Thursday, October 8, 2026
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Bangladeshi People: 1970 के दशक में सीमा पार करने वाले सभी लोगों को वापस कैसे भेजा जा सकता है? क्या सीमावर्ती जिलों में यह संभव है?

सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट की मुख्य टिप्पणियाँ

  1. ‘ड्यूट प्रोसेस’ का पालन अनिवार्य:न्यायमूर्ति भट्टाचार्य ने राज्य सरकार से सवाल किया:“1970 के दशक में कितने लोगों ने सीमा पार की थी? क्या उन सभी को वापस भेजना संभव है? सीमावर्ती जिलों में जाकर देखिए… क्या यह संभव है? जब तक आप उचित कानूनी प्रक्रिया (Due Process) का पालन नहीं करते, किसी व्यक्ति को हिरासत में कैसे रखा जा सकता है?”
  2. पारिवारिक बयानों के आधार पर डिपोर्टेशन पर सवाल:अदालत ने व्यक्ति के खिलाफ जारी डिपोर्टेशन आदेश का आधार पूछे जाने पर पाया कि यह आदेश कुछ परिजनों के बयानों पर आधारित था। पीठ ने पूछा:“क्या किसी पारिवारिक सदस्य का बयान यह साबित कर देता है कि वह बांग्लादेशी है?”अदालत ने जोर देकर कहा कि किसी व्यक्ति को निर्वासित करने से पहले अधिकारियों को उसकी राष्ट्रीयता साबित करने वाले ठोस सबूतों पर विचार करना होगा।
  3. लंबित याचिका के दौरान डिपोर्टेशन ऑर्डर:सुनवाई में यह बात सामने आई कि जब अदालत पहले ही मामले में आदेश पारित कर चुकी थी और याचिका लंबित थी, उसी दौरान विदेशी क्षेत्रीय पंजीकरण अधिकारी (FRRO) ने डिपोर्टेशन आदेश जारी कर दिया।

राज्य सरकार की दलील और मामले का स्थानांतरण

  • राज्य की दलील: एएजी राजदीप मजूमदार ने तर्क दिया कि यदि पैन (PAN) या पहचान दस्तावेज फर्जी कागजातों के आधार पर हासिल किए गए हैं, तो वह खुद डिपोर्टेशन का आधार बन सकता है। राज्य ने याचिकाकर्ता को FRRO के समक्ष जाने का सुझाव दिया।
  • अदालत का इनकार: कोर्ट ने याचिकाकर्ता को FRRO भेजने से इनकार कर दिया, क्योंकि हिरासत मेमो पुलिस अधिकारियों द्वारा जारी किया गया था और पुलिस ने ही उसे हिरासत में लिया था।
  • रोस्टर बेंच को स्थानांतरण: हाईकोर्ट ने इस रिट याचिका को अपनी पीठ से रिलीज कर विशेष गहन पुनरीक्षण (Special Intensive Revision – SIR) से जुड़े मामलों का अधिकार क्षेत्र रखने वाली पीठ के पास भेजने का निर्देश दिया। अब यह मामला 14 अक्टूबर 2026 को न्यायमूर्ति कृष्णा राव की पीठ के समक्ष सूचीबद्ध किया जाएगा।

कोलकाता: संदिग्ध विदेशी नागरिकों की पहचान, विदेशी विषयक अधिनियम (Foreigners Act, 1946) के तहत निर्वासन (Deportation) की विहित प्रक्रिया, संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया (Procedure Established by Law), तथा दशकों पूर्व सीमा पार कर आए प्रवासियों के ऐतिहासिक संदर्भ पर कलकत्ता हाईकोर्ट ने पश्चिम बंगाल सरकार और पुलिस प्रशासन से तीखे सवाल पूछे हैं।

न्यायमूर्ति सौगत भट्टाचार्य की एकल पीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए राज्य के अतिरिक्त महाधिवक्ता (AAG) राजदीप मजूमदार से सीधा सवाल किया कि क्या 1970 के दशक में आए सभी लोगों को व्यावहारिक रूप से वापस भेजना संभव है, और क्या बिना उचित विधिक प्रक्रिया अपनाए किसी व्यक्ति को इस प्रकार निरंतर हिरासत में रखा जा सकता है। अदालत ने मामले को विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) से जुड़े मामलों का क्षेत्राधिकार रखने वाली न्यायमूर्ति कृष्णा राव की पीठ के समक्ष 14 अक्टूबर 2026 को प्रस्तुत करने का निर्देश देते हुए याचिका को संबंधित पीठ के लिए अवमुक्त (Release) कर दिया। अदालत ने लगभग दो महीने से हिरासत में रखे गए एक संदिग्ध बांग्लादेशी नागरिक के मामले में बिना ठोस दस्तावेजी जांच और केवल परिजनों के बयानों के आधार पर निर्वासन आदेश पारित करने पर गंभीर चिंता जताई।

उच्च न्यायालय के प्रमुख न्यायिक निष्कर्ष एवं तीखी मौखिक टिप्पणियां

1. ‘1970 के दशक के प्रवासियों को वापस भेजना क्या व्यावहारिक रूप से संभव है?’

