At A Glance | एक नजर में
- सरकार का आश्वासन: एडवोकेट जनरल ने हाईकोर्ट से कहा, “यह विधेयक कभी दिन का उजाला नहीं देखेगा (will not see the light of day)। हम यह सुनिश्चित करेंगे कि मूल कानून को ही बहाल रखा जाए।”
- विरोध की वजह: नए विधेयक में किराए से जुड़े विवादों की सुनवाई का अधिकार दीवानी अदालतों (Civil Courts) से छीनकर राजस्व अधिकारियों (Revenue Authorities) को सौंपने का प्रस्ताव था, जिसे वकीलों ने न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर हमला बताया।
- वकीलों की हड़ताल: बार काउंसिल ऑफ गुजरात (BCG) और गुजरात हाईकोर्ट एडवोकेट्स एसोसिएशन (GHCAA) के आह्वान पर राज्यभर के वकील कार्य बहिष्कार (Strike) पर हैं।
- हाईकोर्ट की टिप्पणी: जस्टिस मौलिक जे. शेलाट की पीठ ने कहा कि इस तरह के मामलों में बार (वकीलों) की भावनाओं और विचारों का भी सम्मान किया जाना चाहिए।
अहमदाबाद: अदालतों और लघु वाद न्यायालयों (Small Causes Courts) के न्यायिक क्षेत्राधिकार को छीनकर किराया विवादों (Rent Disputes) का निपटारा प्रशासनिक/राजस्व अधिकारियों को सौंपने के विधायी प्रयासों के खिलाफ पूरे गुजरात में वकीलों द्वारा शुरू किए गए तीखे राज्यव्यापी आंदोलन पर राज्य सरकार ने कदम पीछे खींच लिए हैं।
न्यायमूर्ति मौलिक जे. शेलत की एकल पीठ के समक्ष महाधिवक्ता ने उपमुख्यमंत्री और बार काउंसिल ऑफ गुजरात (BCG) के पदाधिकारियों के बीच हुई उच्च स्तरीय बैठक का विवरण साझा करते हुए यह महत्वपूर्ण बयान दिया। एजी ने अदालत को अवगत कराया कि सरकार ने बार को स्पष्ट वचन दिया है कि इस विधेयक को ठंडे बस्ते में डाल दिया जाएगा और पूर्ववर्ती मूल किराया अधिनियम को ही यथावत बहाल रखा जाएगा। हालांकि, इस सरकारी आश्वासन के बावजूद अधिवक्ताओं की हड़ताल तुरंत वापस नहीं हो सकी, जिस पर अदालत ने टिप्पणी की कि बार की भावनाओं और आक्रोश को सम्मान दिया जाना आवश्यक है। गुजरात सरकार के महाधिवक्ता (Advocate General) कमल त्रिवेदी ने गुजरात उच्च न्यायालय को आधिकारिक तौर पर आश्वस्त किया है कि विवादित ‘गुजरात रेंट बिल, 2026’ (Gujarat Rent Bill, 2026) कानून का रूप धारण नहीं करेगा और माननीय राज्यपाल द्वारा इस पर हस्ताक्षर नहीं किए जाएंगे।
उच्च न्यायालय के समक्ष महाधिवक्ता के प्रमुख कथन एवं न्यायिक टिप्पणियां
1. ‘राज्यपाल इस पर हस्ताक्षर नहीं करेंगे, यह विधेयक कभी दिन का उजाला नहीं देखेगा’ न्यायमूर्ति मौलिक जे. शेलत की पीठ के समक्ष महाधिवक्ता कमल त्रिवेदी ने राज्य सरकार का आधिकारिक स्टैंड रखते हुए कहा: “हमने वकीलों को यह पक्का वादा दिया है कि इस विधेयक पर माननीय राज्यपाल द्वारा हस्ताक्षर नहीं किए जाएंगे। यह विधेयक कभी कानून का रूप नहीं लेगा (This will not see the light of the day)…
सरकार यह सुनिश्चित करने का प्रयास करेगी कि मूल कानून (Original Act) को ही पुनः बहाल रखा जाए। यह संदेश पूरे राज्य के अधिवक्ताओं तक पहुंचाया गया था ताकि न्यायिक कार्य पूरी तरह ठप न हो।”
2. बार की भावनाओं का सम्मान जरूरी: जस्टिस शेलत
- महाधिवक्ता ने अदालत को बताया कि सरकार के इस आश्वासन के बावजूद गुजरात हाईकोर्ट एडवोकेट्स एसोसिएशन (GHCAA) और बार काउंसिल ने कार्य बहिष्कार वापस नहीं लिया और हड़ताल 5 व 6 अक्टूबर को भी जारी रही।
- इस पर न्यायमूर्ति मौलिक जे. शेलत ने टिप्पणी करते हुए कहा:“रात भर में कुछ नए घटनाक्रम हुए प्रतीत होते हैं और स्थिति में आए इस बदलाव की जानकारी अधिवक्ताओं तक पहुंची होगी। हर किसी की भावना का सम्मान किया जाना चाहिए, क्योंकि इन दिनों बार का प्रबंधन करना अत्यंत कठिन कार्य है।”
विवाद की जड़: क्या है ‘गुजरात रेंट बिल, 2026’ और क्यों भड़के वकील?
