सुप्रीम कोर्ट की मुख्य टिप्पणियाँ
- तर्कसंगत वर्गीकरण (Reasonable Classification):न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची ने टिप्पणी की:“लॉ क्लर्क के अनुभव को वकालत के समकक्ष माने जाने के पीछे एक स्पष्ट तर्कसंगत संबंध है, जिसे कोर्ट की सहायता करने वाले अन्य लिपिकीय कर्मचारियों (Ministerial Staff) पर लागू या विस्तारित नहीं किया जा सकता।”
- अदालती वकालत (Courtroom Advocacy) की अनिवार्यता:सीजेआई सूर्यकांत ने स्पष्ट किया कि न्यायिक सेवा में प्रवेश के लिए अदालत में वकालत का व्यावहारिक अनुभव बेहद जरूरी है:“यदि आपके पास एक वर्ष के वास्तविक अभ्यास (Practice) का श्रेय है, तो आपकी बेंच क्लर्कशिप को भी गिना जाएगा और आप पात्र होंगे। यदि आपके पास वकालत का कोई अनुभव नहीं है, तो आप पात्र नहीं हैं। पहले आप एक साल के अभ्यास के लिए जाएं।”
- भूमिका का स्पष्ट अंतर:न्यायमूर्ति वी. मोहना ने कहा कि आप बेंच क्लर्क के रूप में काम जारी रखकर उसे वकालत के रूप में गिनने की मांग नहीं कर सकते, क्योंकि दोनों में बड़ा अंतर है।
नई दिल्ली: अधीनस्थ न्यायपालिका में प्रवेश-स्तरीय न्यायिक सेवा परीक्षा (Civil Judge / Judicial Service Examinations) के लिए पूर्व विधिक वकालत अनुभव (Bar/Legal Practice Experience) की अनिवार्यता, न्यायाधीशों के साथ विधिक शोध करने वाले ‘लॉ क्लर्क’ (Law Clerk-cum-Research Assistant) बनाम अदालती फाइलों का प्रबंधन करने वाले मिनिस्टीरियल स्टाफ यानी ‘बेंच क्लर्क’ (Bench Clerk) के विधिक दर्जे में भेद, और संविधान के अनुच्छेद 14 के तहत ‘युक्तियुक्त वर्गीकरण’ (Reasonable Classification) के सिद्धांतों पर देश की सर्वोच्च अदालत ने स्पष्ट और महत्वपूर्ण व्यवस्था दी है। सुप्रीम कोर्ट ने दो-टूक कहा है कि बेंच क्लर्क के रूप में किए गए प्रशासनिक कार्य को न्यायिक सेवा परीक्षा के लिए आवश्यक विधिक वकालत के अनुभव के बराबर नहीं माना जा सकता।
बेंच क्लर्क (याचिकाकर्ता) द्वारा दायर रिट याचिका
मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की तीन सदस्यीय विशेष पीठ ने जिला न्यायपालिका में कार्यरत एक बेंच क्लर्क (याचिकाकर्ता) द्वारा दायर रिट याचिका को खारिज करते हुए यह निर्णय पारित किया। अदालत ने व्यवस्था दी कि विधिक शोध और ड्राफ्टिंग में सीधे न्यायाधीशों की सहायता करने वाले लॉ क्लर्कों के अनुभव को वकालत अनुभव का समतुल्य मानने के पीछे एक स्पष्ट विधिक तर्कसंगत संबंध (Rational Nexus) है, जिसे अदालत की प्रशासनिक व अनुसचिवीय सहायता करने वाले अन्य मिनिस्टीरियल स्टाफ (Bench Clerks) तक विस्तारित नहीं किया जा सकता।
सुप्रीम कोर्ट के प्रमुख विधिक निष्कर्ष एवं न्यायिक टिप्पणियां
