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याचिका में उठाए गए मुख्य आधार और उदाहरण
1. चुनाव आयुक्तों की लिखित असहमति (Internal Dissent):
- याचिका मीडिया रिपोर्ट (सितंबर 2026) का हवाला देती है, जिसके अनुसार चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू (Sukhbir Singh Sandhu) और विवेक जोशी (Vivek Joshi) ने मुख्य निर्वाचन आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार (Gyanesh Kumar) द्वारा लिए गए एकतरफा फैसलों पर 10 महीनों में कम से कम 14 बार लिखित आपत्तियां दर्ज कराईं।
- ये आपत्तियां वैधानिक फॉर्म 6 में अनधिकृत बदलावों, मतदाता डेटाबेस के केंद्रीयकरण, पश्चिम बंगाल में बिना अनुमति के अपील याचिकाएं दायर करने और कार्य आवंटन आदेशों से संबंधित थीं। ECI ने इन टिप्पणियों को सामान्य सुझाव मानकर खारिज कर दिया।
2. पश्चिम बंगाल विशेष गहन संशोधन (SIR) का भारी बैकलाग:
- याचिका में पश्चिम बंगाल में मतदाता सूचियों के ‘विशेष गहन संशोधन’ (Special Intensive Revision – SIR) का मुद्दा उठाया गया है।
- मतदाता सूची से बाहर किए गए लोगों द्वारा लगभग 38.20 लाख अपीलें दायर की गई थीं, जिनमें से केवल 1.02 लाख अपीलों का ही निपटारा हो सका है। आयोग ने अपील न्यायाधिकरणों को 19 से बढ़ाकर 42 करने की मांग की थी।
3. महाराष्ट्र मतदाता सूची में डेटा ग्लिच (Data Glitch):
- याचिका में महाराष्ट्र की मसौदा मतदाता सूची का हवाला दिया गया, जहां एक तकनीकी खराबी (Default Birth Year Glitch) के कारण 2,70,313 मतदाताओं की उम्र 101 से 150 वर्ष के बीच दर्ज हो गई थी।
प्रस्तावित समिति का स्वरूप
याचिकाकर्ता ने मांग की है कि सर्वोच्च न्यायालय द्वारा गठित विशेषज्ञ समिति में निम्नलिखित क्षेत्रों के विशेषज्ञों को शामिल किया जाना चाहिए:
- संवैधानिक कानून (Constitutional Law)
- चुनाव प्रशासन (Election Administration)
- सांख्यिकी (Statistics)
- प्रौद्योगिकी और साइबर सुरक्षा (Technology & Cybersecurity)
- डेटा सुरक्षा (Data Protection)
याचिकाकर्ता ने अदालत से अनुरोध किया है कि निर्वाचन आयोग की संस्थागत विश्वसनीयता और निष्पक्षता को मजबूत करने के लिए इन दूरगामी सुधारों को लागू करना आवश्यक है।
नई दिल्ली: भारत का संविधान के अनुच्छेद 324 (भारत निर्वाचन आयोग का अधीक्षण, निर्देशन और नियंत्रण), अनुच्छेद 14 व 21 (स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनाव लोकतंत्र का आधारभूत ढांचा / Basic Structure), लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 (RPA, 1951) की धारा 123(3) (धर्म, जाति, समुदाय या धार्मिक प्रतीकों के आधार पर वोट मांगने को भ्रष्ट आचरण / Corrupt Practice मानना), चुनाव प्रतीक (आरक्षण एवं आवंटन) आदेश, 1968 का पैरा 16A (मान्यता व प्रतीक निलंबन की शक्ति), निर्वाचन नियमावली के सांविधिक प्रारूप 6 (Form 6) में अनधिकृत फेरबदल, तथा मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) में आई भारी विसंगतियों के परीक्षण हेतु सर्वोच्च न्यायालय में एक अत्यंत महत्वपूर्ण एवं संस्थागत जनहित याचिका (PIL) दायर की गई है।
अधिवक्ता विशाल तिवारी द्वारा दायर इस जनहित याचिका में शीर्ष अदालत से प्रार्थना की गई है कि वह भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश (Former CJI) या सुप्रीम कोर्ट के किसी पूर्व न्यायाधीश की अध्यक्षता में एक स्वतंत्र बहु-विषयक विशेषज्ञ समिति (Independent Expert Committee) का गठन करे। यह समिति भारत निर्वाचन आयोग (ECI) की आंतरिक कार्यप्रणाली, केंद्रीकृत मतदाता डेटाबेस प्रबंधन, निर्णय प्रक्रिया में संस्थागत खामियों और मतदाता पुनरीक्षण की जांच करेगी।