न्यायमूर्ति सौगत भट्टाचार्य ने भारत-बांग्लादेश सीमा के ऐतिहासिक और सामाजिक संदर्भ को रेखांकित करते हुए राज्य सरकार से पूछा:

*”1970 के दशक में कितने लोगों ने सीमा पार की थी? क्या उन सभी को वापस भेजना संभव है? आप सीमावर्ती जिलों में जाकर देखिए… क्या यह संभव है? जब तक आप उचित विधिक प्रक्रिया (Due Process) का पालन नहीं करते, तब तक किसी व्यक्ति को हिरासत में कैसे रखा जा सकता है?“

2. ‘8 अगस्त से हिरासत में—क्या केवल परिवार के बयान से नागरिकता तय होगी?’

  • अदालत ने व्यक्ति की निरंतर हिरासत की अवधि पर सवाल उठाते हुए पूछा: “8 अगस्त से हिरासत में रखा गया है?”
  • निर्वासन आदेश के आधारों पर सवाल उठाते हुए पीठ ने रेखांकित किया कि आदेश केवल परिवार के कुछ सदस्यों द्वारा दिए गए बयानों के आधार पर पारित किया गया प्रतीत होता है।
  • अदालत ने सख्त लहजे में पूछा:“क्या परिवार के किसी सदस्य का बयान यह साबित कर देता है कि वह व्यक्ति बांग्लादेशी है? किसी व्यक्ति को निर्वासित करने से पहले अधिकारियों को उसकी राष्ट्रीयता स्थापित करने वाली प्रासंगिक और ठोस विधिक सामग्री पर विचार करना होगा।”

3. अदालती कार्यवाही के लंबित रहते निर्वासन आदेश पारित करने पर आपत्ति:

  • सुनवाई के दौरान अदालत को अवगत कराया गया कि जब मामला उच्च न्यायालय के समक्ष विचाराधीन था और अदालत पहले ही एक आदेश पारित कर चुकी थी, उसी दौरान ‘विदेशी क्षेत्रीय पंजीकरण अधिकारी’ (FRRO) ने व्यक्ति के खिलाफ निर्वासन आदेश (Deportation Order) पारित कर दिया।
  • अदालत ने कार्यवाही के लंबित रहते इस प्रकार आदेश जारी करने के घटनाक्रम पर गंभीर संज्ञान लिया।

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राज्य सरकार (AAG) की दलीलें एवं एफआरआरओ का मुद्दा

  • जाली दस्तावेजों का तर्क:
    • राज्य सरकार की ओर से पेश अतिरिक्त महाधिवक्ता (AAG) राजदीप मजूमदार ने दलील दी कि यदि संबंधित व्यक्ति ने पैन (PAN) या अन्य पहचान दस्तावेज जाली या फर्जी कागजात के आधार पर प्राप्त किए हैं, तो वह तथ्य अपने आप में निर्वासन का एक वैध आधार बन सकता है।
  • एफआरआरओ जाने का सुझाव कोर्ट ने नकारा:
    • जब एएजी ने अनुरोध किया कि याचिकाकर्ता को एफआरआरओ (FRRO) के समक्ष जाने का निर्देश दिया जाए, तो न्यायमूर्ति भट्टाचार्य ने इसे अस्वीकार कर दिया।
    • अदालत ने स्पष्ट किया कि उक्त व्यक्ति को पुलिस द्वारा हिरासत में लिया गया है और हिरासत मेमो (Detention Memo) भी पुलिस अधिकारियों द्वारा ही जारी किया गया है, अतः राज्य पुलिस अपनी विधिक जवाबदेही से पल्ला नहीं झाड़ सकती।

मामले का अंतरण (Roster Assignment)

चूंकि यह विवाद नागरिकता, पहचान दस्तावेजों और मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (Special Intensive Revision – SIR) से जुड़ी प्रक्रियाओं से भी गहराई से जुड़ा हुआ है, इसलिए न्यायमूर्ति सौगत भट्टाचार्य ने याचिका को अपने रोस्टर से अवमुक्त करते हुए निर्देश दिया:

  • इस मामले को उस उपयुक्त पीठ के समक्ष प्रस्तुत किया जाए जो SIR से संबंधित मामलों की सुनवाई कर रही है।
  • याचिका को 14 अक्टूबर 2026 को न्यायमूर्ति कृष्णा राव की पीठ के समक्ष सूचीबद्ध किया जाएगा।

विधिक एवं संवैधानिक विश्लेषण: क्या कहता है कानून?

