Wednesday, October 7, 2026
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Hiding Relation: होने वाली दुल्हन से पूर्व लिव-इन रिलेशनशिप-बच्चे को छुपाना धोखे के साधनों से शारीरिक संबंध का अपराध; आरोपी अब भी शादी को तैयार है, यह दलील बचाव नहीं

आरोपी की दलील बनाम कोर्ट का रुख

  • आरोपी का तर्क:आरोपी ने तर्क दिया कि BNS की धारा 69 उस पर लागू नहीं होती, क्योंकि यह धारा तब लागू होती है जब कोई शादी के वादे से मुकर जाए। उसने दावा किया कि वह अब भी पीड़िता से शादी करने के लिए तैयार है।
  • हाईकोर्ट द्वारा BNS धारा 69 का विश्लेषण:अदालत ने स्पष्ट किया कि BNS की धारा 69 (जो बलात्कार की श्रेणी में न आने वाले लेकिन धोखे से बनाए गए यौन संबंधों को अपराध मानती है) मुख्य रूप से दो स्थितियों को कवर करती है:
    1. पहला पहलू: जब यौन संबंध के लिए सहमति छल-कपट/धोखे (Deceitful Means) के माध्यम से प्राप्त की गई हो।
    2. दूसरा पहलू: जब सहमति शादी के झूठे वादे (False Promise to Marry) पर आधारित हो, जिसे पूरा करने की कोई मंशा शुरू से न हो।

कोच्चि: भारतीय न्याय संहिता (BNS), 2023 के तहत नव-निर्मित धारा 69 (कपटपूर्ण साधनों या शादी का झूठा वादा करके संभोग करना) के दायरे, वैवाहिक सहमति प्राप्त करने के दौरान पूर्व के लिव-इन संबंधों व संतानों को जानबूझकर छिपाने, तथा अभियुक्त द्वारा “अब भी विवाह करने को तैयार होने” के कानूनी प्रभाव पर केरल उच्च न्यायालय ने अत्यंत महत्वपूर्ण आपराधिक न्यायशास्त्रीय व्यवस्था दी है।

धारा 69 तभी लागू होती है जब कोई व्यक्ति शादी के वादे से पीछे हट जाए

न्यायमूर्ति ए. बदरुद्दीन की एकल पीठ ने कोझिकोड के फेरोक पुलिस स्टेशन में दर्ज मामले में आरोपी (उदयन) की अग्रिम जमानत याचिका खारिज करने के निचली अदालत के आदेश को चुनौती देने वाली आपराधिक अपील को खारिज कर दिया। अदालत ने आरोपी की इस दलील को सिरे से नकार दिया कि धारा 69 तभी लागू होती है जब कोई व्यक्ति शादी के वादे से पीछे हट जाए। अदालत ने पाया कि आरोपी ने पीड़िता से शारीरिक संबंध बनाने की सहमति प्राप्त करने के लिए अपने पूर्व लिव-इन रिश्ते और 3 वर्षीय बच्चे के अस्तित्व को जानबूझकर छुपाया, जो “कपटपूर्ण साधनों” (Deceitful means) की श्रेणी में आता है। उच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि बीएनएस की धारा 69 केवल ‘शादी के वादे से मुकरने’ तक सीमित नहीं है, बल्कि यदि महत्वपूर्ण वैवाहिक तथ्यों को छिपाकर धोखे से शारीरिक सहमति ली गई है, तो यह धारा के पहले हिस्से के तहत सीधे संज्ञेय अपराध बनता है।

उच्च न्यायालय के प्रमुख विधिक निष्कर्ष एवं न्यायिक टिप्पणियां

1. BNS की धारा 69 के दोहरे अंग (Two Limbs of Section 69 BNS): न्यायमूर्ति ए. बदरुद्दीन ने बीएनएस की धारा 69 के दायरे की विस्तृत व्याख्या करते हुए स्पष्ट किया कि यह प्रावधान उन स्थितियों में यौन संबंध को अपराध मानता है जो दुष्कर्म (Rape) की श्रेणी में नहीं आते, परंतु दो अलग-अलग परिस्थितियों में किए जाते हैं:

  • पहला अंग (First Limb): जब शारीरिक संबंध के लिए सहमति “कपटपूर्ण साधनों” (Deceitful Means) द्वारा प्राप्त की गई हो (पहचान छिपाना, भौतिक तथ्यों का दमन आदि)।
  • दूसरा अंग (Second Limb): जब सहमति शादी के ऐसे झूठे वादे (False Promise to Marry) के बाद प्राप्त की गई हो, जिसे पूरा करने का शुरुआत से ही कोई इरादा न रहा हो।

