घटनाक्रम: अदालत कक्ष में कैसे पकड़ा गया मामला?
- गलियारे (Corridor) से रिकॉर्डिंग:झोपड़पट्टी पुनर्वसन योजना से जुड़े मामलों की सुनवाई चल रही थी। उसी दौरान वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी (Prothonotary and Senior Master) ए.एच. लड्ढा की नजर गलियारे में खड़े एक क्लर्क पर पड़ी, जो चुपके से मोबाइल कैमरे से कोर्टरूम की कार्यवाही रिकॉर्ड कर रहा था। अधिकारी ने तुरंत जज को इस बात की सूचना दी।
- निर्देश पर रिकॉर्डिंग का दावा:पूछताछ करने पर क्लर्क ने स्वीकार किया कि वह अपने वरिष्ठ वकील के चैंबर में काम करने वाले एक जूनियर वकील के निर्देशों पर यह वीडियो बना रहा था। अदालत ने मोबाइल जब्त करने और उसमें से वीडियो पूरी तरह से डिलीट करने का आदेश दिया।
हाईकोर्ट के मुख्य निष्कर्ष और टिप्पणी
1. “वकीलों को अदालत के नियमों का पालन करना सबसे पहले जरूरी”:
पीठ ने इस आचरण पर कड़ा आश्चर्य व्यक्त करते हुए कहा: “हम वास्तव में हैरान हैं। इस अदालत के वकीलों को सबसे पहले अदालत के नियमों का पालन करने की आवश्यकता होती है। हम यह स्पष्ट करना चाहते हैं कि उच्च न्यायालय द्वारा बनाए गए नियमों के तहत अदालत की कार्यवाही को रिकॉर्ड करने पर स्पष्ट रोक है।”
2. बार काउंसिल और अवमानना कार्रवाई से राहत:
- पीठ ने माना कि यह एक ऐसा मामला था जहां अदालत की अवमानना (Contempt of Court) की कार्यवाही शुरू की जा सकती थी या बार काउंसिल को संबंधित जूनियर वकील के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई करने का निर्देश दिया जा सकता था।
- हालांकि, यह देखते हुए कि वकील नया/जूनियर है और उसमें बुनियादी अदालती प्रशिक्षण व शिष्टाचार की कमी है, अदालत ने उसका करियर बचाने के उद्देश्य से सख्त कानूनी कार्रवाई के बजाय मौद्रिक जुर्माना (Monetary Fine) और बिना शर्त माफीनामा (Unconditional Undertaking) जमा करने का निर्देश दिया।
सोशल मीडिया पर वीडियो वायरल करने के बढ़ते रुझान पर चिंता
यह आदेश ऐसे समय में आया है जब कुछ ही दिन पहले इसी पीठ ने फ्लैश लाइट ऑन करके चोरी-छिपे वीडियो बना रहे एक सरकारी कर्मचारी पर ₹10,000 का जुर्माना लगाया था और उसका मोबाइल जब्त कर लिया था।
हाईकोर्ट ने चिंता जताई कि आजकल अदालती कार्यवाहियों के अनधिकृत वीडियो बनाकर, उन्हें कांट-छांट (Manipulate) करके सोशल मीडिया पर प्रसारित करने का खतरनाक चलन बढ़ रहा है, जिसे किसी भी कीमत पर बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।
मुंबई: बॉम्बे उच्च न्यायालय (मूल व अपीलीय पक्ष) नियम एवं उच्च न्यायालय की लाइव-स्ट्रीमिंग व रिकॉर्डिंग नियमावली के तहत अदालती कार्यवाहियों की अनधिकृत ऑडियो-वीडियो रिकॉर्डिंग पर स्पष्ट प्रतिबंध, न्यायालय अवमानना अधिनियम, 1971 (Contempt of Courts Act, 1971) के तहत अदालती शुचिता भंग करने के परिणाम, एडवोकेट्स एक्ट, 1961 (Advocates Act, 1961) के तहत बार काउंसिल अनुशासनिक कार्यवाही, तथा जूनियर वकीलों में पेशेवर शिष्टाचार और कोर्ट रूम प्रशिक्षण (Courtroom Training and Etiquette) की अनिवार्यता पर बॉम्बे हाईकोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है।
