Friday, October 23, 2026
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Lok Adalat Award: लाभ उठाने के बाद मुकरना कानूनन वर्जित; लोक अदालत के अवॉर्ड को धोखाधड़ी बताकर चुनौती नहीं दी जा सकती

मामले की पृष्ठभूमि: क्या था पूरा विवाद?

  1. 2011 का सौदा और लोक अदालत का आदेश:वर्ष 2011 में एम. गंगा राजू (पावर ऑफ अटॉर्नी धारक) ने ₹1 करोड़ में 4 एकड़ जमीन बेचने का समझौता किया था और अग्रिम राशि के रूप में ₹85 लाख प्राप्त किए। वर्ष 2013 में कुकटपल्ली स्थित लोक अदालत ने दोनों पक्षों की सहमति दर्ज करते हुए अवार्ड जारी किया, जिसमें तय हुआ कि शेष ₹15 लाख की राशि बैनामे (Sale Deed) के पंजीकरण के समय दी जाएगी।
  2. पैसा प्राप्त करने के बाद विवाद दर्ज कराना:2014 में गंगा राजू के निधन के बाद, उनकी पत्नी और बेटी ने अप्रैल से सितंबर 2015 के बीच ₹30 लाख की अतिरिक्त राशि ‘बिक्री प्रतिफल’ (Part Sale Consideration) के रूप में प्राप्त की। हालांकि, सिविल कोर्ट में मामले हारने के बाद 2023-24 में (लगभग 10 साल बाद) उन्होंने अनुच्छेद 226 के तहत हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया और दावा किया कि लोक अदालत का फैसला धोखाधड़ी पर आधारित था।

हाईकोर्ट के मुख्य निष्कर्ष और कानूनी तर्क

1. “अनुबंध का लाभ उठाने के बाद उससे पीछे हटना गैर-कानूनी”:

पीठ ने अपने आदेश में सख्त टिप्पणी की: “किसी सौदे का लाभ उठाना और बाद में पलटकर उसकी वैधता को नकारना कानूनी रूप से अस्वीकार्य है। यह विशेष रूप से तब लागू होता है जब कोई पक्ष अनुबंध के एक बड़े हिस्से का आनंद लेता है और उसका लाभ मिलने के बाद दूसरे हिस्से पर सवाल उठाता है।”

2. पूर्व समझौता डीड (Memorandum of Settlement) की अनिवार्यता नहीं:

  • अदालत ने कानूनी सेवा प्राधिकरण अधिनियम, 1987 (Legal Services Authorities Act, 1987) का हवाला देते हुए स्पष्ट किया कि लोक अदालत का रुख करने से पहले पक्षों के बीच अलग से लिखित समझौता ज्ञापन निष्पादित करना अनिवार्य नहीं है।

3. आर्थिक क्षेत्राधिकार (Pecuniary Jurisdiction) पर देर से उठाई गई आपत्ति:

  • हाईकोर्ट ने नोट किया कि याचिकाकर्ताओं ने 10 साल बाद याचिका दायर की और आर्थिक क्षेत्राधिकार से जुड़ी आपत्ति याचिका में नहीं, बल्कि 13 अगस्त 2026 को बहस समाप्त होने के बाद अपने रिजॉइंडर (Rejoinder) में पहली बार उठाई, जिसे स्वीकार नहीं किया जा सकता।

हैदराबाद: विधिक सेवा प्राधिकरण अधिनियम, 1987 (Legal Services Authorities Act, 1987) की धारा 21 एवं 22E (लोक अदालत के अवॉर्ड की अंतिमता व सिविल कोर्ट की डिक्री के समान प्रवर्तनीयता), स्वीकृति एवं अनुमोदन का सिद्धांत (Doctrine of Approbate and Reprobate / Estoppel by Conduct), सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (CPC) का आदेश VI नियम 4 (धोखाधड़ी के आरोपों में ठोस तथ्यों और ब्योरे की अनिवार्यता), तथा 10 वर्ष के अत्यधिक विलंब के बाद धन प्रतिफल अपने पास रखते हुए धन-संबंधी क्षेत्राधिकार (Pecuniary Jurisdiction) पर आपत्ति उठाने की विधिक अमान्यता पर तेलंगाना उच्च न्यायालय ने एक अत्यंत महत्वपूर्ण निर्णय सुनाया है।

