At A Glance | एक नजर में
- दिल्ली हाईकोर्ट का कड़ा रुख: RDB अधिनियम की धारा 19(5)(i) के तहत लिखित बयान दर्ज करने के लिए तय 30 दिन की अवधि में अधिकतम 15 दिनों का विस्तार (कुल 45 दिन) ही संभव है। 45 दिनों के बाद किसी भी देरी को माफ (Condone) नहीं किया जा सकता।
- पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट का विचार: अधिनियम का प्रावधान और सिविल प्रक्रिया संहिता (CPC) का आदेश VIII नियम 1 ‘निर्देशात्मक’ है, ‘अनिवार्य’ नहीं। विशेष परिस्थितियों में 45 दिनों के बाद भी लिखित बयान स्वीकार किए जा सकते हैं।
- तेलंगाना हाईकोर्ट का रुख: DRT के पास देरी को माफ करने का विशेषाधिकार और क्षेत्राधिकार मौजूद है, लेकिन देरी को माफ किया जाए या नहीं, यह प्रत्येक मामले के तथ्यों पर निर्भर करेगा।
- कानूनी टकराव: विभिन्न उच्च न्यायालयों के विपरीत फैसलों के कारण DRT प्रक्रियाओं में एकरूपता पर सवाल उठ रहे हैं, जिसका अंतिम निपटारा सुप्रीम कोर्ट द्वारा किए जाने की संभावना है।
नई दिल्ली: बैंक ऋणों की त्वरित वसूली, ऋण शोधन अक्षमता एवं दिवाला संहिता के साथ बैंक एवं वित्तीय संस्था शोध्य ऋण वसूली अधिनियम, 1993 (RDB Act, 1993) की धारा 19(5)(i) के तहत देनदार/प्रतिवादी द्वारा लिखित बयान (Written Statement) दाखिल करने की अधिकतम समय-सीमा, तथा परिसीमा अधिनियम (Limitation Act) की धारा 5 के अनुप्रयोग पर देश के उच्च न्यायालयों के बीच गहरा न्यायिक मतभेद (Judicial Split) उभरकर सामने आया है। दिल्ली उच्च न्यायालय ने पुनः स्पष्ट किया है कि आरडीबी अधिनियम के तहत लिखित बयान के लिए निर्धारित 30 दिन की मूल अवधि में अधिकतम 15 दिन का ही विस्तार संभव है; इसके उपरांत कुल 45 दिनों के बाद न्यायाधिकरण के पास विलंब माफ करने (Condonation of Delay) का कोई अंतर्निहित या विवेकाधीन अधिकार शेष नहीं रहता।
न्यायमूर्ति सुब्रमण्यम प्रसाद और न्यायमूर्ति रेणु भटनागर की खंडपीठ ने निखिल पोद्दार द्वारा दायर रिट याचिका को खारिज करते हुए ऋण वसूली अपीलीय न्यायाधिकरण (DRAT) के उस आदेश को बरकरार रखा, जिसने 45 दिन की वैधानिक सीमा समाप्त होने के बाद दाखिल किए गए लिखित बयान को रिकॉर्ड पर लेने से इनकार कर दिया था। इसके विपरीत, पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय और तेलंगाना उच्च न्यायालय ने व्यवस्था दी है कि यह समय-सीमा आज्ञापक (Mandatory) नहीं बल्कि निदेशात्मक (Directory) है और न्यायहित में 45 दिनों के बाद भी जवाब स्वीकार किया जा सकता है।
दिल्ली उच्च न्यायालय के प्रमुख विधिक निष्कर्ष एवं न्यायिक टिप्पणियां
1. ’45 दिनों की अधिकतम सीमा के बाद कोई भी अदालत विलंब माफ नहीं कर सकती’