याचिकाकर्ता ने स्पष्ट किया है कि यह याचिका पूरी तरह गैर-पक्षपातपूर्ण (Non-partisan) और भविष्योन्मुखी (Prospective) है, जिसका उद्देश्य किसी राजनीतिक दल, व्यक्ति विशेष के खिलाफ निष्कर्ष निकालना या किसी पिछले चुनाव परिणाम को चुनौती देना नहीं, बल्कि संस्थागत जवाबदेही को बहाल करना है।
याचिका में उठाए गए मुख्य कानूनी आधार एवं संस्थागत चिंताएं
1. मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) के ‘एकतरफा फैसलों’ पर 2 चुनाव आयुक्तों की 14 लिखित आपत्तियां
याचिका में 23 सितंबर 2026 की एक प्रमुख खोजी मीडिया रिपोर्ट का हवाला देते हुए बताया गया है कि निर्वाचन आयोग के भीतर संस्थागत सर्वसम्मति और बहु-सदस्यीय निर्णय प्रक्रिया चरमरा गई है:
- रिपोर्ट के अनुसार, पिछले 10 महीनों के दौरान चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और चुनाव आयुक्त विवेक जोशी ने मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार द्वारा कथित तौर पर ‘एकतरफा’ (Unilateral) रूप से लिए गए प्रशासनिक निर्णयों के विरुद्ध कम से कम 14 अवसरों पर औपचारिक रूप से लिखित आपत्तियां दर्ज कराईं।
- ये मतभेद मुख्यतः निम्नलिखित बिंदुओं पर केंद्रित थे:
- मतदाता सूची में नाम जोड़ने वाले सांविधिक प्रारूप 6 (Statutory Form 6) में बिना पूर्ण आयोग के अनुमोदन के अनधिकृत संशोधन।
- देश भर के मतदाता डेटाबेस का अनियंत्रित केंद्रीकरण (Centralisation of Electoral Database)।
- पश्चिम बंगाल से जुड़े विधिक मामलों में बिना विधिवत अनुमोदन के अपीलों का दाखिला।
- आयोग के भीतर आंतरिक कार्य आवंटन आदेश (Work Allocation Orders)।
- याचिका के अनुसार, ईसीआई ने असहमति के इन नोटों को स्वीकार तो किया, किंतु उन्हें केवल “नियमित सुझाव” बताकर टाल दिया और यह स्पष्ट नहीं किया कि फॉर्म 6 में बदलाव को वास्तव में किसने अधिकृत किया था।
2. पश्चिम बंगाल SIR: 38.20 लाख अपीलें लंबित, केवल 1.02 लाख का निस्तारण:
- याचिका में पश्चिम बंगाल में चलाए गए विशेष गहन पुनरीक्षण (Special Intensive Revision – SIR) के प्रशासनिक संकट को रेखांकित किया गया है।
- मीडिया रिपोर्टों और ईसीआई के हलफनामे के अनुसार, मतदाता सूची से बाहर किए गए नागरिकों द्वारा लगभग 38.20 लाख अपीलें दायर की गई थीं, जिनमें से अब तक मात्र 1.02 लाख अपीलों का ही निस्तारण हो सका है।
- अपीलों के इस भारी अंबार से निपटने के लिए आयोग को अपीलीय अधिकरणों की संख्या 19 से बढ़ाकर 42 करने की मांग करनी पड़ी, जो यह साबित करता है कि बुनियादी प्रशासनिक तैयारी के बिना लाखों नागरिकों के मताधिकार को अधर में लटका दिया गया।
3. महाराष्ट्र मतदाता सूची ग्लिच: 2.70 लाख से अधिक मतदाताओं की उम्र 101 से 150 वर्ष:
- याचिका में तकनीकी विसंगति का उदाहरण देते हुए बताया गया कि महाराष्ट्र की प्रारूप मतदाता सूची में 2,70,313 मतदाताओं की उम्र 101 से 150 वर्ष के बीच दर्ज हो गई थी, क्योंकि सिस्टम में डिफॉल्ट जन्म वर्ष 1900 ले लिया गया था।
- यद्यपि बाद में इस त्रुटि को सुधारा गया, किंतु यह प्रकरण ईसीआई के तकनीकी आर्किटेक्चर, डेटाबेस सत्यापन और साइबर सुरक्षा मानकों की पोल खोलता है।
