Tuesday, October 27, 2026
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Ayodhya Development: क्या किसानों को भूखा मरने दें? होटल बनाने हेतु बहु-फसली सिंचित भूमि न छीनी जाए; अयोध्या में भूमि अधिग्रहण का केस जानें

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मामले की पृष्ठभूमि: क्या था पूरा विवाद?

  1. इलाहाबाद हाईकोर्ट का 6 अगस्त का फैसला:इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने 6 अगस्त के अपने आदेश में भूमि अधिग्रहण को रद्द करने से इंकार कर दिया था, लेकिन यह निर्देश दिया था कि भूस्वामियों को भूमि अधिग्रहण कानून, 2013 के मानकों के अनुसार मुआवजा, पुनर्वास और पुनर्व्यवस्था (Rehabilitation & Resettlement) लाभ प्रदान किए जाएं। हाईकोर्ट ने माना था कि कार्यवाही रद्द करने से सार्वजनिक उद्देश्य प्रभावित होगा, क्योंकि कुछ जमीन पहले ही तीसरे पक्ष को आवंटित की जा चुकी है।
  2. सुप्रीम कोर्ट में याचिकाकर्ता के तर्क:‘श्री सरयू नगर विकास समिति’ की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायणन (Gopal Sankaranarayanan) ने तर्क दिया कि 2013 के कानून के संरक्षण केवल मुआवजे तक सीमित नहीं हैं, बल्कि वे भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया (जैसे सामाजिक प्रभाव आकलन और सिंचित बहुफसली भूमि के अधिग्रहण पर रोक) पर भी लागू होते हैं।
  3. पुराने अधिग्रहणों का हवाला:शंकरनारायणन ने तर्क दिया कि पूर्व की दो योजनाओं में लगभग 1,400 एकड़ जमीन अधिग्रहित की गई थी, जिसमें से केवल 70 एकड़ का उपयोग हुआ है। ऐसे में पहले से उपलब्ध भूमि का पुनरीक्षण किए बिना अतिरिक्त 450 एकड़ जमीन अधिग्रहित करने की क्या आवश्यकता है?

अदालत में हुई तीखी नोकझोंक और मुख्य तर्क

1. “होटल निर्माण बनाम किसानों की आजीविका”:

अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी (Aishwarya Bhati) ने सरकार का पक्ष रखते हुए कहा कि यह 450 एकड़ अधिग्रहण अयोध्या के समग्र विकास का हिस्सा है, जिसमें आवास, सड़कें, स्कूल, अस्पताल, होटल, मठ और आश्रम शामिल हैं। 4 में से 3 गांवों का कब्जा लिया जा चुका है।

  • भाटी: “अयोध्या जैसी जगह में होटल कैसे नहीं हो सकते?”
  • शंकरनारायणन: “इसके लिए किसानों की बहुफसली सिंचित भूमि मत लीजिए।”
  • जब भाटी ने वैश्विक पर्यटन और तीर्थयात्रा का हवाला दिया, तो शंकरनारायणन ने तीखा सवाल किया:
  • शंकरनारायणन: “और इसलिए क्या किसानों को भूखा मरने दिया जाए?”
  • भाटी: “कोई किसी को भूखा नहीं मार रहा है। कानून के तहत पूरा मुआवजा और पुनर्वास लाभ दिया जा रहा है।”

2. सामाजिक प्रभाव आकलन (SIA) पर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी:

पीठ ने संतुलन बनाए रखने पर जोर देते हुए टिप्पणी की: “सामाजिक प्रभाव आकलन (Social Impact Assessment) को हल्के में नहीं दरकिनार किया जा सकता, लेकिन इसे राज्य/सरकार के गले का तौक भी नहीं बनाया जाना चाहिए। विकास और किसान अधिकारों के बीच एक सूक्ष्म संतुलन आवश्यक है।”

