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मामले की पृष्ठभूमि: क्या था पूरा विवाद?
- 2007 का एमओयू और निवेश:वर्ष 2007 में आंध्र प्रदेश सरकार और रास अल खैमाह (UAE) सरकार के बीच आंध्र प्रदेश में एल्यूमिना रिफाइनरी, एल्युमिनियम स्मेल्टर और पावर प्लांट स्थापित करने के लिए एक समझौता ज्ञापन (MoU) हुआ था। परियोजना को लागू करने के लिए गठित ‘अनराक एल्युमिनियम लिमिटेड’ (ANRAK) में RAKIA ने लगभग $42.5 मिलियन का निवेश किया (जिसमें बाद में उसकी हिस्सेदारी घटकर ~12% रह गई)।
- बॉक्साइट आपूर्ति रद्द होना और प्रोजेक्ट का ठप होना:यह पूरी परियोजना राज्य के स्वामित्व वाले ‘आंध्र प्रदेश मिनरल डेवलपमेंट कॉर्पोरेशन’ (APMDC) से मिलने वाली बॉक्साइट आपूर्ति पर निर्भर थी। हालांकि, स्थानीय सार्वजनिक विरोध प्रदर्शनों के बाद, आंध्र प्रदेश सरकार ने 2015 में अपना रुख बदल दिया और बॉक्साइट आपूर्ति आदेश वापस ले लिए। बाद में APMDC ने आपूर्ति समझौता ही रद्द कर दिया।
- मध्यस्थता (Arbitration) और हाई कोर्ट का निर्णय:RAKIA ने दिसंबर 2016 में भारत-यूएई निवेश संधि के उल्लंघन का आरोप लगाते हुए भारत के खिलाफ मध्यस्थता शुरू की। मई 2022 में मध्यस्थ न्यायाधिकरण (Arbitral Tribunal) ने माना कि उसके पास सुनवाई का अधिकार (Jurisdiction) नहीं है क्योंकि सरकारी कार्रवाई का असर ANRAK पर पड़ा, RAKIA के शेयरों पर केवल अप्रत्यक्ष असर पड़ा। हालांकि, जून 2025 में इंग्लिश हाई कोर्ट के जस्टिस रॉबिन नोल्स ने ट्रिब्यूनल के इस फैसले को उलट दिया, जिसके खिलाफ भारत सरकार ने कोर्ट ऑफ अपील में याचिका दायर की थी।
लंदन: भारत-संयुक्त अरब अमीरात द्विपक्षीय निवेश संधि (India-UAE Bilateral Investment Treaty – BIT), अंतरराष्ट्रीय निवेश मध्यस्थता (International Investment Arbitration), बीआईटी के तहत अल्पांश शेयरधारिता (Minority Shareholding) का विधिक स्तर, प्रत्यक्ष बनाम अप्रत्यक्ष राज्यीय प्रभाव (Direct vs. Indirect Government Action on Investments), तथा बहुराष्ट्रीय निवेश संधियों में संकीर्ण कानूनी व्याख्या बनाम आर्थिक यथार्थ के सिद्धांत पर इंग्लैंड और वेल्स की अपील्स कोर्ट (Court of Appeal of England and Wales) ने भारत सरकार के विरुद्ध एक अत्यंत महत्वपूर्ण अंतरराष्ट्रीय निर्णय सुनाया है।
लॉर्ड जस्टिस मेल्स (Lord Justice Males), लॉर्ड जस्टिस फिलिप्स (Lord Justice Phillips) और लॉर्ड जस्टिस माइल्स (Lord Justice Miles) की अपीलीय खंडपीठ ने जून 2025 के इंग्लिश हाईकोर्ट (जस्टिस रॉबिन नोल्स) के निर्णय को पूरी तरह बरकरार रखते हुए भारत सरकार की अपील को खारिज कर दिया।
अपील्स कोर्ट ने स्पष्ट व्यवस्था दी कि संयुक्त अरब अमीरात की निवेश संस्था रास अल खैमाह इन्वेस्टमेंट अथॉरिटी (RAKIA) भारत सरकार के खिलाफ बीआईटी के तहत मध्यस्थता की कार्यवाही आगे बढ़ाने की पूर्ण अधिकारी है। अदालत ने भारत के इस औपचारिक तर्क को सिरे से नकार दिया कि चूंकि आंध्र प्रदेश सरकार का बॉक्साइट अनुबंध रद्द करने का फैसला केवल स्थानीय कंपनी (ANRAK) पर लक्षित था, इसलिए RAKIA की अल्पांश (लगभग 12%) शेयरहोल्डिंग पर इसका प्रभाव केवल ‘अप्रत्यक्ष’ माना जाएगा। अदालत ने कहा कि निवेश को केवल विधिक औपचारिकता में नहीं, बल्कि उसके समग्र आर्थिक संदर्भ (Economic Context) में देखा जाना चाहिए।