न्यायमूर्ति सुब्रमण्यम प्रसाद और न्यायमूर्ति रेणु भटनागर की खंडपीठ ने RDB Act की धारा 19(5)(i) के विधायी पाठ का विश्लेषण करते हुए दो-टूक व्यवस्था दी: “RDB अधिनियम की धारा 19(5)(i) के तहत निर्धारित अधिकतम 45 दिनों (30 दिन + अधिकतम 15 दिन) की अवधि से परे हुए विलंब को किसी भी न्यायालय द्वारा माफ (Cannot be condoned by any Court) नहीं किया जा सकता। अधिनियम में प्रयुक्त शब्द ‘not exceeding fifteen days’ (पंद्रह दिनों से अनधिक) स्पष्ट रूप से विधायिका की मंशा को दर्शाते हैं कि न्यायाधिकरण का विवेक अतिरिक्त 15 दिनों से आगे विस्तार देने पर पूरी तरह प्रतिबंधित है।”
2. आरडीबी एक्ट एक स्वयंपूर्ण विशेष कानून (Special Code):
- खंडपीठ ने रेखांकित किया कि आरडीबी अधिनियम, 1993 बैंकों के फंसे हुए कर्जों की त्वरित वसूली के लिए बनाया गया एक ‘विशेष संहिता’ (Special Code) है।
- अदालत ने माना कि जहां किसी विशेष कानून में विलंब माफी की अधिकतम सीमा विधायिका द्वारा स्पष्ट तय कर दी गई हो, वहां परिसीमा अधिनियम, 1963 की धारा 5 को लागू करके उस सीमा को आगे नहीं बढ़ाया जा सकता।
- उच्च न्यायालय ने अपने निष्कर्षों को पुष्ट करने के लिए उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, मध्यस्थता एवं सुलह अधिनियम, केंद्रीय उत्पाद शुल्क अधिनियम और कंपनी अधिनियम के तहत वैधानिक समय-सीमाओं पर सर्वोच्च न्यायालय द्वारा प्रतिपादित सिद्धांतों का सहारा लिया।
3. सम्पूर्ण दस्तावेज प्राप्त होने की तिथि से शुरू होती है परिसीमा:
- याचिकाकर्ता का तर्क था कि बैंक द्वारा दस्तावेजों की आपूर्ति में देरी की गई।
- अदालत ने रिकॉर्ड का परीक्षण कर पाया कि याचिकाकर्ता के अधिवक्ता को संपूर्ण वाद-पत्र/पेपर बुक 6 सितंबर 2019 को प्राप्त हो गई थी, जबकि लिखित बयान 26 नवंबर 2019 को दाखिल किया गया—जो 45 दिनों की अवधि से कहीं अधिक था। अतः परिसीमा 6 सितंबर से ही गिनी जाएगी।
उच्च न्यायालयों के बीच विधिक टकराव: 45 दिन की समय-सीमा पर तीन अलग दृष्टिकोण
| उच्च न्यायालय | मुख्य निर्णय एवं पीठ | विधिक रुख | मुख्य आधार |
| दिल्ली उच्च न्यायालय | निखिल पोद्दार बनाम पीएनबी (2026) एवं अनीता गर्ग बनाम एसबीआई (2021) | पूर्णतः आज्ञापक (Strictly Mandatory) — 45 दिनों के बाद DRT के पास कोई शक्ति नहीं। | धारा 19(5)(i) में ‘not exceeding fifteen days’ का प्रयोग; विशेष कानून में परिसीमा अधिनियम की धारा 5 लागू नहीं हो सकती। |
| पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय | श्री श्री राम गुप्ता बनाम DRAT (मार्च 2026) — मुख्य न्यायाधीश शील नागू व न्यायमूर्ति संजीव बेरी | निदेशात्मक (Directory) — DRT के पास 45 दिनों के बाद भी लिखित बयान स्वीकार करने का विवेक है। | RDB Act के प्रावधानों को CPC के आदेश VIII नियम 1 के साथ पढ़ा जाना चाहिए; प्रक्रिया न्याय की दासी है, बाधा नहीं। |
