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मामले की पृष्ठभूमि: क्या था पूरा विवाद?
- 2024 का अपराध और मेडिकल परीक्षण से इंकार:वर्ष 2024 में 8 वर्षीय बच्ची के साथ दुष्कर्म (POCSO Act के तहत पेनेट्रेटिव यौन हमला) का मामला सामने आया। प्राथमिकी दर्ज कराते समय बच्ची/परिवार ने आंतरिक मेडिकल जांच (Internal Medical Examination) के लिए अपनी सहमति नहीं दी। पुलिस ने आरोपी को गिरफ्तार कर चार्जशीट दाखिल की, जिस पर निचली अदालत में मुकदमा चल रहा है।
- राज्य सरकार द्वारा मुआवजा खारिज होना:जब पीड़िता ने राज्य की ‘रानी लक्ष्मीबाई सम्मान कोष योजना’ के तहत वित्तीय सहायता के लिए आवेदन किया, तो राज्य सरकार ने इस आधार पर आवेदन खारिज कर दिया कि याचिकाकर्ता पेनेट्रेटिव यौन हमले की पुष्टि करने वाली मेडिकल/इंजरी रिपोर्ट पेश करने में विफल रही। इसके बाद पीड़िता ने अपनी मां के माध्यम से हाईकोर्ट का रुख किया।
हाईकोर्ट के मुख्य निष्कर्ष और कानूनी तर्क
1. POCSO अधिनियम की धारा 3 की व्याख्या:
हाईकोर्ट ने रेखांकित किया कि POCSO अधिनियम की धारा 3 के अनुसार ‘पेनेट्रेटिव सेक्सुअल असॉल्ट’ केवल ऐसे कृत्य तक सीमित नहीं है जिससे शारीरिक चोट (Physical Injury) दिखाई दे। इसमें किसी भी सीमा तक प्रवेश, किसी वस्तु/शरीर के अंग का प्रवेश या मौखिक कृत्य शामिल हैं। ऐसे में दृश्यमान चोट का न होना अपराध की गंभीरता को कम नहीं करता।
2. शारीरिक स्वायत्तता और सहमति का अधिकार (BNSS Section 184(7)):
पीठ ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 184(7) का हवाला दिया, जो पीड़िता को मेडिकल परीक्षण से इंकार (Refuse Consent) करने का वैधानिक अधिकार देती है: “यदि मूल कानून पीड़िता के सहमति न देने के अधिकार की रक्षा करता है और आंतरिक जांच न होने मात्र से आपराधिक केस विफल नहीं होता, तो उसी इंकार को कल्याणकारी योजना से पीड़िता को बाहर करने का आधार नहीं बनाया जा सकता।”
3. पीड़िता के सामने अनुचित दुविधा (Impermissible Dilemma):
- कोर्ट ने माना कि इंजरी रिपोर्ट को अनिवार्य बनाने से पीड़िता के सामने एक अनुचित शर्त खड़ी होती है—या तो वह उस परीक्षण को सहन करे जो उसकी शारीरिक स्वायत्तता को प्रभावित करता है, या फिर अपने पुनर्वास हेतु आवश्यक वित्तीय सहायता खो दे। कोई भी कल्याणकारी योजना अप्रत्यक्ष रूप से वह काम नहीं करा सकती जिसे कानून बिना सहमति करने से रोकता है।
4. अनुच्छेद 14 (समानता के अधिकार) का उल्लंघन:
- हाईकोर्ट ने कहा कि यह अनिवार्य शर्त समान अपराध की शिकार पीड़ितों को दो असमान श्रेणियों में बांटती है—जिनके पास इंजरी रिपोर्ट है और जिनके पास नहीं है। यह संविधान के अनुच्छेद 14 का सीधा उल्लंघन है।
5. सत्यापन हेतु FIR और चार्जशीट पर्याप्त:
- अदालत ने स्पष्ट किया कि जब मामले में FIR दर्ज है और पुलिस जांच के बाद POCSO अधिनियम के तहत चार्जशीट दाखिल हो चुकी है, तो प्रारंभिक पुनर्वास सहायता (Monetary Relief) प्रदान करने के लिए ये दस्तावेज पूरी तरह से पर्याप्त हैं।
