मामले की पृष्ठभूमि और पक्ष-विपक्ष की दलीलें
- क्या था मामला?मई 2026 में बिहार के खगड़िया जिले में एक पिकअप वैन से 484 लीटर कोडीन कफ सिरप जब्त किया गया था। पुलिस ने वाहन के पास खड़े भारत कुमार को गिरफ्तार कर उसके खिलाफ एनडीपीएस एक्ट की धारा 37 सहित अन्य कठोर धाराओं के तहत मामला दर्ज कर दिया।
- याचिकाकर्ता (आरोपी) की दलीलें:
- भारत कुमार के वकील विजय किशोर भारती ने तर्क दिया कि उनका मुवक्किल केवल गाड़ी के पास खड़ा था, उसका वाहन या सिरप से कोई सीधा संबंध नहीं था।
- केंद्र सरकार की 14 नवंबर 1985 की अधिसूचना के अनुसार, यदि कफ सिरप में कोडीन की सांद्रता 2.5 प्रतिशत से कम और प्रति खुराक मात्रा 100 मिलीग्राम से कम हो, तो वह एनडीपीएस अधिनियम के तहत ‘निर्मित नशीली दवा’ (Manufactured Drug) की श्रेणी से बाहर है।
- राज्य सरकार का तर्क (हिरा सिंह फैसला):राज्य सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक हिरा सिंह बनाम भारत संघ (Hira Singh v. Union of India) फैसले का हवाला देते हुए जमानत का विरोध किया, जिसमें कहा गया था कि व्यावसायिक मात्रा (Commercial Quantity) तय करते समय पूरे मिश्रण का वजन देखा जाना चाहिए, न कि केवल शुद्ध नशीले पदार्थ का।
हाईकोर्ट के मुख्य निष्कर्ष और कानूनी व्याख्या
1. “एनडीपीएस का प्रयोग पुलिस की सरासर मनमानी”:
न्यायामूर्ति अशोक कुमार पांडेय ने पुलिस के रवैये पर कड़ा प्रहार करते हुए कहा: “कोडीन युक्त कफ सिरप केवल एक शेड्यूल H दवा है, जिसके लिए दुकानदार को लाइसेंस रखना होता है और एक रजिस्टर बनाए रखना होता है। इस प्रकार के मामलों को ड्रग्स एंड कॉस्मेटिक्स एक्ट के तहत दर्ज किया जाना चाहिए। यह केवल ड्रग्स एंड कॉस्मेटिक्स एक्ट का उल्लंघन है, जबकि पुलिस लगातार एनडीपीएस प्रक्रिया का दुरुपयोग कर रही है।”
2. ‘व्यावसायिक मात्रा’ का सवाल ही नहीं उठता:
- कोर्ट ने माना कि जब कोई निर्मित दवा केंद्र सरकार की 1985 की अधिसूचना के तहत नशीली दवा (Contraband) की परिभाषा में ही नहीं आती, तो उसमें यह तय करने का प्रश्न ही नहीं उठता कि जब्त की गई मात्रा व्यावसायिक है या नहीं। इसलिए एनडीपीएस की धारा 37 (जिसके तहत जमानत पाना बेहद कठिन होता है) इस मामले में लागू ही नहीं होती।
पटना: स्वापक औषधि और मनःप्रभावी पदार्थ अधिनियम, 1985 (NDPS Act, 1985) की धारा 2(xi) (निर्मित मादक औषधि की परिभाषा व केंद्र सरकार की छूट अधिसूचनाएं), धारा 8, 21 एवं धारा 37 (व्यावसायिक मात्रा में जमानत की कठोर शर्तें), केंद्र सरकार की अधिसूचना दिनांक 14 नवंबर 1985 (प्रविष्टि संख्या 35 – कोडीन की 2.5% या 100 मिग्रा प्रति खुराक से कम सांद्रता वाली चिकित्सकीय तैयारियों को NDPS से बाहर रखना), औषधि एवं प्रसाधन सामग्री अधिनियम, 1940 (Drugs and Cosmetics Act, 1940) के शेड्यूल H (पर्चे पर बिकने वाली दवाएं व लाइसेंसिंग शर्तें), तथा सुप्रीम कोर्ट के हीरा सिंह फैसले की प्रयोज्यता की सीमाओं पर पटना उच्च न्यायालय ने बिहार पुलिस की कार्यप्रणाली की कड़ी खिंचाई करते हुए एक महत्वपूर्ण विधिक निर्णय सुनाया है।
न्यायमूर्ति अशोक कुमार पांडे की एकल पीठ ने खगड़िया जिले में एक पिक-अप वैन से 484 लीटर कोडीन-युक्त कफ सिरप बरामद होने के मामले में मई 2026 से जेल में बंद आरोपी भरत कुमार की नियमित जमानत याचिका स्वीकार करते हुए उसे रिहा करने का आदेश दिया।
