मामले की पृष्ठभूमि और मेडिकल कॉलेज रिश्वतकांड
- क्या था मूल भ्रष्टाचार मामला?इलाहाबाद हाईकोर्ट में जज रहते हुए न्यायमूर्ति शुक्ला पर आरोप लगा कि उन्होंने अगस्त 2017 में ‘प्रसाद इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज’ (PIMS) नामक मेडिकल कॉलेज को छात्रों के दाखिले की अनुमति देने वाला एक अनुचित आदेश पारित किया था। इस कॉलेज को मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया (MCI) ने घटिया सुविधाओं के कारण प्रतिबंधित कर दिया था। सीबीआई के अनुसार, ओडिशा हाईकोर्ट के पूर्व जज आई.एम. कुद्दुसी (Retd. Justice IM Quddusi) और मध्यस्थों के साथ मिलकर रिश्वत के बदले यह आदेश दिलवाया गया था।
- इन-हाउस जांच और काम वापस लेना:तत्कालीन सीजेआई दीपक मिश्रा द्वारा गठित इन-हाउस कमेटी ने न्यायमूर्ति शुक्ला को न्यायिक कदाचार का दोषी पाया। इसके बाद उनसे सभी प्रशासनिक और न्यायिक कार्य वापस ले लिए गए थे। जुलाई 2019 में तत्कालीन सीजेआई रंजन गोगोई ने सीबीआई को उनके खिलाफ आपराधिक मामला दर्ज करने की अनुमति दी और सरकार को उन्हें हटाने की सिफारिश की। शुक्ला जुलाई 2020 में सेवानिवृत्त हो गए।
- आय से अधिक संपत्ति (DA) का नया केस:मूल भ्रष्टाचार मामले की जांच के दौरान, सीबीआई ने 2023 में शुक्ला के खिलाफ 2014 से 2019 की अवधि के दौरान ₹2.5 करोड़ से अधिक की आय से अधिक संपत्ति अर्जित करने के आरोप में एक नई प्राथमिकी दर्ज की। हालांकि मूल केस दिल्ली की राउज एवेन्यू कोर्ट में चल रहा था, लेकिन DA मामले का ट्रायल लखनऊ की सीबीआई अदालत में शुरू कर दिया गया।
सुप्रीम कोर्ट के मुख्य निष्कर्ष और निर्देश
1. दोनों मामलों की सुनवाई एक साथ राउज एवेन्यू कोर्ट में:
पूर्व जज के वकील संजय मणि त्रिपाठी ने दलील दी कि DA का मामला भी उसी मूल FIR और जांच से उपजा है जो दिल्ली में लंबित है। सीबीआई का प्रतिनिधित्व कर रहे अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल (ASG) देविंदर पाल सिंह ने भी इस पर सहमति जताई। सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया: “सत्र मामला संख्या 737/2026 (CBI v. Narayan Shukla & Anr.), जो विशेष न्यायाधीश, भ्रष्टाचार निवारण, सीबीआई, पश्चिम लखनऊ के समक्ष लंबित है, को विशेष न्यायाधीश (पीसी एक्ट) सीबीआई, राउज एवेन्यू कोर्ट, मध्य जिला, नई दिल्ली के न्यायालय में स्थानांतरित किया जाता है।”
2. मुकदमे में तेजी लाने के निर्देश:
- सुप्रीम कोर्ट ने पूर्व जज और उनके परिजनों को निर्देश दिया कि वे बिना कोई अनावश्यक स्थगन (Unnecessary Adjournment) मांगे ट्रायल में पूरी तरह सहयोग करें।
- शीर्ष अदालत ने सीबीआई को ऐसे सरकारी गवाहों की पहचान करने का निर्देश दिया जिनकी गवाही वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग (Video Conferencing) के माध्यम से कराई जा सके, ताकि मुकदमे का निपटारा जल्द से जल्द हो सके।
नई दिल्ली: दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (CrPC) की धारा 406 सहपठित भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) की धारा 447 (आपराधिक मामलों और अपीलों को एक राज्य से दूसरे राज्य में स्थानांतरित करने की सुप्रीम कोर्ट की असाधारण शक्ति), भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 (PC Act, 1988) की धारा 13(1)(b) व 13(2) (आय से अधिक संपत्ति और भ्रष्ट आचरण), आपराधिक न्यायशास्त्र में समवर्ती या शृंखलाबद्ध अपराधों का संयुक्त/समन्वित विचारण (Joint / Consolidated Trial to Avoid Multiplicity of Proceedings), तथा वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग (VC) के माध्यम से सरकारी गवाहों के परीक्षण पर भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण प्रक्रियात्मक व्यवस्था दी है।
मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्य कांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस (सेवानिवृत्त) श्री नारायण शुक्ला द्वारा दायर स्थानांतरण याचिका (Transfer Petition) को स्वीकार कर लिया।
शीर्ष अदालत ने लखनऊ की विशेष सीबीआई अदालत में लंबित आय से अधिक संपत्ति (DA) मामले के मुकदमे को नई दिल्ली स्थित राउज एवेन्यू कोर्ट परिसर (विशेष सीबीआई अदालत) में स्थानांतरित करने का आदेश दिया, जहाँ जस्टिस शुक्ला के खिलाफ प्रसाद इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज रिश्वतखोरी मामले का मुख्य भ्रष्टाचार मुकदमा पहले से ही विचाराधीन है।
सुप्रीम कोर्ट ने पूर्व न्यायाधीश और उनके परिवार के सदस्यों को निर्देश दिया कि वे मुकदमे में पूर्ण सहयोग करेंगे और कोई अनावश्यक स्थगन (Unnecessary Adjournments) नहीं मांगेंगे। साथ ही, अदालत ने सीबीआई को निर्देश दिया कि वे ऐसे सरकारी गवाहों की पहचान करें जिनका परीक्षण वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग से कराया जा सके, ताकि मुकदमे की कार्यवाही त्वरित गति से संपन्न हो सके।
सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य कानूनी निष्कर्ष एवं निर्देश
1. ‘लखनऊ से दिल्ली स्थानांतरण: दोनों मुकदमों की उत्पत्ति एक ही स्रोत से’
प्रधान न्यायाधीश सूर्य कांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ ने 14 अक्टूबर 2026 के अपने आदेश में दर्ज किया: “सत्र वाद संख्या 737/2026 शीर्षक ‘सीबीआई बनाम नारायण शुक्ला व अन्य’, जो विशेष न्यायाधीश, भ्रष्टाचार निरोधक, सीबीआई (पश्चिम), लखनऊ, उत्तर प्रदेश की अदालत में लंबित है, को विशेष न्यायाधीश (पीसी एक्ट) सीबीआई, राउज एवेन्यू कोर्ट, सेंट्रल डिस्ट्रिक्ट, नई दिल्ली की अदालत में स्थानांतरित किया जाता है।”
2. मुकदमों के एकीकरण का विधिक आधार:
- पूर्व न्यायाधीश के अधिवक्ता संजय मणि त्रिपाठी ने दलील दी कि वर्ष 2023 में दर्ज ₹2.5 करोड़ से अधिक की आय से अधिक संपत्ति (DA) का मामला दिल्ली में दर्ज मूल रिश्वतखोरी मामले (2019 FIR) की जांच के दौरान ही सामने आया था।
- दोनों मामले परस्पर जुड़े हुए हैं और मुख्य मामला राउज एवेन्यू कोर्ट, दिल्ली में लंबित है।
- अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल (ASG) देविंदर पाल सिंह ने सीबीआई की ओर से इस स्थानांतरण पर कोई आपत्ति नहीं जताई और सहमति दी कि दिल्ली की सक्षम अदालत में दोनों मुकदमों का एक साथ या समानांतर संचालन प्रक्रियात्मक दृष्टि से सुगम होगा।
3. अभियुक्तों को सख्त निर्देश और वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग का उपयोग:
- शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया कि स्थानांतरण की इस राहत का उपयोग मुकदमे में देरी करने के लिए नहीं किया जाएगा:
- पूर्व न्यायाधीश और उनके परिवार के सदस्य, जो DA मामले में सह-आरोपी हैं, बिना किसी अनावश्यक स्थगन के विचारण में पूरा सहयोग करेंगे।
- सीबीआई उन आधिकारिक/सरकारी गवाहों की पहचान करेगी जिनका बयान वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग (VC) के माध्यम से दर्ज कराया जा सकता है, जिससे गवाहों को लखनऊ से दिल्ली की बार-बार यात्रा करने से बचाया जा सके और ट्रायल त्वरित गति से समाप्त हो सके।
मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि एवं 2017 से 2026 का घटनाक्रम
| कालखंड / चरण | तथ्यात्मक स्थिति एवं जांच के निष्कर्ष |
|---|---|
| प्रसाद इंस्टीट्यूट विवाद (2017) | लखनऊ स्थित ‘प्रसाद इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज’ (PIMS) को मानक सुविधाएं न होने के कारण मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया (MCI) द्वारा सत्र 2017-18 और 2018-19 हेतु छात्रों के प्रवेश से रोक दिया गया था। सुप्रीम कोर्ट में याचिका वापस लेने के बाद कॉलेज ने इलाहाबाद हाईकोर्ट का रुख किया। |