अदालत का अंतिम आदेश
- इलाहाबाद हाईकोर्ट ने ‘उत्तर प्रदेश रानी लक्ष्मीबाई महिला एवं बाल सम्मान कोष नियम, 2015’ के तहत इंजरी रिपोर्ट अनिवार्य करने वाली शर्त को असंवैधानिक घोषित करते हुए रद्द (Struck Down) कर दिया।
- राज्य सरकार को निर्देश दिया गया कि वह याचिकाकर्ता (नाबालिग पीड़िता) को 10 दिनों के भीतर ₹3 लाख की वित्तीय सहायता जारी करे।
प्रयागराज: यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण अधिनियम, 2012 (POCSO Act) की धारा 3 व 4 (प्रवेशी लैंगिक हमला / Penetrative Sexual Assault), भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) की धारा 184(7) (दुष्कर्म पीड़िता द्वारा आंतरिक चिकित्सकीय परीक्षण से इनकार करने का विधिक अधिकार / Right to Refuse Medical Examination), उत्तर प्रदेश रानी लक्ष्मीबाई महिला एवं बाल सम्मान कोष नियमावली, 2015, तथा भारत का संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार व मनमानी के विरुद्ध वर्गीकरण) एवं अनुच्छेद 21 (शारीरिक स्वायत्तता एवं पुनर्वास का मौलिक अधिकार) पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक ऐतिहासिक एवं मानवीय फैसला सुनाया है।
इलाहाबाद उच्च न्यायालय की खंडपीठ, जिसमें न्यायमूर्ति सरल श्रीवास्तव (Justice Saral Srivastava) और न्यायमूर्ति गरिमा प्रसाद (Justice Garima Prasad) शामिल थीं, ने 23 अक्टूबर 2026 के अपने निर्णय में उत्तर प्रदेश रानी लक्ष्मीबाई महिला एवं बाल सम्मान कोष नियमावली, 2015 के उस विवादास्पद नियम/शर्त को असंवैधानिक घोषित कर निरस्त (Struck Down) कर दिया, जिसके तहत वित्तीय सहायता प्राप्त करने के लिए ‘प्रवेशी लैंगिक हमले की पुष्टि करने वाली चोट/मेडिकल रिपोर्ट’ (Injury Report) प्रस्तुत करना अनिवार्य बनाया गया था।
खंडपीठ ने स्पष्ट व्यवस्था दी कि किसी आपराधिक मुकदमे में भी प्रत्यक्ष शारीरिक चोट की अनुपस्थिति मात्र से आरोपी बरी नहीं होता। ऐसे में पुनर्वास हेतु बनाई गई सामाजिक कल्याण योजना में मेडिकल रिपोर्ट को वित्तीय सहायता पाने का “एकमात्र प्रवेश द्वार” (Sole Gateway) नहीं बनाया जा सकता। अदालत ने राज्य सरकार को 10 दिनों के भीतर 8 वर्षीय नाबालिग पीड़िता को ₹3,00,000 (तीन लाख रुपये) की वित्तीय सहायता जारी करने का सख्त आदेश दिया।
उच्च न्यायालय के मुख्य कानूनी निष्कर्ष एवं विधिक व्यवस्था
1. ‘मेडिकल रिपोर्ट का अभाव वित्तीय सहायता रोकने का पूर्ण विधिक अवरोध नहीं’
न्यायमूर्ति सरल श्रीवास्तव और न्यायमूर्ति गरिमा प्रसाद की खंडपीठ ने दस्तावेजी शर्त को असंवैधानिक घोषित करते हुए दर्ज किया: “जहां कोई मेडिकल या चोट रिपोर्ट उपलब्ध हो, उसे सक्षम प्राधिकारी के समक्ष रखा जा सकता है और उस पर विचार किया जा सकता है; किंतु इसकी अनुपस्थिति किसी भी स्थिति में मौद्रिक राहत (Monetary Relief) के लिए पूर्ण विधिक अवरोध (Absolute Bar) के रूप में कार्य नहीं कर सकती। अतः विवादित दस्तावेजी शर्त को असंवैधानिक घोषित किया जाता है और इसे निरस्त (Struck Down) किया जाता है।”