उच्च न्यायालय ने अपने 1 अक्टूबर 2026 के आदेश में स्पष्ट व्यवस्था दी कि पुलिस द्वारा कोडीन-आधारित कफ सिरप मिलने पर आंख मूंदकर सीधे कठोर एनडीपीएस कानून की धाराएं लगा देना कानून की प्रक्रिया का स्पष्ट दुरुपयोग (Abuse of Procedure) है। अदालत ने कहा कि जब किसी चिकित्सकीय कफ सिरप में कोडीन की सांद्रता केंद्र सरकार द्वारा 1985 में अधिसूचित 2.5% की सीमा से कम हो, तो वह पदार्थ ‘मादक पदार्थ’ (Contraband) की श्रेणी में आता ही नहीं; अतः ऐसा मामला केवल औषधि एवं प्रसाधन सामग्री अधिनियम के तहत लाइसेंस और रजिस्टर के उल्लंघन का बनता है।
उच्च न्यायालय के मुख्य कानूनी निष्कर्ष एवं विधिक व्यवस्था
1. ‘कोडीन कफ सिरप शेड्यूल H दवा है; सीधे NDPS लगाना कानूनी प्रक्रिया का दुरुपयोग’
न्यायमूर्ति अशोक कुमार पांडे ने पुलिस द्वारा औषधि मामलों में सीधे एनडीपीएस कानून थोपने की प्रवृत्ति पर सख्त टिप्पणी करते हुए दर्ज किया: “कोडीन युक्त कफ सिरप केवल एक शेड्यूल H (Schedule H) दवा है, जिसके लिए दुकानदार को केवल एक रजिस्टर संधारित करना होता है और उसके पास वैध लाइसेंस होना चाहिए।
इस प्रकार के मामलों को औषधि एवं प्रसाधन सामग्री अधिनियम (Drugs and Cosmetics Act) के तहत दर्ज किया जाना चाहिए। यह केवल औषधि एवं प्रसाधन सामग्री अधिनियम का उल्लंघन है, जबकि पुलिस लगातार और अनिवार्य रूप से कानूनी प्रक्रिया का दुरुपयोग (Invariably misusing the procedure) कर रही है।”
2. ‘जब पदार्थ ही मादक द्रव्य नहीं, तो “व्यावसायिक मात्रा” (Commercial Quantity) का प्रश्न ही नहीं उठता’:
- राज्य की ओर से अपर लोक अभियोजक (APP) ने जमानत का विरोध करते हुए सर्वोच्च न्यायालय के बहुचर्चित संविधान पीठ के निर्णय हीरा सिंह बनाम भारत संघ [(2020) 20 SCC 272] का हवाला दिया। राज्य का तर्क था कि हीरा सिंह के अनुसार यदि किसी मिश्रण में थोड़ा भी नशीला पदार्थ मौजूद हो, तो पूरे मिश्रण (यहाँ 484 लीटर) के वजन को व्यावसायिक मात्रा माना जाएगा, जिससे NDPS की धारा 37 के तहत जमानत प्रतिबंधित हो जाती है।
- अदालत ने इस तर्क में अंतर्निहित प्रक्रियात्मक त्रुटि को उजागर करते हुए स्पष्ट किया:“जहाँ दवा की तैयारी स्वयं NDPS अधिनियम के तहत ‘मादक औषधि’ (Narcotic Drug) के रूप में अर्हता प्राप्त नहीं करती है, वहाँ बरामद पदार्थ के ‘व्यावसायिक मात्रा’ होने या न होने का निर्धारण करने का प्रश्न ही पैदा नहीं होता।”
- अदालत ने माना कि हीरा सिंह का फैसला केवल उन पदार्थों पर लागू होता है जो मूल रूप से NDPS एक्ट के तहत ‘कंट्राबैंड’ घोषित हैं। यदि कोई दवा केंद्र सरकार की 1985 की अधिसूचना द्वारा एनडीपीएस के दायरे से ही बाहर रखी गई है, तो उस पर हीरा सिंह के सिद्धांत को लागू करके एनडीपीएस की धारा 37 की कठोरता नहीं थोपी जा सकती।
3. 14 नवंबर 1985 की केंद्रीय अधिसूचना और 2.5% सांद्रता की विधिक छूट:
- अदालत ने आदेश के अंतिम पैराग्राफ में निष्कर्ष दर्ज किया:“निर्णय समाप्त करने से पूर्व, यह अत्यंत विचित्र (Very Strange) है कि जिन मामलों में कोडीन युक्त कफ सिरप बरामद होते हैं, पुलिस बिना सोचे-समझे NDPS एक्ट के तहत मुकदमे दर्ज कर रही है, जबकि केंद्र सरकार की उपरोक्त अधिसूचना के मद्देनजर कोडीन की सांद्रता 2.5% से कम होने के कारण यह मात्रा प्रतिबंधित मादक पदार्थ (Contraband) के दायरे में नहीं आती है।”
मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि एवं प्रक्रियात्मक कालक्रम
| चरण / विवरण | तथ्यात्मक स्थिति एवं पक्षों की विधिक दलीलें |
| घटना एवं प्राथमिकी | मई 2026 में बिहार के खगड़िया जिले में पुलिस ने एक पिक-अप वैन को रोका, जिसकी तलाशी लेने पर कुल 484 लीटर कोडीन-आधारित कफ सिरप की बोतलें बरामद हुईं। पुलिस ने सीधे NDPS एक्ट की धारा 21(c)/22(c) के तहत प्राथमिकी दर्ज की। |
| अभियुक्त भरत कुमार की स्थिति | कुमार को मौके से हिरासत में लिया गया। बचाव पक्ष का कहना था कि वह केवल सड़क किनारे गाड़ी के पास खड़ा था; न तो वह गाड़ी का चालक/मालिक था और न ही उसके पास से कोई नशीला पदार्थ व्यक्तिगत रूप से बरामद हुआ। |
| बचाव पक्ष के तर्क (अधिवक्ता विजय किशोर भारती) | 1. अभियुक्त का कोई आपराधिक इतिहास (No Criminal Antecedents) नहीं है। 2. एक समान स्थिति वाले सह-आरोपी को अदालत पहले ही जमानत दे चुकी है। 3. 14 नवंबर 1985 की केंद्रीय अधिसूचना के तहत 2.5% से कम कोडीन वाली दवाएं ‘निर्मित ड्रग’ (Manufactured Drug) की परिभाषा से बाहर हैं। यह केवल ड्रग्स एंड कॉस्मेटिक्स एक्ट के तहत अनधिकृत भंडारण का मामला बनता है, NDPS का नहीं। |
| राज्य का विरोध (APP सुरेंद्र प्रसाद सिंह) | 484 लीटर एक भारी व्यावसायिक मात्रा है। हीरा सिंह फैसले के अनुसार पूरे सिरप का वजन गिना जाएगा, जिससे धारा 37 की दोहरी शर्तें लागू होती हैं और जमानत नहीं दी जा सकती। |
| हाईकोर्ट का अंतिम निर्णय | राज्य की दलीलें खारिज। कोडीन सिरप NDPS के तहत मादक द्रव्य नहीं है। भरत कुमार को नियमित जमानत पर रिहा करने का आदेश। |
विधिक एवं सांविधिक विश्लेषण: 1985 की अधिसूचना बनाम NDPS की धारा 37
- 14 नवंबर 1985 की केंद्रीय अधिसूचना (SO 826(E)) की प्रविष्टि 35:
- केंद्र सरकार ने NDPS अधिनियम की धारा 2(xi)(b) के तहत अपनी शक्तियों का प्रयोग करते हुए यह अधिसूचना जारी की थी।
- इसके तहत ऐसे सभी मिथाइल मॉर्फिन (कोडीन) युक्त मिश्रणों को ‘निर्मित नशीली दवा’ (Manufactured Drug) की परिभाषा से छूट दी गई है, जिनमें:
- अन्य सामग्रियों के साथ मिश्रित होने पर कोडीन की मात्रा प्रति खुराक इकाई (Dosage Unit) 100 मिलीग्राम से अधिक न हो; और
- पूरे घोल में कोडीन की सांद्रता 2.5% से अधिक न हो; तथा उसका चिकित्सीय उपयोग (Therapeutic Use) स्थापित हो।
- चूंकि अधिकांश कफ सिरप (जैसे फेंसिडिल, कोरेक्स आदि) में कोडीन फॉस्फेट की मात्रा प्रति 5 मिलीलीटर में मात्र 10 मिलीग्राम (लगभग 0.2%) होती है, इसलिए वे इस 2.5% की सीमा के काफी नीचे रहते हैं।
- शेड्यूल H और औषधि कानून का उल्लंघन:
- यदि कोई व्यक्ति बिना मेडिकल लाइसेंस, थोक परमिट या वैध डॉक्टर के पर्चे के ऐसी दवाओं का बड़ा जखीरा ले जा रहा है, तो वह औषधि एवं प्रसाधन सामग्री अधिनियम, 1940 की धारा 18 और धारा 27 के तहत गैर-लाइसेंसी दवा भंडारण व वितरण का दोषी है।
- ड्रग्स एक्ट के तहत ऐसे अपराधों में दंड का प्रावधान अलग है और यह एक नियमित विधिक प्रक्रिया है। पुलिस द्वारा इसे सीधे अंतरराष्ट्रीय मादक तस्करी जैसा रूप देकर NDPS कानून थोपना कानून की मंशा को विकृत करना है।