अपील्स कोर्ट के मुख्य विधिक निष्कर्ष एवं सिद्धांत
1. ‘अल्पांश शेयरधारिता केवल कंपनी में तकनीकी हित नहीं; वह बीआईटी का संरक्षित निवेश है’
लॉर्ड जस्टिस फिलिप्स ने बीआईटी के तहत प्रत्यक्ष प्रभाव की व्याख्या करते हुए अपने मुख्य निर्णय में दर्ज किया: “इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि द्विपक्षीय निवेश संधि (BIT) के उद्देश्यों के लिए, किसी कंपनी में पूंजी निवेश के बदले किसी विदेशी निवेशक को आवंटित अल्पांश शेयरधारिता (Minority Shareholding) को केवल कंपनी में एक हित मात्र नहीं माना जा सकता। संधि के तहत निवेशों को उनके आर्थिक संदर्भ (Economic Context) में समझा जाना आवश्यक है, न कि केवल उन कानूनी उपकरणों (Legal Instruments) के रूप में जिनके माध्यम से उन्हें औपचारिक रूप से धारित किया गया है।”
2. संकीर्ण व्याख्या बीआईटी के संरक्षण को निरर्थक बना देगी:
- भारत सरकार ने तर्क दिया था कि RAKIA का संरक्षित निवेश केवल ANRAK में उसके शेयर थे, न कि अंतर्निहित एल्युमिनियम और बॉक्साइट खनन परियोजना। इसलिए, जब सरकार ने बॉक्साइट आपूर्ति रद्द की, तो वह कार्रवाई RAKIA के शेयरों पर ‘प्रत्यक्ष’ रूप से लागू नहीं थी।
- अपील्स कोर्ट ने इसे खारिज करते हुए कहा:“बीआईटी का यह (व्यापक आर्थिक) पठन ही संधि के मूल प्रावधानों में निवेश को दिए गए संरक्षणों को वास्तविक अर्थ प्रदान करता है।यदि भारत द्वारा प्रस्तावित इस अत्यधिक संकीर्ण व्याख्या को स्वीकार कर लिया जाए, तो यह संधि के तहत विदेशी निवेशकों के लिए परिकल्पित सुरक्षा तंत्र को काफी हद तक कमजोर और निष्प्रभावी कर देगा।”
3. आपूर्ति समझौता रद्द करना निवेश पर प्रत्यक्ष आघात:
- अदालत ने माना कि ANRAK परियोजना पूरी तरह से राज्य के स्वामित्व वाली आंध्र प्रदेश खनिज विकास निगम (APMDC) द्वारा बॉक्साइट की आपूर्ति पर निर्भर थी।
- जब राज्य सरकार ने जन-विरोध के बाद अपने पूर्व आदेशों को वापस ले लिया और आपूर्ति समझौता रद्द कर दिया, तो उसने परियोजना के अस्तित्व के प्राथमिक आधार को ही समाप्त कर दिया। यह कार्रवाई RAKIA के निवेश पर सीधा और प्रत्यक्ष आघात (Applied Directly to RAKIA’s Investment) थी।
4. ‘व्हाइट इंडस्ट्रीज’ नजीर और संधि वार्ता के संदर्भ को नकारना:
- भारत ने तर्क दिया था कि व्हाइट इंडस्ट्रीज बनाम भारत मामले में आए प्रतिकूल मध्यस्थता निर्णय के बाद भारत-यूएई बीआईटी की भाषा को जानबूझकर संकीर्ण बनाया गया था ताकि अप्रत्यक्ष दावों से बचा जा सके।
- अपील्स कोर्ट ने संधि वार्ता की इस पृष्ठभूमि पर भारत की अत्यधिक निर्भरता को अप्रासंगिक मानते हुए अस्वीकार कर दिया।
मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि एवं प्रक्रियात्मक कालक्रम (2007–2026)
| चरण / विवरण | तथ्यात्मक स्थिति एवं पक्षों के दावे |
| मूल परियोजना समझौता (2007) | आंध्र प्रदेश सरकार और रास अल खैमाह सरकार (यूएई) के बीच आंध्र प्रदेश में एल्यूमिना रिफाइनरी, स्मेल्टर और कैप्टिव पावर प्लांट स्थापित करने के लिए समझौता ज्ञापन (MoU) हुआ। |
