हाईकोर्ट के मुख्य निष्कर्ष और टिप्पणी
- “पक्षकार खुश होकर दोस्त बनकर अलग हुए हैं”:न्यायामूर्ति विवेक जैन ने टिप्पणी करते हुए कहा:“चूंकि विवाह पहले ही समाप्त हो चुका है और विवाह के पक्षकार पहले ही खुशी-खुशी दोस्त के रूप में अलग हो चुके हैं (Happily parted as friends), इसलिए आपराधिक कार्यवाहियों को आगे जारी रखना न्याय के हित में नहीं होगा और वास्तव में न्याय के हित के विपरीत सिद्ध होगा।”
- द्वितीय याचिका की ग्राह्यता:यद्यपि पति की पहली याचिका खारिज हो चुकी थी, लेकिन हाईकोर्ट ने माना कि उस समय फैमिली कोर्ट की समझौता डिक्री अदालत के संज्ञान में नहीं लाई जा सकी थी। अब नए तथ्य (समझौता डिक्री) के आने के बाद एफआईआर रद्द करना पूरी तरह न्यायोचित है।
जबलपुर: भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) की धारा 528 (उच्च न्यायालय की अंतर्निहित शक्तियां – पूर्ववर्ती CrPC धारा 482), भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 498-A (दहेज प्रताड़ना व क्रूरता), धारा 323 व धारा 506 के तहत दर्ज आपराधिक मुकदमों का वैवाहिक विवादों (Matrimonial Disputes) से संबंध, हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 13-B के तहत पारस्परिक सहमति से तलाक (Divorce by Mutual Consent), स्थायी गुजारा भत्ता (Permanent Alimony) के पूर्ण भुगतान के उपरांत आपराधिक कार्यवाहियों को वापस लेने की वैधानिक बाध्यता, तथा पहली याचिका खारिज होने के बाद ‘परिस्थितियों में बदलाव’ (Change in Circumstances – Compromise Decree) के आधार पर दूसरी क्वैशिंग याचिका की पोषणीयता पर मध्य प्रदेश हाईकोर्टने एक व्यावहारिक और संवेदनशील फैसला सुनाया है।
मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय की जबलपुर एकल पीठ के न्यायमूर्ति विवेक जैन ने 15 अक्टूबर 2026 को दिए अपने आदेश में सिंगरौली जिले के मोरवा थाने में दर्ज अपराध क्रमांक 433/2024 की FIR और उससे उत्पन्न सभी परिणामी आपराधिक कार्यवाहियों को रद्द कर दिया। अदालत ने कहा कि जब पति-पत्नी ने रायबरेली (उत्तर प्रदेश) की फैमिली कोर्ट से आपसी सहमति से तलाक ले लिया है, पत्नी को तय गुजारा भत्ता मिल चुका है और उसने सभी मामले वापस लेने पर सहमति दी है, तो आपराधिक मुकदमा जारी रखना न्याय प्रशासन के मूल उद्देश्य को निष्फल करने जैसा होगा।
उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायिक निष्कर्ष एवं विधिक व्यवस्था
1. ‘पक्षकार मित्रवत अलग हो चुके हैं; मुकदमा जारी रखना न्याय के हित के विरुद्ध’
न्यायमूर्ति विवेक जैन ने वैवाहिक विवादों के शांतिपूर्ण समाधान के बाद आपराधिक मुकदमे जारी रखने की निरर्थकता पर जोर देते हुए दर्ज किया: “चूंकि विवाह पहले ही समाप्त हो चुका है और विवाह के दोनों पक्षकार पहले ही मित्रवत रूप से खुशी-खुशी अलग (Happily Parted As Friends) हो चुके हैं, इसलिए आपराधिक कार्यवाही को आगे जारी रखना न्याय के हित में नहीं होगा और वास्तव में न्याय के हित के प्रतिकूल (Counterproductive to the interest of justice) साबित होगा। पक्षकारों के बीच हुए उस समझौते के आलोक में, जिसे आपसी सहमति से जारी तलाक की डिक्री में विधिवत दर्ज किया गया है, इस न्यायालय का यह सुविचारित मत है कि थाना मोरवा, जिला सिंगरौली में दर्ज अपराध क्रमांक 433/2024 की FIR को रद्द किया जाना न्यायसंगत है।”
