Sunday, October 4, 2026
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Soldier Missing: नागरिकों की चैन की नींद सैनिकों की रतजगे-सतर्कता की कीमत पर संभव होती है; 14 साल पहले रहस्यमय ढंग से त्रिपुरा स्टेट राइफल्स का जवान लापता

हाईकोर्ट की मुख्य टिप्पणियाँ और कानूनी तर्क (Key Observations)

  • सैनिकों के प्रति समाज का दायित्व:पीठ ने मामले की शुरुआत में ही बेहद मार्मिक टिप्पणी की:“आम नागरिकों की चैन की नींद सैनिकों की रतजगा, सतर्कता और बलिदान की कीमत पर आती है। बदले में देश के नागरिक समाज की यह जिम्मेदारी बनती है कि जब सैनिक अपने व्यक्तिगत जीवन में किसी संकट का सामना करे, तो समाज उसके साथ खड़ा हो। यहाँ एक ऐसा मामला है जहाँ तीन राज्यों की पुलिस और त्रिपुरा का एक प्रमुख सशस्त्र बल 14 साल पहले गायब हुए जवान का पता लगाने में असमर्थ रहा है।”
  • अनुच्छेद 226 के तहत असाधारण शक्तियों का प्रयोग:कोर्ट ने माना कि आमतौर पर व्यक्ति के लापता होने पर शुरुआती 48 से 72 घंटे काफी महत्वपूर्ण (Golden Hours) होते हैं। लेकिन जब सीमाओं की रक्षा करने वाला जवान बिना किसी सुराग के गायब हो जाए और उसका वृद्ध पिता 14 साल से भटक रहा हो, तो यह संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत सीबीआई जांच का आदेश देने का एक दुर्लभ और योग्य मामला बनता है।
  • क्षेत्राधिकार (Territorial Jurisdiction) पर फैसला:अभियोजन पक्ष की क्षेत्राधिकार संबंधी आपत्ति को खारिज करते हुए कोर्ट ने CrPC की धारा 183 (अब BNSS, 2023 की धारा 203) का हवाला दिया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि यात्रा के दौरान कोई अपराध या घटना होती है, तो उस मार्ग में आने वाले किसी भी स्थानीय अधिकार क्षेत्र की अदालत को मामले की जांच या सुनवाई का अधिकार प्राप्त होता है।
  • CBI के दृष्टिकोण पर टिप्पणी:14 साल बीत जाने के कारण सफलता की कम संभावना वाले तर्क पर पीठ ने कहा कि सीबीआई जैसी शीर्ष जांच एजेंसी से ऐसे मामलों में नकारात्मक या निराशावादी रवैये की उम्मीद नहीं की जाती है।

कोच्चि: सीमाओं की सुरक्षा करने वाले अर्धसैनिक बलों के जवानों के प्रति राष्ट्र और नागरिक समाज के विधिक व नैतिक दायित्व, संविधान के अनुच्छेद 226 के असाधारण क्षेत्राधिकार और अंतर-राज्यीय अपराधों में जांच की विफलता पर केरल हाईकोर्ट ने अत्यंत संवेदनशील, मानवीय और नजीर योग्य फैसला सुनाया है।

न्यायमूर्ति जी. गिरीश की एकल पीठ ने लापता जवान के बुजुर्ग पिता द्वारा 14 वर्षों से लड़ी जा रही कानूनी लड़ाई में यह आदेश पारित किया। उच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि यद्यपि किसी लापता व्यक्ति की खोज में पहले 48 से 72 घंटे ‘गोल्डन ऑवर्स’ (Golden Hours) होते हैं, परंतु जब देश की सीमाओं की रक्षा करने वाला एक जवान रहस्यमय ढंग से गायब हो जाए और तीन राज्यों की पुलिस उसे खोजने में पूरी तरह लाचार साबित हो चुकी हो, तो अदालत अंतिम उम्मीद के रूप में आए एक लाचार पिता के लिए अपने दरवाजे बंद नहीं कर सकती। उच्च न्यायालय ने वर्ष 2012 में केरल से गुवाहाटी की ट्रेन यात्रा के दौरान रहस्यमय ढंग से लापता हुए त्रिपुरा स्टेट राइफल्स (TSR) के एक राइफलमैन/जवान के मामले की जांच तुरंत प्रभाव से केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) को सौंप दी है।

