Wednesday, October 7, 2026
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Junior Lawyer: मुवक्किल के विश्वास के साथ विश्वासघात बर्दाश्त नहीं; मुख्य अधिवक्ता केवल जूनियर को ब्रीफ सौंपकर खुद पेशी से गायब नहीं हो सकता

NCLAT की सख्त टिप्पणियाँ

  1. कानून के तहत स्वीकार्य प्रक्रिया नहीं:NCLAT ने वैधानिक संस्थाओं के मामलों पर प्रकाश डालते हुए कहा:“जब कोई वकील विद्युत अधिनियम जैसे कानून के तहत बनी वैधानिक कंपनियों या निगमों के मामलों की पैरवी के लिए नियुक्त किया जाता है… तो वह अपनी व्यक्तिगत ज़िम्मेदारी किसी जूनियर वकील को नहीं सौंप सकता। जिस वकील को विशेष रूप से नियुक्त किया गया है, वह पेश होने के लिए व्यावसायिक रूप से बाध्य है।”
  2. ग्राहक का विश्वास तोड़ना (Betrayal of Trust):न्यायाधिकरण ने कहा कि किसी मामले को इस तरह जूनियर के भरोसे छोड़ देना केवल अनजाने में हुई गलती या सामान्य लापरवाही नहीं है, बल्कि यह क्लाइंट के भरोसे को तोड़ना है। पीठ ने इसे वकील की ओर से “जानबूझकर किया गया कृत्य” (Deliberate & Intentional Act) माना।
  3. वकीलों के आपसी विवाद का खामियाजा मुवक्किल क्यों भुगते?NCLAT ने टिप्पणी की कि आज के “अत्यधिक प्रतिस्पर्धी दौर” (Cut throat competition) में पेशेवर मनमुटाव, रंजिश या फीस के विवादों के चलते कई बार वकील मामले की प्रभावी ढंग से पैरवी नहीं करते। लेकिन ऐसे मामलों में वकील के जानबूझकर किए गए कृत्यों की सजा मुवक्किल (Litigant) को नहीं मिलनी चाहिए।

नई दिल्ली: वैधानिक निगमों (Statutory Corporations) और सार्वजनिक उपक्रमों द्वारा अदालतों व न्यायाधिकरणों में प्रतिनिधित्व हेतु नियुक्त पैनल अथवा विशेष अधिवक्ताओं के पेशेवर दायित्वों, वकालतनामे के तहत मुवक्किल के प्रति जवाबदेही, और मुख्य काउंसिल द्वारा स्वयं उपस्थित न होकर मुकदमों को पूरी तरह कनिष्ठ (Junior) वकीलों के भरोसे छोड़कर पैरवी न करने (Non-prosecution) के गंभीर परिणामों पर राष्ट्रीय कंपनी विधि अपीलीय न्यायाधिकरण (NCLAT) की नई दिल्ली प्रधान पीठ ने एक अत्यंत महत्वपूर्ण एवं नजीर पेश करने वाला फैसला सुनाया है।

ईस्टर्न पावर डिस्ट्रीब्यूशन कंपनी ऑफ आंध्र प्रदेश लिमिटेड (APEPDCL) द्वारा दायर कंपनी अपील

न्यायिक सदस्य न्यायमूर्ति शरद कुमार शर्मा, तकनीकी सदस्य अरुण बरोका और तकनीकी सदस्य इंदेवर पांडे की पीठ ने ईस्टर्न पावर डिस्ट्रीब्यूशन कंपनी ऑफ आंध्र प्रदेश लिमिटेड (APEPDCL) द्वारा दायर कंपनी अपील को स्वीकार करते हुए यह व्यवस्था दी। अपीलार्थी कंपनी दिवाला समाधान प्रक्रिया (CIRP) से गुजर रहे एक कॉर्पोरेट देनदार से लगभग ₹20.72 करोड़ के बकाया बिजली शुल्क की वसूली का प्रयास कर रही थी, परंतु उसके पूर्व वकील की लगातार अनुपस्थिति के कारण एनसीएलटी (NCLAT) कोलकाता ने मूल अर्जी को गैर-पैरवी (Dismissed for non-prosecution) के चलते खारिज कर दिया था। एनसीएलएटी ने इस आदेश को रद्द करते हुए कंपनी की बहाली अर्जी मंजूर कर ली। न्यायाधिकरण ने दो-टूक व्यवस्था दी है कि किसी वैधानिक निगम द्वारा नियुक्त वकील व्यक्तिगत रूप से (Counsel in persona) अदालत के समक्ष उपस्थित होने और मामले को आगे बढ़ाने के लिए पेशेवर रूप से बाध्य है; वह केवल जूनियर को ब्रीफ थमाकर अपनी जिम्मेदारी से पल्ला नहीं झाड़ सकता।