न्यायमूर्ति जी.एस. कुलकर्णी और न्यायमूर्ति नीला गोखले की खंडपीठ ने स्लम पुनर्विकास प्राधिकरण (SRA) परियोजना से जुड़ी याचिकाओं की सुनवाई के दौरान अदालत कक्ष की अवैध रूप से मोबाइल से वीडियो रिकॉर्डिंग करने के गंभीर कृत्य पर कड़ा संज्ञान लिया।
पीठ ने जूनियर अधिवक्ता पर ₹25,000 और उनके कक्ष के क्लर्क पर ₹10,000 का जुर्माना (लागत) लगाते हुए उक्त राशि हाईकोर्ट एम्प्लॉइज मेडिकल वेलफेयर फंड (High Court Employees Medical Welfare Fund) में दो सप्ताह के भीतर जमा करने का निर्देश दिया। इसके साथ ही अदालत ने उस मोबाइल हैंडसेट को जब्त करने, रिकॉर्ड किए गए वीडियो को स्थायी रूप से नष्ट/डिलीट करने और दोनों को भविष्य में ऐसा कदाचार न करने का बिना शर्त हलफनामा (Unconditional Undertaking) दाखिल करने का आदेश दिया।
उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायिक निष्कर्ष एवं तल्ख टिप्पणियां
1. ‘वकीलों से सबसे पहले नियमों के अनुपालन की अपेक्षा; रिकॉर्डिंग पर पूर्ण वैधानिक रोक’
न्यायमूर्ति जी.एस. कुलकर्णी और न्यायमूर्ति नीला गोखले की खंडपीठ ने वकीलों के विधिक दायित्वों को रेखांकित करते हुए आदेश में दर्ज किया: “हम वास्तव में स्तब्ध और आश्चर्यचकित हैं। इस न्यायालय के अधिवक्ता वे पहले व्यक्ति हैं जिनसे न्यायालय के नियमों का कड़ाई से पालन करने की अपेक्षा की जाती है। हम यह स्पष्ट कर दें कि उच्च न्यायालय द्वारा बनाए गए नियमों के तहत अदालत की कार्यवाहियों की रिकॉर्डिंग करने पर स्पष्ट और पूर्ण प्रतिबंध (Express Bar) है।”
2. बार काउंसिल एक्शन और अवमानना से बख्शा: ‘कनिष्ठ वकील में बुनियादी प्रशिक्षण की कमी’:
- खंडपीठ ने रेखांकित किया कि यह मामला सीधे तौर पर न्यायालय की आपराधिक अवमानना (Criminal Contempt) की कार्यवाही शुरू करने या बार काउंसिल ऑफ महाराष्ट्र एंड गोवा को संबंधित वकील के खिलाफ लाइसेंस निलंबन/अनुशासनिक जांच के निर्देश देने का था।
- तथापि, अदालत ने नरम रुख अपनाते हुए कहा:“यह एक ऐसा मामला था जहां अदालत की अवमानना की कार्यवाही शुरू की जा सकती थी, या बार काउंसिल को जूनियर वकील के खिलाफ कार्रवाई करने का निर्देश दिया जा सकता था।तथापि, न्यायालय ने ऐसा करने से परहेज किया, क्योंकि संबंधित वकील एक कनिष्ठ (Junior) है, जिसमें एक अधिवक्ता के रूप में पालन किए जाने वाले बुनियादी प्रशिक्षण और कोर्ट रूम शिष्टाचार (Basic training and etiquette) की स्पष्ट कमी प्रतीत होती है।”
3. भविष्य के लिए सख्त चेतावनी:
- पीठ ने चेतावनी दी कि यदि इस आदेश के बाद अदालत की कार्यवाहियों की गुप्त या अनधिकृत रिकॉर्डिंग का कोई भी मामला सामने आया, तो उसे अत्यंत गंभीरता से लिया जाएगा और संबंधित व्यक्ति के विरुद्ध अवमानना कानून के तहत दंडात्मक कार्यवाही की जाएगी।
मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि एवं प्रक्रियात्मक घटनाक्रम
| चरण / विवरण | तथ्यात्मक स्थिति एवं पक्षों की भूमिका |
| मूल मामला | नागेंद्र कनौजिया बनाम मुख्य कार्यकारी अधिकारी, SRA व अन्य — स्लम पुनर्वास प्राधिकरण (SRA) से संबंधित कई रिट याचिकाओं के बैच पर न्यायमूर्ति जी.एस. कुलकर्णी व न्यायमूर्ति नीला गोखले की पीठ सुनवाई कर रही थी। |