2. पहली याचिका खारिज होने के बावजूद दूसरी याचिका स्वीकार:
- पति नलिन मिश्रा द्वारा FIR रद्द कराने का यह दूसरा प्रयास था। पहली याचिका (M.Cr.C. No. 31185 of 2024) को हाईकोर्ट की समन्वय पीठ ने 27 जुलाई 2026 को गुण-दोष पर खारिज कर दिया था।
- याचिकाकर्ता के वकील ने इस तथ्य का पूर्ण प्रकटीकरण करते हुए दलील दी कि पहली याचिका के समय फैमिली कोर्ट में हुए समझौते और तलाक की डिक्री का तथ्य अदालत के संज्ञान में नहीं लाया जा सका था।
- अदालत ने माना कि परिस्थितियों में वास्तविक बदलाव (Subsequent Settlement & Compromise Decree) होने पर धारा 528 BNSS (CrPC 482) के तहत दूसरी याचिका पोषणीय है।
3. फैमिली कोर्ट की डिक्री की शर्त (c) और पत्नी का अनापत्ति बयान:
- रायबरेली (उ.प्र.) की प्रधान परिवार अदालत ने वैवाहिक वाद संख्या 506/2025 में 15 मई 2025 को दोनों पक्षों के बीच हुए समझौते के आधार पर विवाह विच्छेद की डिक्री पारित की थी।
- डिक्री की शर्त संख्या (c) के तहत पत्नी ने स्पष्ट वचन दिया था कि वह पति के खिलाफ दर्ज सभी मामले, शिकायतें और अदालती कार्यवाहियां बिना शर्त वापस ले लेगी।
- हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान पत्नी के अधिवक्ता ने भी स्पष्ट रूप से बयान दर्ज कराया कि चूंकि मामला सुलझ चुका है और स्थायी गुजारा भत्ता प्राप्त हो चुका है, इसलिए FIR रद्द किए जाने पर पत्नी को कोई आपत्ति (No Objection) नहीं है।
मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि एवं विधिक घटनाक्रम
| चरण / मंच | घटनाक्रम एवं अदालती कार्यवाही |
| मूल वैवाहिक विवाद | पति नलिन मिश्रा और उनकी पत्नी के बीच वैवाहिक कलह। पत्नी ने मध्य प्रदेश के सिंगरौली जिले के थाना मोरवा में पति के खिलाफ IPC की धारा 498-A, 323 और 506 के तहत क्राइम नं. 433/2024 दर्ज कराया। |
| पारस्परिक सहमति से तलाक (15.05.2025) | दोनों पक्षों ने विवादों को हमेशा के लिए समाप्त करने हेतु रायबरेली (उत्तर प्रदेश) की फैमिली कोर्ट में हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 13-B के तहत वाद संख्या 506/2025 दायर किया। फैमिली कोर्ट ने स्थायी गुजारा भत्ता भुगतान की पुष्टि के बाद तलाक की डिक्री पारित की। |
| पहली याचिका (27.07.2026) | पति ने हाईकोर्ट में पूर्व में M.Cr.C. 31185/2024 दायर की थी, जिसे अदालत ने खारिज कर दिया था क्योंकि उसमें तलाक और समझौते के दस्तावेज विधिवत प्रस्तुत नहीं हो पाए थे। |
| दूसरी याचिका (धारा 528 BNSS) | नए तथ्यों और समझौते की डिक्री के साथ याचिका दायर की गई। पत्नी ने भी अदालत में उपस्थित होकर मुकदमे को समाप्त करने पर अपनी स्पष्ट सहमति दी। |
| हाईकोर्ट का अंतिम निर्णय | न्यायमूर्ति विवेक जैन ने याचिका स्वीकार करते हुए FIR और ट्रायल कोर्ट की सभी कार्यवाहियों को पूर्णतः रद्द कर दिया। |
विधिक एवं विधायी विश्लेषण: क्या कहता है कानून?