2. ‘अभी भी शादी करने को तैयार हूँ’—कोई विधिक बचाव नहीं:

  • आरोपी ने तर्क दिया था कि वह आज भी पीड़िता से शादी करने को तैयार है, इसलिए उसने शादी का झूठा वादा नहीं किया और धारा 69 उस पर लागू नहीं हो सकती।
  • अदालत ने इस तर्क को खारिज करते हुए कहा:“आरोपी के विरुद्ध आरोप बीएनएस की धारा 69 के पहले अंग (First Limb) के दायरे में आते हैं, चाहे उसका यह दावा क्यों न हो कि वह पीड़िता से शादी करने को तैयार है।इसका कारण यह है कि उसने पीड़िता से शारीरिक संबंध बनाने की सहमति प्राप्त करते समय अपने पूर्व लिव-इन रिलेशनशिप और उससे जन्मे बच्चे की जानकारी को जानबूझकर छुपाया। पूर्व रिश्ते को दबाकर विवाह के आधार पर धोखे से शारीरिक संबंध बनाया गया, जो सीधे धारा 69 के तहत अपराध का गठन करता है।”

3. वैवाहिक बातचीत की बुनियाद का खंडन:

  • अदालत ने रिकॉर्ड का परीक्षण कर पाया कि विवाह का रिश्ता इस स्पष्ट समझ पर तय हुआ था कि आरोपी अविवाहित है और विवाह जैसी प्रकृति के किसी भी अन्य संबंध में शामिल नहीं है।
  • ऐसे मूलभूत तथ्यों का दमन विवाह प्रस्ताव की पवित्रता और उसके आधार पर दी गई सहमति को दूषित (Vitiated Consent) कर देता है।

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मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि: सगाई समारोह से वायनाड के होटल तक

  • सगाई और ₹10 लाख का खर्च:
    • शिकायतकर्ता महिला अनुसूचित जाति (SC) समुदाय से संबंधित है। आरोपी और पीड़िता के परिवारों ने बातचीत के बाद दोनों का विवाह तय किया।
    • विवाह तय होने पर औपचारिक ‘मैरिज-फिक्सेशन’ समारोह आयोजित किया गया, जिसके लिए पीड़िता के परिवार ने लगभग ₹10 लाख खर्च किए।
  • लिव-इन रिलेशनशिप और बच्चे को छिपाना:
    • विवाह तय होने के समय आरोपी ने यह तथ्य पूरी तरह छुपा लिया कि वह पहले से ही एक अन्य महिला के साथ लिव-इन रिलेशनशिप में रह रहा था और उस संबंध से उसका 3 साल का एक बच्चा भी है।
  • वायनाड की यात्रा और शारीरिक संबंध:
    • रिश्ता तय होने के बाद, आरोपी के अनुरोध पर पीड़िता उसके साथ वायनाड गई और वहां एक होटल में ठहरी।
    • होने वाले विवाह के भरोसे के आधार पर आरोपी ने उसके साथ शारीरिक संबंध बनाए, जिसके लिए पीड़िता ने केवल आगामी विवाह के आधार पर सहमति दी थी।
  • सच्चाई सामने आने पर आपराधिक मामला:
    • बाद में जब पीड़िता को आरोपी के पूर्व रिश्ते और बच्चे की सच्चाई का पता चला, तो उसने फेरोक पुलिस स्टेशन में प्राथमिकी दर्ज कराई।
    • पुलिस ने आरोपी के खिलाफ BNS की धारा 318(4) (धोखाधड़ी), BNS की धारा 69 (कपटपूर्ण साधनों द्वारा संभोग), तथा अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 की धारा 3(2)(va) के तहत मामला दर्ज किया।

