हाईकोर्ट की मुख्य टिप्पणियाँ और तर्क (Key Observations)
- सरकार के ढीले रवैये पर सवाल:पीठ ने कहा:“अदालत इस हालिया हलफनामे से संतुष्ट नहीं है। इसमें कहा गया है कि सरकार के पास रूपांतरण की शर्तों और दरों को तय करने का विवेक है। हालांकि, इन मामलों के तथ्यों से स्पष्ट है कि सरकार इस विवेक का प्रयोग करने में काफी ढीली/सुस्त रही है।”
- दिल्लीवासियों की परेशानी पर चिंता:कोर्ट ने कहा कि पोर्टल बंद होने के कारण पिछले 8 महीनों से संपत्ति मालिक और निवासी भारी परेशानी का सामना कर रहे हैं। जिन लोगों ने प्रचलित दरों पर रूपांतरण शुल्क भी जमा कर दिया है, वे DDA के फैसले के इंतजार में अधर में लटके हुए हैं।
- न्यायसंगत फैसला:अदालत ने माना कि जब नागरिकों से 155.06 करोड़ रुपये का शुल्क लिया जा चुका है, तो उन्हें नई नीति के नाम पर अनिश्चितकाल तक रोके रखना न्यायसंगत नहीं है। इसलिए, जिस तारीख को आवेदन जमा किया गया था, उसी तारीख की नीति के तहत उनके आवेदनों को तुरंत प्रोसेस किया जाना चाहिए।
नई दिल्ली: दिल्ली में संपत्तियों को पट्टे (Leasehold) से मालिकाना हक यानी फ्रीहोल्ड (Freehold) में बदलने की प्रक्रिया, दिल्ली विकास प्राधिकरण (DDA) द्वारा अरबों रुपये की कन्वर्जन फीस वसूलने के बावजूद फाइलों को लटकाए रखने और 8 महीने से अधिक समय से ऑनलाइन पोर्टल के ठप रहने पर दिल्ली हाईकोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है।
न्यायमूर्ति प्रतिभा एम. सिंह और न्यायमूर्ति विकास महाजन की खंडपीठ ने दिल्ली के विभिन्न सहकारी आवासीय समितियों (Co-operative Group Housing Societies) के फ्लैट मालिकों और शहर के निवासियों द्वारा दायर याचिकाओं के एक समूह पर सुनवाई करते हुए यह ऐतिहासिक आदेश पारित किया। अदालत ने कड़े शब्दों में कहा कि जब प्राधिकरण जनता से पहले ही ₹155.06 करोड़ जैसी भारी-भरकम राशि बतौर कन्वर्जन शुल्क वसूल चुका है, तो नीतिगत फैसलों के अभाव या पोर्टल की खराबी की आड़ लेकर नागरिकों को अधर में लटकाना न्याय के सिद्धांतों के विपरीत है। उच्च न्यायालय की खंडपीठ ने डीडीए को स्पष्ट और बाध्यकारी निर्देश जारी किया है कि वह लीजहोल्ड से फ्रीहोल्ड कन्वर्जन के लिए लंबित सभी आवेदनों को उस नीति (Prevalent Policy) के तहत प्रोसेस करे जो आवेदन दाखिल करने की तारीख पर लागू थी।
उच्च न्यायालय के प्रमुख विधिक निष्कर्ष एवं न्यायिक टिप्पणियां
1. ‘₹155.06 करोड़ वसूल चुके हैं, पुरानी लागू नीति के अनुसार ही तय करें लंबित आवेदन’ न्यायमूर्ति प्रतिभा एम. सिंह और न्यायमूर्ति विकास महाजन की खंडपीठ ने दिल्लीवासियों की कठिनाइयों और डीडीए की निष्क्रियता पर दो-टूक व्यवस्था दी:
*”न्याय के हित में (In the interest of justice), और इस तथ्य को संज्ञान में लेते हुए कि डीडीए द्वारा ₹155.06 करोड़ की भारी राशि पहले ही वसूली जा चुकी है, यह न्यायालय निर्देश देना उचित समझता है कि: संपत्तियों को लीजहोल्ड से फ्रीहोल्ड में बदलने के लिए लंबित सभी आवेदनों पर डीडीए द्वारा उस प्रचलित नीति (Prevalent Policy) के तहत ही कार्रवाई और निस्तारण किया जाएगा, जो संबंधित आवेदन दाखिल करने की तारीख पर लागू थी।”*
2. 8 महीने से पोर्टल ठप, सरकार का ढुलमुल रवैया अस्वीकार्य:
- अदालत ने रिकॉर्ड का अवलोकन करते हुए कहा कि 2 जनवरी 2026 से डीडीए का ‘इंटरएक्टिव डिस्पोजल ऑफ लैंड इंफॉर्मेशन सिस्टम’ (IDLI Portal) गैर-कार्यात्मक (Non-functional) बना हुआ है।
- केंद्रीय आवास एवं शहरी कार्य मंत्रालय (MoHUA) के अवर सचिव द्वारा दाखिल नवीनतम हलफनामे पर गहरी असंतुष्टि जताते हुए खंडपीठ ने कहा:“न्यायालय इस नवीनतम हलफनामे से कतई संतुष्ट नहीं है। हलफनामे में कहा गया है कि सरकार के पास नियम, शर्तें और दरें तय करने का विवेकाधिकार व सक्षमता है। परंतु इन मामलों के तथ्यों और परिस्थितियों से स्पष्ट है कि सरकार अपने इस विवेकाधिकार के प्रयोग में पूरी तरह शिथिल और लापरवाह (Lax) प्रतीत होती है। हलफनामे में न तो कोई ठोस प्रगति दिखाई गई है और न ही नीति को अंतिम रूप देने की कोई समय-सीमा दी गई है।”
3. आवेदन और शुल्क जमा कर चुके संपत्ति मालिकों की दोहरी प्रताड़ना:
- अदालत ने रेखांकित किया कि दिल्ली के नागरिक पिछले आठ महीनों से भारी अनिश्चितता और उत्पीड़न का सामना कर रहे हैं:“यह स्थिति उन संपत्ति मालिकों के मामले में और भी गंभीर हो जाती है जिन्होंने काफी पहले अपने आवेदन दाखिल कर दिए थे, उस समय प्रचलित सभी आवश्यक कन्वर्जन शुल्क जमा कर दिए थे, और अब केवल डीडीए के औपचारिक फैसले का अंतहीन इंतजार कर रहे हैं।”
मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि: IDLI पोर्टल का संकट और नीतिगत गतिरोध
- 3 जुलाई 2026 (न्यायिक संज्ञान):
- दिल्ली उच्च न्यायालय के समक्ष कोऑपरेटिव सोसायटियों के फ्लैट मालिकों ने याचिकाएं दायर कर बताया कि डीडीए का कन्वर्जन पोर्टल (IDLI) 2 जनवरी 2026 से पूरी तरह बंद पड़ा है।
- अदालत ने इस पर संज्ञान लेते हुए डीडीए से स्थिति रिपोर्ट (Status Report) तलब की थी।
- MoHUA, DDA और L&DO का पत्राचार:
- रिकॉर्ड पर पेश किए गए पत्राचार से यह उजागर हुआ कि पोर्टल बंद होने के बावजूद केंद्रीय शहरी विकास मंत्रालय (MoHUA), दिल्ली विकास प्राधिकरण (DDA) और भूमि एवं विकास कार्यालय (L&DO) के बीच केवल फाइलों का आदान-प्रदान चल रहा था और नई कन्वर्जन नीति पर कोई अंतिम निर्णय नहीं लिया गया।
- 7 सितंबर 2026 (अंतिम अवसर):
- उच्च न्यायालय ने संबंधित मंत्रालयों और प्राधिकरणों को अपनी अंतिम नीति अदालत के समक्ष पेश करने का अंतिम अवसर दिया था।
- इसके बावजूद मंत्रालय ने केवल वित्तीय प्रभावों और नीतिगत कारकों का हवाला देकर और समय की मांग की, जिसे अदालत ने नागरिकों के अधिकारों का हनन मानते हुए खारिज कर दिया।
उच्च न्यायालय द्वारा जारी प्रमुख दिशा-निर्देश
- लंबित आवेदनों की प्रोसेसिंग: डीडीए उन सभी आवेदनों को बिना किसी देरी के प्रोसेस करेगा जो पहले से जमा हैं और जिन पर शुल्क एकत्र किया जा चुका है। इनके मूल्यांकन और दरों के लिए आवेदन की तिथि पर लागू नियमों को ही पैमाना बनाया जाएगा।
- भविष्य के नए आवेदनों हेतु नीति निर्धारण: भविष्य के नए आवेदनों के लिए सरकार/डीडीए नई नीति का प्रारूप तैयार कर अगली सुनवाई तक अदालत के समक्ष प्रस्तुत करे।
- अगली सुनवाई: मामले की अगली सुनवाई 11 दिसंबर 2026 को नियत की गई है।
विधिक एवं प्रशासनिक विश्लेषण: ‘वैध अपेक्षा’ (Legitimate Expectation) का सिद्धांत