| निवेश संरचना | परियोजना को लागू करने के लिए ANRAK एल्युमिनियम लिमिटेड का गठन हुआ। RAKIA ने इसमें लगभग $42.5 मिलियन का प्रत्यक्ष निवेश किया। बाद में शेयर कमजोर होकर लगभग 12% रह गए। |
| बॉक्साइट आपूर्ति की समाप्ति (2015) | परियोजना राज्य सरकार की कंपनी ‘आंध्र प्रदेश खनिज विकास निगम’ (APMDC) से बॉक्साइट आपूर्ति पर निर्भर थी। स्थानीय और राजनीतिक विरोध के चलते 2015 में राज्य सरकार ने आपूर्ति आदेश वापस ले लिए और अंततः APMDC ने अनुबंध रद्द कर दिया। |
| मध्यस्थता दावा (2016) | RAKIA ने भारत-यूएई बीआईटी के तहत अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता शुरू की। आरोप लगाया कि भारत सरकार ‘उचित और न्यायसंगत व्यवहार’ (Fair and Equitable Treatment – FET) देने में विफल रही और उसका निवेश अवैध रूप से जब्त (Unlawful Expropriation) कर लिया गया। |
| लॉर्ड हॉफमैन ट्रिब्यूनल का फैसला (2022) | लॉर्ड हॉफमैन, जस्टिस चंद्रमौली और जे. विलियम राउली क्यूसी के ट्रिब्यूनल ने मई 2022 में माना कि उसके पास क्षेत्राधिकार नहीं है, क्योंकि सरकारी कार्रवाई का प्रभाव RAKIA पर केवल अप्रत्यक्ष था। |
| इंग्लिश हाईकोर्ट का निर्णय (2025) | जस्टिस रॉबिन नोल्स ने ट्रिब्यूनल का फैसला पलटते हुए क्षेत्राधिकार बहाल किया। |
| इंग्लिश अपील्स कोर्ट का अंतिम आदेश (2026) | अपील्स कोर्ट ने भारत की अपील खारिज की; ट्रिब्यूनल का क्षेत्राधिकार बहाल रखा; अब ट्रिब्यूनल गुण-दोष के आधार पर तय करेगा कि क्या भारत ने संधि का उल्लंघन किया और क्या RAKIA को हर्जाना देना होगा। |
विधिक एवं अंतरराष्ट्रीय निवेश न्यायशास्त्र: आर्थिक वास्तविकता बनाम कॉर्पोरेट आवरण
- अल्पांश शेयरधारकों का विधिक संरक्षण (Minority Shareholder Protections):
- अंतरराष्ट्रीय निवेश कानून में यह लंबे समय से विवादित विषय रहा है कि क्या किसी कंपनी में अल्पांश हिस्सेदारी रखने वाला विदेशी निवेशक उस स्थिति में राज्य के खिलाफ स्वतंत्र रूप से दावा कर सकता है जब राज्य की कार्रवाई सीधे कंपनी के अनुबंधों पर लक्षित हो।
- अपील्स कोर्ट का यह फैसला वैश्विक स्तर पर एक मजबूत मिसाल कायम करता है कि द्विपक्षीय निवेश संधियों के तहत “निवेश” की परिभाषा में शेयरहोल्डिंग और उससे जुड़ी अंतर्निहित आर्थिक परिसंपत्तियां अविभाज्य हैं। यदि राज्य की नियामक कार्रवाइयां कंपनी के मूल व्यवसाय को नष्ट करती हैं, तो अल्पांश विदेशी शेयरधारक भी प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित माना जाएगा।
- प्रत्यक्ष बनाम परिणामी प्रभाव का अंतर:
- अपील्स कोर्ट ने हालांकि इंग्लिश हाईकोर्ट की उस टिप्पणी से असहमति जताई कि प्रत्यक्षता इस बात पर निर्भर करती है कि क्या कार्रवाई विशिष्ट रूप से उस निवेश को ‘टारगेट’ करके की गई थी।
- अपील्स कोर्ट ने स्पष्ट किया कि बीआईटी केवल उन प्रभावों को बाहर करती है जो नितांत आकस्मिक, दूरस्थ या कहीं और की गई कार्रवाई के केवल परिणामी प्रभाव (Remote/Consequential Effects) हों। बॉक्साइट आपूर्ति रद्द करना सीधे परियोजना को पंगु बनाने वाला कदम था, इसलिए यह परिणामी नहीं बल्कि प्रत्यक्ष प्रभाव था।
विधिक विवरण एवं उपस्थित वरिष्ठ अधिवक्ता (Barristers)
- केस संदर्भ: भारत गणराज्य बनाम रास अल खैमाह इन्वेस्टमेंट अथॉरिटी (RAKIA) [अपील – कोर्ट ऑफ अपील (सिविल डिवीजन), इंग्लैंड और वेल्स]