नई दिल्ली: भूमि अर्जन, पुनर्वासन और पुनर्व्यवस्थापन में उचित प्रतिकर और पारदर्शिता का अधिकार अधिनियम, 2013 (LARR Act, 2013) की धारा 4 से 9 (अनिवार्य सामाजिक प्रभाव आकलन / Social Impact Assessment – SIA), धारा 10 (खाद्य सुरक्षा की रक्षा हेतु सिंचित बहु-फसली भूमि के अधिग्रहण पर प्रतिबंध), उत्तर प्रदेश आवास एवं विकास परिषद अधिनियम, 1965, जनहित (Public Purpose) बनाम किसानों की खाद्य सुरक्षा, तथा पूर्व अधिग्रहित अनुपयुक्त भूमि के रहते नए अधिग्रहण के औचित्य पर भारत के सर्वोच्च न्यायालय में एक अत्यंत तीखी और नीतिगत बहस के बाद फैसला सुरक्षित रख लिया गया है।

भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की तीन-न्यायाधीशों की विशेष पीठ ने अयोध्या में ‘नव अयोध्या’ (ग्रीनफील्ड टाउनशिप) विकास योजना के तीसरे चरण के तहत लगभग 450 एकड़ भूमि के अधिग्रहण को चुनौती देने वाली ‘श्री सरयू नगर विकास समिति’ की विशेष अनुमति याचिका (SLP) पर विस्तृत सुनवाई पूरी की।

पीठ ने सामाजिक प्रभाव आकलन (SIA) के विधिक महत्व को रेखांकित करते हुए एक व्यावहारिक टिप्पणी की कि सामाजिक प्रभाव आकलन को हल्के में नजरअंदाज नहीं किया जा सकता, लेकिन साथ ही इसे राज्य के विकास कार्यों के लिए “गले की फांस / चक्की का पाट” (Millstone around the neck) भी नहीं बनाया जा सकता। अदालत कक्ष में विकास बनाम किसानों की आजीविका को लेकर वरिष्ठ अधिवक्ताओं के बीच तीखी नोकझोंक देखने को मिली।

अदालत कक्ष में तीखी बहस: गोपाल शंकरनारायणन बनाम एएसजी ऐश्वर्या भाटी

सुनवाई के दौरान अयोध्या के वैश्विक विकास और किसानों की उपजाऊ जमीन छीने जाने के मुद्दे पर दोनों पक्षों के वकीलों के बीच कड़े तर्क-वितर्क हुए:

  • एएसजी ऐश्वर्या भाटी (उत्तर प्रदेश राज्य):“अयोध्या एक प्रमुख वैश्विक तीर्थ स्थल और अंतरराष्ट्रीय पर्यटन केंद्र के रूप में उभर रहा है। यह अधिग्रहण अयोध्या के समग्र विकास—जिसमें आवास, सड़कें, स्कूल, अस्पताल, मठ-आश्रम और होटल शामिल हैं—का हिस्सा है। अयोध्या जैसी जगह पर होटल कैसे नहीं हो सकते?“
  • वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायणन (किसानों/समिति की ओर से):“होटल बनाने के लिए आप किसानों की बहु-फसली उपजाऊ जमीन (Multi-crop land) मत छीनिए!“
  • एएसजी भाटी का तर्क: अयोध्या की ओर पूरे विश्व का ध्यान और अंतरराष्ट्रीय श्रद्धालुओं की आवश्यकताएं हैं।
  • शंकरनारायणन का तीखा पलटवार:“तो क्या इसके लिए किसानों को भूखा मरने दिया जाए (Should the farmers starve)?“
  • एएसजी भाटी का जवाब:“कोई किसी को भूखा नहीं मार रहा है। कानून के अनुसार पूर्ण मुआवजा, पुनर्वास और पुनर्व्यवस्थापन के सभी वैधानिक लाभ दिए जा रहे हैं। चार में से तीन गांवों का कब्जा पहले ही लिया जा चुका है।”

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मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि एवं प्रक्रियात्मक कालक्रम (1965–2026)