अपीलीय न्यायाधिकरण (NCLAT) के प्रमुख विधिक निष्कर्ष एवं न्यायिक टिप्पणियां

1. ‘वैधानिक निकाय द्वारा नियुक्त वकील खुद पेश होने के लिए पेशेवर रूप से बाध्य’ न्यायमूर्ति शरद कुमार शर्मा, अरुण बरोका और इंदेवर पांडे की पीठ ने वैधानिक निगमों के मुकदमों में वकीलों की जिम्मेदारी तय करते हुए स्पष्ट रूप से दर्ज किया:

“हम इस मोड़ पर यह पूरी तरह स्पष्ट करते हैं कि जब किसी वैधानिक कंपनी या निगम—जैसे कि वर्तमान अपीलार्थी, जिसका अस्तित्व विद्युत अधिनियम के वैधानिक प्रावधानों के तहत है—के मामलों की पैरवी के लिए कोई काउंसिल नियुक्त किया जाता है, तो ऐसे वैधानिक संगठन का प्रतिनिधित्व हमेशा वकीलों के एक पैनल या विशेष रूप से नियुक्त काउंसिल द्वारा किया जाना होता है।

ऐसे संगठन द्वारा नियुक्त विशेष अधिवक्ता मामले की ब्रीफ किसी जूनियर काउंसिल को सौंपकर खुद मामले से अलग नहीं हो सकते; विशेष रूप से वह काउंसिल व्यक्तिगत रूप से (Counsel in persona), जिसे पैरवी हेतु नियुक्त किया गया है, अदालत में उपस्थित होने के लिए पेशेवर रूप से आबद्ध (Professionally bound to appear) है।”

2. जूनियर को ब्रीफ सौंपना कानूनन अस्वीकार्य और मुवक्किल के विश्वास से विश्वासघात:

  • न्यायाधिकरण ने कहा कि ऐसी परिस्थितियों में मुकदमों को पूरी तरह कनिष्ठ अधिवक्ताओं के भरोसे छोड़ देना “कानून के तहत अनुमेय प्रक्रिया नहीं है” (Not a process permissible under the law)।
  • अपीलीय पीठ ने कड़ा रुख अपनाते हुए टिप्पणी की कि वकील का यह आचरण मुवक्किल द्वारा उस पर जताए गए “विश्वास के साथ विश्वासघात” (Betraying the trust) करने के समान है।

3. अनजाने में हुई भूल नहीं, बल्कि ‘जानबूझकर किया गया कृत्य’ (Attributed Mens Rea):

  • एनसीएलएटी ने अधिवक्ता की अनुपस्थिति का सूक्ष्म विधिक विश्लेषण करते हुए इसे सामान्य मानवीय भूल या साधारण लापरवाही (Ordinary Negligence) से अलग माना।
  • पीठ ने पाया कि रिकॉर्ड पर मौजूद परिस्थितियां यह दर्शाती हैं कि यह वकील की ओर से एक “सुविचारित एवं जानबूझकर किया गया कृत्य” (Deliberate and intentional act) था, जिसके पीछे गैर-हाजिरी की एक आरोपित आपराधिक मंशा (Attributed Mens Rea) स्पष्ट रूप से झलकती है।

4. फीस विवाद या आपसी रंजिश के लिए मुवक्किल को पीड़ित नहीं बनाया जा सकता: गलाकाट प्रतिस्पर्धा और पेशेवर जटिलताओं पर चिंता व्यक्त करते हुए पीठ ने टिप्पणी की:

  • आज के युग में तीखी प्रतिस्पर्धा, पेशेवर गलतफहमी, व्यक्तिगत रंजिश या वकालत फीस के विवादों के कारण कई बार वकील मुकदमों की प्रभावी पैरवी बंद कर देते हैं।
  • न्यायाधिकरण ने सिद्धांत प्रतिपादित किया कि काउंसिल के ऐसे किसी जानबूझकर किए गए कृत्य, गैर-हाजिरी या फीस विवाद का खामियाजा मुवक्किल (Litigant) को नहीं भुगतने दिया जा सकता।

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मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि: ₹20.72 करोड़ का दावा और गैर-पैरवी में खारिज अर्जी

  • कॉर्पोरेट देनदार और दिवाला प्रक्रिया:
    • एक कॉर्पोरेट देनदार (कंपनी) के विरुद्ध राष्ट्रीय कंपनी विधि न्यायाधिकरण (NCLT), कोलकाता पीठ के समक्ष दिवाला एवं शोधन अक्षमता संहिता (IBC), 2016 के तहत कॉर्पोरेट दिवाला समाधान प्रक्रिया (CIRP) लंबित थी।
  • विद्युत कंपनी का बकाया दावा:
    • अपीलार्थी (ईस्टर्न पावर डिस्ट्रीब्यूशन कंपनी ऑफ आंध्र प्रदेश लिमिटेड) ने देनदार पर बकाया ₹20,72,00,000 (20.72 करोड़ रुपये से अधिक) के बिजली बकाये के दावे को समाधान प्रक्रिया में शामिल कराने हेतु एनसीएलटी कोलकाता के समक्ष विविध अर्जी दाखिल की थी।
  • वकील का आश्वासन और वास्तविकता:
    • कंपनी ने पूर्व में अधिवक्ता राकेश कुमार शर्मा को पैरवी हेतु नियुक्त किया था। वकील ने आश्वस्त किया था कि वे एनसीएलटी कोलकाता में नियमित अभ्यास करते हैं और तत्परता से मामले को आगे बढ़ाएंगे।
    • बाद में कंपनी को पता चला कि मुख्य वकील खुद कभी उपस्थित नहीं हुए और उन्होंने संपूर्ण ब्रीफ एक कनिष्ठ सहयोगी (Junior) को सौंप दी थी।
  • अर्जी का खारिज होना और एनओसी (NOC) का संकट:
    • लगातार गैर-हाजिरी के चलते एनसीएलटी कोलकाता ने बिजली कंपनी की अर्जी को गैर-पैरवी में खारिज कर दिया।
    • बिजली कंपनी तुरंत दूसरा वकील भी नियुक्त नहीं कर सकी, क्योंकि पूर्व वकील ने वकालतनामा वापस लेने के लिए अनापत्ति प्रमाण पत्र (NOC) देने से इनकार कर दिया था।

विधिक एवं सांविधिक विश्लेषण: बार काउंसिल नियम और न्यायिक बहाली

  • बार काउंसिल ऑफ इंडिया रूल्स (BCI Rules) का नियम 39:
    • एनसीएलएटी ने रेखांकित किया कि बीसीआई नियमों का नियम 39 (Rule 39) किसी भी नए अधिवक्ता को तब तक किसी लंबित मामले में वकालतनामा दाखिल करने से रोकता है, जब तक कि पूर्व अधिवक्ता से लिखित सहमति/एनओसी प्राप्त न कर ली जाए अथवा अदालत/न्यायाधिकरण स्वयं वकील बदलने की विशेष अनुमति न दे दे।
    • इस प्रक्रियागत बाधा के चलते बिजली कंपनी असहाय स्थिति में पहुंच गई थी।
  • न्याय के हित में बहाली (Restoration on Merits):
    • न्यायाधिकरण ने व्यवस्था दी कि जहां किसी सार्वजनिक उपक्रम का ₹20.72 करोड़ का भारी वित्तीय दावा दांव पर लगा हो, वहां वकील की गैर-जिम्मेदाराना हरकत के आधार पर जनता के पैसे का नुकसान नहीं होने दिया जा सकता।
    • अपीलीय पीठ ने एनसीएलटी कोलकाता के खारिज आदेश को निरस्त कर दिया और मूल अर्जी को उसके मूल नंबर पर बहाल करते हुए एनसीएलटी को निर्देश दिया कि वह दावे का गुण-दोष (Merits) के आधार पर त्वरित निपटारा करे।