- वैवाहिक विवादों में धारा 482 CrPC / धारा 528 BNSS का प्रयोग:
- सर्वोच्च न्यायालय की ऐतिहासिक नजीरों—बी.एस. जोशी बनाम हरियाणा राज्य [(2003) 4 SCC 675] और ज्ञान सिंह बनाम पंजाब राज्य [(2012) 10 SCC 303]—ने यह स्थापित किया है कि यद्यपि धारा 498-A IPC गैर-शमनीय (Non-compoundable) अपराध है, किंतु जब विवाद मूल रूप से व्यक्तिगत और वैवाहिक प्रकृति का हो और पक्षकारों ने समझौता कर लिया हो, तो उच्च न्यायालय समाज में शांति और पक्षकारों के पुनर्वास हेतु अपनी असाधारण शक्तियों का प्रयोग कर आपराधिक कार्यवाहियों को रद्द कर सकता है।
- समझौते के बाद आपराधिक मुकदमों का दुरुपयोग रोकने का दायित्व:
- सर्वोच्च न्यायालय ने के. श्रीनिवास राव बनाम डी.ए. दीपा (2013) में कहा था कि वैवाहिक मामलों में यदि तलाक की डिक्री हो चुकी है और दोनों पक्ष अपने-अपने जीवन में आगे बढ़ चुके हैं, तो पुराने मुकदमों को घसीटना केवल प्रतिशोध और उत्पीड़न को बढ़ावा देता है।
- कानून पक्षकारों को सुहावने और गरिमापूर्ण तरीके से अलग होने (Amicable parting) का अवसर देता है, ताकि वे अपने भविष्य का पुनर्निर्माण कर सकें।
- तथ्यों के प्रकटीकरण का विधिक महत्व (Full Disclosure):
- याचिकाकर्ता के अधिवक्ता ने पूर्व में खारिज हुई याचिका का पूरा ब्यौरा अदालत के सामने रखा, जिससे यह स्पष्ट हुआ कि याचिकाकर्ता अदालत के समक्ष स्वच्छ हाथों (Clean Hands) से आया था। इस ईमानदारी और समझौते की पुष्टि ने दूसरी याचिका को स्वीकार करने का ठोस आधार प्रदान किया।
विधिक विवरण एवं उपस्थित अधिवक्ता
- केस संदर्भ: नलिन मिश्रा बनाम मध्य प्रदेश राज्य व अन्य [विविध आपराधिक याचिका (M.Cr.C.) – मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय, जबलपुर]
- पीठ: न्यायमूर्ति विवेक जैन (एकल पीठ)
- आदेश की तिथि: 15 अक्टूबर 2026
- संबद्ध निचली अदालत/थाना: थाना मोरवा, जिला सिंगरौली (म.प्र.) — अपराध क्रमांक 433/2024
- पारिवारिक न्यायालय संदर्भ: प्रधान न्यायाधीश, परिवार न्यायालय, रायबरेली (उ.प्र.) — वैवाहिक वाद संख्या 506/2025 (डिक्री दिनांक: 15 मई 2025)
विधिक प्रतिनिधित्व:
- याचिकाकर्ता (पति) की ओर से: अधिवक्ता मनन अग्रवाल (Advocate Manan Agrawal)
- प्रतिवादी संख्या 2 (पत्नी) की ओर से: अधिवक्ता शुभम मिश्रा (Advocate Shubham Mishra)
- राज्य (मध्य प्रदेश) की ओर से: शासकीय अधिवक्ता सुमित रघुवंशी (Government Advocate Sumit Raghuvanshi)
- प्रासंगिक कानून एवं विधिक प्रावधान:
- भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) — धारा 528 (उच्च न्यायालय की अंतर्निहित शक्तियां / पूर्ववर्ती धारा 482 CrPC)
- भारतीय दंड संहिता, 1860 (IPC) — धारा 498-A (दहेज क्रूरता), धारा 323 (स्वेच्छा से चोट पहुंचाना) एवं धारा 506 (आपराधिक धमकी)
- हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 — धारा 13-B (पारस्परिक सहमति से विवाह विच्छेद)
- संबद्ध न्यायिक सिद्धांत:
- पारस्परिक सहमति से तलाक उपरांत 498-A की समाप्ति: ‘जब वैवाहिक संबंध आपसी सहमति से समाप्त हो चुका हो, स्थायी गुजारा भत्ता अदा किया जा चुका हो और पक्षकार मित्रवत अलग हो चुके हों, तो आपराधिक मुकदमों को जारी रखना न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग और न्याय के हित के प्रतिकूल है।’
- अंतिम परिणाम: याचिका स्वीकार; सिंगरौली के मोरवा थाने में दर्ज अपराध क्रमांक 433/2024 की FIR तथा उससे संबंधित सभी परिणामी न्यायिक कार्यवाहियां पूरी तरह रद्द और समाप्त।
Matrimonial Dispute: मामले का संक्षिप्त विवरण (At A Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय, जबलपुर पीठ |
| न्यायाधीश | न्यायमूर्ति विवेक जैन |
| याचिकाकर्ता | नलिन मिश्रा (पति) |
| संबंधित कानून | IPC की धारा 498-A, 323, 506; हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 13-B; और BNSS की धारा 528 |
| संबंधित थाना | पुलिस स्टेशन मोरवा, जिला सिंगरौली (FIR अपराध सं. 433/2024) |
| मुख्य कानूनी सिद्धांत | 1. आपसी सहमति से तलाक और समझौते के बाद धारा 498-A की दंडात्मक कार्यवाही जारी रखना न्याय प्रक्रिया का दुरुपयोग है। 2. यदि पक्षकार सौहार्दपूर्ण तरीके से अलग हो चुके हैं, तो समझौते के आधार पर FIR रद्द की जानी चाहिए। |
| अदालत का अंतिम आदेश | FIR रद्द; सिंगरौली जिले के मोरवा थाने में दर्ज FIR और उससे जुड़ी सभी अनुवर्ती कार्यवाहियां निरस्त। |

