मामले की पृष्ठभूमि और सरकार का पत्र
- चोरबागान भगदड़ हादसा:17 अक्टूबर 2026 को कोलकाता के प्रसिद्ध चोरबागान दुर्गा पूजा पंडाल में भारी भीड़, संकरे रास्तों, सजावटी ढांचों, अपर्याप्त रोशनी, वेंटिलेशन की कमी और अचानक हुई बारिश के बीच पुलिस व भीड़ प्रबंधन की विफलता के कारण भीषण भगदड़ मच गई थी, जिसमें 19 श्रद्धालुओं की जान चली गई।
- मुख्य सचिव का पत्र:दुर्घटना के बाद राज्य के मुख्य सचिव मनोज अग्रवाल ने कलकत्ता हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को एक पत्र भेजकर जांच आयोग की अध्यक्षता के लिए हाईकोर्ट के किसी सेवारत न्यायाधीश (Serving Judge) को उपलब्ध कराने का अनुरोध किया था। राज्य ने आयोग के लिए संदर्भ शर्तें (Terms of Reference) भी तय की थीं, जिनमें सीसीटीवी फुटेज, कॉल रिकॉर्ड, कंट्रोल रूम लॉग्स और क्राउड मैनेजमेंट विफलताओं की जांच शामिल है।
हाईकोर्ट के मुख्य निष्कर्ष और कानूनी तर्क
1. हाईकोर्ट में जजों की उपलब्धता की स्थिति:
अदालत ने कहा कि वर्तमान में जजों की स्वीकृत संख्या 72 है, जबकि केवल 50 न्यायाधीश कार्यरत हैं। 27 अक्टूबर 2026 को न्यायमूर्ति शम्पा दत्त (पाल) और 25 नवंबर 2026 को न्यायमूर्ति अपूर्व सिन्हा राय सेवानिवृत्त हो रहे हैं, जिसके बाद जजों की संख्या घटकर 48 रह जाएगी। इस स्थिति में सेवारत जज देना संभव नहीं है।
2. सेवारत जज देना सीजे का प्रशासनिक फैसला:
पीठ ने स्पष्ट किया: “आयोग के अध्यक्ष के रूप में नियुक्त करने के लिए इस अदालत के एक सेवारत न्यायाधीश को बख्शा जाए या नहीं, यह प्रशासनिक पक्ष पर मुख्य न्यायाधीश को तय करना है। यदि मुख्य न्यायाधीश सेवारत जज नहीं देते हैं, तो राज्य सरकार जांच आयोग अधिनियम, 1952 के प्रावधानों के तहत इस अदालत के एक सेवानिवृत्त न्यायाधीश को नियुक्त करके आयोग गठित करने के लिए स्वतंत्र है।”
3. कोर्ट-मॉनिटर्ड प्रोब (Court-Monitored Probe) से इनकार:
पीठ ने यह भी साफ कर दिया कि वह जांच की निगरानी नहीं करेगी: “हम यह स्पष्ट करते हैं कि जांच आयोग अधिनियम के प्रावधानों को ध्यान में रखते हुए, उच्च न्यायालय जांच की निगरानी नहीं करेगा। आयोग जो रिपोर्ट प्रस्तुत करेगा, उससे निपटना राज्य सरकार का काम होगा।”
कोलकाता: जांच आयोग अधिनियम, 1952 (Commissions of Inquiry Act, 1952) की धारा 3 (सार्वजनिक महत्व के मामलों की जांच हेतु आयोग की नियुक्ति), संवैधानिक अदालतों द्वारा जांच की सतत निगरानी (Court-Monitored Investigation) की विधिक सीमाएं, उच्च न्यायालयों में कार्यरत न्यायाधीशों की कमी (Judicial Vacancies and Case Load) के मद्देनजर प्रशासनिक पक्ष बनाम न्यायिक पक्ष का दायरा, तथा सार्वजनिक उत्सवों (दुर्गा पूजा पंडालों) में भीड़ प्रबंधन और आपदा नियंत्रण (Disaster and Crowd Management Failure) पर कलकत्ता हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण आदेश पारित किया है।
कलकत्ता उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश रवींद्र विठ्ठलराव घुगे और न्यायमूर्ति शब्बर रशीदी की खंडपीठ ने 17 अक्टूबर 2026 को उत्तरी कोलकाता के चोरबागान सार्वजनीन दुर्गा पूजा पंडाल में मची भीषण भगदड़ (जिसमें एक 7 वर्षीय बच्चे सहित 19 लोगों की दर्दनाक मौत हो गई थी) की न्यायिक जांच की मांग वाली जनहित याचिका (PIL) पर सुनवाई की।
