Wednesday, October 21, 2026
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CJP Row-I: कॉकरोच जनता पार्टी” (CJP) के नेताओं सौरव दास और आशुतोष रांका ने दिल्ली हाईकोर्ट से अपनी याचिका क्यों वापस ली? यहां जानिए

हाईकोर्ट द्वारा याचिका वापस लेने की प्रमुख सिफारिशें व टिप्पणी

1. “शांति बांड तोड़ने के बाद कड़े रुख को अवैध कैसे कह सकते हैं?”

सुनवाई की शुरुआत में ही न्यायमूर्ति प्रसाद ने याचिकाकर्ताओं के वकील अभिक चिमनी से कहा: “यह एक ऐसा मामला है जहां एक निवारक नोटिस (Preventive Notice) तोड़ा गया। जब आप एक बार बांड देते हैं और उसे तोड़ते हैं, तो ऐसी स्थिति में अधिकारियों द्वारा जमानतदारों (Sureties) पर सख्त शर्तें लगाना या जांच करना कितना अवैध माना जा सकता है?”

2. “बैरीकेड तोड़ने से हिंसा और अराजकता की आशंका”:

हाईकोर्ट ने प्रदर्शन के तरीके और संभावित खतरे पर चिंता जताते हुए कहा: “जब आप जाकर बैरिकेड्स तोड़ते हैं, तो धारा 163 (BNSS) के तहत अन्य 10 या 20 लोगों के जुड़ने की संभावना बढ़ जाती है। हो सकता है आप शांतिपूर्ण ढंग से शुरू करें, लेकिन असामाजिक तत्व भीड़ में घुसकर हिंसा या आगजनी कर सकते हैं। पुलिस अनुमति इसीलिए जरूरी होती है ताकि बाहरी लोग आपका नाम खराब न करें।”

3. वैकल्पिक कानूनी उपाय (Revision Court):

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि दंड प्रक्रिया/BNSS के तहत यह आदेश सीधे रिट याचिका के तहत सुनवाई योग्य (Entertainable) नहीं बनता: “आपके पास रिवीजन (Revision) का विकल्प मौजूद है। जब मामला आज ही दोपहर 2 बजे SEM कोर्ट के सामने आ रहा है, तो आप यहां क्यों भाग रहे हैं? अगर 4 बजे फैसला आपके पक्ष में आ जाता है तो सब खत्म हो जाएगा। अगर पक्ष में नहीं आता, तो आप रिवीजन कोर्ट और फिर हाईकोर्ट आ सकते हैं।”

4. ‘जनरेशन-जी’ (GenZ) और कारणों के बदलाव पर सवाल:

पीठ ने टिप्पणी की कि दोनों नेताओं की उम्र (27 और 31 वर्ष) GenZ की श्रेणी में नहीं आती और उनका मुद्दा लगातार बदल रहा है: “पहले यह छात्रों का मुद्दा (NEET) था, अब मुद्दा बदल गया है। संगठन वही है, लेकिन कारण बदलते जा रहे हैं। जब शांति भंग की आशंका होती है, तो यह सवाल महत्वपूर्ण हो जाता है कि आपका संगठन क्या है और उसका मकसद क्या है?”

नई दिल्ली: भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS, 2023) की धारा 126, 127 सहपठित धारा 135(3) (शांति व लोक व्यवस्था बनाए रखने हेतु अंतरिम बंधपत्र निष्पादित कराने की शक्ति), धारा 140 (जमानतदार / Surety के अनर्ह पाए जाने पर अस्वीकृति की प्रक्रिया), विशेष कार्यपालक मजिस्ट्रेट (SEM) के आदेशों के विरुद्ध संवैधानिक उपचार बनाम सांविधिक पुनरीक्षण अधिकारिता (Maintainability vs. Entertainability under Article 226 vs Criminal Revision), तथा शांति बंधपत्र के उल्लंघन के मामलों में कार्यपालक हिरासत की सीमाओं पर दिल्ली की अदालतों से दो परस्पर जुड़े महत्वपूर्ण घटनाक्रम सामने आए हैं।

कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के कार्यकर्ता सौरव दास और आशुतोष रांका को 7 दिनों की न्यायिक हिरासत के बाद तिहाड़ जेल से रिहा करने का आदेश जारी किया गया। इससे पूर्व, दिल्ली हाईकोर्ट में न्यायमूर्ति सुब्रह्मण्यम प्रसाद की एकल पीठ ने SEM अदालत द्वारा 19 अक्टूबर को हिरासत दो दिन बढ़ाने के आदेश के खिलाफ दायर रिट याचिका पर विचार करने से अनिच्छा जताई। पीठ ने स्पष्ट किया कि जब संहिता के तहत वैकल्पिक उपाय (सत्र न्यायालय में पुनरीक्षण) मौजूद है और उसी दिन दोपहर 2 बजे SEM अदालत में जमानतदारों के सत्यापन का मामला सूचीबद्ध है, तो सीधे अनुच्छेद 226 के तहत हाईकोर्ट आना उचित नहीं है। हाईकोर्ट के इस रुख के बाद याचिका वापस ले ली गई।

तत्पश्चात, मंदिर मार्ग पुलिस स्टेशन स्थित SEM कोर्ट में सहायक पुलिस आयुक्त (ACP) ऋतु राज ने दोनों नेताओं द्वारा दिए गए लिखित वचनपत्र (Written Undertaking), मौखिक माफीनामे और ₹50,000 के व्यक्तिगत व जमानती मुचलके को स्वीकार करते हुए उनकी औपचारिक रिहाई का आदेश पारित किया।

1. दिल्ली हाईकोर्ट का रुख: वैकल्पिक उपचार और प्रक्रियात्मक अनुशासन

‘समानता और विचारणीयता में अंतर; जब संहिता में उपाय है तो सीधे अनुच्छेद 226 क्यों?’:

न्यायमूर्ति सुब्रह्मण्यम प्रसाद ने याचिकाकर्ता के वकील द्वारा कार्यपालक मजिस्ट्रेट के क्षेत्राधिकार पर सवाल उठाने पर प्रक्रियात्मक मर्यादा रेखांकित की:

  • रिवीजन का सांविधिक मंच: अदालत ने मौखिक रूप से टिप्पणी की कि याचिका की Maintainability (पोषणीयता) हो सकती है, किंतु Entertainability (स्वीकार्यता) नहीं, क्योंकि CrPC/BNSS के तहत कार्यपालक मजिस्ट्रेट के आदेश के विरुद्ध सत्र न्यायालय के समक्ष आपराधिक पुनरीक्षण (Revision Petition) का सक्षम मंच उपलब्ध है।
  • दोपहर 2 बजे की सुनवाई का इंतजार: पीठ ने याचिकाकर्ताओं को सलाह दी कि जब SEM अदालत उसी दिन दोपहर 2 बजे नए सिरे से जमानतदारों पर विचार कर रही है, तो हाईकोर्ट में समय से पूर्व दबाव बनाने के बजाय SEM के निर्णय की प्रतीक्षा करनी चाहिए। यदि राहत मिलती है तो विवाद समाप्त हो जाएगा; अन्यथा वे सक्षम अदालत में जा सकते हैं।

‘शांति बॉन्ड का उल्लंघन और बैरिकेड्स तोड़ना’:

  • पीठ ने पाया कि याचिकाकर्ताओं ने 11 अक्टूबर को शांति बनाए रखने के लिए ₹50,000 का बॉन्ड भरा था। उसके बाद 13 अक्टूबर को वे गैर-अधिसूचित क्षेत्र जंतर-मंतर पहुंचे और बैरिकेड्स लांघे।
  • अदालत ने मौखिक रूप से कहा:“जब कोई व्यक्ति एक निवारक बॉन्ड देता है और फिर उसे तोड़ता है, तो ऐसे मामले में जमानतदार पर जोर देना गैर-कानूनी कैसे हो सकता है? जब आप बैरिकेड तोड़ते हैं, तो अन्य लोगों के शामिल होने की आशंका बढ़ जाती है। समूह में अनियंत्रित तत्व शामिल होकर शांति भंग कर सकते हैं, इसीलिए पुलिस अनुमति अनिवार्य होती है.”

‘संगठन वही, किंतु मुद्दे बदलते रहते हैं’:

  • अदालत ने यह भी सवाल उठाया कि याचिकाकर्ताओं की उम्र 27 और 31-32 वर्ष है, अतः वे ‘Gen Z’ श्रेणी में नहीं आते।
  • पीठ ने मौखिक टिप्पणी की कि जुलाई में नीट पेपर लीक प्रदर्शन से लेकर अब चुनाव आयोग विरोधी प्रदर्शन तक कारण बदलते रहे हैं। जब लोक शांति और कानून-व्यवस्था का प्रश्न आता है, तो मजिस्ट्रेट के लिए यह देखना स्वाभाविक है कि संगठन का स्वरूप, उद्देश्य और बार-बार गैर-अधिसूचित स्थलों पर जाने की प्रवृत्ति क्या है।
  • इन टिप्पणियों के बाद अधिवक्ता ने याचिका वापस लेने की अनुमति मांगी, जिसे अदालत ने बिना गुण-दोष पर राय व्यक्त किए स्वीकार कर लिया।