| रिश्वतखोरी का आरोप (25 अगस्त 2017) | आरोप है कि जस्टिस एस.एन. शुक्ला ने उड़ीसा हाईकोर्ट के सेवानिवृत्त जज आई.एम. कुद्दुसी, कॉलेज संचालकों (भगवान प्रसाद यादव व पलाश यादव) और बिचौलियों (भावना पांडे व सुधीर गिरी) के साथ आपराधिक साजिश रची और अपने आवास पर मुलाकात के बाद कॉलेज के पक्ष में राहतकारी आदेश पारित किया। |
| न्यायिक इन-हाउस जांच समिति | तत्कालीन CJI दीपक मिश्रा द्वारा गठित तीन जजों की आंतरिक जांच समिति ने जस्टिस शुक्ला को ‘न्यायिक कदाचार’ (Judicial Malpractice) का गंभीर दोषी ठहराया। इसके बाद उनसे सभी न्यायिक और प्रशासनिक कार्य वापस ले लिए गए। |
| अभियोजन की मंजूरी व सेवानिवृत्ति | जुलाई 2019 में तत्कालीन CJI रंजन गोगोई ने सीबीआई को जस्टिस शुक्ला के खिलाफ आपराधिक मुकदमा दर्ज करने की ऐतिहासिक मंजूरी दी और सरकार को उन्हें हटाने की सिफारिश की। जुलाई 2020 में शुक्ला सेवानिवृत्त हो गए। दिसंबर 2021 में दिल्ली की राउज एवेन्यू कोर्ट में चार्जशीट दाखिल हुई। |
| आय से अधिक संपत्ति (DA केस – 2023) | सीबीआई ने जांच के दौरान पाया कि जस्टिस शुक्ला और उनके परिवार ने 2014 से 2019 के दौरान अपनी ज्ञात आय के स्रोतों से ₹2.5 करोड़ से अधिक की बेहिसाब संपत्ति अर्जित की। सीबीआई ने लखनऊ की विशेष अदालत में अलग चार्जशीट दाखिल की। |
| सुप्रीम कोर्ट का अंतिम आदेश | दोनों मामलों की कड़ियां जुड़ी होने के कारण लखनऊ का सत्र वाद संख्या 737/2026 दिल्ली की राउज एवेन्यू कोर्ट को स्थानांतरित किया गया। |
विधिक एवं प्रक्रियात्मक विश्लेषण: मुकदमों का अंतर-राज्यीय स्थानांतरण
- दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 406 (BNSS धारा 447):
- यह धारा केवल भारत के सर्वोच्च न्यायालय को यह असाधारण विशेषाधिकार प्रदान करती है कि वह ‘न्याय के हित’ में किसी भी आपराधिक मामले या अपील को एक उच्च न्यायालय के अधीनस्थ अदालत से दूसरे उच्च न्यायालय के अधीनस्थ अदालत में स्थानांतरित कर सके।
- जहां दो आपराधिक मामलों की जड़ें एक ही मूल षड्यंत्र से जुड़ी हों, वहां सुप्रीम कोर्ट मुकदमों के सुचारू संचालन हेतु स्थानांतरण को प्राथमिकता देता है।
- भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 13(1)(b) और अनुपातहीन संपत्ति:
- पद के दुरुपयोग से रिश्वत लेना (धारा 7/13(1)(d) पुराना कानून) और उसी अवधि के दौरान आय से अधिक संपत्ति एकत्र करना (धारा 13(1)(e) पुराना कानून / धारा 13(1)(b) 2018 संशोधन) एक-दूसरे के पूरक अपराध हैं।
- रिश्वत से अर्जित धन ही सामान्यतः DA का स्रोत बनता है। अतः दोनों मामलों का एक ही विशेष अदालत के समक्ष होना न्यायिक समय की बचत करता है।
- इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य और वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग:
- सुप्रीम कोर्ट द्वारा सरकारी गवाहों की गवाही वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग से कराने का निर्देश यह सुनिश्चित करता है कि स्थानांतरण के कारण अभियोजन के गवाहों (विशेषकर उत्तर प्रदेश के स्थानीय अधिकारियों) को अनावश्यक असुविधा न हो और सुनवाई बिना रुके दिन-प्रतिदिन के आधार पर आगे बढ़ सके।
विधिक विवरण एवं उपस्थित अधिवक्ता
- केस संदर्भ: जस्टिस (सेवानिवृत्त) श्री नारायण शुक्ला बनाम केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) [आपराधिक स्थानांतरण याचिका – भारत का सर्वोच्च न्यायालय]
- पीठ: भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्य कांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची (खंडपीठ)
- आदेश की तिथि: 14 अक्टूबर 2026
- स्थानांतरित वाद: सत्र वाद संख्या 737/2026 (CBI v. Narayan Shukla & Anr.)