न्यायमूर्ति मौशमी भट्टाचार्य और न्यायमूर्ति रेणुका यारा की खंडपीठ ने 2013 में कुकटपल्ली स्थित लोक अदालत द्वारा पारित अवॉर्ड को रद्द करने की मांग वाली रिट याचिका को खारिज कर दिया। यह विवाद रंगारेड्डी जिले के रायदुर्ग नवा खालसा गांव में स्थित 4 एकड़ की बेशकीमती भूमि से संबंधित था।

अदालत ने स्पष्ट व्यवस्था दी कि कोई भी पक्षकार किसी समझौते या लेन-देन का लाभ उठाकर और उसकी प्रतिफल राशि का उपभोग करने के बाद बाद में मुकर कर (Turn around) उसकी वैधता पर सवाल नहीं उठा सकता। बिक्री प्रतिफल की राशि स्वीकार करना और उसे अपने पास बनाए रखना धोखाधड़ी के किसी भी आरोप को पूरी तरह निष्प्रभावी कर देता है।

उच्च न्यायालय के मुख्य कानूनी निष्कर्ष एवं विधिक व्यवस्था

1. ‘लेन-देन का लाभ उठाकर बाद में उसकी वैधता को नकारना अस्वीकार्य’

न्यायमूर्ति मौशमी भट्टाचार्य और न्यायमूर्ति रेणुका यारा की खंडपीठ ने ‘अनुमोदन और अस्वीकृति’ (Approbate and Reprobate) के सिद्धांत को रेखांकित करते हुए दो-टूक कहा: “किसी लेन-देन का लाभ उठाना और उसके बाद मुकर कर उसकी वैधता को नकारना पूरी तरह अस्वीकार्य (Impermissible) है। यह विशेष रूप से तब पूरी तरह सच साबित होता है जब पक्षकार अनुबंध के एक हिस्से का पूर्ण आनंद ले चुका हो और उस उपभोग के लगभग पूर्ण होने के कगार पर पहुंचकर, वह अनुबंध के दूसरे हिस्से पर सवाल उठाने लगे।”

2. प्रतिफल राशि अपने पास रखना धोखाधड़ी के दावे को स्वतः करता है समाप्त:

  • याचिकाकर्ताओं (दिवंगत गंगा राजू की पत्नी और बेटी) ने तर्क दिया था कि 2013 का लोक अदालत अवॉर्ड धोखाधड़ी (Vitiated by Fraud) से प्राप्त किया गया था।
  • हाईकोर्ट ने आदेश VI नियम 4 CPC का संज्ञान लेते हुए स्पष्ट किया कि धोखाधड़ी का आरोप केवल कह देने से साबित नहीं होता; इसके लिए ठोस दस्तावेजी साक्ष्य और विवरण देना अनिवार्य है।
  • अदालत ने रेखांकित किया कि मूल एग्रीमेंट धारक गंगा राजू ने जीवित रहते ₹85 लाख लिए थे, और उनके निधन (2014) के बाद याचिकाकर्ताओं ने स्वयं अप्रैल और सितंबर 2015 के बीच ₹30 लाख “बिक्री प्रतिफल के हिस्से” (Part Sale Consideration) के रूप में स्वीकार किए। जब तक याचिकाकर्ताओं के पास बिक्री प्रतिफल का पैसा रखा हुआ है, तब तक वे लेन-देन को कपटपूर्ण नहीं कह सकते।

3. लोक अदालत से पूर्व अलग से ‘समझौता विलेख’ की कोई वैधानिक आवश्यकता नहीं:

  • याचिकाकर्ताओं का एक तकनीकी तर्क यह था कि लोक अदालत अवॉर्ड से पहले सभी पक्षों द्वारा हस्ताक्षरित कोई अलग समझौता ज्ञापन (Memorandum of Settlement / Compromise) निष्पादित नहीं किया गया था।
  • अदालत ने इसे खारिज करते हुए विधिक स्थिति स्पष्ट की:“याचिकाकर्ता 1987 के अधिनियम या 2009 के विनियमों के तहत एक वैध लोक अदालत अवॉर्ड की शर्तों का कोई सांविधिक उल्लंघन नहीं दिखा सके हैं। 1987 का अधिनियम यह अनिवार्य नहीं करता है कि लोक अदालत जाने से पहले सभी पक्ष एक औपचारिक समझौता ज्ञापन (Memorandum of Settlement) निष्पादित करें।”

4. धन-संबंधी क्षेत्राधिकार (Pecuniary Jurisdiction) पर अंतिम चरण में आपत्ति अमान्य:

  • याचिकाकर्ताओं ने मौखिक बहस समाप्त होने के बाद, 13 अगस्त 2026 को अपने प्रत्युत्तर (Rejoinder) में पहली बार यह उठाया कि लोक अदालत के पास इस मूल्यांकन के मामले को तय करने का आर्थिक क्षेत्राधिकार नहीं था।
  • अदालत ने इसे सिरे से नकारते हुए कहा कि क्षेत्राधिकार की आपत्ति सबसे पहले अवसर पर ली जानी चाहिए, न कि अवॉर्ड पारित होने के 10 वर्ष बाद और अदालती बहस समाप्त होने के उपरांत।

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मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि एवं प्रक्रियात्मक कालक्रम (2011–2026)

चरण / विवरणतथ्यात्मक स्थिति एवं पक्षों के दावे
मूल संपत्ति एवं समझौता (2011)रंगारेड्डी जिले के रायदुर्ग नवा खालसा गांव स्थित 4 एकड़ जमीन। एम. गंगा राजू ने बिक्री समझौता-सह-जनरल पावर ऑफ अटॉर्नी (ASGPA) धारक के रूप में ₹1 करोड़ में संपत्ति बेचने का करार किया और ₹85 लाख अग्रिम प्राप्त किए।
लोक अदालत अवॉर्ड (2013)कुकटपल्ली विधिक सेवा समिति के समक्ष विवाद सुलझा। लोक अदालत ने अवॉर्ड पारित किया कि शेष ₹15 लाख का भुगतान बैनामा (Sale Deed) के पंजीकरण के समय किया जाएगा।
वारिसों द्वारा अतिरिक्त राशि स्वीकार करना (2015)गंगा राजू की 2014 में मृत्यु के बाद, उनकी पत्नी (एम. नागलक्ष्मी) और बेटी ने अप्रैल से सितंबर 2015 के दौरान क्रेता से ₹30 लाख की अतिरिक्त राशि प्राप्त की और लिखित में इसे ‘बिक्री प्रतिफल का हिस्सा’ स्वीकार किया।
विफल दीवानी मुकदमेबाजीकानूनी उत्तराधिकारियों ने कई वर्षों तक निचली अदालतों में दीवानी मुकदमे लड़े, जिनमें उन्हें कोई राहत नहीं मिली।
हाईकोर्ट में रिट याचिका (10 वर्ष बाद)संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत 10 वर्ष बाद लोक अदालत अवॉर्ड को चुनौती दी गई। आधार लिया गया कि कोई अलग समझौता पत्र नहीं था, यह धोखाधड़ी थी और लोक अदालत का आर्थिक क्षेत्राधिकार नहीं था।
हाईकोर्ट का अंतिम निर्णयहाईकोर्ट ने याचिका को पूरी तरह आधारहीन माना; वादीगण द्वारा प्रतिफल का उपभोग करने के बाद अवॉर्ड को चुनौती देना वर्जित (Estoppel) ठहराया और याचिका खारिज कर दी।

विधिक एवं सांविधिक विश्लेषण: लोक अदालत अवॉर्ड की अंतिमता

  • लोक अदालत अवॉर्ड की पवित्रता (Sanctity of Lok Adalat Awards):
    • सर्वोच्च न्यायालय ने स्टेट ऑफ पंजाब बनाम जलोउर सिंह [(2008) 2 SCC 660] और के.एन. गोविंदन कुट्टी मेनन बनाम सी.डी. शाजी [(2012) 2 SCC 31] में स्थापित किया है कि लोक अदालत द्वारा पारित अवॉर्ड सिविल न्यायालय की डिक्री के समान होता है और इसके खिलाफ कोई नियमित अपील (Appeal) नहीं होती।
    • यद्यपि असाधारण मामलों में धोखाधड़ी साबित होने पर अनुच्छेद 226 के तहत समीक्षा संभव है, किंतु उसके लिए याचिकाकर्ता का आचरण पूरी तरह निष्कलंक होना चाहिए।
  • स्वीकृति एवं अनुमोदन का सिद्धांत (Doctrine of Approbate and Reprobate):
    • यह सिद्धांत ‘इक्विटी’ (साम्या) पर आधारित है—एक व्यक्ति एक ही सांस में हां और ना (Blow hot and cold) नहीं कर सकता।
    • जब याचिकाकर्ताओं ने गंगा राजू की मृत्यु के बाद भी ₹30 लाख की राशि यह कहकर ली कि यह जमीन की बिक्री का पैसा है, तो उन्होंने 2013 के लोक अदालत अवॉर्ड और मूल समझौते को अपने आचरण से पूरी तरह स्वीकार और पुष्ट (Ratify) कर दिया था। इसके बाद उसके खिलाफ जाना कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग है।

