मामले की पृष्ठभूमि: क्या था पूरा विवाद?
- आवेदन और प्रशासन द्वारा अस्वीकृति:याचिकाकर्ता ए. सत्यनारायण स्वामी ने 2021 के नियमों के नियम 8(3) के तहत एक आवेदन देकर अपनी अपील की सुनवाई से जुड़ी अर्काइव रिकॉर्डिंग मांगी थी। हालांकि, हाईकोर्ट प्रशासन ने नियम 10(1)(ii) का हवाला देते हुए उनके आवेदन को यह कहकर खारिज कर दिया कि अर्काइव डेटा तब तक अदालत का आधिकारिक रिकॉर्ड नहीं बनता जब तक कि संबंधित पीठ ऐसा आदेश न दे।
- हाईकोर्ट में चुनौती:प्रशासनिक निर्णय से व्यथित होकर स्वामी ने हाईकोर्ट का रुख किया। उन्होंने तर्क दिया कि नियम 8(3) उन रिकॉर्डिंग की प्रतियां मांगने की अनुमति देता है जो वेबसाइट पर अपलोड नहीं की गई हैं। उन्होंने यह भी तर्क दिया कि इस अस्वीकृति से उनके संवैधानिक अधिकार (अनुच्छेद 14 – समानता का अधिकार) का हनन हुआ है और इस प्रक्रिया के लिए स्पष्ट एसओपी (SOP) बनाने की मांग की।
हाईकोर्ट के मुख्य निष्कर्ष और कानूनी तर्क
1. नियम 8 और नियम 10 का संयुक्त अध्ययन:
न्यायमूर्ति सी.एम. पूनाचा ने ‘कर्नाटक लाइव स्ट्रीमिंग और कार्यवाही की रिकॉर्डिंग नियम, 2021’ के नियम 8 और 10 का अध्ययन करने के बाद माना: “नियम 8 और नियम 10 के संयुक्त वाचन से यह स्पष्ट है कि ये नियम याचिकाकर्ता को रिकॉर्डिंग की प्रतियां मांगने का कोई अधिकार प्रदान नहीं करते हैं, जब तक कि अदालत द्वारा विशेष रूप से ऐसा आदेश न दिया गया हो।”
2. अर्काइव डेटा की कानूनी स्थिति:
- कोर्ट ने नियम 10(1)(ii) का उल्लेख किया, जो स्पष्ट करता है: “जब तक पीठ द्वारा अन्यथा निर्देश न दिया जाए, अर्काइव डेटा अदालत की कार्यवाही का आधिकारिक रिकॉर्ड गठित नहीं करेगा।”
3. याचिका खारिज:
- अदालत ने माना कि जब कानून के तहत याचिकाकर्ता में कोई अधिकार ही निहित नहीं है, तो प्रशासनिक अस्वीकृति को चुनौती देने या उस पर सवाल उठाने का कोई आधार नहीं बनता।
बेंगलुरु: कर्नाटक उच्च न्यायालय (अदालती कार्यवाहियों की लाइव स्ट्रीमिंग और रिकॉर्डिंग) नियम, 2021 के नियम 8 (रिकॉर्डिंग और प्रतियों के लिए आवेदन) सहपठित नियम 10(1)(ii) (अर्काइवल डेटा का विधिक स्वरूप व आधिकारिक रिकॉर्ड न होना), भारत का संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार व मनमानी के विरुद्ध संरक्षण), अनुच्छेद 226 (रिट क्षेत्राधिकार की सीमाएं), तथा खुली अदालत में सुनवाई के सिद्धांत बनाम ऑडियो-विजुअल रिकॉर्डिंग के अनियंत्रित वितरण पर कर्नाटक हाईकोर्ट ने एक अत्यंत महत्वपूर्ण एवं प्रक्रियात्मक फैसला सुनाया है।
