Saturday, October 17, 2026
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Ethics of Advocate: सुप्रीम कोर्ट ने एडवोकेट-ऑन-रिकॉर्ड के आचरण पर क्यों जताई गहरी चिंता; बेंगलुरु और पुणे के लक्जरी होटलों की दिवाला कार्यवाही रखी बरकरार

अदालत की मुख्य टिप्पणियां और घटनाक्रम

  1. “अवांछनीय घटना” (Undesirable Incident):सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले के अंत में इस घटना का उल्लेख करते हुए दर्ज किया:“मामले से अलग होने से पहले, हम सुनवाई के दौरान घटी एक अवांछनीय घटना का उल्लेख करना चाहते हैं। अपीलकर्ताओं की ओर से निर्णयों का एक संकलन रिकॉर्ड पर रखा गया था, जिस पर उत्तरदाताओं ने तुरंत गंभीर आपत्ति जताई। उनके अनुसार, यह संकलन AI द्वारा जनरेट किए गए गैर-मौजूद निर्णयों से भरा हुआ था।”
  2. जिम्मेदारी से भागने पर फटकार:जब पीठ ने विवादित संकलन के बारे में पूछताछ की, तो एडवोकेट-ऑन-रिकॉर्ड (AoR) ने खुद को अनभिज्ञ बताते हुए पूरी जिम्मेदारी याचिकाकर्ताओं पर डालने की कोशिश की। बाद में अपीलकर्ताओं की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता ने जिम्मेदारी स्वीकार की और क्षमा मांगी।
  3. NCLT और दिवाला कानून पर बड़ा निर्णय:अदालत ने विवादित AI फैसलों को दरकिनार करते हुए मूल याचिका पर फैसला सुनाया। शीर्ष अदालत ने माना कि राष्ट्रीय कंपनी कानून न्यायाधिकरण (NCLT) को दिवाला याचिका स्वीकार करने से पहले बकाया राशि की सटीक गणना करने की आवश्यकता नहीं है; केवल ऋण का डिफ़ॉल्ट होना ही CIRP शुरू करने के लिए पर्याप्त है।

नई दिल्ली: न्यायालयीन कार्यवाहियों में कृत्रिम बुद्धिमत्ता (Artificial Intelligence – AI) के उपयोग के नैतिक व व्यावसायिक मानक (Professional Ethics of Advocates), अदालतों के समक्ष अस्तित्वहीन/काल्पनिक न्यायिक निर्णयों (AI-Generated Hallucinated & Non-Existent Judgments) को नजीर के रूप में प्रस्तुत करने का गंभीर कदाचार, एडवोकेट-ऑन-रिकॉर्ड (AoR) की व्यक्तिगत जवाबदेही बनाम मुवक्किल पर दोषारोपण की प्रवृत्ति, तथा दिवाला और दिवालियापन संहिता, 2016 (IBC) की धारा 7 के तहत ऋण की सटीक राशि तय किए बिना CIRP स्वीकार करने की NCLT की अधिकारिता पर सुप्रीम कोर्ट ने एक अत्यंत महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है।

न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की खंडपीठ ने 15 अक्टूबर 2026 को बेंगलुरु के जेडब्ल्यू मैरियट होटल (JW Marriott Hotel) और पुणे के क्राउन प्लाजा होटल (Crowne Plaza Hotel) का संचालन करने वाली कंपनियों के खिलाफ कॉरपोरेट दिवाला समाधान प्रक्रिया (CIRP) को चुनौती देने वाली अपीलों को खारिज करते हुए यह तीखी और गंभीर टिप्पणी दर्ज की। अदालत ने पाया कि अपीलकर्ताओं की ओर से फैसलों का जो आधिकारिक संकलन (Compilation of Judgments) दाखिल किया गया था, वह एआई द्वारा तैयार किए गए काल्पनिक फैसलों से भरा हुआ था। अदालत ने विशेष रूप से एडवोकेट-ऑन-रिकॉर्ड के उस रवैये पर खेद व्यक्त किया जिसमें उन्होंने संकलन की सामग्री से अनभिज्ञता जताते हुए सारा दोष अपने मुवक्किलों पर डालने का प्रयास किया।

सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायिक निष्कर्ष एवं तल्ख टिप्पणियां

1. ‘एआई-जनरेटेड काल्पनिक फैसलों का संकलन और मुवक्किल पर दोषारोपण’

खंडपीठ ने फैसले के समापन भाग (Before Parting) में सुनवाई के दौरान घटी इस अवांछनीय घटना को औपचारिक रूप से दर्ज करते हुए कहा: *”मामले के निस्तारण से पूर्व, हम सुनवाई के दौरान घटित एक अत्यंत अवांछनीय घटना (Undesirable Incident) का उल्लेख करना आवश्यक समझते हैं। अपीलकर्ताओं की ओर से निर्णयों का एक संकलन रिकॉर्ड पर रखा गया था, जिस पर प्रत्यर्थियों (ओंकारा एसेट्स) ने तुरंत गंभीर आपत्ति दर्ज कराई। प्रत्यर्थियों के अनुसार, यह संकलन कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) द्वारा तैयार किए गए अस्तित्वहीन और काल्पनिक फैसलों (AI generated non-existent judgments) से भरा हुआ था।”*

