हाईकोर्ट की मुख्य और तीखी टिप्पणियाँ
- कानूनी प्रक्रिया बनाम व्यक्तिगत हमला:न्यायालय ने स्पष्ट किया कि किसी आदेश की त्रुटि पर सवाल उठाने और जज की निष्ठा पर व्यक्तिगत हमला करने में बहुत अंतर है:“यह एक स्थापित सिद्धांत है कि किसी न्यायिक अधिकारी द्वारा अपने न्यायिक कार्यों के निष्पादन में पारित आदेश को कानून द्वारा निर्धारित मंच पर चुनौती दी जानी चाहिए… किसी न्यायिक आदेश को गलत या गैर-टिकाऊ कहना याचिकाकर्ता का अधिकार है, लेकिन यह अधिकार जज की व्यक्तिगत ईमानदारी पर गैर-जिम्मेदाराना आरोप लगाने का लाइसेंस नहीं देता।”
- अवमानना याचिका अपील का विकल्प नहीं:पीठ ने दोहराया कि अदालत के फैसले से असंतुष्ट होने पर अवमानना कार्यवाही (Contempt Proceedings) को अपील या रिविजन के विकल्प के रूप में इस्तेमाल नहीं किया जा सकता।
अदालत का अंतिम आदेश
- हाईकोर्ट ने न्यायिक अधिकारी के खिलाफ दायर अवमानना याचिका को खारिज कर दिया।
- याचिकाकर्ता पर ₹40,000 का जुर्माना लगाया गया, जिसे दो महीने के भीतर जिला कानूनी सेवा प्राधिकरण (District Legal Services Authority, Andaman) में जमा करना होगा।
- जमा रसीद को एक सप्ताह के भीतर हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार के समक्ष पेश करने का निर्देश दिया गया है।
कोलकाता/पोर्ट ब्लेयर: न्यायिक आदेशों को चुनौती देने के स्थापित विधिक रास्तों (अपील, रिवीजन आदि) बनाम न्यायिक अधिकारियों पर व्यक्तिगत हमलों, अदालत की अवमानना कानून के दुरुपयोग, और मातहत न्यायपालिका की संस्थागत गरिमा के संरक्षण पर कलकत्ता हाईकोर्ट ने एक अत्यंत कड़ा और नजीर पेश करने वाला फैसला सुनाया है।
न्यायमूर्ति प्रसेनजीत बिस्वास की एकल पीठ ने अंडमान एवं निकोबार द्वीप समूह में तैनात एक न्यायिक अधिकारी के खिलाफ वादी द्वारा दायर अवमानना याचिका (Contempt Petition) को पूरी तरह खारिज करते हुए यह निर्णय पारित किया। अदालत ने न्यायिक अधिकारी के खिलाफ अशोभनीय व आपत्तिजनक टिप्पणियां करने के लिए वादी पर ₹40,000 का हर्जाना (Cost) अधिरोपित किया। उच्च न्यायालय ने निर्देश दिया कि यह राशि 2 महीने के भीतर अंडमान जिला विधिक सेवा प्राधिकरण (DLSA) में जमा कराई जाए। उच्च न्यायालय ने स्पष्ट व्यवस्था दी है कि किसी न्यायिक आदेश की कानूनी आलोचना करने और फैसला सुनाने वाले न्यायाधीश की व्यक्तिगत सत्यनिष्ठा (Personal Integrity) पर हमला करने के बीच एक स्पष्ट विभाजन रेखा है। यदि कोई वादी किसी आदेश से असंतुष्ट है, तो उसे सक्षम अपीलीय मंच का दरवाजा खटखटाना चाहिए; अवमानना याचिका का सहारा लेकर जज को डराना या अपमानित करना कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग है।
उच्च न्यायालय के प्रमुख विधिक निष्कर्ष एवं न्यायिक टिप्पणियां
1. ‘आदेश को चुनौती देने की आजादी, जज की निष्ठा पर हमले का लाइसेंस नहीं’ न्यायमूर्ति प्रसेनजीत बिस्वास ने न्यायिक आदेश की वैधानिक समीक्षा और जज पर व्यक्तिगत हमले के अंतर को स्पष्ट करते हुए दो-टूक कहा:
“यह एक सुस्थापित विधिक सिद्धांत है कि किसी न्यायिक अधिकारी द्वारा अपने न्यायिक कर्तव्यों के विधिपूर्ण निर्वहन के दौरान पारित आदेश को कानून द्वारा निर्धारित सक्षम मंच (Prescribed Forum) के समक्ष ही चुनौती दी जानी चाहिए।