कर्नाटक हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति सी.एम. पूनाचा (Justice CM Poonacha) की एकल पीठ ने 72 वर्षीय वादी ए. सत्यनारायण स्वामी द्वारा दायर रिट याचिका को पूरी तरह खारिज कर दिया। याचिकाकर्ता ने उच्च न्यायालय प्रशासन (रजिस्ट्री) के उस प्रशासनिक आदेश को चुनौती दी थी, जिसके द्वारा उनकी एक अपीलीय मामले की अदालती कार्यवाही की आर्काइव की गई ऑडियो-वीडियो रिकॉर्डिंग की प्रतियां मांगने वाले आवेदन को निरस्त कर दिया गया था।
न्यायमूर्ति पूनाचा ने स्पष्ट विधिक व्यवस्था दी कि वर्ष 2021 के नियमों के नियम 8 और नियम 10 का संयुक्त अध्ययन यह सिद्ध करता है कि जब तक संबंधित पीठ (Concerned Bench) द्वारा स्पष्ट रूप से कोई विशिष्ट न्यायिक निर्देश (Specific Judicial Order) पारित न किया गया हो, तब तक किसी भी वादी के पास आर्काइव रिकॉर्डिंग की प्रतियां प्राप्त करने का कोई लागू करने योग्य विधिक अधिकार (Enforceable Right) नहीं है।
उच्च न्यायालय के मुख्य कानूनी निष्कर्ष एवं विधिक व्यवस्था
1. ‘नियम 8 और 10 के संयुक्त पठन से स्पष्ट: न्यायिक आदेश के बिना कोई अंतर्निहित अधिकार नहीं’
न्यायमूर्ति सी.एम. पूनाचा ने 2021 की नियमावली के वैधानिक ढांचे का विश्लेषण करते हुए निर्णय में दर्ज किया: “नियम 8 और नियम 10 के संयुक्त पठन से यह पूरी तरह स्पष्ट है कि ये नियम किसी भी प्रकार से याचिकाकर्ता को उक्त रिकॉर्डिंग की प्रतियां मांगने का कोई अधिकार प्रदान नहीं करते हैं, जब तक कि न्यायालय (पीठ) द्वारा इसके लिए विशेष रूप से कोई आदेश न दिया गया हो। याचिकाकर्ता में किसी भी प्रकार का विधिक अधिकार निहित न होने की स्थिति में, प्रतियों के उसके अनुरोध की अस्वीकृति को चुनौती देने का प्रश्न ही उत्पन्न नहीं होता।”
2. ‘नियम 10(1)(ii): अर्काइव डेटा अदालत की आधिकारिक कार्यवाही का हिस्सा नहीं’:
- उच्च न्यायालय प्रशासन ने आवेदन खारिज करने के लिए नियम 10(1)(ii) पर भरोसा किया था, जो स्पष्ट रूप से प्रावधान करता है:“आर्काइवल डेटा (Archival Data) अदालत की कार्यवाही का आधिकारिक रिकॉर्ड (Official Record of the Court Proceedings) नहीं माना जाएगा, जब तक कि संबंधित पीठ द्वारा अन्यथा निर्देशित न किया गया हो।”
- अदालत ने माना कि चूंकि न्यायिक पीठ ने उक्त रिकॉर्डिंग को मामले के ‘आधिकारिक न्यायिक रिकॉर्ड’ का हिस्सा बनाने का कोई विशिष्ट आदेश पारित नहीं किया था, इसलिए रजिस्ट्री द्वारा रिकॉर्डिंग की आपूर्ति से इनकार करना पूरी तरह कानून सम्मत था।
3. अनुच्छेद 14 के उल्लंघन और SOP की मांग खारिज:
- याचिकाकर्ता ने तर्क दिया था कि प्रतियों से इनकार करना अनुच्छेद 14 के तहत मनमाना है और अदालत को नियम 8(3) के तहत शक्तियों के प्रयोग के लिए स्पष्ट दिशानिर्देश या ‘मानक संचालन प्रक्रिया’ (SOP) बनाने का निर्देश देना चाहिए।