4. चुनावी अभियानों में धार्मिक प्रतीकों, सांप्रदायिक अपीलों व हेट स्पीच पर पूर्ण रोक:
याचिका में लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 123(3) और आदर्श आचार संहिता (MCC) का हवाला देते हुए शीर्ष अदालत से निर्देश जारी करने की मांग की गई है:
- धर्म, धार्मिक प्रतीकों, संप्रदाय या नफरती भाषणों (Hate Speech) के जरिए वोट मांगने पर पूर्ण और निरपेक्ष प्रतिबंध (Absolute Prohibition) लागू किया जाए।
- ऐसी शिकायतों पर 48 घंटे के भीतर अनिवार्य निर्णय की समय-सीमा तय हो।
- बार-बार सांप्रदायिक प्रचार करने वाले दलों के खिलाफ चुनाव प्रतीक आदेश के पैरा 16A के तहत दल की मान्यता और चुनाव चिह्न निलंबित करने की बाध्यकारी प्रक्रिया बने।
- धार्मिक अपीलों के जरिए वोट मांगने वाले स्टार प्रचारकों और उम्मीदवारों पर तुरंत प्राथमिकी (FIR) दर्ज कर अयोग्यता की कार्यवाही शुरू की जाए।
तथ्यात्मक संरचना एवं याचिका में उठाए गए बिंदु
| प्रमुख मुद्दा | याचिका में उल्लेखित विवरण एवं सांख्यिकीय आंकड़े | विधिक व संस्थागत प्रभाव |
| आंतरिक निर्णय प्रक्रिया | 10 महीनों में चुनाव आयुक्तों द्वारा कम से कम 14 लिखित आपत्तियां; फॉर्म 6 में अनाधिकृत परिवर्तन का आरोप। | अनुच्छेद 324 के तहत बहु-सदस्यीय आयोग की सामूहिक निर्णय प्रणाली का क्षरण। |
| पश्चिम बंगाल SIR अपील बैकलॉग | 38.20 लाख अपीलें दायर; केवल 1.02 लाख निस्तारित; अधिकरण 19 से बढ़ाकर 42 करने की मांग। | वैध मतदाताओं के मताधिकार से वंचित होने का खतरा; नैसर्गिक न्याय में देरी। |
| मतदाता सूची में तकनीकी त्रुटि | महाराष्ट्र की ड्राफ्ट रोल में 2,70,313 मतदाता 101-150 वर्ष के दर्शाए गए (डिफ़ॉल्ट जन्म वर्ष गड़बड़ी)। | चुनावी सॉफ्टवेयर और डेटाबेस की विश्वसनीयता व ऑडिट प्रणाली पर गंभीर सवाल। |
| प्रस्तावित विशेषज्ञ समिति | पूर्व CJI की अध्यक्षता में संवैधानिक कानून, चुनाव प्रशासन, सांख्यिकी, साइबर सुरक्षा व डेटा विशेषज्ञों की टीम। | ईसीआई की संरचनात्मक जवाबदेही तय करना और 6 माह में रिपोर्ट सौंपना। |
प्रस्तावित विशेषज्ञ समिति की रूपरेखा एवं दायरा
याचिकाकर्ता ने मांग की है कि प्रस्तावित समिति में केवल सेवानिवृत्त न्यायाधीश ही नहीं, बल्कि विभिन्न डोमेन के स्वतंत्र विशेषज्ञों को शामिल किया जाए:
- कार्य-प्रणाली व समय-सीमा:
- समिति केंद्र सरकार, सभी राष्ट्रीय/राज्यीय राजनीतिक दलों, नागरिक समाज और शोधकर्ताओं के साथ व्यापक परामर्श करे।
- 6 महीने के भीतर अपनी सुधारात्मक सिफारिशें सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत करे।
- केंद्र सरकार और चुनाव आयोग को एक निर्धारित समय-सीमा के भीतर इन सिफारिशों पर ‘सकारण कार्रवाई रिपोर्ट’ (Reasoned Action-Taken Report) दाखिल करने का निर्देश दिया जाए।
विधिक एवं संवैधानिक विश्लेषण: ‘टी.एन. शेषन’ व ‘अनूप बरनवाल’ न्यायशास्त्र
- टी.एन. शेषन बनाम भारत संघ [(1995) 4 SCC 611]:
- सुप्रीम कोर्ट की 5 जजों की संविधान पीठ ने स्पष्ट किया था कि भारत निर्वाचन आयोग एक बहु-सदस्यीय संस्था है। CEC को आयोग के भीतर कोई ‘वीटो’ या उच्चतर शक्ति प्राप्त नहीं है; वे केवल Primus Inter Pares (समानों में प्रथम) हैं।
- यदि मुख्य चुनाव आयुक्त अन्य दो चुनाव आयुक्तों की लिखित आपत्तियों को दरकिनार कर एकतरफा आदेश पारित कर रहे हैं, तो यह सीधे तौर पर 1995 की संविधान पीठ के फैसले और अनुच्छेद 324 की लोकतांत्रिक आत्मा का हनन है।
- अनूप बरनवाल बनाम भारत संघ [(2023) 6 SCC 1]:
- जस्टिस के.एम. जोसेफ की अध्यक्षता वाली 5 जजों की संविधान पीठ ने दोहराया था कि एक निष्पक्ष, पारदर्शी और संदेह-मुक्त चुनाव आयोग ही स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनावों की गारंटी दे सकता है। आयोग के भीतर पारदर्शिता का अभाव सीधे लोकतंत्र के बुनियादी ढांचे (Basic Structure of the Constitution) को चोट पहुंचाता है।
- अभिराम सिंह बनाम सी.डी. कोमाचेन [(2017) 2 SCC 629]:
- सुप्रीम कोर्ट की 7 जजों की संविधान पीठ ने व्यवस्था दी थी कि चुनावी अभियानों में धर्म, जाति, नस्ल या समुदाय का उपयोग लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 123(3) के तहत भ्रष्ट आचरण है। याचिका में इसी निर्णय के पूर्ण और कठोर क्रियान्वयन की मांग उठाई गई है।
विधिक विवरण
- न्यायालय: भारत का सर्वोच्च न्यायालय (संवैधानिक जनहित याचिका क्षेत्राधिकार)
- केस संदर्भ: विशाल तिवारी बनाम भारत संघ एवं अन्य [रिट याचिका (सिविल) – जनहित याचिका]
- याचिकाकर्ता: अधिवक्ता विशाल तिवारी
- प्रतिवादी: भारत संघ (विधि एवं न्याय मंत्रालय) एवं भारत निर्वाचन आयोग (ECI)
- दाखिल करने की तिथि: 24 अक्टूबर 2026
- स्थिति: नई याचिका दाखिल; सुप्रीम कोर्ट की रजिस्ट्री द्वारा केस नंबर आवंटन और पीठ के समक्ष सूचीबद्ध किए जाने की प्रतीक्षा।
प्रासंगिक कानून एवं संवैधानिक प्रावधान:
- भारत का संविधान — अनुच्छेद 324 (चुनाव आयोग की स्थापना व शक्तियां), अनुच्छेद 32 (संवैधानिक उपचार), अनुच्छेद 14 (समानता) एवं अनुच्छेद 21
- लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 — धारा 123(3) (धार्मिक अपीलों पर प्रतिबंध) एवं धारा 169 (नियम बनाने की शक्ति)
- मतदाता पंजीकरण नियम, 1960 — प्रारूप 6 (Form 6 – नाम जोड़ने का वैधानिक आवेदन)
- चुनाव प्रतीक (आरक्षण एवं आवंटन) आदेश, 1968 — पैरा 16A (आदर्श आचार संहिता के उल्लंघन पर मान्यता/प्रतीक निलंबन)
- संबद्ध न्यायिक सिद्धांत:
- संस्थागत स्वायत्तता और निष्पक्ष चुनाव का सिद्धांत: ‘लोकतंत्र की शुचिता बनाए रखने के लिए निर्वाचन आयोग का बहु-सदस्यीय, सामूहिक और पारदर्शी होना अनिवार्य है; जब आयोग के भीतर आंतरिक मतभेद, मतदाता डेटाबेस में त्रुटियां और अपीलों का भारी बैकलॉग सामने आए, तो पूर्व CJI के नेतृत्व वाली स्वतंत्र विशेषज्ञ समिति द्वारा इसकी प्रणालीगत जांच नागरिकों के मताधिकार और चुनावी शुचिता की रक्षा हेतु आवश्यक है।’
CEC Gyanesh Kumar:मामले का संक्षिप्त विवरण (At A Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | भारत का सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court of India) |
| याचिकाकर्ता | अधिवक्ता विशाल तिवारी (Advocate Vishal Tiwari) |
| मूल मांग | ECI की जांच हेतु पूर्व CJI की अध्यक्षता में एक स्वतंत्र विशेषज्ञ समिति का गठन और धार्मिक/सांप्रदायिक चुनाव प्रचार पर पूर्ण प्रतिबंध। |
| मुख्य बिंदु/आधार | 1. मुख्य निर्वाचन आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार के खिलाफ 2 चुनाव आयुक्तों की 14 लिखित आपत्तियां। 2. पश्चिम बंगाल SIR के तहत 38 लाख से अधिक अपीलों का बकाया होना। 3. महाराष्ट्र मतदाता सूची में तकनीकी गड़बड़ी (2.7 लाख मतदाता 101-150 वर्ष आयु के दिखे)। |
| याचिका का स्वरूप | याचिका गैर-पक्षपातपूर्ण और भविष्य लक्षी (Prospective) है; किसी भी चुनाव परिणाम या राजनीतिक दल को चुनौती नहीं दी गई है। |

