब से जुड़े मामलों के एक समूह पर फैसला सुनाते हुए टिप्पणी की कि उच्च न्यायालय की ‘फुल कोर्ट’ (Full Court) बैठकें अक्सर किसी राजनीतिक सरकार द्वारा विश्वास मत के दौरान अपने सदस्यों को “व्हिप” जारी कर संचालित करने की तर्ज पर पूरी तरह मंच-प्रबंधित (Stage-Managed) होती हैं।
अदालत ने गंभीर चिंता जताई कि फुल कोर्ट की कार्यवाही में व्यक्तिगत न्यायाधीशों की सहमति (Concurrence) या असहमति (Dissent) तक दर्ज नहीं की जाती, जिससे एक सामूहिक लोकतांत्रिक संस्था के रूप में न्यायालय के विधिक अस्तित्व और जजों के कार्यालय की गरिमा को ठेस पहुंचती है। न्यायमूर्ति दिवाकर ने उजागर किया कि अनिवार्य नियमों के बावजूद पिछले 10 वर्षों में केवल 16 फुल कोर्ट बैठकें बुलाई गईं और न्याय प्रशासन पर कोई वार्षिक रिपोर्ट न तो फुल कोर्ट के समक्ष रखी गई और न ही सरकार को भेजी गई।
उत्तर प्रदेश की न्यायपालिका में रिक्तियों का संकट: आधिकारिक आंकड़े (सितंबर 2026)
न्यायमूर्ति दिवाकर ने रेखांकित किया कि मुख्य न्यायाधीश और समितियों के अनियंत्रित व असंरचित विवेकाधिकार (Unstructured Discretion) के कारण जिला न्यायपालिका और रजिस्ट्री में कर्मचारियों व न्यायिक अधिकारियों की भारी कमी हो गई है:
| संवर्ग / श्रेणी | स्वीकृत पद (Sanctioned Strength) | वास्तविक कार्यरत संख्या | रिक्त पदों की संख्या (Vacancies) |
|---|---|---|---|
| जिला न्यायिक अधिकारी (Judicial Officers) | 4,625 (900 पद सितंबर में स्वीकृत) | 2,603 | 1,122 पद रिक्त |
| जिला न्यायालय कर्मचारी (District Judiciary Staff) | 28,552 | 20,718 | 7,834 पद रिक्त |
| उच्च न्यायालय रजिस्ट्री कर्मचारी (HC Registry Staff) | — | — | 1,396 पद रिक्त |
| कुल संचयी रिक्तियां (सितंबर 2026 तक) | — | — | 10,352 पद रिक्त |
भर्ती प्रक्रियाओं में ठहराव: HJS और पीसीएस (जे) का विवरण
अदालत ने न्यायिक अधिकारियों की भर्ती में हो रही अत्यधिक देरी पर प्रकाश डाला:
- उच्चतर न्यायिक सेवा (Higher Judicial Service – HJS):
- दिसंबर 2023 में विज्ञापित 83 पदों के लिए लिखित परीक्षा अगस्त 2026 में आयोजित की गई, परंतु परिणाम अभी भी प्रतीक्षित है।
- सितंबर 2022 के बाद से HJS में कोई नई नियमित नियुक्ति नहीं की गई है।
- सिविल जज (जूनियर डिवीजन) / पीसीएस (जे):
- सिविल जज (जू.डि.) के लिए अंतिम अधिसूचना 10 दिसंबर 2022 को 303 पदों के लिए जारी की गई थी, जिसका परिणाम 30 अगस्त 2023 को घोषित हुआ था।
- 30 अगस्त 2023 के बाद से सिविल जज (जूनियर डिवीजन) के लिए कोई नई भर्ती प्रक्रिया आयोजित नहीं की गई है।
- हाईकोर्ट जजों बनाम जिला जजों की भर्ती में दोहरा मापदंड:
- न्यायमूर्ति दिवाकर ने टिप्पणी की कि यह स्थिति उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति प्रक्रिया के ठीक विपरीत है, जहां नियुक्तियों को सर्वोच्च संस्थागत प्राथमिकता दी जाती है, जबकि अधीनस्थ अदालतों की भर्ती प्रक्रियाओं को उपेक्षित छोड़ दिया जाता है।
अदालत द्वारा जारी प्रशासनिक निर्देश
अदालत ने माना कि प्रशासनिक विवेकाधिकार को नियंत्रित करने वाले एक संरचित ढांचे के अभाव का न्याय प्रशासन पर सीधा नकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है। पीठ ने निम्नलिखित निर्देश दिए:
- मुख्य न्यायाधीश के समक्ष प्रस्तुति: इस विस्तृत निर्णय की प्रति इलाहाबाद उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के समक्ष रखी जाए, ताकि वे इसका परीक्षण कर सकें और जो भी उचित व आवश्यक कदम हों, वे उठा सकें।