- न्यायपालिका से राजस्व अधिकारियों को अधिकार स्थानांतरण:
- प्रस्तावित गुजरात रेंट बिल, 2026 के माध्यम से राज्य सरकार किरायेदारी, बेदखली (Eviction) और किराया विवादों के न्यायनिर्णयन (Adjudication) का अधिकार सिविल अदालतों और स्मॉल कॉज कोर्ट्स से छीनकर राजस्व प्राधिकारियों (Revenue Authorities)—जैसे डिप्टी कलेक्टर, तहसीलदार या राजस्व अपीलीय अधिकारियों—को सौंपना चाहती थी।
- अधिवक्ताओं की मुख्य आपत्तियां:
- न्यायिक स्वतंत्रता का क्षरण: वकीलों का तर्क है कि दीवानी अधिकारों और संपत्ति विवादों का फैसला न्यायिक मस्तिष्क (Judicial Mind) और साक्ष्य विधि के सिद्धांतों से बंधे न्यायाधीशों द्वारा ही किया जाना चाहिए। अर्ध-न्यायिक व प्रशासनिक राजस्व अधिकारियों के पास सिविल मामलों की जटिलता को सुलझाने की न्यायिक विशेषज्ञता और स्वतंत्रता नहीं होती।
- कार्यपालिका का हस्तक्षेप: राजस्व अधिकारी कार्यपालिका (Executive) के सीधे नियंत्रण में होते हैं, जिससे भ्रष्टाचार, राजनीतिक दबाव और मनमाने प्रशासनिक फैसलों की संभावना बढ़ जाती है।
- वकालत पेशे पर सीधा आघात: अदालतों से किराया मुकदमों को हटाने से सिविल वकालत से जुड़े हजारों युवा व अनुभवी वकीलों की आजीविका और विधिक कार्यक्षेत्र पर प्रत्यक्ष प्रहार हो रहा था।
हड़ताल का घटनाक्रम: अहमदाबाद से पूरे गुजरात तक कार्य बहिष्कार
- अहमदाबाद सिविल व स्मॉल कॉज कोर्ट से शुरुआत:
- बिल के प्रावधान सार्वजनिक होते ही अहमदाबाद स्थित सिटी सिविल कोर्ट और स्मॉल कॉज कोर्ट के वकीलों ने पिछले सप्ताह से विरोध-प्रदर्शन और कार्य बहिष्कार शुरू किया था।
- बार काउंसिल ऑफ गुजरात (BCG) का राष्ट्रव्यापी आह्वान:
- बार काउंसिल ऑफ गुजरात ने आंदोलन को पूर्ण समर्थन देते हुए राज्यव्यापी प्रस्ताव पारित किया।
- इसके तहत पूरे गुजरात के वकीलों को 5 अक्टूबर 2026 से अनिश्चितकाल तक उच्च न्यायालय, जिला अदालतों, न्यायाधिकरणों (Tribunals), अर्ध-न्यायिक निकायों और राजस्व मंचों (Revenue Forums) के समक्ष न्यायिक कार्यवाही से पूरी तरह अनुपस्थित रहने का निर्देश दिया गया।
- गुजरात हाईकोर्ट एडवोकेट्स एसोसिएशन (GHCAA) की एकजुटता:
- हाईकोर्ट बार एसोसिएशन ने भी निचली अदालतों के वकीलों के साथ एकजुटता दिखाते हुए 5 और 6 अक्टूबर को उच्च न्यायालय में न्यायिक कार्य से विरत रहने (Abstain from court work) का औपचारिक प्रस्ताव पारित किया।
- सरकार के साथ बातचीत:
- राज्य में न्याय व्यवस्था पूरी तरह ठप होने के बाद उपमुख्यमंत्री और एडवोकेट जनरल ने बार काउंसिल प्रतिनिधियों के साथ आपात बैठक की, जिसमें सरकार ने बिल को वापस लेने और राज्यपाल की सहमति न दिलाने का वादा किया।
विधिक एवं संवैधानिक विश्लेषण: क्या कहता है कानून?