2. विशेष कार्यपालक मजिस्ट्रेट (SEM) अदालत का रिहाई आदेश

हाईकोर्ट से याचिका वापसी के बाद दोनों नेताओं को मंदिर मार्ग स्थित SEM अदालत में पेश किया गया।

लिखित हलफनामा (Undertaking):

SEM ऋतु राज ने अपने आदेश में दोनों कार्यकर्ताओं द्वारा प्रस्तुत औपचारिक वचनपत्र दर्ज किया: “हम शांति, कानून-व्यवस्था और लोक प्रशांति के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दोहराते हैं। हम स्पष्ट रूप से यह वचन देते हैं कि जब तक जंतर-मंतर को कानून सम्मत तरीके से पुनः अधिसूचित (De-notified) नहीं किया जाता, तब तक हम वहां किसी भी विरोध-प्रदर्शन का आह्वान नहीं करेंगे। हमारे द्वारा किया जाने वाला कोई भी भावी विरोध-प्रदर्शन भारत के संविधान के दायरे (Four Corners of the Constitution) के भीतर ही आयोजित होगा।”

धारा 135(3) BNSS के तहत संतुष्टि:

  • SEM अदालत ने दर्ज किया कि BNSS की धारा 135(3) के तहत लोक प्रशांति भंग होने से रोकने के तात्कालिक सुरक्षा उपाय लिखित वचनपत्र और प्रस्तुत शांति बंधपत्र से पर्याप्त रूप से सुनिश्चित हो जाते हैं।
  • पूर्व में 19 अक्टूबर को जिन जमानतदारों के पहचान पत्रों और विवरणों में विसंगतियां पाई गई थीं, उन तकनीकी कमियों और मीडिया बयानों पर वकीलों द्वारा बिना शर्त मौखिक माफी दिए जाने के बाद अदालत ने ₹50,000 के व्यक्तिगत और जमानती मुचलके पर दोनों को रिहा करने का निर्देश दिया।

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प्रक्रियात्मक एवं तथ्यात्मक कालक्रम

तिथि / कालखंडघटनाक्रम एवं प्रक्रियात्मक स्थिति
10 अक्टूबर 2026मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ प्रस्तावित प्रदर्शन से पूर्व दिल्ली हवाई अड्डे पर दोनों को हिरासत में लिया गया; BNSS की धारा 126/170 के तहत ₹50,000 का शांति बॉन्ड भरकर रिहाई हुई।
13 अक्टूबर 2026शांति बॉन्ड का उल्लंघन करते हुए दोनों जंतर-मंतर (जो 11 अक्टूबर से गैर-अधिसूचित था) पहुंचे और गेट पर चढ़कर तिरंगा फहराया; पुलिस ने पुनः हिरासत में लिया।
14 अक्टूबर 2026SEM अदालत ने पूर्व बॉन्ड के उल्लंघन पर दोनों को 5 दिन की न्यायिक हिरासत (तिहाड़ जेल) में भेजा।
19 अक्टूबर 2026हिरासत अवधि समाप्त होने पर पेशी; प्रस्तुत जमानतदारों के पहचान विवरणों में विसंगति पाए जाने पर SEM ने हिरासत 2 दिन (21 अक्टूबर तक) बढ़ा दी।
21 अक्टूबर 2026 (सुबह)दिल्ली हाईकोर्ट में 19 अक्टूबर के आदेश को चुनौती; न्यायमूर्ति सुब्रह्मण्यम प्रसाद द्वारा वैकल्पिक उपचार (Revision) अपनाने का निर्देश देने पर याचिका वापस ली गई।
21 अक्टूबर 2026 (शाम)SEM अदालत में लिखित हलफनामा, माफीनामा और ₹50,000 के जमानती बॉन्ड स्वीकार; दोनों नेताओं की तिहाड़ जेल से रिहाई का आदेश।