| पकड़े जाने का घटनाक्रम | अदालत के वरिष्ठतम प्रशासनिक अधिकारी, प्रॉथोनोटरी और सीनियर मास्टर ए.एच. लद्दाद (AH Laddhad) ने अदालत कक्ष के बाहर गलियारे (Corridor) से एक क्लर्क को अपने मोबाइल फोन से पीठ और अदालती कार्यवाही की वीडियो रिकॉर्डिंग करते हुए रंगे हाथों पकड़ा और तुरंत पीठ को सूचित किया। |
| क्लर्क का इकबालिया बयान | क्लर्क ने अदालत के सामने स्वीकार किया कि वह अपनी मर्जी से नहीं, बल्कि एक अन्य अधिवक्ता के चैंबर में कार्यरत एक कनिष्ठ वकील (Junior Advocate) के विशिष्ट निर्देशों पर वीडियो बना रहा था। |
| न्यायालय का आदेश | 1. क्लर्क का मोबाइल हैंडसेट तुरंत जब्त किया गया और अनधिकृत वीडियो डिलीट कराई गई। 2. जूनियर वकील पर ₹25,000 और क्लर्क पर ₹10,000 का जुर्माना लगाया गया, जिसे 2 सप्ताह में हाईकोर्ट कर्मचारी चिकित्सा कल्याण कोष में जमा करना होगा। 3. दोनों को भविष्य में ऐसा न करने का बिना शर्त वचनपत्र दाखिल करने का निर्देश। |
सोशल मीडिया पर कोर्ट वीडियोज के दुरुपयोग पर खंडपीठ की चिंता
यह आदेश उसी पीठ द्वारा हाल ही में पारित एक अन्य आदेश के तुरंत बाद आया है, जिसमें एक सरकारी कर्मचारी द्वारा अदालत कक्ष के भीतर कैमरा फ्लैश जलाकर गुप्त रूप से कार्यवाही रिकॉर्ड करते पकड़े जाने पर उस पर ₹10,000 का जुर्माना लगाया गया था और उसका फोन जब्त किया गया था।
पीठ ने अदालती कार्यवाहियों की अवैध रिकॉर्डिंग के पीछे उभरते खतरनाक रुझानों पर गहरी चिंता व्यक्त की:
- हेरफेर और सनसनीखेज प्रस्तुति (Manipulated Clips): अदालत ने रेखांकित किया कि अनधिकृत रूप से रिकॉर्ड की गई वीडियो क्लिपों को संदर्भ से काटकर (Out of context), संपादित कर या सनसनीखेज बनाकर यूट्यूब, इंस्टाग्राम और अन्य सोशल मीडिया मंचों पर वायरल किया जाता है।
- न्यायिक मर्यादा और निष्पक्षता पर आघात: लाइव-स्ट्रीमिंग नियमों के तहत केवल अदालत द्वारा अधिकृत आधिकारिक प्रसारण ही मान्य होता है। किसी भी निजी व्यक्ति, वकील या क्लर्क द्वारा अपने व्यक्तिगत मोबाइल से अदालती बहस या जजों की टिप्पणियों की रिकॉर्डिंग करना न्याय प्रशासन की गरिमा और अदालती कार्यवाही की निष्पक्षता को गंभीर रूप से कलंकित करता है।
विधिक एवं सांविधिक विश्लेषण: अदालत कक्ष में रिकॉर्डिंग पर कानूनी रोक
- लाइव-स्ट्रीमिंग और रिकॉर्डिंग नियम (Rules on Live-Streaming and Recording of Court Proceedings):
- सर्वोच्च न्यायालय द्वारा स्वप्निल त्रिपाठी बनाम सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया [(2018) 10 SCC 639] में निर्धारित सिद्धांतों के आधार पर उच्च न्यायालयों ने लाइव-स्ट्रीमिंग नियमावली बनाई है।
- इन नियमों के तहत स्पष्ट प्रावधान है कि:
- किसी भी व्यक्ति, वकील, मुवक्किल या मीडिया कर्मी को अदालत कक्ष में मोबाइल या किसी भी इलेक्ट्रॉनिक उपकरण से ऑडियो/वीडियो रिकॉर्ड करने की अनुमति नहीं है।
- आधिकारिक लाइव-स्ट्रीमिंग फुटेज को भी बिना अनुमति डाउनलोड, संपादित या व्यावसायिक लाभ के लिए प्रसारित नहीं किया जा सकता।
- न्यायालय अवमानना अधिनियम, 1971 की धारा 2(c):