| तेलंगाना उच्च न्यायालय | रवाली इंडस्ट्रीज बनाम एसबीआई (2021) एवं बी. आनंद बनाम अग्रसेन को-ऑपरेटिव अर्बन बैंक (सितंबर 2026) — न्यायमूर्ति मौसमी भट्टाचार्य व न्यायमूर्ति रेणुका यारा | विवेकाधीन अधिकार बरकरार (Discretion Retained) — न्यायाधिकरण शक्तिहीन नहीं है। | यह निष्कर्ष गलत है कि ट्रिब्यूनल के पास शक्ति का अभाव है; मामले के गुण-दोष और परिस्थितियों के आधार पर विलंब माफ किया जा सकता है। |
मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि: निखिल पोद्दार बनाम पीएनबी
- वसूली कार्यवाही: पंजाब नेशनल बैंक (PNB) ने निखिल पोद्दार के खिलाफ बकाया ऋण वसूली हेतु डीआरटी के समक्ष मूल आवेदन (Original Application – OA) दायर किया।
- दस्तावेज प्राप्ति और विलंब: याचिकाकर्ता के वकील को 6 सितंबर 2019 को संपूर्ण पेपर बुक प्राप्त कराई गई। कानूनन 30 दिनों के भीतर (और अधिकतम 15 दिनों के विस्तार के साथ यानी कुल 45 दिनों में) जवाब दाखिल करना अनिवार्य था।
- देरी से दाखिला: याचिकाकर्ता ने 26 नवंबर 2019 को लिखित बयान पेश किया।
- डीआरटी व डीआरएटी का इनकार: डीआरटी और अपीलीय न्यायाधिकरण (DRAT) ने 45 दिन से अधिक की देरी को माफ करने से इनकार करते हुए लिखित बयान को रिकॉर्ड पर लेने से मना कर दिया।
- हाईकोर्ट की पुष्टि: दिल्ली हाईकोर्ट ने अनीता गर्ग (2021) के अपने पूर्व निर्णय को दोहराते हुए डीआरएटी के आदेश को पूरी तरह वैध माना और याचिका खारिज कर दी।
विधिक एवं सांविधिक विश्लेषण: RDB Act की धारा 19(5) की रूपरेखा
- आरडीबी अधिनियम, 1993 की धारा 19(5)(i):
- देनदार/प्रतिवादी समन की तामील या वाद-पत्र की प्राप्ति के 30 दिनों के भीतर अपना लिखित बयान दाखिल करेगा।
- परंतु न्यायाधिकरण, प्रतिवादी द्वारा पर्याप्त कारण दर्शाए जाने पर, ऐसी अवधि को बढ़ा सकता है जो “पंद्रह दिनों से अधिक नहीं होगी” (not exceeding fifteen days)।
- सीपीसी (CPC) के आदेश VIII नियम 1 बनाम RDB Act:
- सिविल प्रक्रिया संहिता (CPC) के आदेश VIII नियम 1 के तहत सामान्य सिविल अदालतों में लिखित बयान 30 से 90 दिनों में दाखिल किया जाता है। सर्वोच्च न्यायालय ने कैलाश बनाम ननकू (2005) में माना था कि सीपीसी का यह नियम मूलतः ‘निदेशात्मक’ (Directory) है।
- हालांकि, दिल्ली हाईकोर्ट का मत है कि आरडीबी एक्ट एक विशेष वित्तीय कानून है जिसका उद्देश्य समयबद्ध समाधान है, इसलिए सीपीसी की उदार व्याख्या को आरडीबी एक्ट की नकारात्मक शब्दावली (‘not exceeding’) में लागू नहीं किया जा सकता। इसके विपरीत पंजाब एवं हरियाणा और तेलंगाना हाईकोर्ट ने इसे सीपीसी के सिद्धांतों के अनुरूप माना है।