अदालत ने स्पष्ट किया कि पश्चिम बंगाल सरकार द्वारा जांच आयोग की अध्यक्षता हेतु हाईकोर्ट के किसी ‘कार्यरत न्यायाधीश’ (Serving Judge) को नामित करने का अनुरोध मुख्य न्यायाधीश के प्रशासनिक विशेषाधिकार (Administrative Discretion) के अधीन है। यदि न्यायिक कार्यभार और रिक्तियों के चलते कार्यरत जज उपलब्ध नहीं होते हैं, तो राज्य सरकार जांच आयोग अधिनियम, 1952 के तहत उच्च न्यायालय के किसी सेवानिवृत्त न्यायाधीश (Retired Judge) को जांच आयोग का अध्यक्ष नियुक्त करने के लिए पूर्णतः स्वतंत्र है। साथ ही, खंडपीठ ने स्पष्ट निर्देश दिया कि हाईकोर्ट इस जांच की कोई निगरानी (Monitoring) नहीं करेगा; आयोग अपनी रिपोर्ट सीधे राज्य सरकार को सौंपेगा।
उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायिक निष्कर्ष एवं विधिक व्यवस्था
1. ‘जांच आयोग की कोर्ट-मॉनिटरिंग नहीं होगी; रिपोर्ट पर कार्रवाई राज्य का दायित्व’
मुख्य न्यायाधीश रवींद्र विठ्ठलराव घुगे और न्यायमूर्ति शब्बर रशीदी की खंडपीठ ने स्पष्ट विधिक विभाजन तय करते हुए आदेश दिया: “हम यह पूरी तरह स्पष्ट करते हैं कि जांच आयोग अधिनियम के प्रावधानों को ध्यान में रखते हुए, यह उच्च न्यायालय जांच की कोई निगरानी (Monitoring the Inquiry) नहीं करेगा। आयोग द्वारा राज्य सरकार को जो रिपोर्ट प्रस्तुत की जाएगी, उस रिपोर्ट पर आगे की कार्रवाई और विचार करना पूरी तरह राज्य सरकार का काम होगा।”
2. कार्यरत जज देना चीफ जस्टिस का प्रशासनिक निर्णय; सेवानिवृत्त जज का विकल्प खुला:
- राज्य के मुख्य सचिव मनोज अग्रवाल ने पत्र भेजकर मुख्य न्यायाधीश से अनुरोध किया था कि आयोग की अध्यक्षता हेतु हाईकोर्ट का एक कार्यरत जज उपलब्ध कराया जाए।
- खंडपीठ ने रेखांकित किया:“जांच आयोग के अध्यक्ष के रूप में नियुक्त किए जाने हेतु इस न्यायालय के किसी कार्यरत न्यायाधीश को उपलब्ध कराया जाए या नहीं, यह प्रशासनिक पक्ष में मुख्य न्यायाधीश द्वारा तय किया जाना है।यदि मुख्य न्यायाधीश कार्यरत जज उपलब्ध नहीं कराते हैं, तो राज्य सरकार जांच आयोग अधिनियम, 1952 के प्रावधानों के तहत 17.10.2026 की दुर्भाग्यपूर्ण भगदड़ की जांच के लिए इस न्यायालय के किसी सेवानिवृत्त न्यायाधीश को नियुक्त कर आयोग गठित करने हेतु कानूनन स्वतंत्र होगी।”
3. कलकत्ता हाईकोर्ट में न्यायाधीशों की गंभीर कमी (Judicial Vacancy Concern):
- खंडपीठ ने न्यायिक कार्यभार का संज्ञान लेते हुए आधिकारिक आंकड़े दर्ज किए:
- कलकत्ता हाईकोर्ट में न्यायाधीशों की कुल स्वीकृत संख्या (Sanctioned Strength) 72 है।
- वर्तमान में अदालत मात्र 50 न्यायाधीशों के साथ काम कर रही है।
- आगामी सेवानिवृत्तियां: न्यायमूर्ति श्रीमती शम्पा दत्त (पॉल) 27 अक्टूबर 2026 को सेवानिवृत्त हो रही हैं, जबकि न्यायमूर्ति अपूर्व सिन्हा राय 25 नवंबर 2026 को सेवानिवृत्त होंगे। इसके बाद हाईकोर्ट में न्यायाधीशों की संख्या घटकर मात्र 48 रह जाएगी।
- ऐसी स्थिति में नियमित न्यायिक कार्यों को छोड़कर किसी कार्यरत जज को लंबी जांच सौंपना व्यावहारिक रूप से अत्यधिक कठिन है।
मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि एवं प्रक्रियात्मक कालक्रम
| चरण / विवरण | तथ्यात्मक स्थिति एवं पक्षों के तर्क |
| दुर्भाग्यपूर्ण त्रासदी | 17 अक्टूबर 2026 को कोलकाता के चोरबागान सार्वजनीन दुर्गा पूजा पंडाल में अत्यधिक भीड़, अचानक बारिश और संकरे निकास मार्गों के चलते मची भगदड़ में 19 श्रद्धालुओं की मृत्यु हो गई (जिसमें एक 7 वर्षीय मासूम भी शामिल था) और दर्जनों घायल हो गए। |
| याचिकाकर्ता के तर्क (वरिष्ठ अधिवक्ता कल्याण बंदोपाध्याय) | 1. पूजा पंडालों में भीड़ को नियंत्रित करने के लिए बेहद संकरी गलियों से प्रवेश द्वार बनाए गए थे। 2. सत्ता परिवर्तन के बाद पूजा कमेटियों के अनुभवी सदस्यों को हटाकर ऐसे अनुभवहीन लोगों को दायित्व सौंपे गए जो आपदा से निपटने में अक्षम थे। 3. थीम पंडाल में ऊंचे मंच, सजावटी ढांचे, अपर्याप्त वेंटिलेशन और कम रोशनी ने अचानक बारिश होते ही लोगों में सामूहिक दहशत (Mass Hysteria) फैला दी। पर्याप्त पुलिस बल और आपदा प्रबंधन कर्मी नदारद थे। |
| राज्य सरकार का रुख (अतिरिक्त महाधिवक्ता बिल्वदल भट्टाचार्य) | सरकार ने पहले ही मुख्य सचिव के माध्यम से मुख्य न्यायाधीश को पत्र लिखकर जांच आयोग बनाने की पहल की है। आयोग के संदर्भ की शर्तें (Terms of Reference) तैयार हैं—जिसमें सीसीटीवी फुटेज, कंट्रोल रूम और थाना लॉग, कॉल रिकॉर्ड और भीड़ प्रबंधन की विफलता के कारणों की जांच शामिल है। |
| हाईकोर्ट का अंतिम निर्णय | हाईकोर्ट जांच की सीधी निगरानी नहीं करेगा। राज्य सरकार सेवानिवृत्त जज को नियुक्त कर जांच आयोग अधिनियम, 1952 के तहत आयोग अधिसूचित कर सकती है। याचिका को निस्तारित करने के बजाय भविष्य की जरूरतों के लिए लंबित रखा गया। |
विधिक एवं प्रक्रियात्मक विश्लेषण: जांच आयोग अधिनियम, 1952 का ढांचा
- जांच आयोग की विधिक प्रकृति (Fact-Finding Body):
- सर्वोच्च न्यायालय ने राम कृष्ण डालमिया बनाम न्यायमूर्ति तेंदुलकर [AIR 1958 SC 538] और टी.टी. एंटनी (2001) में स्थापित किया है कि जांच आयोग अधिनियम, 1952 के तहत गठित आयोग कोई अदालत नहीं होता और न ही यह किसी को सजा दे सकता है। यह एक विशुद्ध ‘तथ्य अन्वेषण निकाय’ (Fact-Finding Body) है जिसका उद्देश्य घटनाओं के कारणों का पता लगाकर भविष्य के लिए नीतिगत सिफारिशें देना है।
- चूंकि आयोग अपनी रिपोर्ट सीधे उपयुक्त सरकार (राज्य सरकार) को सौंपता है, इसलिए हाईकोर्ट का जांच की दिन-प्रतिदिन मॉनिटरिंग करना न तो वैधानिक योजना में शामिल है और न ही आवश्यक है।
- कार्यरत न्यायाधीशों को गैर-न्यायिक कार्यों में लगाने की सीमा:
- सुप्रीम कोर्ट ने कई मौकों पर दोहराया है कि जब उच्च न्यायालयों में लाखों मुकदमे लंबित हों और जजों की भारी कमी हो, तो प्रशासनिक जांचों के लिए कार्यरत जजों को शामिल करने से बचना चाहिए।
- कलकत्ता हाईकोर्ट में 72 में से 24 पद रिक्त होने के कारण सेवानिवृत्त न्यायाधीश की नियुक्ति सबसे व्यावहारिक और कानूनी रूप से सुदृढ़ विकल्प है।
- याचिका को लंबित रखने का औचित्य:
- अदालत ने याचिका को खारिज नहीं किया, बल्कि लंबित रखा है ताकि यदि राज्य सरकार जांच प्रक्रिया में अनुचित विलंब करती है या आयोग के समक्ष कोई प्रक्रियात्मक गतिरोध आता है, तो पक्षकार दोबारा अदालत का दरवाजा खटखटा सकें।