- केंद्रीय विधि मंत्रालय को प्रेषण: निर्णय की एक प्रति भारत सरकार के कानून एवं न्याय मंत्रालय के न्याय विभाग (Department of Justice) के सचिव को भेजी जाए, जो इसे विचारार्थ राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार), कानून एवं न्याय के समक्ष प्रस्तुत करेंगे।
- कैबिनेट सचिव को सूचना: निर्णय में उठाए गए संस्थागत मुद्दों का एक विस्तृत नोट भारत सरकार के कैबिनेट सचिव (Cabinet Secretary of India) को भी आवश्यक संज्ञान हेतु अग्रेषित किया जाए।
विधिक विवरण
- केस संदर्भ: ट्रायल कोर्ट कार्यवाहियों में अत्यधिक विलंब से संबंधित याचिकाओं का समूह [आपराधिक/सिविल विविध याचिकाएं – इलाहाबाद उच्च न्यायालय, प्रधान पीठ प्रयागराज]
- पीठ: न्यायमूर्ति विनोद दिवाकर (एकल पीठ, इलाहाबाद उच्च न्यायालय)
- निर्णय की तिथि: सितंबर/अक्टूबर 2026
- प्रासंगिक नियम एवं संवैधानिक प्रावधान:
- इलाहाबाद उच्च न्यायालय नियमावली, 1952 (Allahabad High Court Rules, 1952):
- चैप्टर III (फुल कोर्ट की शक्तियां, बैठकें, कोरम और न्यूनतम त्रैमासिक बैठक की अनिवार्यता)
- न्याय प्रशासन पर सामान्य वार्षिक रिपोर्ट का वैधानिक प्रावधान
- भारत का संविधान:
- अनुच्छेद 227 (उच्च न्यायालय का अधीनस्थ न्यायालयों पर अधीक्षण का अधिकार)
- अनुच्छेद 229 (उच्च न्यायालय के अधिकारियों व सेवकों की नियुक्ति और सेवा शर्तें)
- अनुच्छेद 233, 234 एवं 235 (जिला न्यायाधीशों की नियुक्ति, न्यायिक सेवा में भर्ती और अधीनस्थ न्यायालयों पर उच्च न्यायालय का पूर्ण प्रशासनिक नियंत्रण)
- अनुच्छेद 21 (त्वरित विचारण और सुलभ न्याय का मौलिक अधिकार)
- इलाहाबाद उच्च न्यायालय नियमावली, 1952 (Allahabad High Court Rules, 1952):
- संबद्ध ऐतिहासिक न्यायिक नजीरें:
- मलिक मजहर सुल्तान बनाम यूपी लोक सेवा आयोग (सुप्रीम कोर्ट) — ‘जिला न्यायपालिका में रिक्तियों को भरने के लिए सर्वोच्च न्यायालय द्वारा निर्धारित वार्षिक समय-सारिणी (Time-schedule) का कड़ाई से पालन अनिवार्य है।’
- चीफ जस्टिस ऑफ आंध्र प्रदेश बनाम एल.वी.ए. दीक्षितुलु (1979, सुप्रीम कोर्ट संविधान पीठ) — ‘अनुच्छेद 235 के तहत अधीनस्थ न्यायपालिका पर उच्च न्यायालय का नियंत्रण सामूहिक (Collegiate) होता है, जो पूरी अदालत (Full Court) में निहित है, न कि केवल व्यक्तिगत रूप से मुख्य न्यायाधीश में।’
- ऑल इंडिया जजेस एसोसिएशन बनाम भारत संघ (सुप्रीम कोर्ट) — ‘पर्याप्त न्यायिक अवसंरचना और समय पर भर्ती स्वतंत्र न्यायपालिका का अनिवार्य घटक है।’
- वर्तमान स्थिति: निर्णय की प्रतियां इलाहाबाद हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश, केंद्रीय विधि मंत्रालय और कैबिनेट सचिव को उच्च-स्तरीय सुधारात्मक कदमों हेतु प्रेषित।
Full Court-I: मामले का संक्षिप्त विवरण (At A Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | इलाहाबाद उच्च न्यायालय (Allahabad High Court) |
| पीठ | न्यायमूर्ति विनोद दिवाकर (Justice Vinod Diwakar) |
| मुख्य मुद्दा | जिला न्यायालयों में मुकदमों के निपटारे में देरी और हाईकोर्ट की प्रशासनिक शिथिलता। |
| प्रमुख टिप्पणी | पिछले 10 वर्षों में नियम उल्लंघन कर केवल 16 ‘फुल कोर्ट’ बैठकें आयोजित की गईं। |
| अगला कदम | फैसले की प्रति मुख्य न्यायाधीश, केंद्रीय कानून मंत्रालय और कैबिनेट सचिव को भेजने का निर्देश। |