विधिक विवरण
- केस संदर्भ: निखिल पोद्दार बनाम पंजाब नेशनल बैंक व अन्य [W.P.(C) – दिल्ली उच्च न्यायालय]
- पीठ: न्यायमूर्ति सुब्रमण्यम प्रसाद और न्यायमूर्ति रेणु भटनागर (खंडपीठ)
- निर्णय की तिथि: अक्टूबर 2026
- विधिक प्रतिनिधित्व:
- प्रतिवादी बैंक (PNB) की ओर से: अधिवक्ता बृजेश के. तांबर, चंचला कुमारी एवं विनय सिंह बिष्ट
- प्रासंगिक कानून एवं विधिक धाराएं:
- बैंक एवं वित्तीय संस्था शोध्य ऋण वसूली अधिनियम, 1993 (RDB Act, 1993) की धारा 19(5)(i) (लिखित बयान दाखिल करने की वैधानिक अवधि)
- परिसीमा अधिनियम, 1963 (Limitation Act, 1963) की धारा 5 (विलंब माफी का सिद्धांत)
- सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (CPC) का आदेश VIII नियम 1
- भारत का संविधान – अनुच्छेद 226/227 (उच्च न्यायालय का रिट एवं अधीक्षण क्षेत्राधिकार)
- संबद्ध न्यायिक नजीरें:
- अनीता गर्ग बनाम स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (2021, दिल्ली हाईकोर्ट) — ‘RDB Act में 45 दिनों की सीमा अनम्य है; डीआरटी को इससे अधिक समय देने का कोई अधिकार नहीं है।’
- न्यू इंडिया एश्योरेंस कंपनी लिमिटेड बनाम हिली मल्टीपर्पज कोल्ड स्टोरेज (2020, 5-जज संविधान पीठ, सुप्रीम कोर्ट) — ‘उपभोक्ता संरक्षण कानून में विशेष रूप से निर्धारित अधिकतम समय-सीमा से परे जाकर जवाब स्वीकार नहीं किया जा सकता।’
- श्री श्री राम गुप्ता बनाम DRAT (2026, P&H हाईकोर्ट) एवं रवाली इंडस्ट्रीज बनाम एसबीआई (2021, तेलंगाना हाईकोर्ट) — ‘RDB Act में लिखित बयान की समय-सीमा निदेशात्मक है और असाधारण परिस्थितियों में डीआरटी विलंब माफ कर सकता है।’
- अंतिम परिणाम: दिल्ली उच्च न्यायालय ने याचिका खारिज की; 45 दिनों के बाद लिखित बयान दाखिल करने पर पूर्ण प्रतिबंध बरकरार रखा; विभिन्न उच्च न्यायालयों के परस्पर विरोधी निर्णयों के कारण अब इस विधिक प्रश्न का अंतिम निपटारा सर्वोच्च न्यायालय द्वारा किया जाना संभावित है।
DRT Timeline: Key Indicators | मुख्य बिंदु
| संकेत बिंदु | विवरण |
| संबंधित अधिनियम | ऋण वसूली और दिवालियापन अधिनियम (RDB Act) — धारा 19(5)(i) |
| दिल्ली हाईकोर्ट पीठ | जस्टिस सुब्रमण्यम प्रसाद और जस्टिस रेणु भटनागर (निखिल पोद्दार बनाम पीएनबी) |
| पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट पीठ | मुख्य न्यायाधीश शील नागू और जस्टिस संजीव बेरी (श्री श्री राम गुप्ता मामला, मार्च 2026) |
| तेलंगाना हाईकोर्ट पीठ | जस्टिस मौशमी भट्टाचार्य और जस्टिस रेणुका यारा (बी. आनंद मामला, सितंबर 2026) |
| समय-सीमा का नियम | 30 दिन (मूल अवधि) + 15 दिन (अधिकतम विस्तार योग्य अवधि) = 45 दिन |

