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मामले की पृष्ठभूमि: क्या था पूरा विवाद?
- गैर-कृषि (NA) अनुमति का मामला:कलेक्टर अनिल धामेलिया ने 17 अगस्त 2026 को एक याचिकाकर्ता के गैर-कृषि (NA) उपयोग आवेदन को यह कहकर खारिज कर दिया था कि गुजरात राजस्व न्यायाधिकरण (GRT) के समक्ष पुनरीक्षण याचिकाएं (Revision Applications) लंबित हैं। हालांकि, याचिकाकर्ता का दावा था कि वे कार्यवाहियां 2024 में ही समाप्त हो चुकी थीं।
- हलफनामे में विवादित टिप्पणी:अदालत के सवाल का जवाब देते हुए कलेक्टर ने हलफनामे में लिखा कि GRT के तत्कालीन प्रभारी अध्यक्ष ने गुजरात हाईकोर्ट के आदेशों की सही व्याख्या किए बिना अन्य जमीनों पर आदेश पारित किए थे।
- हाईकोर्ट का कड़ा ऐतराज:न्यायाधीश निरल आर. मेहता ने स्पष्ट किया कि यदि पुनरीक्षण याचिकाओं के निपटारे की जानकारी ऑनलाइन पोर्टल पर अपडेट नहीं थी, तो कलेक्टर केवल उतना लिखकर बात खत्म कर सकते थे। न्यायिक अधिकारी के इतिहास को हलफनामे का हिस्सा बनाना पूरी तरह से अनावश्यक और न्यायिक व्यवस्था की गरिमा पर हमला है।
अदालत के मुख्य निष्कर्ष और तीखी टिप्पणियां
1. “अपराध दोहराने पर माफी की गंभीरता का पैमाना क्या है?”:
अदालत ने कलेक्टर के उस रवैये पर सवाल उठाया जहाँ बार-बार गलतियाँ करने के बाद औपचारिक माफी मांग ली जाती है: “आपकी इस सिंसियायरिटी (गंभीरता) का पैमाना क्या है? मैं इसे कैसे मापूँ? क्या आपके पास इसके लिए कोई बैरोमीटर या समीकरण है? माफी देने का मतलब यह होना चाहिए कि भविष्य में ऐसा आचरण दोबारा न दोहराया जाए।”
2. पूर्व में लंबित अवमानना मामले का हवाला:
- पीठ ने ध्यान दिलाया कि अप्रैल 2026 में एक खंडपीठ ने एक अन्य मामले में कलेक्टर धामेलिया के खिलाफ अवमानना (Contempt) के आरोप तय किए थे। इसके बावजूद उनके आचरण में कोई बदलाव नहीं आया।
3. अदालती मर्यादा और संयम:
- जस्टिस मेहता ने कहा कि अदालतें प्रशासनिक अधिकारियों के फैसलों से असहमत होने पर भी कभी व्यक्तिगत टिप्पणियां नहीं करतीं:“हम आपके कई आदेशों को रद्दी (Rubbish) पाते हैं, लेकिन क्या हमने कभी आपके खिलाफ व्यक्तिगत रूप से कुछ कहा? क्योंकि हम संयम बरतते हैं और मर्यादा का पालन करते हैं। आपको यह बात नहीं भूलनी चाहिए।”
अहमदाबाद: न्यायालय अवमानना अधिनियम, 1971 (Contempt of Courts Act, 1971) की धारा 2(c) (आपराधिक अवमानना—न्यायपालिका की गरिमा को कम करना या कलंकित करना / Scandalising the Court), शपथपत्रों (Affidavits) की शुचिता, प्रशासनिक अधिकारियों द्वारा न्यायिक आदेशों व अधिकारियों पर अनधिकृत टिप्पणियां करने की विधिक सीमाएं, सिविल प्रक्रिया संहिता (CPC) के आदेश 19 (शपथपत्र में अप्रासंगिक व मानहानिकारक सामग्री को हटाना), तथा भारत का संविधान के अनुच्छेद 215 के तहत अभिलेख न्यायालय (Court of Record) की अवमानना शक्तियों पर गुजरात हाईकोर्ट ने अत्यंत सख्त और गंभीर रुख अपनाया है।