उच्च न्यायालय के प्रमुख विधिक निष्कर्ष एवं न्यायिक टिप्पणियां

1. ‘नागरिकों की शांति सैनिकों के बलिदान पर निर्भर है’ न्यायमूर्ति जी. गिरीश ने राष्ट्र की रक्षा और सुरक्षा बलों के पारिवारिक संरक्षण के अंतर्संबंध पर मार्मिक टिप्पणी करते हुए कहा: “एक नागरिक की चैन की नींद (Peaceful sleep) सीमाओं पर तैनात सैनिक की रतजगे, सतर्कता और आत्म-बलिदान (Sleepless nights, vigilance and sacrifice) की कीमत पर मिलती है। इसके बदले में राष्ट्र के नागरिक समाज का यह बुनियादी दायित्व है कि जब वह सैनिक अपने व्यक्तिगत जीवन में किसी गंभीर संकट का सामना करे, तो वह उसके साथ मजबूती से खड़ा रहे। यह एक ऐसा मामला है जहां तीन राज्यों की पुलिस (केरल, आंध्र प्रदेश, असम) और त्रिपुरा का एक प्रमुख सशस्त्र बल पिछले चौदह वर्षों से उस सैनिक का पता लगाने में असमर्थ रहे हैं, जो अचानक रहस्य में विलीन हो गया।”

2. सीबीआई के नकारात्मक या निराशावादी दृष्टिकोण पर रोक:

  • सीबीआई और अभियोजन की इस दलील पर कि 14 साल बीत जाने के बाद अब किसी सुराग के मिलने की संभावना लगभग न के बराबर है, अदालत ने कहा:“सीबीआई जैसी देश की शीर्ष जांच एजेंसी से यह अपेक्षा नहीं की जाती कि वह इस तरह के संवेदनशील मामले में कोई नकारात्मक या निराशावादी दृष्टिकोण (Pessimistic attitude) अपनाए।यह मामला उन ‘दुर्लभ से दुर्लभतम मामलों’ (Rarest of Rare Cases) में से एक है जहां भारत के संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत निहित शक्तियों का प्रयोग करके लापता जवान के मामले की जांच सीबीआई को सौंपी जानी चाहिए।”

3. यात्रा के दौरान हुए अपराधों में क्षेत्रीय अधिकारिता (Territorial Jurisdiction): विशेष लोक अभियोजक ने तर्क दिया था कि चूंकि जवान विशाखापट्टनम या उसके आगे कहीं गायब हुआ, अतः केरल हाईकोर्ट के पास इस मामले की सुनवाई का क्षेत्रीय क्षेत्राधिकार नहीं है। अदालत ने इस आपत्ति को खारिज करते हुए विधिक स्थिति स्पष्ट की:

  • अदालत ने CrPC की धारा 183 [वर्तमान भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS), 2023 की धारा 203] का हवाला दिया, जो यात्रा या जलयात्रा (Journey or Voyage) के दौरान किए गए अपराधों के क्षेत्राधिकार को नियंत्रित करती है।
  • कानूनन यदि कोई अपराध किसी यात्रा के दौरान घटित होता है, तो उस पूरे मार्ग में आने वाले किसी भी न्यायालय को अधिकारिता प्राप्त होती है जिसके स्थानीय क्षेत्राधिकार से पीड़ित व्यक्ति गुजरा हो।
  • चूंकि यात्रा एर्नाकुलम (केरल) से शुरू हुई थी, इसलिए केरल उच्च न्यायालय को इस मामले में रिट क्षेत्राधिकार के तहत जांच ट्रांसफर करने का पूर्ण विधिक अधिकार है।

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मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि: 2012 से शुरू हुई अंतहीन तलाश

  • जवान की पृष्ठभूमि और वापसी यात्रा (4 अप्रैल 2012):
    • लापता जवान केरल के वेन्गूर का निवासी था और त्रिपुरा स्टेट राइफल्स (TSR) में राइफलमैन के पद पर सेवारत था।
    • एक महीने की छुट्टी पूरी करने के बाद, उसके पिता ने 4 अप्रैल 2012 को उसे एर्नाकुलम रेलवे स्टेशन से गुवाहाटी जाने वाली ट्रेन में बैठाकर विदा किया था।
  • अंतिम टेलीफोन कॉल और रहस्यमय गुमशुदगी:
    • पिता के अनुसार, ट्रेन यात्रा के दौरान उन्हें एक अज्ञात मोबाइल नंबर से बेटे का फोन आया। बेटे ने बताया कि ट्रेन विशाखापट्टनम पहुंच चुकी है, उसकी तबीयत ठीक नहीं लग रही है, लेकिन उसने पिता से चिंता न करने और खुद संभाल लेने की बात कही।
    • इसके बाद जवान से कोई संपर्क नहीं हो सका।
  • कमांडेंट की सूचना और पुलिस की विफलता:
    • 10 अप्रैल 2012 को त्रिपुरा स्टेट राइफल्स के कमांडेंट ने पिता को सूचित किया कि उनका बेटा निर्धारित समय पर ड्यूटी पर उपस्थित नहीं हुआ है।
    • व्यथित पिता ने एर्नाकुलम रेलवे पुलिस स्टेशन में गुमशुदगी की शिकायत दर्ज कराई और आंध्र प्रदेश व रेलवे अधिकारियों के चक्कर काटे।
  • विशाखापट्टनम पुलिस की लाचारी:
    • केरल हाईकोर्ट के प्रारंभिक हस्तक्षेप पर आंध्र प्रदेश पुलिस से संपर्क किया गया, परंतु विशाखापट्टनम पुलिस ने कोई सुराग न मिलने की लाचारी जताते हुए मामले को “अट्रेस्ड / अनडिटेक्टेड” (Undetected) मानकर फाइल बंद कर दी।
    • पिता ने अंततः थक-हारकर सीबीआई जांच की गुहार लगाई।