- इलाहाबाद हाईकोर्ट व अन्य अदालतों की समवर्ती नजीरें:
- इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने विभोर राणा बनाम असम राज्य (2021) और अशोक कुमार बनाम यूपी राज्य (2022) में भी यही दोहराया था कि जब तक रासायनिक विश्लेषण (FSL रिपोर्ट) यह न दिखा दे कि सिरप में कोडीन की सांद्रता 2.5% से अधिक थी या उसमें शुद्ध कोडीन अलग से मिलाई गई थी, तब तक NDPS एक्ट लागू नहीं किया जा सकता।
विधिक विवरण एवं उपस्थित अधिवक्ता
- केस संदर्भ: भरत कुमार बनाम बिहार राज्य [आपराधिक विविध (जमानत) याचिका – पटना उच्च न्यायालय]
- पीठ: न्यायमूर्ति अशोक कुमार पांडे (एकल पीठ)
- आदेश की तिथि: 1 अक्टूबर 2026
- संबद्ध जिला: खगड़िया, बिहार (संबंधित थाना क्षेत्र – 484 लीटर कोडीन कफ सिरप जब्ती)
विधिक प्रतिनिधित्व:
- जमानत याचिकाकर्ता की ओर से: अधिवक्ता विजय किशोर भारती (Advocate Vijay Kishore Bharti)
- बिहार राज्य (अभियोजन) की ओर से: अपर लोक अभियोजक (Additional Public Prosecutor) सुरेंद्र प्रसाद सिंह
- प्रासंगिक कानून एवं विधिक प्रावधान:
- स्वापक औषधि और मनःप्रभावी पदार्थ अधिनियम, 1985 (NDPS Act) — धारा 2(xi) (निर्मित नशीली दवा), धारा 8, 21 एवं धारा 37 (जमानत पर कठोर प्रतिबंध)
- केंद्रीय राजस्व विभाग अधिसूचना दिनांक 14 नवंबर 1985 (SO 826(E)) — प्रविष्टि संख्या 35 (2.5% से कम कोडीन वाली चिकित्सकीय दवाओं को छूट)
- औषधि एवं प्रसाधन सामग्री अधिनियम, 1940 — धारा 18, 27 एवं औषधि नियम, 1945 का शेड्यूल H
- भारत का संविधान — अनुच्छेद 21 (व्यक्तिगत स्वतंत्रता व विधि द्वारा स्थापित निष्पक्ष प्रक्रिया)
- संबद्ध न्यायिक सिद्धांत:
- चिकित्सीय कोडीन सिरप और NDPS का अनुचित प्रयोग: ‘यदि किसी कफ सिरप में कोडीन की सांद्रता 1985 की अधिसूचना के तहत 2.5% से कम है, तो वह NDPS अधिनियम के तहत मादक पदार्थ नहीं बनता; ऐसी बरामदगी केवल औषधि एवं प्रसाधन सामग्री अधिनियम के तहत जांच का विषय है, और पुलिस द्वारा ऐसे मामलों में NDPS एक्ट लगाना प्रक्रियात्मक कानून का दुरुपयोग है।’
- अंतिम परिणाम: नियमित जमानत याचिका स्वीकार; याचिकाकर्ता भरत कुमार को ट्रायल कोर्ट की संतुष्टि के अनुसार जमानत बंधपत्र प्रस्तुत करने पर तुरंत नियमित जमानत पर रिहा करने का आदेश।
NDPS Act: मामले का संक्षिप्त विवरण (At A Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | पटना उच्च न्यायालय (Patna High Court) |
| न्यायाधीश | न्यायमूर्ति अशोक कुमार पांडेय |
| याचिकाकर्ता | भारत कुमार (खगड़िया जिला, बिहार) |
| बरामदगी | पिकअप वैन से 484 लीटर कोडीन-आधारित कफ सिरप |
| केंद्र सरकार की अधिसूचना | 14 नवंबर 1985 की अधिसूचना: 2.5% से कम कोडीन सांद्रता और प्रति खुराक 100mg से कम मात्रा होने पर वह NDPS के तहत प्रतिबंधित दवा (Contraband) नहीं मानी जाएगी। |
| कोर्ट का मुख्य निष्कर्ष | 1. कोडीन कफ सिरप एक शिड्यूल H दवा (Schedule H Drug) है। इसका बिना लाइसेंस या बिना रजिस्टर रखरखाव के बेचना केवल ‘ड्रग्स एंड कॉस्मेटिक्स एक्ट’ का उल्लंघन है। 2. पुलिस द्वारा एनडीपीएस एक्ट की धाराओं का इस्तेमाल प्रक्रिया का सीधा दुरुपयोग है। |
| अदालत का अंतिम आदेश | आरोपी को जमानत मंजूर; पुलिस की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े किए। |