- अनुच्छेद 200 (विधेयक पर राज्यपाल की अनुमति):
- राज्य विधानसभा द्वारा पारित किसी भी विधेयक को कानून बनने के लिए संविधान के अनुच्छेद 200 के तहत राज्यपाल की सहमति (Assent) मिलना अनिवार्य है।
- यदि सरकार स्वयं राज्यपाल को यह संसूचित करती है कि विधेयक को सहमति न दी जाए या उसे पुनर्विचार/वापसी के लिए रोक लिया जाए, तो वह विधेयक विधायी रूप से समाप्त (Lapse) या निष्प्रभावी हो जाता है।
- संविधान का अनुच्छेद 50 (न्यायपालिका का कार्यपालिका से पृथक्करण):
- राज्य के नीति निदेशक तत्वों का अनुच्छेद 50 निर्देश देता है कि राज्य की लोक सेवाओं में न्यायपालिका को कार्यपालिका से अलग रखने के लिए कदम उठाए जाएं।
- सिविल अदालतों के न्यायिक क्षेत्राधिकार को प्रशासनिक/राजस्व अधिकारियों को सौंपना शक्ति के पृथक्करण (Separation of Powers) के सिद्धांत के विपरीत माना जाता है।
- बॉम्बे रेंट्स, होटल एंड लॉजिंग हाउस रेट्स कंट्रोल एक्ट, 1947 [गुजरात किराया नियंत्रण कानून]:
- मूल कानून के तहत दशकों से स्थापित विशेष किराया अदालतों और सिविल जजों की अधिकारिता को बहाल रखने की मांग पूरी तरह न्यायसंगत मानी गई।
विधिक विवरण
- केस संदर्भ: गुजरात रेंट बिल, 2026 विरोध एवं हड़ताल संबंधी न्यायिक कार्यवाही [विविध कार्यवाही – गुजरात उच्च न्यायालय]
- पीठ: न्यायमूर्ति मौलिक जे. शेलत (एकल पीठ)
- कार्यवाही की तिथि: 5 अक्टूबर 2026
- विधिक एवं प्रशासनिक प्रतिनिधित्व:
- गुजरात राज्य की ओर से: कमल त्रिवेदी (महाधिवक्ता / Advocate General, Gujarat)
- बार का प्रतिनिधित्व: बार काउंसिल ऑफ गुजरात (BCG) एवं गुजरात हाईकोर्ट एडवोकेट्स एसोसिएशन (GHCAA)
- प्रासंगिक कानून एवं संवैधानिक प्रावधान:
- गुजरात रेंट बिल, 2026 (प्रस्तावित विवादित विधेयक)
- गुजरात किराया नियंत्रण अधिनियम (मूल किराया कानून)
- भारत का संविधान:
- अनुच्छेद 50 (कार्यपालिका से न्यायपालिका का पृथक्करण)
- अनुच्छेद 200 (विधेयकों पर राज्यपाल की अनुमति या रोक की शक्तियां)
- अनुच्छेद 226 (उच्च न्यायालय का अधीक्षण व रिट क्षेत्राधिकार)
- संबद्ध न्यायिक सिद्धांत व नजीरें:
- एल. चंद्र कुमार बनाम भारत संघ (1997, संविधान पीठ, सुप्रीम कोर्ट) — ‘न्यायिक समीक्षा और नियमित अदालतों के अधिकार क्षेत्र को पूरी तरह से छीनकर कार्यपालिका के अधीन निकायों को नहीं सौंपा जा सकता।’
- हरीश उप्पल बनाम भारत संघ (2002, सुप्रीम कोर्ट) — ‘वकीलों द्वारा अदालती कामकाज का बहिष्कार या हड़ताल अवैध है, परंतु गंभीर विधिक व संस्थागत संकट के समय सरकार और बार के बीच संवाद से समाधान निकाला जाना चाहिए।’
- वर्तमान स्थिति: सरकार के महाधिवक्ता ने हाईकोर्ट में औपचारिक वचन दिया कि विधेयक पर राज्यपाल हस्ताक्षर नहीं करेंगे और मूल कानून बहाल रहेगा; बार के साथ बातचीत जारी; मामले पर अदालत की नजर।
Rent Bill Row:Key Indicators | मुख्य बिंदु
| संकेत बिंदु | विवरण |
| संबंधित विधेयक | गुजरात भाड़ा विधेयक, 2026 (Gujarat Rent Bill, 2026) |
| राज्य सरकार का रुख | विधेयक को वापस लेने और पुराने अधिनियम (Original Act) को ही लागू रखने की प्रतिबद्धता। |
| महाधिवक्ता (AG) | कमल त्रिवेदी |
| सुनवाई करने वाले जज | जस्टिस मौलिक जे. शेलाट |
| हड़ताल की स्थिति | सरकार के आश्वासन के बावजूद, वकीलों ने 5 और 6 अक्टूबर को न्यायिक कार्य से दूर रहने का फैसला बरकरार रखा। |