1. ‘लॉ क्लर्क और मिनिस्टीरियल स्टाफ के बीच स्पष्ट एवं युक्तियुक्त वर्गीकरण’
न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची ने दोनों पदों के विधिक दायित्वों और बौद्धिक कार्यक्षेत्र के अंतर को रेखांकित करते हुए कहा: “लॉ क्लर्क के अनुभव को वास्तविक वकालत के समतुल्य माने जाने के पीछे एक स्पष्ट तार्किक संबंध (Clear rational nexus) है, जिसे अदालत की सहायता करने वाले अन्य अनुसचिवीय/मिनिस्टीरियल स्टाफ (Ministerial staff) के साथ मिलाकर भ्रमित नहीं किया जा सकता और न ही उनके लिए इसका विस्तार किया जा सकता है। लॉ क्लर्कों की न्याय प्रक्रिया में एक अनूठी और विशिष्ट भूमिका होती है, और उनकी तुलना किसी भी स्थिति में बेंच क्लर्कों से नहीं की जा सकती।”
2. वास्तविक वकालत की अनिवार्य शर्त से समझौता नहीं: सीजेआई सूर्यकांत
याचिकाकर्ता का तर्क था कि चूंकि वह अधीनस्थ न्यायपालिका में पूर्णकालिक सरकारी सेवा (बेंच क्लर्क) में थी, इसलिए बार काउंसिल के नियमों के तहत वह सक्रिय वकालत नहीं कर सकी और इस प्रकार वह प्रतियोगी परीक्षा में भाग लेने से वंचित रह गई। इस दलील का उत्तर देते हुए मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने स्पष्ट किया:
- पीठ ने कहा कि न्यायपालिका युवाओं की सहायता करना चाहती है, परंतु न्यायिक सेवा में आने के लिए न्यायालय में प्रत्यक्ष वकालत (Courtroom Advocacy) की बुनियादी शर्त को छोड़ा नहीं जा सकता।
- सीजेआई ने टिप्पणी की:“हम युवाओं की मदद करने की कोशिश कर रहे हैं, परंतु हम वास्तविक वकालत के अनुभव की शर्त (Practice condition) को त्याग नहीं सकते। यदि आपके पास वास्तविक वकालत का न्यूनतम अनुभव होता, तो आपकी बेंच क्लर्कशिप को भी साथ में जोड़ा जा सकता था और आप पात्र हो जातीं।परंतु यदि आपके पास अदालती वकालत का कोई अनुभव ही नहीं है, तो आप पात्र नहीं हैं। पहले आपको जाकर वकालत का अनुभव प्राप्त करना होगा।”
3. बेंच क्लर्क और अदालत में वकालत के बीच ‘जमीन-आसमान का अंतर’:
न्यायमूर्ति वी. मोहना ने प्रशासनिक कार्य और अदालती जिरह के भेद पर टिप्पणी करते हुए कहा: “आप एक बेंच क्लर्क के रूप में अपनी नौकरी जारी रखना चाहती हैं और फिर यह अपेक्षा करती हैं कि उसे कानून की अदालत में वकालत (Practice in a court of law) के रूप में गिना जाए? इन दोनों भूमिकाओं के स्वरूप और चरित्र में एक बहुत बड़ा अंतर (Huge difference) है।”
दोनों पदों के कार्यक्षेत्र में विधिक एवं व्यावहारिक अंतर
सर्वोच्च न्यायालय ने दोनों संवर्गों के कार्यों का विश्लेषण करते हुए समानता (Parity) की मांग को खारिज कर दिया:
| मानक | न्यायिक लॉ क्लर्क (Law Clerk-cum-Research Assistant) | बेंच क्लर्क (Bench Clerk / Court Master / Peshkar) |