गुजरात हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति निरल आर. मेहता (Justice Niral R Mehta) की एकल पीठ ने गैर-कृषि (NA) भूमि उपयोग की अनुमति के एक मामले में वडोदरा के जिला कलेक्टर अनिल धमेलिया (Vadodara Collector Anil Dhameliya) द्वारा दाखिल हलफनामे पर तीव्र अप्रसन्नता व्यक्त की। हलफनामे में गुजरात राजस्व अधिकरण (GRT) के तत्कालीन प्रभारी अध्यक्ष के खिलाफ की गई अनुचित और अपमानजनक टिप्पणियों को अदालत ने “परेशान करने वाला और न्यायपालिका को कलंकित करने वाला (Scandalous in nature)” करार दिया।
न्यायमूर्ति मेहता ने कलेक्टर द्वारा बार-बार मांगी गई बिना शर्त माफी (Unconditional Apology) को सिरे से खारिज कर दिया और हलफनामा वापस लेने की उनकी गुहार को भी ठुकरा दिया। अदालत ने सामान्य प्रशासन विभाग (GAD) के अतिरिक्त मुख्य सचिव को तलब कर राज्य सरकार को कलेक्टर के आचरण पर स्वतंत्र रूप से विचार करने और की जाने वाली अनुशासनात्मक/प्रशासनिक कार्रवाई से अवगत कराने का निर्देश दिया, जिसके बाद ही अदालत आपराधिक अवमानना शुरू करने पर फैसला करेगी। मामले की अगली सुनवाई 27 नवंबर 2026 को नियत की गई है।
उच्च न्यायालय के मुख्य कानूनी निष्कर्ष एवं विधिक टिप्पणियां
1. ‘आप कानून का पालन नहीं करते? न्यायिक अधिकारी पर आरोप लगाने की हिम्मत कैसे हुई?’
न्यायमूर्ति निरल आर. मेहता ने सुनवाई के दौरान कलेक्टर के आचरण को पूरी तरह अस्वीकार्य बताते हुए कहा: “क्या आप अदालत के निर्देशों के अनुसार अपने कर्तव्यों का निर्वहन कर रहे हैं? क्या आप किसी कानून का पालन नहीं करते? अपने एसी दफ्तर में बैठकर आप एक न्यायिक अधिकारी पर आरोप लगा रहे हैं? आपकी ऐसी हिम्मत कैसे हुई (How dare you)?“
न्यायाधीश ने आगे कहा: “दर्जनों-दर्जनों आदेशों में मैं आपको अनदेखा करता रहा हूँ। किंतु अब आपने अपनी सीमाएं लांघ दी हैं (You have crossed the limit now)।”
2. अप्रासंगिक तथ्य और न्यायिक अधिकारी पर लांछन (Scandalous Statements on Oath):
- मामला गैर-कृषि (NA) उपयोग की अनुमति खारिज किए जाने से जुड़ा था, जिसे कलेक्टर ने 17 अगस्त 2026 को इस आधार पर खारिज किया था कि गुजरात राजस्व अधिकरण (GRT) में रिवीजन याचिकाएं लंबित हैं, जबकि याचिकाकर्ता का दावा था कि वे कार्यवाहियां 2024 में ही समाप्त हो चुकी थीं।
- अदालत ने कहा कि कलेक्टर संक्षेप में यह स्पष्टीकरण दे सकते थे कि रिवीजन याचिकाओं का निपटारा ऑनलाइन पोर्टल पर अपडेट नहीं दिख रहा था। इसके बजाय उन्होंने जीआरटी के तत्कालीन प्रभारी अध्यक्ष द्वारा आनंद जिले के किसी अन्य मामले में पारित आदेश का अनावश्यक इतिहास बयान करना शुरू कर दिया और आरोप लगाया कि न्यायिक अधिकारी ने हाईकोर्ट के आदेशों की सही व्याख्या नहीं की।
- अदालत ने दर्ज किया:“कलेक्टर ने जो इतिहास सुनाना चुना है, वह इस अदालत के अनुसार, एक न्यायिक अधिकारी पर लांछन लगाने के अलावा कुछ नहीं है। शपथपत्र पर ऐसे पूरी तरह से अप्रासंगिक तथ्यों का उल्लेख न केवल व्यथित करने वाला है, बल्कि न्यायपालिका को कलंकित करने वाला (Scandalous in nature) है।”
3. बार-बार माफी मांगने का ‘पैमाना और बैरोमीटर’ क्या है?