विधिक विवरण एवं उपस्थित अधिवक्ता
- केस संदर्भ: तपस कुमार डे बनाम पश्चिम बंगाल राज्य व अन्य [जनहित याचिका (WPA-P) – कलकत्ता उच्च न्यायालय]
- पीठ: मुख्य न्यायाधीश रवींद्र विठ्ठलराव घुगे और न्यायमूर्ति शब्बर रशीदी (खंडपीठ)
- आदेश की तिथि: 21 अक्टूबर 2026
- संबद्ध घटना: 17 अक्टूबर 2026 को चोरबागान सार्वजनीन दुर्गा पूजा पंडाल में मची भगदड़ (19 मौतें)
विधिक प्रतिनिधित्व:
- याचिकाकर्ता की ओर से: वरिष्ठ अधिवक्ता कल्याण बंदोपाध्याय सहपठित अधिवक्ता सुमन सेनगुप्ता, अनित कुमार दास, आशीष दत्ता, जोएब रऊफ एवं राहुल कुमार सिंह
- पश्चिम बंगाल राज्य की ओर से: अतिरिक्त महाधिवक्ता (AAG) बिल्वदल भट्टाचार्य, शासकीय अधिवक्ता (Government Pleader) डी.एन. रे सहपठित अधिवक्ता अनिंद्य बसु, प्रतीप मुखर्जी, इंद्रदीप पाल एवं विकास कुमार श्रीवास्तव
- प्रासंगिक कानून एवं विधिक प्रावधान:
- जांच आयोग अधिनियम, 1952 (Commissions of Inquiry Act, 1952) — धारा 3 (आयोग की नियुक्ति) एवं धारा 4 (आयोग की शक्तियां)
- आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005 (Disaster Management Act, 2005) — सुरक्षा दिशानिर्देश व भीड़ नियंत्रण
- भारत का संविधान — अनुच्छेद 21 (जीवन की सुरक्षा का अधिकार) एवं अनुच्छेद 226 (उच्च न्यायालय का रिट क्षेत्राधिकार)
- संबद्ध न्यायिक सिद्धांत:
- जांच आयोगों में अदालती अहस्तक्षेप और न्यायिक शक्तियों का संतुलन: ‘जांच आयोग अधिनियम के तहत गठित जांच की सीधी कोर्ट मॉनिटरिंग नहीं की जाएगी; कार्यरत जज उपलब्ध कराना मुख्य न्यायाधीश का प्रशासनिक निर्णय है; भारी न्यायिक रिक्तियों को देखते हुए राज्य सरकार उच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश की अध्यक्षता में जांच आयोग गठित करने के लिए कानूनन अधिकृत है।’
- अंतिम परिणाम: अदालत द्वारा जांच की मॉनिटरिंग से इनकार; राज्य सरकार को हाईकोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायाधीश की अध्यक्षता में स्वतंत्र जांच आयोग गठित करने की पूर्ण छूट; जनहित याचिका को भविष्य के संदर्भों के लिए न्यायालय के समक्ष लंबित रखा गया।
Chorebagan Stampede:मामले का संक्षिप्त विवरण (At A Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | कलकत्ता उच्च न्यायालय (Calcutta High Court) |
| पीठ | मुख्य न्यायाधीश रवींद्र विठ्ठलराव घुगे एवं न्यायमूर्ति शाब्बर रशीदी |
| घटना की तिथि व स्थल | 17 अक्टूबर 2026, चोरबागान सार्वजनिक दुर्गा पूजा पंडाल, कोलकाता |
| हादसे का प्रभाव | 19 लोगों की मृत्यु (एक 7 साल का बच्चा भी शामिल) तथा कई घायल। |
| याचिकाकर्ता | तपस कुमार डे (वरिष्ठ अधिवक्ता कल्याण बंद्योपाध्याय द्वारा प्रतिनिधित्व) |
| प्रतिवादी | पश्चिम बंगाल राज्य सरकार व अन्य |
| मुख्य कानूनी बिंदु | 1. जांच आयोग अधिनियम, 1952 (Commission of Inquiries Act, 1952) 2. सेवारत जज देना मुख्य न्यायाधीश का प्रशासनिक अधिकार है; जजों की कमी के कारण राज्य सरकार पूर्व जज को नियुक्त कर सकती है। 3. हाईकोर्ट जांच की सीधी निगरानी (Court-Monitored Probe) नहीं करेगा। |