2. वकील द्वारा जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ना:

पीठ ने एडवोकेट-ऑन-रिकॉर्ड के आचरण को आड़े हाथों लेते हुए दर्ज किया:

  • जब अदालत ने संकलन के बारे में सवाल पूछा, तो एडवोकेट-ऑन-रिकॉर्ड (AoR) ने सामग्री की जानकारी होने से इनकार किया और पूरी जिम्मेदारी अपीलकर्ताओं (मुवक्किलों) पर मढ़ने का प्रयास किया।
  • बाद में, अपीलकर्ताओं की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता ने इस गंभीर चूक की जिम्मेदारी स्वीकार की और अदालत से बिना शर्त क्षमा याचना की।
  • प्रत्यर्थियों ने यह भी तर्क दिया था कि ऐसे भ्रष्ट आचरण के कारण अपीलकर्ताओं को गुण-दोष पर सुनने का अधिकार ही समाप्त हो जाना चाहिए, हालांकि अदालत ने आपत्तियों को खुला रखते हुए मामले के गुण-दोष पर सुनवाई जारी रखी।

3. अपीलकर्ता की मृत्यु के कारण भारी जुर्माना (Exemplary Costs) लगाने से परहेज:

  • शीर्ष अदालत ने इस कदाचार के लिए अपीलकर्ताओं पर भारी अनुकरणीय जुर्माना (Exemplary Costs) लगाने का मन बना लिया था।
  • हालांकि, जब अदालत को सूचित किया गया कि पहले अपीलकर्ता दीपक रहेजा का निधन हो चुका है, तो अदालत ने मानवीय आधार पर लागत लगाने के आदेश को वापस ले लिया और ‘खर्च पर कोई आदेश नहीं’ (No order as to costs) दर्ज किया।

मामले की मूल पृष्ठभूमि: 2 लक्जरी होटलों की दिवाला कार्यवाही

विवादित कंपनी / होटलसंचालक इकाई एवं ऋण पृष्ठभूमि
JW मैरियट होटल, बेंगलुरुगस्टाड होटल्स प्राइवेट लिमिटेड (GSTAAD Hotels Pvt. Ltd.) द्वारा संचालित।
क्राउन प्लाजा होटल, पुणेनियो कैप्रिकॉर्न प्लाजा प्राइवेट लिमिटेड (Neo Capricorn Plaza Pvt. Ltd.) द्वारा संचालित।
मूल ऋणदाता एवं एसेट रिकंस्ट्रक्शन कंपनीऋण मूल रूप से पिरामल फाइनेंस द्वारा दिया गया था, जिसके डिफॉल्ट होने के बाद इसे ओंकारा एसेट्स रिकंस्ट्रक्शन प्राइवेट लिमिटेड (Omkara ARC) को असाइन किया गया।
अपीलकर्ताओं की दलीलकंपनियों ने NCLT और NCLAT द्वारा CIRP शुरू करने के आदेश को चुनौती दी थी, यह तर्क देते हुए कि वास्तविक देयता और चूक की सटीक राशि का निर्धारण पहले होना चाहिए था।
सुप्रीम कोर्ट का निर्णय (गुण-दोष पर)दोनों अपीलें पूरी तरह खारिज; सुप्रीम कोर्ट ने दोनों होटल कंपनियों के खिलाफ दिवाला प्रक्रिया (CIRP) जारी रखने के आदेश को पूरी तरह वैध ठहराया।

विधिक विश्लेषण: क्या कहता है कानून?

  • वकील की व्यावसायिक जवाबदेही (Advocates Act & Bar Council Rules):
    • सुप्रीम कोर्ट के नियमों और बार काउंसिल ऑफ इंडिया के मानकों के अनुसार, एडवोकेट-ऑन-रिकॉर्ड (AoR) केवल एक ‘डाकघर’ नहीं है जो मुवक्किल द्वारा दिए गए किसी भी ड्राफ्ट पर आंख मूंदकर हस्ताक्षर कर दे।
    • अदालत में प्रस्तुत किए जाने वाले प्रत्येक दस्तावेज, उद्धरण और केस-लॉ की प्रामाणिकता की पुष्टि करना वकील का वैधानिक कर्तव्य है।
    • अमेरिका और ब्रिटेन की अदालतों (जैसे माता बनाम एविएंका) की तरह भारत में भी वकीलों द्वारा चैटजीपीटी या अन्य जेनेरेटिव एआई टूल्स द्वारा बनाए गए ‘काल्पनिक उद्धरणों’ (AI Hallucinations) को बिना जांचे अदालत में पेश करने को न्याय प्रशासन में गंभीर हस्तक्षेप माना गया है।
  • IBC धारा 7 के तहत NCLT की भूमिका (Precise Liability Determination Not Required):
    • शीर्ष अदालत ने कानूनी सिद्धांत दोहराया कि वित्तीय लेनदार (Financial Creditor) की धारा 7 याचिका को स्वीकार करते समय NCLT को देनदारी की पाई-पाई का सटीक हिसाब लगाने की आवश्यकता नहीं होती।
    • यदि प्रथम दृष्टया ₹1 करोड़ से अधिक का ‘ऋण’ (Debt) और ‘चूक’ (Default) सिद्ध हो जाती है, तो अदालत को CIRP शुरू करना अनिवार्य है। सटीक दावों का निपटारा समाधान पेशेवर (Resolution Professional – RP) द्वारा किया जाता है।