- अदालत के स्पष्ट नियमों और चेतावनी के बावजूद गुप्त रूप से रिकॉर्डिंग करना ‘आपराधिक अवमानना’ है क्योंकि यह न्याय प्रशासन की गरिमा को कम करता है और न्यायिक प्रक्रिया में व्यवधान डालता है।
- वरिष्ठ अधिवक्ताओं का दायित्व और जूनियर्स का प्रशिक्षण:
- पीठ ने यह भी संकेत दिया कि चैंबर चलाने वाले वरिष्ठ अधिवक्ताओं का यह विधिक और नैतिक कर्तव्य है कि वे अपने कनिष्ठों और क्लर्कों को कोर्ट रूम एटिकेट्स और बुनियादी अदालती नियमों की अनिवार्य ट्रेनिंग दें, ताकि पेशेवर अनुशासन बना रहे।
विधिक विवरण
- केस संदर्भ: नागेंद्र कनौजिया बनाम मुख्य कार्यकारी अधिकारी, स्लम पुनर्विकास प्राधिकरण (SRA) व अन्य [रिट याचिकाओं का बैच – बॉम्बे उच्च न्यायालय]
- पीठ: न्यायमूर्ति जी.एस. कुलकर्णी और न्यायमूर्ति नीला गोखले (खंडपीठ)
- आदेश की तिथि: अक्टूबर 2026
- संबद्ध विषय: अदालत कक्ष की अनधिकृत मोबाइल वीडियो रिकॉर्डिंग, पेशेवर कदाचार एवं जुर्माना
दंडात्मक निर्देश एवं वित्तीय विवरण:
- कनिष्ठ अधिवक्ता पर जुर्माना: ₹25,000/-
- अधिवक्ता के क्लर्क पर जुर्माना: ₹10,000/-
- जमा करने का स्थान: बॉम्बे हाईकोर्ट एम्प्लॉइज मेडिकल वेलफेयर फंड (High Court Employees Medical Welfare Fund)
- अनुपालन समय-सीमा: 2 सप्ताह के भीतर
- दंडात्मक जब्ती: मोबाइल फोन की जब्ती और अनधिकृत वीडियो रिकॉर्डिंग को तत्काल डिलीट करने का आदेश
- प्रासंगिक कानून एवं विधिक प्रावधान:
- बॉम्बे उच्च न्यायालय नियम (मूल व अपीलीय पक्ष) — अदालत कक्ष आचार संहिता व रिकॉर्डिंग पर स्पष्ट रोक
- न्यायालय अवमानना अधिनियम, 1971 — धारा 2(c) (आपराधिक अवमानना) एवं धारा 14 (न्यायालय के समक्ष अवमानना प्रक्रिया)
- अधिवक्ता अधिनियम, 1961 (Advocates Act, 1961) — धारा 35 (व्यावसायिक कदाचार हेतु अनुशासनात्मक अधिकारिता)
- संबद्ध न्यायिक सिद्धांत:
- न्यायिक कक्ष की शुचिता और अनधिकृत रिकॉर्डिंग पर पूर्ण निषेध: ‘अदालत कक्ष की अनधिकृत वीडियो रिकॉर्डिंग न्यायालय के नियमों का खुला उल्लंघन है; वकीलों से नियमों के सर्वोच्च अनुपालन की अपेक्षा की जाती है; कनिष्ठ होने के नाते गंभीर अवमानना से छूट दी जा सकती है किंतु ऐसा आचरण दंडात्मक लागत और बिना शर्त माफीनामे के बिना स्वीकार्य नहीं है।’
- अंतिम परिणाम: जूनियर अधिवक्ता और क्लर्क पर कुल ₹35,000 की दंडात्मक लागत अधिरोपित; मोबाइल जब्त कर वीडियो डिलीट किया गया; भविष्य में किसी भी पुनरावृत्ति पर सख्त अवमानना कार्यवाही शुरू करने की स्पष्ट चेतावनी जारी।
Contempt of Court:मामले का संक्षिप्त विवरण (At A Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | बंबई उच्च न्यायालय (Bombay High Court) |
| पीठ | न्यायमूर्ति जी.एस. कुलकर्णी एवं न्यायमूर्ति नीला गोखले |
| मामला/विषय | झोपड़पट्टी पुनर्वसन (SRA) परियोजना से जुड़ी याचिकाओं की सुनवाई के दौरान अनधिकृत रिकॉर्डिंग |
| आरोपी | एक जूनियर वकील और उनके चैंबर का एडवोकेट क्लर्क |
| सजा व जुर्माना | 1. जूनियर वकील: ₹25,000 जुर्माना 2. क्लर्क: ₹10,000 जुर्माना 3. मोबाइल जब्त करने व वीडियो डिलीट करने का आदेश। |
| राहत | बार काउंसिल कार्रवाई और आपराधिक अवमानना (Contempt of Court) की कार्यवाही से दी गई छूट। |