- कलेक्टर द्वारा बार-बार बिना शर्त माफी मांगे जाने पर न्यायमूर्ति मेहता ने तीखा सवाल किया:“ईमानदारी (Sincerity) का पैमाना क्या है? मैं इसका आकलन कैसे करूँ? क्या आपके पास इसका कोई समीकरण या बैरोमीटर है? मैं कैसे मान लूँ कि अधिकारी वास्तव में माफी मांग रहा है और भविष्य में ऐसा दोबारा नहीं दोहराया जाएगा? आप यह माफी अपने उच्चाधिकारियों को दीजिए।”
- अदालत ने यह भी याद दिलाया कि न्यायपालिका संयम और मर्यादा का पालन करती है:“हम आपके सभी आदेशों को कूड़ा (Rubbish) पाते हैं, लेकिन क्या हमने कभी आपके खिलाफ व्यक्तिगत टिप्पणी की? क्योंकि हम संयम बरतते हैं, मर्यादा का पालन करते हैं। आपको यह कभी नहीं भूलना चाहिए।”
4. पूर्व में लंबित अवमानना कार्यवाहियों का संज्ञान:
- अदालत ने संज्ञान लिया कि वडोदरा कलेक्टर अनिल धमेलिया के खिलाफ पहले से ही एक अन्य मामले में उच्च न्यायालय की खंडपीठ के समक्ष आपराधिक अवमानना की कार्यवाही लंबित है, जिसमें अप्रैल 2026 में खंडपीठ द्वारा औपचारिक आरोप तय (Charges Framed) किए जा चुके हैं।
- अदालत ने चिंता जताई कि पूर्व कार्यवाहियों के बावजूद अधिकारी के आचरण में सुधार नहीं दिखा।
प्रक्रियात्मक कालक्रम एवं प्रशासनिक हस्तक्षेप
| चरण / विवरण | तथ्यात्मक स्थिति एवं पक्षों के तर्क |
| पीठासीन न्यायाधीश | न्यायमूर्ति निरल आर. मेहता, गुजरात उच्च न्यायालय। |
| संबंधित प्रशासनिक अधिकारी | अनिल धमेलिया, जिला कलेक्टर, वडोदरा (गुजरात)। |
| मूल दीवानी विवाद | एक विवादित भूखंड को गैर-कृषि (NA) उपयोग में परिवर्तित करने की अनुमति का आवेदन, जिसे कलेक्टर ने जीआरटी में मामला लंबित बताकर खारिज किया था। |
| विवादित हलफनामा (Affidavit) | कलेक्टर ने हलफनामे में लिखा कि जीआरटी के तत्कालीन प्रभारी अध्यक्ष ने आनंद जिले की किसी अन्य भूमि के मामले में गुजरात हाईकोर्ट के आदेशों की सही व्याख्या किए बिना आदेश पारित कर दिया था। |
| कलेक्टर का बचाव | कलेक्टर ने अदालत में बार-बार झुककर बिना शर्त माफी मांगी और हलफनामा वापस लेने (Withdraw) की अनुमति देने का आग्रह किया। |
| हाईकोर्ट का कड़ा रुख | हलफनामा वापस लेने से इनकार; माफी को संदेहास्पद माना; कहा कि प्रशासनिक अधिकारी किसी न्यायिक अधिकारी के न्यायिक आचरण पर लांछन लगाने के लिए उन्मुक्त (Immune) नहीं हैं। |
| राज्य सरकार को निर्देश | सामान्य प्रशासन विभाग (GAD) के अतिरिक्त मुख्य सचिव टी. नटराजन को वर्चुअल माध्यम से जोड़ा गया; अदालत ने संबंधित दस्तावेज उनके समक्ष रखकर राज्य को स्वतंत्र रूप से अनुशासनात्मक कदम तय करने को कहा। |
विधिक एवं संवैधानिक विश्लेषण: न्यायिक अधिकारियों का संरक्षण और ‘स्कैंडलाइजिंग द कोर्ट’
- न्यायालय अवमानना अधिनियम, 1971 की धारा 2(c) (Scandalising the Court):
- सर्वोच्च न्यायालय ने ब्रह्म प्रकाश शर्मा बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और सी. रविचंद्रन अय्यर बनाम जस्टिस ए.एम. भट्टाचार्जी में स्पष्ट किया है कि किसी भी न्यायिक अधिकारी के खिलाफ अनुचित, अपमानजनक या आधारहीन लांछन लगाना सीधे तौर पर न्याय प्रशासन में बाधा और अदालत की आपराधिक अवमानना का गठन करता है।
- किसी कार्यपालक अधिकारी (कलेक्टर) द्वारा अपने न्यायिक या अर्ध-न्यायिक आदेशों के बचाव में किसी न्यायिक अधिकरण (GRT) के पीठासीन अधिकारी की समझ या निष्ठा पर सवाल उठाना शक्ति पृथक्करण (Separation of Powers) के सिद्धांत का खुला उल्लंघन है।