उच्च न्यायालय द्वारा जारी निर्देश

उच्च न्यायालय ने मामले की गहराई और बहु-राज्यीय आयाम को देखते हुए निम्नलिखित आदेश पारित किए:

  1. सीबीआई को जांच का पूर्ण हस्तांतरण: मामले की समग्र जांच तत्काल प्रभाव से केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) को सौंपी जाती है।
  2. रिकॉर्ड्स का त्वरित प्रेषण: केरल और आंध्र प्रदेश के पुलिस महानिदेशकों (State Police Chiefs) को निर्देश दिया गया कि वे अब तक की गई सभी जांचों, केस डायरियों और संबंधित दस्तावेजों को तत्काल सीबीआई के नामित जांच अधिकारी को सौंपें।
  3. गहन जांच का अधिदेश: सीबीआई को निर्देश दिया गया कि वह जवान की गुमशुदगी के पीछे के रहस्य को सुलझाने के लिए नए सिरे से समन्वित जांच शुरू करे।

विधिक विवरण

  • केस संदर्भ: लापता जवान के पिता बनाम भारत संघ व अन्य [रिट याचिका (आपराधिक) – केरल उच्च न्यायालय, एर्नाकुलम]
  • पीठ: न्यायमूर्ति जी. गिरीश (एकल पीठ)
  • निर्णय की तिथि: अक्टूबर 2026
  • विधिक प्रतिनिधित्व:
    • याचिकाकर्ता (पिता) की ओर से: अधिवक्ता सूरज टी. एलेंजिकल
    • प्रतिवादी (भारत संघ / सीबीआई) की ओर से: भारत की उप सॉलिसिटर जनरल (DSGI) ओ.एम. शलीना
  • प्रासंगिक कानून एवं विधिक धाराएं:
    • भारत का संविधान:
      • अनुच्छेद 226 (उच्च न्यायालय का रिट क्षेत्राधिकार – निष्पक्ष जांच सुनिश्चित करने हेतु मामलों को सीबीआई को सौंपने की असाधारण शक्ति)
      • अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार – त्वरित व निष्पक्ष जांच का मूल अधिकार)
    • भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS):
      • धारा 203 [पूर्ववर्ती दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा 183 — यात्रा या जलयात्रा के दौरान किए गए अपराधों के संबंध में न्यायालयों की क्षेत्रीय अधिकारिता]
    • दिल्ली विशेष पुलिस स्थापना अधिनियम, 1946 (DPSE Act, 1946)
  • संबद्ध ऐतिहासिक न्यायिक नजीरें:
    • पश्चिम बंगाल राज्य बनाम समिति फॉर प्रोटेक्शन ऑफ डेमोक्रेटिक राइट्स (2010, 5-जज संविधान पीठ, सुप्रीम कोर्ट) — ‘उच्च न्यायालयों को अनुच्छेद 226 के तहत राज्य की सहमति के बिना भी दुर्लभ और असाधारण मामलों में निष्पक्ष न्याय के लिए सीबीआई जांच का आदेश देने का पूर्ण संवैधानिक अधिकार है।’
    • पूजा पाल बनाम भारत संघ (2016, सुप्रीम कोर्ट) — ‘संविधान के तहत निष्पक्ष, पारदर्शी और त्वरित जांच का अधिकार मौलिक अधिकारों का अभिन्न अंग है, विशेषकर जहां नियमित पुलिस बल जांच में असफल रहा हो।’
  • अंतिम निर्णय: याचिका स्वीकार; केरल और आंध्र प्रदेश पुलिस से जांच छीनकर सीबीआई को हस्तांतरित; संबंधित राज्यों के डीजीपी को सभी साक्ष्य और दस्तावेज सीबीआई को तत्काल सौंपने का आदेश।

Soldier Missing: मामले का संक्षिप्त विवरण (At A Glance)

विवरणजानकारी
संबंधित अदालतकेरला उच्च न्यायालय (Kerala High Court)
न्यायाधीशन्यायमूर्ति जी. गिरिश (Justice G. Girish)
लापता जवानत्रिपुरा स्टेट राइफल्स (Tripura State Rifles) के राइफलमैन
घटना की तारीख4 अप्रैल 2012 (केरल से गुवाहाटी ट्रेन यात्रा के दौरान)
मुख्य आदेशकेरल और आंध्र प्रदेश पुलिस को अब तक की जांच के सभी रिकॉर्ड तुरंत CBI को सौंपने का निर्देश।
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