- अदालत ने इस मांग को अस्वीकार करते हुए स्पष्ट किया कि जब मूल नियम ही न्यायिक पीठ के अनन्य विवेक पर निर्भर हैं, तो प्रशासन पर किसी सामान्य अधिकार के तहत प्रतियों की आपूर्ति की बाध्यता नहीं डाली जा सकती।
मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि एवं प्रक्रियात्मक कालक्रम
| चरण / विवरण | तथ्यात्मक स्थिति एवं पक्षों के तर्क |
|---|---|
| याचिकाकर्ता | ए. सत्यनारायण स्वामी (उम्र 72 वर्ष) — कर्नाटक उच्च न्यायालय में लंबित एक अपील के पक्षकार। |
| विवादित आवेदन | स्वामी ने कर्नाटक कोर्ट लाइव स्ट्रीमिंग व रिकॉर्डिंग नियम, 2021 के नियम 8(3) के तहत आवेदन देकर अपनी अपील की सुनवाई की संग्रहीत (Archived) ऑडियो-विजुअल रिकॉर्डिंग की प्रमाणित प्रतियां मांगी थीं। |
| प्रशासन (रजिस्ट्री) का निर्णय | उच्च न्यायालय प्रशासन ने आवेदन यह कहते हुए खारिज कर दिया कि नियम 10(1)(ii) के तहत अर्काइव डेटा अदालत की कार्यवाही का आधिकारिक हिस्सा नहीं होता, जब तक कि पीठासीन पीठ द्वारा ऐसा घोषित न किया गया हो। |
| याचिकाकर्ता के तर्क (अधिवक्ता गिरीश हेगड़े) | 1. नियम 8(3) उन सभी रिकॉर्डिंग्स की प्रतियां मांगने का सीधा अधिकार देता है जो सार्वजनिक वेबसाइट पर अपलोड नहीं हैं। 2. बिना कारण आवेदन खारिज करना संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन है। 3. अदालत को इस संबंध में स्पष्ट SOP और पारदर्शी दिशानिर्देश जारी करने चाहिए। |
| हाईकोर्ट का अंतिम निर्णय | याचिका खारिज; नियम 8 केवल आवेदन की प्रक्रिया है, अधिकार नहीं। बिना न्यायिक पीठ के आदेश के कोई भी वादी अर्काइव फुटेज की मांग नहीं कर सकता। |
विधिक एवं सांविधिक विश्लेषण: 2021 की लाइव-स्ट्रीमिंग नियमावली का ढांचा
- नियम 8(3) बनाम नियम 10(1)(ii) का सामंजस्यपूर्ण निर्माण (Harmonious Construction):
- नियम 8(3) एक प्रक्रियात्मक व्यवस्था है जो यह तय करती है कि यदि किसी मामले में रिकॉर्डिंग मांगी जाती है तो प्रक्रिया क्या होगी।
- किंतु नियम 10(1)(ii) एक सारभूत विधिक सीमा (Substantive Legal Bar) लगाता है। यह घोषित करता है कि डिजिटल वीडियो/ऑडियो फाइलें मूल न्यायिक आदेश-पत्रिकाओं (Order Sheets) का स्थान नहीं ले सकतीं।
- इसलिए, जब तक संबंधित पीठ गुण-दोष के आधार पर यह तय न कर दे कि रिकॉर्डिंग न्यायहित में पक्षकार को दी जानी चाहिए, तब तक रजिस्ट्री अपने स्तर पर इसे जारी नहीं कर सकती।
- सोशल मीडिया पर दुरुपयोग और न्यायिक शुचिता की सुरक्षा:
- सुप्रीम कोर्ट द्वारा स्वप्निल त्रिपाठी बनाम भारत संघ [(2018) 10 SCC 639] में निर्धारित मार्गदर्शक सिद्धांतों के तहत सभी उच्च न्यायालयों ने यह सुनिश्चित किया है कि अदालती रिकॉर्डिंग को अनियंत्रित रूप से जनता या वादियों के हाथों में न सौंपा जाए।