विधिक विवरण

  • केस संदर्भ: ईस्टर्न पावर डिस्ट्रीब्यूशन कंपनी ऑफ आंध्र प्रदेश लिमिटेड बनाम कॉर्पोरेट देनदार [कंपनी अपील (AT) (Insolvency) – राष्ट्रीय कंपनी विधि अपीलीय न्यायाधिकरण (NCLAT), नई दिल्ली]
  • पीठ: न्यायमूर्ति शरद कुमार शर्मा (न्यायिक सदस्य), अरुण बरोका (तकनीकी सदस्य) और इंदेवर पांडे (तकनीकी सदस्य)
  • निर्णय की तिथि: 6 अक्टूबर 2026
  • विधिक प्रतिनिधित्व:
    • अपीलार्थी (बिजली वितरण कंपनी) की ओर से: वरिष्ठ अधिवक्ता जॉय साहा, साथ में अधिवक्ता सिद्धार्थ शर्मा, ऋषभ दत्त और अमन कतरुका
    • प्रत्यर्थी की ओर से: अधिवक्ता शौनक मित्रा और रियांशु अग्रवाल
  • प्रासंगिक कानून एवं विधिक नियम:
    • दिवाला एवं शोधन अक्षमता संहिता, 2016 (IBC, 2016) [दावों के सत्यापन और समाधान प्रक्रिया से संबंधित धाराएं]
    • विद्युत अधिनियम, 2003 (Electricity Act, 2003) [वैधानिक विद्युत वितरण कंपनियों के अधिकार व बकाये की वसूली]
    • अधिवक्ता अधिनियम, 1961 एवं बार काउंसिल ऑफ इंडिया रूल्स (अध्याय II, भाग VI – मुवक्किल के प्रति अधिवक्ता का कर्तव्य एवं नियम 39)
  • संबद्ध न्यायिक सिद्धांत व नजीरें:
    • रफीक एवं अन्य बनाम मुंशीलाल (1981, सुप्रीम कोर्ट) — ‘वकील की गलती या अनुपस्थिति के लिए निर्दोष मुवक्किल को मुकदमे से वंचित नहीं किया जाना चाहिए; न्याय की मांग है कि मामले का फैसला गुण-दोष के आधार पर हो।’
    • न्यायिक विश्वास का सिद्धांत — ‘अधिवक्ता और मुवक्किल का संबंध पूर्ण विश्वास (Fiduciary Relationship) पर आधारित होता है; वैधानिक संस्थाओं के मुकदमों में सार्वजनिक धन जुड़ा होने के कारण वकीलों का जवाबदेही दायित्व और अधिक बढ़ जाता है।’
  • अंतिम परिणाम: एनसीएलएटी ने अपील पूर्णतः स्वीकार की; एनसीएलटी कोलकाता द्वारा खारिज किया गया आदेश निरस्त; बिजली कंपनी की ₹20.72 करोड़ के दावे वाली अर्जी बहाल की गई।

Junior Lawyer: मामले का संक्षिप्त विवरण (At A Glance)

विवरणजानकारी
संबंधित न्यायाधिकरणNCLAT (राष्ट्रीय कंपनी कानून अपीलीय न्यायाधिकरण)
पीठन्यायमूर्ति शरद कुमार शर्मा, अरुण बरोका और इंदिवर पांडे
अपीलकर्ताईस्टर्न पावर डिस्ट्रीब्यूशन कंपनी ऑफ आंध्र प्रदेश लिमिटेड (A.P. Eastern Power)
मुद्दे की राशि₹20.72 करोड़ से अधिक के बिजली बकाया का दावा
मूल निर्णयNCLT कोलकाता द्वारा वकील की अनुपस्थिति के कारण पैरवी के अभाव (Non-prosecution) में खारिज याचिका को NCLAT ने बहाल (Restore) किया।

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