- पीठ: लॉर्ड जस्टिस मेल्स, लॉर्ड जस्टिस फिलिप्स एवं लॉर्ड जस्टिस माइल्स
- निर्णय की तिथि: अक्टूबर 2026
- संबद्ध निचली अदालत का आदेश: इंग्लिश हाईकोर्ट (कमर्शियल कोर्ट) – जस्टिस रॉबिन नोल्स [निर्णय दिनांक: जून 2025 – पुष्ट]
- संबद्ध संधि: भारत-संयुक्त अरब अमीरात द्विपक्षीय निवेश संधि (India-UAE Bilateral Investment Treaty)
विधिक प्रतिनिधित्व:
- भारत गणराज्य (Republic of India) की ओर से:
- बैरिस्टर सैम वर्डस्वर्थ केसी (Sam Wordsworth KC)
- बैरिस्टर सिद्धार्थ धर केसी (Siddharth Dhar KC)
- बैरिस्टर पीटर वेबस्टर (Peter Webster)
- इंस्ट्रक्टेड बाय: डेंटन्स यूके एंड मिडिल ईस्ट एलएलपी (Dentons UK and Middle East LLP)
- रास अल खैमाह इन्वेस्टमेंट अथॉरिटी (RAKIA) की ओर से:
- बैरिस्टर टिम ओट्टी केसी (Tim Otty KC)
- बैरिस्टर बेन जुराटोविच केसी (Ben Juratowitch KC)
- बैरिस्टर बेनेडिक्ट टॉम्पकिंस (Benedict Tompkins)
- इंस्ट्रक्टेड बाय: फ्रेशफील्ड्स एलएलपी (Freshfields LLP)
- प्रासंगिक कानून एवं अंतरराष्ट्रीय संधियां:
- भारत-यूएई द्विपक्षीय निवेश संवर्धन एवं संरक्षण समझौता (BIT) — निवेश की परिभाषा, निष्पक्ष एवं न्यायसंगत व्यवहार (FET), तथा प्रत्यक्ष जब्ती (Expropriation)
- इंग्लिश मध्यस्थता अधिनियम, 1996 (English Arbitration Act, 1996) — धारा 67 (मध्यस्थता न्यायाधिकरण के ठोस क्षेत्राधिकार को चुनौती)
- अंतरराष्ट्रीय कानून: व्हाइट इंडस्ट्रीज बनाम भारत गणराज्य (नजीर संदर्भ)
- संबद्ध न्यायिक सिद्धांत:
- निवेश संधि के तहत अल्पांश शेयरधारकों का प्रत्यक्ष विधिक संरक्षण: ‘द्विपक्षीय निवेश संधियों में किसी विदेशी निवेशक के अधिकारों की व्याख्या केवल संकीर्ण विधिक साधनों तक सीमित नहीं हो सकती; यदि राज्य की संप्रभु कार्रवाई अंतर्निहित परियोजना की आपूर्ति श्रृंखला को नष्ट कर देती है, तो वह अल्पांश शेयरधारक के निवेश पर प्रत्यक्ष प्रभाव मानी जाएगी; मध्यस्थता न्यायाधिकरण के पास ऐसे विवादों की सुनवाई का पूर्ण विधिक क्षेत्राधिकार है।’
- अंतिम परिणाम: भारत सरकार की अपील पूर्णतः खारिज; इंग्लिश हाईकोर्ट का क्षेत्राधिकार बहाली का आदेश बरकरार; RAKIA का मध्यस्थता दावा अब मध्यस्थता न्यायाधिकरण के समक्ष गुण-दोष (Merits) पर सुना जाएगा ताकि यह तय किया जा सके कि क्या भारत संधि के उल्लंघन और वित्तीय हर्जाने के लिए उत्तरदायी है।
UK Court: मामले का संक्षिप्त विवरण (At A Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | इंग्लैंड और वेल्स की कोर्ट ऑफ अपील (Court of Appeal of England and Wales) |
| पीठ | लॉर्ड जस्टिस मेल्स, लॉर्ड जस्टिस फिलिप्स एवं लॉर्ड जस्टिस माइल्स |
| पक्षकार | भारत सरकार बनाम रास अल खैमाह इन्वेस्टमेंट अथॉरिटी (RAKIA), UAE |
| मूल विवाद | आंध्र प्रदेश में प्रस्तावित एल्यूमिना रिफाइनरी परियोजना और बॉक्साइट आपूर्ति समझौता रद्द होना। |
| निवेश राशि | RAKIA द्वारा ‘अनराक एल्युमिनियम लिमिटेड’ (ANRAK Aluminium Ltd) में ~$42.5 मिलियन का निवेश। |
| अदालत का निर्णय | भारत की अपील खारिज; RAKIA की मध्यस्थता याचिका को वैध ठहराया गया। अब ट्रिब्यूनल मामले के गुण-दोष (Merits) के आधार पर मुआवजे का फैसला करेगा। |