  • विदेशी विषयक अधिनियम, 1946 (Foreigners Act, 1946) की धारा 3 व 9:
    • धारा 3 केंद्र सरकार (या प्रत्यायोजित प्राधिकारी जैसे FRRO/राज्य) को विदेशियों के निष्कासन और आवागमन को नियंत्रित करने की शक्ति देती है।
    • धारा 9 के तहत राष्ट्रीयता सिद्ध करने का भार (Burden of Proof) उस व्यक्ति पर होता है जिस पर विदेशी होने का संदेह है। परंतु न्यायपालिका ने स्पष्ट किया है कि यह भार तभी लागू होता है जब राज्य पहले यह स्थापित करने के लिए प्राथमिक सामग्री पेश करे कि संबंधित व्यक्ति विदेशी है; केवल किसी रिश्तेदार के बयान के आधार पर नागरिकता नहीं छीनी जा सकती।
  • संविधान का अनुच्छेद 21—गैर-नागरिकों को भी प्राप्त संरक्षण:
    • सर्वोच्च न्यायालय ने लुइस डी रेड्ट बनाम भारत संघ (1991) और राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग बनाम अरुणाचल प्रदेश राज्य (1996) में स्थापित किया है कि अनुच्छेद 21 के तहत दैहिक स्वतंत्रता और ‘विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया’ की गारंटी भारत में रहने वाले प्रत्येक व्यक्ति (चाहे वह नागरिक हो या गैर-नागरिक) को प्राप्त है। किसी को भी बिना उचित प्रक्रिया के अनिश्चितकाल तक निरुद्ध नहीं रखा जा सकता।
  • 1971 की कट-ऑफ और असम/सीमावर्ती राज्यों का ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य:
    • 1971 के भारत-पाक/बांग्लादेश युद्ध के समय लाखों शरणार्थी सीमा पार कर भारत आए थे। नागरिकता अधिनियम, 1955 की धारा 6A (असम के संदर्भ में) और सीमावर्ती जिलों की जटिल जनसांख्यिकी को देखते हुए अदालत ने यह व्यावहारिक प्रश्न उठाया कि पांच दशक पुराने ऐतिहासिक मामलों में बिना स्थापित प्रक्रिया के मनमाना निरोध नहीं किया जा सकता।

विधिक विवरण

  • केस संदर्भ: संदिग्ध विदेशी नागरिक की हिरासत व निर्वासन आदेश के विरुद्ध याचिका [रिट याचिका – कलकत्ता उच्च न्यायालय]
  • पीठ: न्यायमूर्ति सौगत भट्टाचार्य (एकल पीठ)
  • तारीख: 8 अक्टूबर 2026
  • अगली सुनवाई की तिथि: 14 अक्टूबर 2026 (न्यायमूर्ति कृष्णा राव की पीठ के समक्ष)
  • विधिक प्रतिनिधित्व:
    • राज्य (पश्चिम बंगाल) की ओर से: अतिरिक्त महाधिवक्ता (AAG) राजदीप मजूमदार
  • संबद्ध प्राधिकरण: विदेशी क्षेत्रीय पंजीकरण अधिकारी (FRRO) एवं पश्चिम बंगाल पुलिस
  • प्रासंगिक कानून एवं विधिक धाराएं:
    • विदेशी विषयक अधिनियम, 1946 (Foreigners Act, 1946) की धाराएं 3 एवं 9
    • भारत का संविधान — अनुच्छेद 21 (विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया के बिना स्वतंत्रता से वंचित न करना) एवं अनुच्छेद 226
    • पासपोर्ट (भारत में प्रवेश) अधिनियम, 1920
  • संबद्ध न्यायिक सिद्धांत:
    • लुइस डी रेड्ट बनाम भारत संघ (1991, सुप्रीम कोर्ट) — ‘विदेशियों को भारत में निवास का मौलिक अधिकार नहीं है, परंतु उन्हें अनुच्छेद 21 के तहत निष्पक्ष प्रक्रिया और जीवन की स्वतंत्रता का संरक्षण प्राप्त है।’
  • वर्तमान स्थिति: कलकत्ता हाईकोर्ट ने दो महीने की हिरासत और साक्ष्यों के अभाव पर कड़े सवाल उठाए; याचिका को 14 अक्टूबर 2026 को न्यायमूर्ति कृष्णा राव की एसआईआर (SIR) क्षेत्राधिकार वाली विशेष पीठ के समक्ष सुनवाई हेतु भेजा गया।

Bangladeshi People: मामले का संक्षिप्त विवरण (At A Glance)

विवरणजानकारी
संबंधित अदालतकलकत्ता उच्च न्यायालय (जस्टिस सौगत भट्टाचार्य)
मामलासंदिग्ध बांग्लादेशी नागरिक की 2 महीने की हिरासत और निर्वासन (Deportation) का आदेश
मुख्य मुद्दाबिना विधि सम्मत प्रक्रिया (Due Process) और पर्याप्त दस्तावेजी सबूत के हिरासत और निर्वासन
अगली सुनवाई14 अक्टूबर 2026 (न्यायमूर्ति कृष्णा राव की पीठ के समक्ष)
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