एक वादी वैध रूप से यह तर्क दे सकता है कि कोई न्यायिक आदेश त्रुटिपूर्ण है, साक्ष्य के विपरीत है, कानून के विरुद्ध है या अन्यथा टिकने योग्य नहीं है; ऐसी शिकायत का निवारण सक्षम अपीलीय या पुनरीक्षण अदालत के समक्ष होना चाहिए।
परंतु, किसी न्यायिक आदेश पर सवाल उठाने के लिए वादी को उपलब्ध स्वतंत्रता किसी न्यायिक अधिकारी की व्यक्तिगत सत्यनिष्ठा (Personal Integrity) के खिलाफ लापरवाही भरे और बेबुनियाद आरोप लगाने का कोई अप्रतिबंधित लाइसेंस (Unrestricted Licence) प्रदान नहीं करती।”
2. अपील या रिवीजन का विकल्प नहीं हो सकती अवमानना याचिका:
- अदालत ने रेखांकित किया कि किसी आदेश की वैधानिकता या उसकी शुद्धता की जांच कराने के लिए ‘अदालत की अवमानना’ का इस्तेमाल किसी सामान्य अपील (Appeal) या पुनरीक्षण (Revision) के विकल्प के रूप में कतई नहीं किया जा सकता।
- उच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि न तो कोई न्यायाधीश केवल इसलिए अवमानना की कार्यवाही शुरू कर सकता है क्योंकि कोई पक्षकार आदेश से असंतुष्ट है, और न ही कोई वादी जज पर किए गए व्यक्तिगत हमले को “आदेश की सामान्य आलोचना” बताकर कानूनी संरक्षण पा सकता है।
मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि: मनी सूट के खारिज होने से अवमानना तक
- मूल वाद (Money Suit) का खारिज होना (21 अगस्त 2026):
- मामला अंडमान एवं निकोबार द्वीप समूह में तैनात एक अधीनस्थ न्यायिक अधिकारी की अदालत में लंबित एक धन वसूली वाद (Money Suit) से उपजा।
- 21 अगस्त 2026 को न्यायिक अधिकारी ने वादी की लगातार अनुपस्थिति और मामले को आगे बढ़ाने के लिए उचित कदम न उठाने के कारण वाद को खारिज कर दिया था। अदालत ने अपने आदेश में दर्ज किया था कि ऐसे मामले को लंबित रखना अदालत के बहुमूल्य समय की बर्बादी होगी।
- विधिक प्रक्रिया छोड़कर जज पर हमला:
- सीपीसी के तहत आदेश IX नियम 9 के तहत वाद बहाली का आवेदन देने या अपीलीय अदालत में जाने के बजाय, वादी ने जिला एवं सत्र न्यायाधीश (District and Sessions Judge) को एक ईमेल भेजा।
- ईमेल में सीधे तौर पर फैसला सुनाने वाले न्यायिक अधिकारी की निष्पक्षता और व्यक्तिगत सत्यनिष्ठा पर अपमानजनक लांछन और निराधार आरोप लगाए गए।
- उच्च न्यायालय में अवमानना याचिका:
- इसके बाद वादी ने उसी न्यायिक अधिकारी के खिलाफ कलकत्ता उच्च न्यायालय में अवमानना याचिका दायर कर दी।
- उच्च न्यायालय ने मामले का अवलोकन करते हुए पाया कि विवाद का मूल कारण न्यायिक आदेश था, लेकिन वादी ने कानून सम्मत रास्ता अपनाने के बजाय सीधे न्यायिक अधिकारी को निशाना बनाया।
उच्च न्यायालय का अंतिम आदेश एवं दंडात्मक निर्देश
- अवमानना याचिका खारिज: न्यायिक अधिकारी के विरुद्ध दायर अवमानना याचिका को दुर्भावनापूर्ण और प्रक्रिया का दुरुपयोग मानते हुए पूर्णतः निरस्त किया जाता है।
- ₹40,000 का हर्जाना: वादी पर न्यायिक अधिकारी के विरुद्ध अपमानजनक टिप्पणियां करने के लिए ₹40,000 का जुर्माना लगाया जाता है।
- डीएलएसए में जमा करने की समय-सीमा:
- यह राशि आदेश के दो महीने के भीतर जिला विधिक सेवा प्राधिकरण (DLSA), अंडमान के खाते में जमा करानी होगी।
- जमा की रसीद राशि जमा होने के एक सप्ताह के भीतर कलकत्ता उच्च न्यायालय के रजिस्ट्रार के समक्ष औपचारिक रूप से दाखिल करनी होगी।
- भविष्य के लिए सख्त चेतावनी: अदालत ने वादी को भविष्य में संयम (Restraint) बरतने की कड़ी चेतावनी दी और दोहराया कि किसी भी न्यायिक आदेश से असंतोष होने पर केवल विहित विधिक प्रक्रिया का ही उपयोग किया जाए।
विधिक विवरण
- केस संदर्भ: वादी (याचिकाकर्ता) बनाम न्यायिक अधिकारी व अन्य [अवमानना आवेदन / विविध वाद – कलकत्ता उच्च न्यायालय (सर्किट बेंच, पोर्ट ब्लेयर)]
- पीठ: न्यायमूर्ति प्रसेनजीत बिस्वास (एकल पीठ)
- आदेश की तिथि: अक्टूबर 2026
- प्रासंगिक कानून एवं विधिक धाराएं:
- न्यायालय अवमानना अधिनियम, 1971 (Contempt of Courts Act, 1971):
- धारा 2(c) (आपराधिक अवमानना — न्याय प्रशासन को कलंकित करने या अदालती प्राधिकार को कमतर आंकने का कृत्य)
- अवमानना क्षेत्राधिकार की सीमाएं (यह अपीलीय मंच का स्थानापन्न नहीं है)
- न्यायिक अधिकारी संरक्षण अधिनियम, 1850 (Judicial Officers Protection Act, 1850) (सद्भावपूर्वक किए गए न्यायिक कार्यों के लिए अधिकारियों को विधिक संरक्षण)
- सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (CPC):
- आदेश IX नियम 8 व 9 (वादी की अनुपस्थिति में वाद खारिज होना एवं बहाली की प्रक्रिया)
- धारा 96 / आदेश XLI (मूल डिक्री/आदेश के विरुद्ध अपील के विहित प्रावधान)
- न्यायालय अवमानना अधिनियम, 1971 (Contempt of Courts Act, 1971):
- संबद्ध ऐतिहासिक न्यायिक नजीरें:
- सी. रविचंद्रन अय्यर बनाम जस्टिस ए.एम. भट्टाचार्जी (1995, सुप्रीम कोर्ट) — ‘न्यायपालिका की स्वतंत्रता की रक्षा के लिए यह आवश्यक है कि न्यायाधीशों को बिना किसी भय या वादियों के निजी हमलों के स्वतंत्र रूप से न्याय करने का माहौल मिले।’
- अदालत की अवमानना (सुप्रीम कोर्ट नजीरें) — ‘न्यायिक आदेशों की निष्पक्ष, अकादमिक और मर्यादित आलोचना कानूनन स्वीकार्य है, परंतु जब आलोचना का उद्देश्य न्यायाधीश की व्यक्तिगत सत्यनिष्ठा को लांछित करना या न्याय प्रशासन में बाधा डालना हो, तो वह अवमानना और दंड का विषय बन जाती है।’
- अंतिम परिणाम: अवमानना याचिका खारिज; वादी पर न्यायिक अधिकारी को लांछित करने हेतु ₹40,000 का हर्जाना; उचित अपीलीय मंच के उपयोग की अनिवार्यता पर जोर।
Advocate Penalised:मामले का संक्षिप्त विवरण (At A Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित न्यायालय | कलकत्ता उच्च न्यायालय (Calcutta High Court) |
| पीठ | न्यायमूर्ति प्रसेनजीत बिस्वास (Justice Prasenjit Biswas) |
| मूल विवाद | अंडमान एवं निकोबार द्वीप समूह के एक न्यायिक अधिकारी द्वारा 21 अगस्त 2026 को मनी सूट (Money Suit) खारिज किया जाना। |
| याचिकाकर्ता का कृत्य | कानूनी प्रक्रिया (अपील) अपनाने के बजाय जिला एवं सत्र न्यायाधीश को पत्र/ईमेल भेजकर जज पर व्यक्तिगत आरोप लगाए। |
| अदालत का फैसला | अवमानना याचिका खारिज; अंडमान जिला कानूनी सेवा प्राधिकरण (DLSA) में ₹40,000 जुर्माना जमा करने का निर्देश। |