विधिक एवं विधायी विश्लेषण: BNS की धारा 69 का महत्व

  • भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 69 (Section 69 BNS):
    • पूर्ववर्ती भारतीय दंड संहिता (IPC) में शादी के झूठे वादे पर संभोग के मामलों को आईपीसी की धारा 375/376 (दुष्कर्म) और धारा 90 (तथ्य के भ्रम के अधीन दी गई सहमति) के तहत खींचा जाता था, जिसे लेकर अदालतों में लगातार विधिक अस्पष्टता बनी रहती थी।
    • बीएनएस की धारा 69 ने इसे एक स्वतंत्र और विशिष्ट अपराध बनाया है:“जो कोई भी किसी महिला से छलपूर्वक या उसे विवाह का ऐसा वचन देकर, जिसे पूरा करने का उसका कोई आशय न हो, उसके साथ ऐसा संभोग करता है जो बलात्कार के अपराध की कोटि में नहीं आता, वह कारावास से (जो 10 वर्ष तक हो सकता है) और जुर्माने से दंडित किया जाएगा।”
    • स्पष्टीकरण में ‘कपटपूर्ण साधन’: कानून स्पष्ट करता है कि कपटपूर्ण साधनों में झूठा वादा, पहचान छिपाना, या रोजगार/पदोन्नति का प्रलोभन शामिल है। पूर्व वैवाहिक स्थिति या बच्चे को छिपाना भौतिक धोखे (Material Deceit) की परिधि में आता है।
  • एससी/एसटी अधिनियम की धारा 3(2)(va):
    • चूंकि पीड़िता अनुसूचित जाति समुदाय से है और आरोपी ने यह जानते हुए अपराध किया, इसलिए विशेष अधिनियम के कठोर प्रावधान भी आकर्षित हुए, जिसके तहत अग्रिम जमानत पर वैधानिक पाबंदियां लागू होती हैं।

विधिक विवरण

  • केस संदर्भ: उदयन बनाम एक्स (पीड़िता) व अन्य [आपराधिक अपील (अग्रिम जमानत) – केरल उच्च न्यायालय]
  • पीठ: न्यायमूर्ति ए. बदरुद्दीन (एकल पीठ)
  • निर्णय की तिथि: अक्टूबर 2026
  • विधिक प्रतिनिधित्व:
    • अपीलार्थी (आरोपी) की ओर से: अधिवक्ता आर. बिंदू (सस्थमंगलम), जी. राजगोपाल (कुम्मनम) एवं अजय टी.एस.
    • राज्य/अभियोजन की ओर से: एम.ए. शहाब (लोक अभियोजक)
  • प्रासंगिक कानून एवं विधिक धाराएं:
    • भारतीय न्याय संहिता, 2023 (BNS):
      • धारा 69 (कपटपूर्ण साधनों से अथवा विवाह के मिथ्या वचन द्वारा मैथुन)
      • धारा 318(4) (धोखाधड़ी / Cheating)
    • अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989:
      • धारा 3(2)(va) सहपठित धारा 18/18A (अग्रिम जमानत पर प्रतिबंध)
    • भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) की धारा 482 [पूर्ववर्ती CrPC धारा 438 – अग्रिम जमानत]
  • संबद्ध न्यायिक सिद्धांत:
    • सहमति की शुद्धता का सिद्धांत — ‘वैवाहिक प्रस्ताव के आधार पर दी गई सहमति तभी वैध है जब वह दोनों पक्षों के वास्तविक वैवाहिक इतिहास और भौतिक तथ्यों के पूर्ण प्रकटीकरण पर आधारित हो; जीवनसाथी या संतान के अस्तित्व को छिपाकर प्राप्त की गई संभोग की सहमति विधि की दृष्टि में शून्य और कपटपूर्ण है।’
  • अंतिम परिणाम: अग्रिम जमानत की अपील खारिज; प्रथम दृष्टया BNS की धारा 69 का अपराध साबित; आरोपी को जांच अधिकारी (IO) के समक्ष तत्काल आत्मसमर्पण (Surrender) करने का न्यायिक निर्देश।

Hiding Relation:मामले का संक्षिप्त विवरण (At A Glance)

विवरणजानकारी
संबंधित अदालतकेरल उच्च न्यायालय (न्यायमूर्ति ए. बदरुद्दीन)
संबंधित कानूनभारतीय न्याय संहिता (BNS), 2023 की धारा 69, धारा 318(4) (धोखाधड़ी), तथा SC/ST (अत्याचार निवारण) अधिनियम
मुख्य मुद्दाक्या शादी तय होने के बाद पहले से मौजूद लिव-इन और बच्चे की बात छिपाकर शारीरिक संबंध बनाना BNS 69 का अपराध है?
कोर्ट का फैसलाहाँ, यह BNS धारा 69 के तहत धोखा देकर यौन संबंध बनाने के दायरे में आता है; अग्रिम जमानत याचिका खारिज।
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