| मूल भूमिका | विशुद्ध रूप से विधिक अनुसंधान, केस लॉ विश्लेषण और आदेशों/निर्णयों की ड्राफ्टिंग में न्यायाधीश की सहायता करना। | अदालती कक्ष का प्रशासनिक व अनुसचिवीय (Ministerial) प्रबंधन संभालना। |
| विशिष्ट कार्य | जटिल कानूनी प्रश्नों पर विधिक नजीरें खोजना, साक्ष्यों का सारांश तैयार करना, और कानून के अनुप्रयोग में बौद्धिक योगदान देना। | मुकदमों की आवाज लगाना (Calling cases), अदालती फाइलों का रखरखाव, पेशी की तारीखें दर्ज करना और डिक्टेशन रिकॉर्ड करना। |
| योग्यता एवं प्रकृति | एक निश्चित अवधि (Fixed term) के लिए अनुबंध पर रखे गए विधि स्नातक (Law Graduates)। | न्यायालय के नियमित सेवा संवर्ग का प्रशासनिक/लिपिकीय कर्मचारी। |
| वकालत से साम्यता | उनके शोध कार्य का सीधा संबंध न्यायालयी न्यायशास्त्र और वकालत की बारीकियों से है, इसलिए इसे प्रैक्टिस के समकक्ष माना जाता है। | कार्य विशुद्ध प्रशासनिक/प्रक्रियात्मक है; इसमें विधिक अनुसंधान या वकालत के तत्वों का पूर्ण अभाव होता है। |
मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि: तपस्मिता सुतार बनाम भारत संघ
- याचिकाकर्ता की पृष्ठभूमि:
- याचिकाकर्ता तपस्मिता सुतार ने विधि स्नातक (LL.B.) करने के बाद जिला न्यायपालिका में ‘बेंच क्लर्क’ (प्रशासनिक कर्मचारी) के रूप में कार्यभार संभाला था।
- वह वर्ष 2023 की न्यायिक सेवा परीक्षा में भी सम्मिलित हुई थीं।
- विवाद और सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती:
- न्यायिक सेवा भर्ती नियमों के तहत न्यायाधीश बनने के लिए न्यूनतम विधिक वकालत (Bar Practice) का अनुभव अनिवार्य किया गया था।
- चूंकि वह सरकारी नौकरी में थीं, इसलिए वे सक्रिय रूप से बार में प्रैक्टिस नहीं कर सकती थीं।
- नियमों के अनुसार, उच्च न्यायालयों और सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों के साथ काम करने वाले ‘लॉ क्लर्क’ की सेवा अवधि को वकालत के अनुभव के समकक्ष माना जाता है।
- याचिकाकर्ता ने संविधान के अनुच्छेद 14 के तहत समानता के अधिकार की दुहाई देते हुए सर्वोच्च न्यायालय में रिट याचिका दायर की और मांग की कि एक बेंच क्लर्क के रूप में उसकी अदालती सेवा को भी लॉ क्लर्क की तरह वकालत के अनुभव के रूप में मान्य किया जाए।
- सुप्रीम कोर्ट का अंतिम आदेश:
- शीर्ष अदालत ने कहा कि याचिकाकर्ता को राहत देने का एकमात्र तरीका यह होता कि बेंच क्लर्क को लॉ क्लर्क के बराबर मान लिया जाए, जिसे अदालत ने यह कहते हुए सिरे से अस्वीकार कर दिया कि यह एक युक्तियुक्त वर्गीकरण (Reasonable Classification) है और इसमें कोई असंवैधानिकता नहीं है। याचिका पूरी तरह खारिज कर दी गई।
विधिक एवं संवैधानिक विश्लेषण: क्या कहता है कानून?