चरण / विवरणतथ्यात्मक स्थिति एवं पक्षों के दावे
याचिकाकर्ताश्री सरयू नगर विकास समिति (प्रभावित किसानों और भूमि स्वामियों का संगठन)।
प्रतिवादी पक्षउत्तर प्रदेश आवास एवं विकास परिषद, उत्तर प्रदेश राज्य एवं अन्य।
विवादित भूमिअयोध्या के 4 गांवों में फैली लगभग 450 एकड़ सिंचित कृषि भूमि (ग्रीनफील्ड टाउनशिप / नव अयोध्या योजना चरण-3)।
इलाहाबाद हाईकोर्ट का फैसला (06.08.2026)हाईकोर्ट ने अधिग्रहण को रद्द करने से इनकार कर दिया था, यह कहते हुए कि सार्वजनिक हित प्रभावित होगा और कुछ भूमि तीसरे पक्षों को आवंटित की जा चुकी है। हालांकि, कोर्ट ने निर्देश दिया था कि भूमि स्वामियों को 2013 के LARR Act के समान मानकों पर मुआवजा, पुनर्वास और पुनर्व्यवस्थापन लाभ दिए जाएं।
सुप्रीम कोर्ट में याचिकाकर्ता की दलीलें1. 2013 का कानून केवल मुआवजे तक सीमित नहीं है, बल्कि अधिग्रहण की पूरी प्रक्रिया (SIA और बहु-फसली भूमि के संरक्षण) पर लागू होना चाहिए।
2. पूर्व की दो योजनाओं में लगभग 1,400 एकड़ भूमि अधिग्रहित की गई थी, जिसमें से केवल 70 एकड़ का उपयोग हुआ है और 1,330 एकड़ खाली है। पहले से उपलब्ध जमीन का आकलन किए बिना नई 450 एकड़ जमीन का अधिग्रहण दुर्भावनापूर्ण और अनावश्यक है।
राज्य सरकार (UP) का रुखसंपूर्ण अयोध्या का एकीकृत मास्टर प्लान है; 4 में से 3 गांवों का भौतिक कब्जा लिया जा चुका है; सड़कों, बुनियादी ढांचे, अस्पतालों, मठों और होटलों के लिए भूमि अपरिहार्य है; पूरा मुआवजा दिया जा रहा है।
सुप्रीम कोर्ट की अंतरिम स्थितिबहस पूरी होने के बाद फैसला सुरक्षित रख लिया गया है।

विधिक एवं संवैधानिक विश्लेषण: ‘2013 कानून के सुरक्षात्मक उपाय बनाम 1965 का राज्य अधिनियम’

  • सामाजिक प्रभाव आकलन (SIA) का वैधानिक उद्देश्य:
    • 2013 के केंद्रीय कानून का सबसे क्रांतिकारी पहलू यह था कि औपनिवेशिक 1894 के कानून की मनमानी को समाप्त कर जन-सुनवाई और सामाजिक प्रभाव आकलन (Social Impact Assessment) को अनिवार्य बनाया गया।
    • इसका उद्देश्य यह जांचना है कि क्या वास्तव में उस परियोजना के लिए उतनी ही जमीन की आवश्यकता है, क्या कोई अप्रयुक्त भूमि पहले से उपलब्ध है, और क्या स्थानीय आजीविका पूरी तरह नष्ट तो नहीं हो जाएगी।
    • शीर्ष अदालत की यह टिप्पणी अत्यंत संतुलित है कि जहां SIA महत्वपूर्ण है, वहीं इसे विकास परियोजनाओं को अनिश्चितकाल तक ठप करने वाला हथियार भी नहीं बनने दिया जा सकता।
  • खाद्य सुरक्षा और धारा 10 LARR Act:
    • धारा 10 स्पष्ट करती है कि सिंचित बहु-फसली भूमि (Irrigated Multi-cropped Land) का अधिग्रहण केवल “अंतिम विकल्प” (Demonstrable Last Resort) के रूप में और सख्त सीमाओं के भीतर ही किया जा सकता है।
    • यदि पहले से अधिग्रहित 1,400 एकड़ में से अधिकांश हिस्सा अप्रयुक्त पड़ा है, तो नई कृषि भूमि को व्यावसायिक होटलों या निजी विकास के लिए लेना धारा 10 की मूल भावना पर कानूनी सवाल खड़े करता है।
  • राज्य कानून (1965 Act) बनाम केंद्रीय कानून (2013 Act):
    • संविधान के अनुच्छेद 254 (समवर्ती सूची में टकराव) और सुप्रीम कोर्ट के गिरनार ट्रेडर्स तथा हालिया संविधान पीठ के फैसलों के आलोक में यह प्रश्न विचारणीय है कि क्या राज्य विकास प्राधिकरण पुराने राज्य अधिनियमों का सहारा लेकर 2013 के कानून के सुरक्षात्मक जांच-पड़ताल (Substantive Safeguards) से बच सकते हैं।