विधिक एवं सांविधिक विश्लेषण: BNSS में निवारक क्षेत्राधिकार

  • कार्यपालक मजिस्ट्रेट बनाम न्यायिक मजिस्ट्रेट का अंतर:
    • BNSS की धारा 126 (पूर्ववर्ती CrPC धारा 107) अपराध की जांच नहीं करती, बल्कि अपराध को घटित होने से रोकने का ‘निवारक’ (Preventive) तंत्र है।
    • जहां किसी व्यक्ति ने पूर्व में दिए गए शांति बंधपत्र की शर्तों का उल्लंघन किया हो, वहां प्रशासन सख्त शर्तों और सत्यापन योग्य जमानतदारों की मांग करने का वैध अधिकार रखता है।
  • वैकल्पिक उपचार का सिद्धांत (Doctrine of Alternative Remedy):
    • उच्च न्यायालय ने दोहराया कि जब किसी कार्यपालक आदेश के विरुद्ध आपराधिक प्रक्रिया संहिता/BNSS के तहत सत्र न्यायालय में पुनरीक्षण याचिका (Revision) का सीधा प्रावधान हो, तो असाधारण रिट क्षेत्राधिकार (अनुच्छेद 226) का प्रयोग तभी किया जा सकता है जब आदेश पूर्णतः क्षेत्राधिकार-विहीन या दुर्भावनापूर्ण हो।

विधिक विवरण एवं उपस्थित अधिवक्ता

  • अदालत संदर्भ (High Court): सौरव दास व अन्य बनाम राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली राज्य [W.P.(Crl.)-3341/2026 – दिल्ली उच्च न्यायालय]
  • पीठ: न्यायमूर्ति सुब्रह्मण्यम प्रसाद (एकल पीठ)
  • अदालत संदर्भ (SEM Court): विशेष कार्यपालक मजिस्ट्रेट अदालत, नई दिल्ली (मंदिर मार्ग थाना परिसर)
  • पीठासीन अधिकारी: ऋतु राज, ACP / विशेष कार्यपालक मजिस्ट्रेट
  • आदेश की तिथि: 21 अक्टूबर 2026
  • मामले की अगली तिथि: 23 अक्टूबर 2026 (SEM कोर्ट में स्थिति की समीक्षा)

विधिक प्रतिनिधित्व:

  • याचिकाकर्ताओं (सौरव दास व आशुतोष रांका) की ओर से: अधिवक्ता अभिक चिमनी एवं अधिवक्ता प्रांजल अबरोल
  • दिल्ली पुलिस / राज्य की ओर से (High Court): अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल (ASG) चेतन शर्मा एवं केंद्र सरकार के स्थायी वकील (CGSC) आशीष दीक्षित
  • प्रासंगिक कानून एवं विधिक प्रावधान:
    • भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) — धारा 126 (शांति कायम रखने के लिए प्रतिभूति), धारा 127 (प्रक्रियात्मक आदेश), धारा 135(3) (शांति बनाए रखने हेतु अंतरिम आदेश), धारा 140 (जमानतदार की अस्वीकृति) एवं धारा 170 (संज्ञेय अपराध रोकने हेतु निवारक गिरफ्तारी)
    • दिल्ली पुलिस अधिनियम, 1978 — धारा 70 (ACP स्तर के अधिकारियों को SEM की शक्तियां)
    • भारत का संविधान — अनुच्छेद 19(1)(b), अनुच्छेद 19(3) (शांतिपूर्ण सम्मेलन का अधिकार व युक्तियुक्त निर्बंधन) एवं अनुच्छेद 226 (उच्च न्यायालय का रिट क्षेत्राधिकार)
  • अंतिम परिणाम: दिल्ली हाईकोर्ट से रिट याचिका बिना गुण-दोष पर आदेश के वापस ली गई; SEM अदालत ने जंतर-मंतर पर प्रदर्शन न करने का लिखित वचनपत्र और ₹50,000 का मुचलका स्वीकार करते हुए दोनों नेताओं को न्यायिक हिरासत से रिहा करने का आदेश जारी किया।

CJP Row-I:मामले का संक्षिप्त विवरण (At A Glance)

विवरणजानकारी
संबंधित अदालतदिल्ली उच्च न्यायालय (Delhi High Court)
न्यायाधीशन्यायमूर्ति सुब्रमण्यम प्रसाद (Justice Subramonium Prasad)
याचिकाकर्तासौरव दास और आशुतोष रांका (CJP नेता)
मुख्य कानूनी विवादजंतर-मंतर पर बिना अनुमति प्रदर्शन करने और शांति बांड (Peace Bond) तोड़ने पर SEM द्वारा 2 दिन की अतिरिक्त न्यायिक हिरासत बढ़ाने का आदेश।
याचिका वापसी का कारणहाईकोर्ट द्वारा वैकल्पिक उपचार (Alternative Remedy) का हवाला और उसी दिन 2 बजे SEM अदालत में दोबारा सुनवाई का होना।
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