2. ‘एफआईआर और चार्जशीट ही दावे के सत्यापन के लिए पर्याप्त’:
- अदालत ने रेखांकित किया कि एफआईआर, चार्जशीट और मेडिकल रिपोर्ट—इनमें से कोई भी दस्तावेज अपने आप में अपराध के अंतिम न्यायिक निर्धारण का प्रमाण नहीं होता; किसी भी मामले का फैसला साक्ष्यों की समग्रता पर होता है।
- अदालत ने कहा:“जब ट्रायल में भी मेडिकल रिपोर्ट न होने या प्रवेशी चोट दर्ज न होने मात्र से अभियुक्त बरी नहीं हो सकता, तो एक सामाजिक कल्याण योजना के तहत प्रारंभिक मौद्रिक राहत के लिए उसी रिपोर्ट को एक अनिवार्य पूर्व-शर्त बना देना पूरी तरह विसंगतिपूर्ण (Anomalous) है—विशेषकर तब जब एफआईआर से अपराध प्रकट होता हो और जांच के बाद POCSO अधिनियम के सुसंगत प्रावधानों में चार्जशीट दाखिल हो चुकी हो।”
3. POCSO अधिनियम की धारा 3: प्रत्येक हमले में प्रत्यक्ष शारीरिक चोट आवश्यक नहीं:
- अदालत ने पाया कि वर्तमान मामले में आरोपी ने पीड़िता के गुप्तांग में उंगली डाली थी और उसके मुंह में अपना लिंग डाला था।
- अदालत ने कानून की स्थिति स्पष्ट की:“POCSO अधिनियम की धारा 3 यह दर्शाती है कि प्रवेशी लैंगिक हमला (Penetrative Sexual Assault) केवल ऐसे कृत्य तक सीमित नहीं है जो अनिवार्य रूप से एक दृश्यमान शारीरिक चोट छोड़े।इसमें किसी भी सीमा तक प्रवेश, किसी वस्तु या शरीर के अंग का प्रवेश, प्रवेश कराने हेतु हेरफेर और विनिर्दिष्ट मौखिक कृत्य (Oral Acts) शामिल हैं। चिकित्सीय साक्ष्य आरोप का समर्थन कर सकते हैं, किंतु वैधानिक अपराध किसी प्रत्यक्ष शारीरिक चोट की उपस्थिति पर निर्भर नहीं करता।”
4. BNSS की धारा 184(7): सहमति से इनकार का अधिकार और शारीरिक स्वायत्तता:
- अदालत ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 184(7) का हवाला दिया, जो पीड़िता को आंतरिक मेडिकल परीक्षण के लिए सहमति देने से इनकार करने का विधिक अधिकार देती है।
- अदालत ने कहा कि अनिवार्य चोट रिपोर्ट की शर्त पीड़िता के समक्ष एक अस्वीकार्य धर्मसंकट (Impermissible Dilemma) खड़ा कर देती है:
- या तो वह अपनी शारीरिक स्वायत्तता (Bodily Autonomy) से समझौता कर आंतरिक जांच कराए;
- या फिर उस नाजुक समय में राज्य की वित्तीय सहायता और पुनर्वास सहायता खो दे जब उसे इसकी सर्वाधिक आवश्यकता है।
- अदालत ने दो-टूक कहा कि एक कल्याणकारी योजना उस कृत्य के लिए परोक्ष रूप से बाध्य नहीं कर सकती जिसे मूल संविधि (Statute) बिना सहमति के करने से स्पष्ट रूप से रोकती है।
5. अनुच्छेद 14 का खुला उल्लंघन:
- अदालत ने माना कि यह शर्त एक ही अपराध के पीड़ितों को दो कृत्रिम वर्गों में बांटकर मनमाना वर्गीकरण करती है:
- वे जिनके पास चोट रिपोर्ट उपलब्ध है, और
- वे जिनके पास चोट रिपोर्ट नहीं है (जिसमें वे पीड़ित शामिल हैं जिन्होंने सहमति नहीं दी, जिनकी जांच निशान मिटने के बाद हुई, या जिनके मामले में कृत्य ऐसा था जिससे दृश्य चोट नहीं आती)। यह वर्गीकरण समानता के अधिकार के विरुद्ध है।
मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि एवं प्रक्रियात्मक कालक्रम (2024–2026)