- शपथपत्र पर माफी की प्रामाणिकता का सिद्धांत:
- सुप्रीम कोर्ट के निर्णयों (एम.वाई. शरीफ बनाम नागपुर हाईकोर्ट के जज एवं टी.एन. गोदवर्मन थिरुमुलपाद) के अनुसार, अदालत में माफी केवल तभी स्वीकार की जा सकती है जब वह वास्तविक पश्चाताप (Genuine Remorse) से उपजी हो।
- जब कोई अधिकारी पहले से अवमानना के आरोपों का सामना कर रहा हो और बार-बार समान आचरण दोहराता हो, तो बिना शर्त माफी को कानूनी जिम्मेदारी से बचने की एक यांत्रिक चाल (Subterfuge) माना जाता है, जिसे अदालतें खारिज कर सकती हैं।
विधिक विवरण
- न्यायालय: गुजरात उच्च न्यायालय (अहमदाबाद)
- पीठ: न्यायमूर्ति निरल आर. मेहता (एकल पीठ)
- निर्णय/आदेश की तिथि: अक्टूबर 2026
- संबद्ध अधिकारी: अनिल धमेलिया (IAS), जिला कलेक्टर, वडोदरा
- आगामी सुनवाई की तिथि: 27 नवंबर 2026
प्रासंगिक कानून एवं विधिक प्रावधान:
- न्यायालय अवमानना अधिनियम, 1971 (Contempt of Courts Act, 1971) — धारा 2(c) (आपराधिक अवमानना / Scandalising the Court) एवं धारा 12 (दण्ड व माफी के नियम)
- सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (CPC) — आदेश 19 नियम 3 (शपथपत्र के दायरे और अप्रासंगिक तथ्यों का निषेध)
- भारत का संविधान — अनुच्छेद 215 (उच्च न्यायालय की अभिलेख न्यायालय के रूप में अवमानना शक्ति) एवं अनुच्छेद 227 (अधीनस्थ न्यायालयों व अधिकरणों पर अधीक्षण)
- गुजरात लैंड रेवेन्यू कोड, 1879 — धारा 65 (गैर-कृषि / NA भूमि उपयोग अनुमति)
- संबद्ध न्यायिक सिद्धांत:
- प्रशासनिक अधिकारियों द्वारा न्यायिक अवमानना का विधिक मानक: ‘कार्यपालक अधिकारी एसी दफ्तरों में बैठकर न्यायिक अधिकारियों के विवेक और आदेशों पर मनमाने लांछन लगाने के लिए स्वतंत्र नहीं हैं; शपथपत्र पर न्यायपालिका के विरुद्ध असत्य या अप्रासंगिक आरोप लगाना आपराधिक अवमानना की श्रेणी में आता है; आदतन ऐसा आचरण करने वाले अधिकारियों की औपचारिक माफी अस्वीकार्य है और राज्य को उनके विरुद्ध अनुशासनात्मक कार्रवाई करनी चाहिए।’
- वर्तमान स्थिति: कलेक्टर अनिल धमेलिया का हलफनामा वापस लेने का अनुरोध और माफी खारिज; मामले के सभी दस्तावेज GAD के अतिरिक्त मुख्य सचिव टी. नटराजन के समक्ष स्वतंत्र विचारार्थ प्रेषित; राज्य सरकार को प्रस्तावित अनुशासनात्मक कार्रवाई से अदालत को अवगत कराने का निर्देश; अगली सुनवाई 27 नवंबर 2026।
Vadodara Collector: मामले का संक्षिप्त विवरण (At A Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | गुजरात उच्च न्यायालय (Gujarat High Court) |
| न्यायाधीश | न्यायमूर्ति निरल आर. मेहता (Justice Niral R Mehta) |
| प्रतिवादी अधिकारी | अनिल धामेलिया (कलेक्टर, वडोदरा) |
| मूल विवाद | गैर-कृषि (NA) उपयोग की अनुमति खारिज करना तथा गुजरात राजस्व न्यायाधिकरण (GRT) के तत्कालीन प्रभारी अध्यक्ष पर हलफनामे में टिप्पणी करना। |
| कोर्ट की मुख्य टिप्पणी | हलफनामे में न्यायिक अधिकारी पर आक्षेप लगाना न केवल अप्रासंगिक बल्कि “अपमानजनक और परेशान करने वाला” (Scandalous) है। |
| प्रशासनिक निर्देश | सामान्य प्रशासन विभाग (GAD) के अतिरिक्त मुख्य सचिव टी. नटराजन को मामले की स्वतंत्र समीक्षा कर 27 नवंबर 2026 तक कार्रवाई से अवगत कराने का निर्देश। |