विधिक विवरण एवं उपस्थित अधिवक्ता

  • केस संदर्भ: श्रीमती एम. नागलक्ष्मी व अन्य बनाम अध्यक्ष, मंडल विधिक सेवा समिति, साइबराबाद व अन्य [रिट याचिका – तेलंगाना उच्च न्यायालय]
  • पीठ: न्यायमूर्ति मौशमी भट्टाचार्य और न्यायमूर्ति रेणुका यारा (खंडपीठ)
  • निर्णय की तिथि: अक्टूबर 2026
  • विवादित विषय: 2013 के लोक अदालत अवॉर्ड की वैधता, बिक्री प्रतिफल का उपभोग एवं 10 वर्ष बाद क्षेत्राधिकार की चुनौती

विधिक प्रतिनिधित्व:

  • याचिकाकर्ताओं की ओर से: वरिष्ठ अधिवक्ता बी. मयूर रेड्डी (Senior Counsel B Mayur Reddy)
  • अन्य प्रत्यर्थियों की ओर से: वरिष्ठ अधिवक्ता विवेक रेड्डी (Senior Counsel Vivek Reddy)
  • मंडल विधिक सेवा समिति (साइबराबाद) की ओर से: स्थायी अधिवक्ता पुसुलुरी शशि किरण (Standing Counsel Pusuluri Shashi Kiran)
  • प्रासंगिक कानून एवं सांविधिक प्रावधान:
    • विधिक सेवा प्राधिकरण अधिनियम, 1987 — धारा 21 (लोक अदालत अवॉर्ड की डिक्री के रूप में मान्यता) एवं राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण (लोक अदालत) विनियम, 2009
    • सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (CPC) — धारा 21 (क्षेत्राधिकार पर आपत्ति की समय-सीमा) एवं आदेश VI नियम 4 (कपट के तथ्यों का विशिष्ट प्रकटीकरण)
    • भारत का संविधान — अनुच्छेद 226 (उच्च न्यायालय की रिट अधिकारिता व अत्यधिक विलंब/लचेज का प्रभाव)
  • संबद्ध न्यायिक सिद्धांत:
    • लाभ प्राप्ति के उपरांत लोक अदालत अवॉर्ड को चुनौती पर रोक: ‘यदि किसी पक्षकार ने अचल संपत्ति सौदे के प्रतिफल की पर्याप्त राशि प्राप्त कर अपने पास रख ली है, तो वह बाद में लोक अदालत अवॉर्ड को धोखाधड़ी बताकर चुनौती नहीं दे सकता; लेनदेन का लाभ उठाकर बाद में उसकी वैधता को नकारना साम्या और कानून दोनों के विरुद्ध है।’
  • अंतिम परिणाम: रिट याचिका पूर्णतः खारिज; 2013 का लोक अदालत अवॉर्ड पूरी तरह वैध और बाध्यकारी घोषित।

Lok Adalat Award:मामले का संक्षिप्त विवरण (At A Glance)

विवरणजानकारी
संबंधित अदालततेलंगाना उच्च न्यायालय (Telangana High Court)
पीठन्यायमूर्ति मौसमी भट्टाचार्य एवं न्यायमूर्ति रेणुका यारा
याचिकाकर्ताएम. गंगा राजू की पत्नी (एम. नागालक्ष्मी) और पुत्री (कानूनी उत्तराधिकारी)
विवादित संपत्तिरायदुर्ग नवा खालसा गांव (रंगा रेड्डी जिला) में 4 एकड़ की कीमती जमीन।
चुनौती दिया गया आदेशकुकटपल्ली स्थित लोक अदालत का वर्ष 2013 का अवार्ड/फैसला।
मुख्य कानूनी सिद्धांत1. अनुबंध/सौदे का पूरा लाभ उठाने के बाद उस पर धोखाधड़ी का आरोप लगाकर इंकार नहीं किया जा सकता (Principle of Estoppel/Approbate and Reprobate)।
2. लोक अदालत जाने से पहले अलग से लिखित समझौता पत्र (Memorandum of Settlement) होना विधिक रूप से अनिवार्य नहीं है।
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