- प्रशासनिक कानून और वैध अपेक्षा:
- प्रशासनिक विधि का स्थापित सिद्धांत है कि जब किसी नागरिक ने तत्कालीन सरकारी नीति के तहत आवेदन किया और राज्य ने निर्धारित शुल्क स्वीकार कर लिया, तो आवेदक के पक्ष में एक वैध अपेक्षा (Legitimate Expectation) उत्पन्न होती है।
- सरकार बाद में नीति में बदलाव का बहाना बनाकर या प्रशासनिक देरी करके उन आवेदनों को अनिश्चितकाल के लिए रोक नहीं सकती और न ही उन पर नई बढ़ी हुई दरों का भूतलक्षी (Retrospective) बोझ डाल सकती है।
- उपभोक्ता और संपत्ति अधिकार:
- डीडीए एक सांविधिक विकास प्राधिकरण है। जनहित में कार्य करने के बजाय नागरिकों के ₹155 करोड़ अपने खातों में रखकर सेवाएं न देना मनमाना प्रशासनिक कृत्य है, जो संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन करता है।
विधिक विवरण
- केस संदर्भ: दिल्ली के नागरिक / फ्लैट मालिक बनाम दिल्ली विकास प्राधिकरण (DDA) व अन्य [रिट याचिकाएं (सिविल) – दिल्ली उच्च न्यायालय]
- पीठ: न्यायमूर्ति प्रतिभा एम. सिंह और न्यायमूर्ति विकास महाजन (खंडपीठ)
- निर्णय की तिथि: अक्टूबर 2026
- विधिक प्रतिनिधित्व:
- अपीलकर्ताओं/नागरिकों की ओर से: स्टैंडिंग काउंसिल मृणालिनी सेन
- प्रतिवादी (केंद्र सरकार / MoHUA) की ओर से: अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल (ASG) चेतन शर्मा
- प्रासंगिक कानून एवं विधिक निकाय:
- दिल्ली विकास अधिनियम, 1957 (Delhi Development Act, 1957)
- दिल्ली अपार्टमेंट स्वामित्व अधिनियम / कोऑपरेटिव सोसाइटी नियम
- भारत का संविधान – अनुच्छेद 226 (उच्च न्यायालय की रिट अधिकारिता – परमादेश / Mandamus)
- प्रशासनिक निकाय: दिल्ली विकास प्राधिकरण (DDA), आवासन और शहरी कार्य मंत्रालय (MoHUA), तथा भूमि एवं विकास कार्यालय (L&DO)
- संबद्ध न्यायिक सिद्धांत व नजीरें:
- खाद्य निगम (FCI) बनाम कामधेनु कैटल फीड इंडस्ट्रीज (1993, सुप्रीम कोर्ट) — ‘प्रशासनिक अधिकारियों को नागरिकों की वैध अपेक्षाओं (Legitimate Expectations) के प्रति संवेदनशील होना चाहिए; मनमाना अनिर्णय कानून के शासन के विपरीत है।’
- दिल्ली विकास प्राधिकरण बनाम राम प्रकाश (सुप्रीम कोर्ट) — ‘डीडीए अपनी स्वयं की प्रक्रियात्मक और नीतिगत देरी का खामियाजा संपत्ति खरीदारों पर नहीं डाल सकता।’
- अंतिम निर्देश: डीडीए को ₹155.06 करोड़ के लंबित कन्वर्जन आवेदनों को आवेदन तिथि की नीति अनुसार तुरंत निस्तारित करने का निर्देश; भविष्य की नीति पेश करने हेतु मामला 11 दिसंबर 2026 के लिए सूचीबद्ध।
DDA Flat: मामले का संक्षिप्त विवरण (At A Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | दिल्ली उच्च न्यायालय (Delhi High Court) |
| पीठ | न्यायमूर्ति प्रतिभा एम. सिंह एवं न्यायमूर्ति विकास महाजन |
| प्रतिवादी | दिल्ली विकास प्राधिकरण (DDA) एवं केंद्रीय आवासन और शहरी कार्य मंत्रालय (MoHUA) |
| एकत्रित राशि | आवेदकों से DDA द्वारा एकत्र किए गए ₹155.06 करोड़ |
| मुख्य आदेश | 1. सभी लंबित आवेदनों को आवेदन जमा करने की तिथि की नीति के अनुसार प्रोसेस किया जाए। 2. भविष्य की नीति तय कर अगली सुनवाई (11 दिसंबर 2026) तक कोर्ट के समक्ष पेश की जाए। |