- यदि प्रत्येक वादी को अपने मामले की वीडियो रिकॉर्डिंग लेने का निरपेक्ष अधिकार दे दिया जाएगा, तो उसका उपयोग जजों के मौखिक संवादों को संदर्भ से काटकर सोशल मीडिया पर प्रसारित करने, न्यायिक गरिमा को प्रभावित करने या वकीलों-गवाहों पर अनुचित दबाव बनाने के लिए किया जा सकता है।
विधिक विवरण
- केस संदर्भ: ए. सत्यनारायण स्वामी बनाम रजिस्ट्रार जनरल, कर्नाटक उच्च न्यायालय [रिट याचिका – कर्नाटक उच्च न्यायालय]
- पीठ: न्यायमूर्ति सी.एम. पूनाचा (एकल पीठ)
- निर्णय की तिथि: अक्टूबर 2026
- संबद्ध विषय: अदालती कार्यवाही की अर्काइव वीडियो रिकॉर्डिंग की मांग, नियम 8 व 10 की व्याख्या एवं अनुच्छेद 14
विधिक प्रतिनिधित्व:
- याचिकाकर्ता की ओर से: अधिवक्ता गिरीश हेगड़े (Advocate Girish Hegde)
- प्रतिवादी की ओर से: उच्च न्यायालय प्रशासन / रजिस्ट्रार जनरल
- प्रासंगिक कानून एवं सांविधिक प्रावधान:
- कर्नाटक उच्च न्यायालय (अदालती कार्यवाहियों की लाइव स्ट्रीमिंग और रिकॉर्डिंग) नियम, 2021 — नियम 8(3) (रिकॉर्डिंग की प्रतियों हेतु आवेदन) एवं नियम 10(1)(ii) (अर्काइवल डेटा का विधिक स्तर)
- भारत का संविधान — अनुच्छेद 14 (विधि के समक्ष समता) एवं अनुच्छेद 226 (उच्च न्यायालय का असाधारण रिट क्षेत्राधिकार)
- संबद्ध न्यायिक सिद्धांत:
- डिजिटल अदालती रिकॉर्ड की सीमित पहुंच और न्यायिक विवेक की सर्वोच्चता: ‘अदालती कार्यवाहियों की लाइव-स्ट्रीमिंग या अर्काइव रिकॉर्डिंग वादकारी का कोई निरपेक्ष विधिक अधिकार नहीं बनाती; नियम 10(1)(ii) के अनुसार डिजिटल फुटेज स्वतः आधिकारिक रिकॉर्ड नहीं है; जब तक न्यायिक पीठ स्वयं किसी ठोस आधार पर रिकॉर्डिंग देने का विशिष्ट आदेश पारित न करे, तब तक रजिस्ट्री द्वारा प्रतियों की मांग को अस्वीकार करना पूरी तरह विधि सम्मत है।’
- अंतिम परिणाम: रिट याचिका गुण-दोष के अभाव में खारिज; उच्च न्यायालय प्रशासन द्वारा रिकॉर्डिंग देने से इनकार करने का निर्णय वैध और न्यायसंगत ठहराया गया।
Archived Recording: मामले का संक्षिप्त विवरण (At A Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | कर्नाटक उच्च न्यायालय (Karnataka High Court) |
| न्यायाधीश | न्यायमूर्ति सी.एम. पूनाचा |
| याचिकाकर्ता | ए. सत्यनारायण स्वामी (72 वर्षीय बुजुर्ग) |
| मूल मांग | अपने मामले की सुनवाई की अर्काइव (सहेजी गई) वीडियो रिकॉर्डिंग की प्रति प्राप्त करना। |
| संबंधित नियम | कर्नाटक लाइव स्ट्रीमिंग और कार्यवाही की रिकॉर्डिंग नियम, 2021 (नियम 8 और नियम 10) |
| हाईकोर्ट का अंतिम फैसला | याचिका खारिज; जब तक पीठ (Bench) खुद रिकॉर्डिंग को आधिकारिक रिकॉर्ड का हिस्सा बनाने का आदेश न दे, तब तक कोई भी पक्षकार इसे अधिकार के रूप में नहीं मांग सकता। |