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विधिक विवरण

  • केस संदर्भ: दीपक रहेजा बनाम ओंकारा एसेट्स रिकंस्ट्रक्शन प्राइवेट लिमिटेड व अन्य [सिविल अपील – सर्वोच्च न्यायालय]
  • पीठ: न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह (खंडपीठ)
  • फैसले की तिथि: 15 अक्टूबर 2026
  • संबद्ध पक्षकार:
    • अपीलकर्ता: दीपक रहेजा (दिवंगत), गस्टाड होटल्स प्रा. लि. (JW मैरियट, बेंगलुरु), नियो कैप्रिकॉर्न प्लाजा प्रा. लि. (क्राउन प्लाजा, पुणे)
    • प्रतिवादी: ओंकारा एसेट्स रिकंस्ट्रक्शन प्राइवेट लिमिटेड (Omkara ARC)
  • प्रासंगिक कानून एवं विधिक प्रावधान:
    • अधिवक्ता अधिनियम, 1961 — व्यावसायिक कदाचार और न्यायालय के प्रति कर्तव्य
    • सर्वोच्च न्यायालय नियम, 2013 — एडवोकेट-ऑन-रिकॉर्ड (AoR) की जिम्मेदारियां
    • दिवाला और दिवालियापन संहिता, 2016 (IBC) — धारा 7 (वित्तीय लेनदार द्वारा CIRP प्रारंभ करने का आवेदन)
  • संबद्ध न्यायिक सिद्धांत:
    • एआई अनुसंधान और विधिक सत्यनिष्ठा: ‘अदालत में पेश किए गए केस संकलन की प्रामाणिकता की जांच करने का दायित्व पूरी तरह अधिवक्ता का है; अस्तित्वहीन एआई निर्णयों को पेश करने के बाद मुवक्किल पर दोष मढ़ना व्यावसायिक मर्यादा के विपरीत है।’
    • IBC प्रवेश मानक: ‘CIRP याचिका स्वीकार करने के लिए NCLT को सटीक बकाया राशि निर्धारित करने की आवश्यकता नहीं है, केवल वैधानिक न्यूनतम सीमा से अधिक के डिफॉल्ट का अस्तित्व पर्याप्त है।’
  • अंतिम परिणाम: अपीलें पूरी तरह खारिज; जेडब्ल्यू मैरियट बेंगलुरु और क्राउन प्लाजा पुणे का संचालन करने वाली दोनों कंपनियों की कॉरपोरेट दिवाला समाधान प्रक्रिया (CIRP) कानून के अनुसार जारी रहेगी; अपीलकर्ता की मृत्यु के दृष्टिगत कोई जुर्माना नहीं लगाया गया।

Ethics of Advocate: मामले का संक्षिप्त विवरण (At A Glance)

विवरणजानकारी
संबंधित अदालतभारत का उच्चतम न्यायालय (Supreme Court of India)
पीठन्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता एवं न्यायमूर्ति ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह
मुख्य मुद्दासुनवाई के दौरान वकील द्वारा AI-जनरेटेड फर्जी/गैर-मौजूद निर्णयों का संकलन (Compilation of Judgments) जमा करना।
कोर्ट की आपत्तिएडवोकेट-ऑन-रिकॉर्ड (AoR) ने संकलन की जानकारी से इनकार करते हुए सारा दोष मुवक्किल (अपीलकर्ता) पर मढ़ दिया।
लागू जुर्माना/लागतकोर्ट ने भारी हर्जाना (Exemplary Costs) लगाने का प्रस्ताव रखा था, लेकिन मुख्य अपीलकर्ता (दीपक रहेजा) के निधन की जानकारी मिलने पर हर्जाना वापस लिया।
मूल मामले का फैसलाबेंगलुरु (JW Marriott) और पुणे (Crowne Plaza) चलाने वाली कंपनियों के खिलाफ CIRP दिवाला कार्यवाही बरकरार।
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