| चरण / विवरण | तथ्यात्मक स्थिति एवं पक्षों के तर्क |
| पीड़िता | घटना के समय 8 वर्षीय नाबालिग बच्ची (माता के माध्यम से याचिकाकर्ता)। |
| अपराध का विवरण (2024) | आरोपी द्वारा पीड़िता के निजी अंग में उंगली डालने और मुंह में लिंग डालने का गंभीर प्रवेशी लैंगिक हमला (धारा 3/4 POCSO अधिनियम)। |
| मेडिकल स्थिति | एफआईआर दर्ज होते समय पीड़िता/संरक्षक ने आंतरिक चिकित्सीय परीक्षण के लिए विधिक रूप से सहमति नहीं दी। पुलिस ने विवेचना के बाद चार्जशीट दाखिल की, जिस पर ट्रायल कोर्ट में विचारण चल रहा है। |
| राज्य का इनकार | उत्तर प्रदेश रानी लक्ष्मीबाई महिला एवं बाल सम्मान कोष नियमावली, 2015 के तहत ₹3 लाख की सहायता मांगी गई। राज्य सरकार ने आवेदन इस आधार पर खारिज किया कि नियमावली के तहत ‘प्रवेशी चोट दर्शाने वाली मेडिकल रिपोर्ट’ संलग्न नहीं थी। |
| याचिकाकर्ता के तर्क (अधिवक्ता पंकज कुमार शुक्ला व सतीश कुमार) | 1. हाईकोर्ट ने जनवरी में पहले ही व्यवस्था दी थी कि गुप्तांगों पर चोट न दिखना मुआवजा रोकने का आधार नहीं है। 2. कानून पीड़िता को मेडिकल जांच से मना करने का अधिकार देता है; इसके आधार पर उसे पुनर्वास योजना से बाहर नहीं किया जा सकता। |
| राज्य का बचाव (AAG मनीष गोयल व CSC संदीप कुमार) | राज्य ने दलील दी कि पूर्व निर्णय ने केवल दृश्य चोट की अनिवार्यता हटाई थी, किंतु ‘इंजरी रिपोर्ट पेश करने’ की दस्तावेजी शर्त समाप्त नहीं की थी; जन-धन के दुरुपयोग को रोकने के लिए सत्यापन जरूरी है। |
| हाईकोर्ट का अंतिम निर्णय | राज्य की दलीलें खारिज; मेडिकल रिपोर्ट की अनिवार्यता वाली शर्त असंवैधानिक घोषित कर निरस्त; 10 दिन में ₹3 लाख भुगतान का निर्देश। |
विधिक एवं संवैधानिक विश्लेषण: पुनर्वास सहायता बनाम प्रक्रियात्मक बाधाएं
- सुप्रीम कोर्ट के ‘निपुण सक्सेना’ व ‘मल्लिका अर्जुन’ न्यायशास्त्र का प्रभाव:
- सर्वोच्च न्यायालय ने निपुण सक्सेना बनाम भारत संघ [(2019) 2 SCC 703] में स्पष्ट किया है कि यौन अपराधों के पीड़ितों को दी जाने वाली अंतरिम और अंतिम क्षतिपूर्ति उनके तत्काल मनोवैज्ञानिक, चिकित्सकीय और सामाजिक पुनर्वास के लिए होती है।
- राज्य का यह संवैधानिक कर्तव्य है कि वह ऐसे पीड़ितों को तत्काल वित्तीय मरहम लगाए, न कि कठोर प्रक्रियात्मक औपचारिकताएं लादकर उन्हें सरकारी दफ्तरों के चक्कर कटवाए।
- साक्ष्य कानून और मेडिकल परीक्षण की प्रकृति:
- आपराधिक न्यायशास्त्र का यह बुनियादी सिद्धांत है कि ‘चिकित्सीय साक्ष्य’ (Medical Evidence) केवल एक संपोषक साक्ष्य (Corroborative Piece of Evidence) होता है, मूल साक्ष्य नहीं। यदि पीड़िता का मौखिक बयान विश्वसनीय है और चार्जशीट दाखिल हो चुकी है, तो मेडिकल रिपोर्ट के अभाव में भी दोषसिद्धि हो सकती है।
- जब अपराध साबित करने के लिए मेडिकल रिपोर्ट अपरिहार्य नहीं है, तो अंतरिम कल्याणकारी सहायता के लिए इसे अनिवार्य बनाना पूरी तरह तर्कहीन और दुर्भावनापूर्ण है।
विधिक विवरण एवं उपस्थित अधिवक्ता