- भारत का संविधान – अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार):
- समानता का अधिकार समान परिस्थितियों वाले व्यक्तियों (Equals) के बीच लागू होता है, असमानों (Unequals) के बीच नहीं।
- कानून स्पष्ट करता है कि यदि दो समूहों के कार्य, दायित्व और प्रकृति भिन्न हैं, तो उनके बीच ‘युक्तियुक्त वर्गीकरण’ (Reasonable Classification) पूरी तरह वैध है।
- लॉ क्लर्क (बौद्धिक/विधिक शोधकर्ता) और बेंच क्लर्क (प्रशासनिक/लिपिक कर्मचारी) दो सर्वथा भिन्न संवर्ग हैं; अतः उन्हें एक समान धरातल पर नहीं रखा जा सकता।
- न्यायिक सेवा में वकालत के अनुभव की अनिवार्यता:
- न्यायिक अधिकारी के रूप में चयन के लिए अदालत कक्ष की वास्तविक वकालत, मुकदमों की जिरह का व्यावहारिक ज्ञान और बार का अनुभव अनिवार्य योग्यता माना गया है।
- केवल अदालत कक्ष में फाइलों के रखरखाव या प्रशासनिक कर्तव्यों के निर्वहन से वकालत का व्यावहारिक ज्ञान अर्जित नहीं किया जा सकता।
विधिक विवरण
- केस संदर्भ: तपस्मिता सुतार बनाम भारत संघ व अन्य [रिट याचिका (सिविल) – सर्वोच्च न्यायालय]
- पीठ: मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना (तीन न्यायाधीशों की विशेष पीठ)
- आदेश की तिथि: 6 अक्टूबर 2026
- प्रासंगिक कानून एवं संवैधानिक प्रावधान:
- भारत का संविधान:
- अनुच्छेद 14 (विधि के समक्ष समता एवं युक्तियुक्त वर्गीकरण का सिद्धांत)
- अनुच्छेद 32 (संवैधानिक उपचारों का अधिकार — रिट याचिका)
- अनुच्छेद 233 एवं 234 (जिला न्यायाधीशों एवं अधीनस्थ न्यायिक सेवा में भर्ती के संवैधानिक प्रावधान)
- राज्य न्यायिक सेवा भर्ती नियम (न्यायिक सेवा परीक्षा हेतु न्यूनतम विधिक वकालत/प्रैक्टिस अनुभव की पात्रता शर्तें)
- अधिवक्ता अधिनियम, 1961 एवं बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) नियम (सरकारी या पूर्णकालिक रोजगार के दौरान वकालत पर प्रतिबंध)
- भारत का संविधान:
- संबद्ध न्यायिक सिद्धांत व नजीरें:
- ऑल इंडिया जजेस एसोसिएशन बनाम भारत संघ (सुप्रीम कोर्ट) — ‘अधीनस्थ न्यायपालिका की गुणवत्ता और दक्षता बनाए रखने के लिए न्यायिक अधिकारियों के पास न्यूनतम कानूनी व अदालती वकालत का अनुभव होना आवश्यक है।’
- समानता का सिद्धांत (सुप्रीम कोर्ट नजीरें) — ‘अनुच्छेद 14 मनमाने भेदभाव को रोकता है, परंतु जहां विभिन्न संवर्गों की जिम्मेदारियां और कार्यक्षेत्र बुनियादी रूप से भिन्न हों, वहां समानता का दावा नहीं किया जा सकता।’
- अंतिम परिणाम: रिट याचिका खारिज; बेंच क्लर्क की सेवा को विधिक वकालत के अनुभव के बराबर मानने से इनकार; न्यायिक सेवा परीक्षा की पात्रता हेतु वकालत के निर्धारित अनुभव को पूरा करना अनिवार्य ठहराया गया।
Law Clerk:मामले का संक्षिप्त विवरण (At A Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित मामला | Tapasmita Sutar vs Union of India |
| पीठ | CJI सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची एवं न्यायमूर्ति वी. मोहना |
| याचिकाकर्ता की मांग | जिला न्यायपालिका में बेंच क्लर्क के रूप में की गई सेवा को न्यायिक सेवा परीक्षा हेतु आवश्यक न्यूनतम legal practice के रूप में गिना जाए। |
| अदालत का फैसला | याचिका खारिज; लॉ क्लर्क और बेंच क्लर्क के बीच का अंतर तर्कसंगत (Reasonable Classification) है। |