विधिक विवरण एवं उपस्थित वरिष्ठ अधिवक्ता

  • न्यायालय: भारत का सर्वोच्च न्यायालय (दीवानी अपीलीय क्षेत्राधिकार)
  • केस संदर्भ: श्री सरयू नगर विकास समिति बनाम उत्तर प्रदेश आवास एवं विकास परिषद व अन्य [विशेष अनुमति याचिका (सिविल)]
  • पीठ: मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जयमाल्या बागची एवं न्यायमूर्ति वी. मोहना
  • तारीख: 26 अक्टूबर 2026 (विस्तृत सुनवाई संपन्न; निर्णय सुरक्षित)
  • चुनौती के अधीन निर्णय: इलाहाबाद उच्च न्यायालय (लखनऊ पीठ) का निर्णय दिनांक 6 अगस्त 2026

विधिक प्रतिनिधित्व:

  • याचिकाकर्ता (सरयू नगर विकास समिति) की ओर से: वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायणन (Senior Advocate Gopal Sankaranarayanan)
  • उत्तर प्रदेश राज्य एवं आवास परिषद की ओर से: अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल (ASG) ऐश्वर्या भाटी (Additional Solicitor General Aishwarya Bhati)
  • प्रासंगिक कानून एवं विधिक प्रावधान:
    • भूमि अर्जन, पुनर्वासन और पुनर्व्यवस्थापन में उचित प्रतिकर और पारदर्शिता का अधिकार अधिनियम, 2013 (LARR Act) — धारा 4 से 9 (सामाजिक प्रभाव आकलन), धारा 10 (खाद्य सुरक्षा व बहु-फसली भूमि का संरक्षण), तथा धारा 26-30 (मुआवजा निर्धारण)
    • उत्तर प्रदेश आवास एवं विकास परिषद अधिनियम, 1965 — धारा 28, 32 व संबंधित अधिग्रहण उपबंध
    • भारत का संविधान — अनुच्छेद 300A (संपत्ति का संवैधानिक अधिकार), अनुच्छेद 21 (आजीविका का अधिकार), एवं अनुच्छेद 136
  • संबद्ध न्यायिक सिद्धांत:
    • विकास और पुनर्वास के संतुलन का विधिक मानक: ‘सार्वजनिक उद्देश्य के लिए भूमि अधिग्रहण वैध है, किंतु सामाजिक प्रभाव आकलन और खाद्य सुरक्षा सुरक्षा उपायों को नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए; हालांकि, पहले से आवंटित और विकसित हो रही वृहद योजनाओं में जनहित और किसानों के पुनर्वास लाभों के बीच सामंजस्य बिठाना अदालत का प्राथमिक दायित्व है।’
  • वर्तमान स्थिति: सर्वोच्च न्यायालय की तीन-न्यायाधीशों की विशेष पीठ ने दोनों पक्षों की विस्तृत बहस सुनने के बाद अपना अंतिम निर्णय सुरक्षित (Reserved) रख लिया है।

Ayodhya Development: मामले का संक्षिप्त विवरण (At A Glance)

विवरणजानकारी
संबंधित अदालतभारत का सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court of India)
पीठमुख्य न्यायाधीश सूर्या कांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची एवं न्यायमूर्ति वी. मोहना
याचिकाकर्ताश्री सरयू नगर विकास समिति (इलाहाबाद हाईकोर्ट के 6 अगस्त के फैसले को चुनौती)
प्रतिवादी/सरकारउत्तर प्रदेश आवास एवं विकास परिषद एवं राज्य सरकार (अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी द्वारा प्रतिनिधित्व)
मुख्य विवाद‘उत्तर प्रदेश आवास एवं विकास परिषद अधिनियम, 1965’ के तहत अयोध्या में 450 एकड़ बहुफसली/सिंचित भूमि का अधिग्रहण।
2013 कानून के तहत मांगसामाजिक प्रभाव आकलन (SIA) और बहुफसली उपजाऊ भूमि के अधिग्रहण पर प्रतिबंध के नियमों का पालन।
अदालत की कार्रवाईफैसला सुरक्षित (Reserved); राज्य के विकास और किसानों के अधिकारों के बीच संतुलन पर टिप्पणी।
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