- प्रेषक न्यायालय: विशेष न्यायाधीश (भ्रष्टाचार निरोधक), सीबीआई (पश्चिम), लखनऊ, उत्तर प्रदेश
- प्राप्तकर्ता न्यायालय: विशेष न्यायाधीश (PC Act), सीबीआई, राउज एवेन्यू कोर्ट परिसर, सेंट्रल डिस्ट्रिक्ट, नई दिल्ली
विधिक प्रतिनिधित्व:
- याचिकाकर्ता (पूर्व न्यायाधीश) की ओर से: अधिवक्ता संजय मणि त्रिपाठी (Advocate Sanjay Mani Tripathi)
- प्रत्यर्थी (सीबीआई) की ओर से: अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल (ASG) देविंदर पाल सिंह (ASG Davinder Pal Singh)
- प्रासंगिक कानून एवं विधिक प्रावधान:
- दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (CrPC) — धारा 406 (आपराधिक मामलों के स्थानांतरण की सुप्रीम कोर्ट की शक्ति) / भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 447
- भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 (PC Act) — धारा 7, 8, 12, धारा 13(1)(b) व धारा 13(2) (लोक सेवक द्वारा आपराधिक अवचार व अनुपातहीन संपत्ति)
- भारतीय दंड संहिता, 1860 (IPC) — धारा 120B (आपराधिक षड्यंत्र)
- भारत का संविधान — अनुच्छेद 139A, अनुच्छेद 142 एवं अनुच्छेद 217 (उच्च न्यायालय न्यायाधीशों की संवैधानिक स्थिति)
- संबद्ध न्यायिक सिद्धांत:
- संबंधित आपराधिक विचारणों का एकीकरण: ‘जब आय से अधिक संपत्ति का मामला पूर्ववर्ती रिश्वतखोरी कांड की जांच का ही परिणाम हो, तो न्याय के सुचारू प्रशासन और प्रक्रियात्मक सुविधा के लिए दोनों मामलों का विचारण एक ही क्षेत्राधिकार (राउज एवेन्यू कोर्ट) में कराया जाना विधि सम्मत है।’
- अंतिम परिणाम: स्थानांतरण याचिका पूरी तरह स्वीकार; लखनऊ में लंबित ₹2.5 करोड़ का DA केस राउज एवेन्यू कोर्ट दिल्ली स्थानांतरित; अभियुक्तों को स्थगन न लेने की सख्त चेतावनी और सीबीआई को आधिकारिक गवाहों की गवाही वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग से कराने का निर्देश।
Disproportionate Assets:मामले का संक्षिप्त विवरण (At A Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | भारत का उच्चतम न्यायालय (Supreme Court of India) |
| पीठ | मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्या कांत एवं न्यायमूर्ति जयमाल्य बागची |
| अपीलकर्ता | सेवानिवृत्त जज श्री नारायण शुक्ला (इलाहाबाद हाईकोर्ट) |
| मामला स्थानांतरित | विशेष न्यायाधीश, सीबीआई, लखनऊ ➔ विशेष न्यायाधीश (PC Act), राउज एवेन्यू कोर्ट, नई दिल्ली |
| मुख्य आरोप | 1. ‘प्रसाद इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज’ को अवैध लाभ पहुंचाने के लिए रिश्वतखोरी। 2. 2014 से 2019 के बीच ₹2.5 करोड़ से अधिक की आय से अधिक संपत्ति (DA) अर्जित करना। |
| सीबीआई का रुख | एएसजी देविंदर पाल सिंह द्वारा मामले के दिल्ली ट्रांसफर पर कोई आपत्ति नहीं जताई गई। |
| अदालत का अंतिम आदेश | ट्रायल दिल्ली ट्रांसफर; आरोपी व परिवार को बिना स्थगन के सहयोग करने और गवाहों के लिए वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग का उपयोग करने का निर्देश। |