- केस संदर्भ: नाबालिग पीड़िता (माता के माध्यम से) बनाम उत्तर प्रदेश राज्य व अन्य [रिट याचिका – इलाहाबाद उच्च न्यायालय]
- पीठ: न्यायमूर्ति सरल श्रीवास्तव एवं न्यायमूर्ति गरिमा प्रसाद (खंडपीठ)
- निर्णय की तिथि: 23 अक्टूबर 2026
- देय वित्तीय अनुतोष: ₹3,00,000 (तीन लाख रुपये) — 10 दिनों के भीतर भुगतान अनिवार्य
विधिक प्रतिनिधित्व:
- याचिकाकर्ता (नाबालिग पीड़िता) की ओर से: अधिवक्ता पंकज कुमार शुक्ला (Advocate Pankaj Kumar Shukla) एवं अधिवक्ता सतीश कुमार (Advocate Satish Kumar)
- प्रतिवादी (उत्तर प्रदेश राज्य) की ओर से: अपर महाधिवक्ता (AAG) मनीष गोयल (Manish Goyal) एवं अपर मुख्य स्थायी वकील (ACSC) संदीप कुमार (Sandeep Kumar)
- प्रासंगिक कानून एवं सांविधिक प्रावधान:
- उत्तर प्रदेश रानी लक्ष्मीबाई महिला एवं बाल सम्मान कोष नियमावली, 2015 — प्रवेशी लैंगिक हमले में अनिवार्य चोट रिपोर्ट की शर्त (असंवैधानिक घोषित व निरस्त)
- यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण अधिनियम, 2012 (POCSO Act) — धारा 3 एवं 4 (प्रवेशी लैंगिक हमला और दंड)
- भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) — धारा 184(7) (बलात्कार पीड़िता का चिकित्सीय परीक्षण एवं सहमति से इनकार का विधिक अधिकार / पूर्ववर्ती CrPC धारा 164A)
- भारत का संविधान — अनुच्छेद 14 (समानता व वर्गीकरण का परीक्षण) एवं अनुच्छेद 21 (दैहिक स्वतंत्रता, शारीरिक स्वायत्तता व त्वरित पुनर्वास)
- संबद्ध न्यायिक सिद्धांत:
- बलात्कार पीड़ितों के पुनर्वास में मेडिकल रिपोर्ट की गैर-अनिवार्यता: ‘POCSO मामलों में किसी कल्याणकारी सामाजिक योजना के तहत मौद्रिक राहत प्राप्त करने के लिए प्रवेशी चोट की मेडिकल रिपोर्ट अनिवार्य नहीं हो सकती; चोट रिपोर्ट की उपलब्धता आरोप की गंभीरता या पीड़िता की पात्रता तय नहीं करती; एफआईआर और चार्जशीट दावे के सत्यापन के लिए पर्याप्त आधार हैं।’
- अंतिम परिणाम: याचिका पूर्णतः स्वीकार; विवादित दस्तावेजी शर्त असंवैधानिक घोषित कर रद्द; राज्य सरकार को 10 दिनों के भीतर पीड़िता को ₹3 लाख की वित्तीय सहायता का भुगतान करने का निर्देश।
Victim Compensation:मामले का संक्षिप्त विवरण (At A Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | इलाहाबाद उच्च न्यायालय (Allahabad High Court) |
| पीठ | न्यायमूर्ति सरल श्रीवास्तव एवं न्यायमूर्ति गरिमा प्रसाद |
| याचिकाकर्ता | 8 वर्षीय नाबालिग पीड़िता (अपनी मां के माध्यम से) |
| प्रतिवादी | उत्तर प्रदेश राज्य सरकार |
| विवादित नियम | यू.पी. रानी लक्ष्मीबाई महिला एवं बाल सम्मान कोष नियम, 2015 (मेडिकल रिपोर्ट की अनिवार्य शर्त)। |
| संविधान का प्रावधान | अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) एवं BNSS की धारा 184(7) (मेडिकल परीक्षण से इंकार का अधिकार)। |
| अदालत का निर्णय | मेडिकल रिपोर्ट की अनिवार्य शर्त असंवैधानिक घोषित और रद्द; राज्य सरकार को पीड़िता को 10 दिनों के भीतर ₹3 लाख की वित्तीय सहायता जारी करने का आदेश। |

