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अदालत में उठाया गया उदाहरण: ₹11,000 का इंजेक्शन ₹1,30,000 में
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने निजी अस्पताल में भर्ती एक दवा वितरक (Drug Dealer) की पत्नी का बेहद दर्दनाक उदाहरण साझा किया: “एक दवा डीलर की पत्नी का कैंसर का इलाज एक नामी निजी अस्पताल में चल रहा था। डीलर ने अस्पताल से गुहार लगाई कि ‘सर, मैं खुद डीलर हूं और मुझे यह कीमोथेरेपी इंजेक्शन ₹11,000 की डीलर दर पर मिलता है।’ अस्पताल ने बाहर से लाया इंजेक्शन लगाने से मना कर दिया और उसी इंजेक्शन के लिए ₹1,30,000 वसूल किए। क्या आप इस लूट का कोई औचित्य दिखा सकते हैं? यह अंतर क्यों है? पैसा कहां जाता है?”
जब अतिरिक्त सॉलिसीटर जनरल (ASG) ऐश्वर्या भाटी ने कहा कि सरकार नीतियों को “कैलिब्रेट” (अंशशोधन) कर रही है, तो पीठ ने कड़ा प्रहार किया: “आपका कैलिब्रेशन बेहद अनियंत्रित है। ₹11,000 से ₹1,30,000 कोई कैलिब्रेशन नहीं है… जब आप मरीजों और जीवन की बात करते हैं, तो क्या हमारे पास ऐसी पूंजीवादी सोच होनी चाहिए?”
सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य सवाल और कानूनी तर्क
1. DPCO का दायरा और विसंगतियां:
अदालत ने कहा कि कैंसर रोधी दवाओं के ट्रेड मार्जिन को 30% पर सीमित करने के केंद्र के हालिया फैसले के बावजूद, बाजार की 90% दवाएं अभी भी ‘दवा मूल्य नियंत्रण आदेश’ (DPCO) के दायरे से पूरी तरह बाहर हैं।
- उदाहरण: ₹15 की रिटेलर कीमत (PTR) वाली सेलाइन ड्रिप लाइन मरीजों के बिल में ₹250 की जोड़ी जाती है।
- पीठ ने संसदीय समितियों का हवाला देते हुए कहा: “तीन संसदीय समितियां बनीं, लेकिन उनकी रिपोर्ट उन लोगों के अनुकूल नहीं थी जो पर्दे के पीछे से सरकार चला रहे हैं।”
2. निजी अस्पतालों का तर्क बनाम सुप्रीम कोर्ट की खरी-खरी:
- अस्पतालों की दलील (वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी): निजी स्वास्थ्य ढांचा चलाना महंगा है। यदि दवाओं के मार्जिन कम किए जाएंगे तो अस्पताल ध्वस्त हो जाएंगे (Hospitals will collapse)। बाहर की दवाइयां नकली हो सकती हैं, इसलिए 24×7 इंफ्रास्ट्रक्चर चलाने के लिए यह मार्जिन जरूरी है।
- सुप्रीम कोर्ट का जवाब:“अस्पताल अन्य साधनों से जीवित रह सकते हैं, इस डकैती (Dacoity) के माध्यम से नहीं! आप एक व्यावसायिक अस्पताल हैं और हर चीज का शुल्क लेते हैं। लेकिन दवा पर 100-200 गुना कीमत क्यों छापी जाती है? निर्माताओं द्वारा दिया जाने वाला कॉर्पोरेट डिस्काउंट का छिपा हुआ खेल बंद होना चाहिए।”
3. ‘इनोवेशन’ और ‘आयुष्मान भारत’ की सीमा:
- जब सरकार ने कहा कि कड़े नियंत्रण से शोध और नवाचार (Innovation) प्रभावित होगा, तो पीठ ने पूछा कि “पिछले 30 वर्षों में भारतीय दवा उद्योग द्वारा विकसित किए गए 5 नए मॉलिक्यूल के नाम बताइए।”
- कोर्ट ने यह भी रेखांकित किया कि आयुष्मान भारत योजना के तहत ₹5 लाख की सीमा है, जबकि अस्पतालों के फूले हुए बिलों के कारण आम परिवारों को अपनी जेब से भारी रकम गंवानी पड़ती है।
नई दिल्ली: भारत का संविधान के अनुच्छेद 21 (स्वास्थ्य एवं गरिमापूर्ण जीवन का अधिकार / Right to Health and Affordable Healthcare), अनुच्छेद 47 (लोक स्वास्थ्य में सुधार का राज्य का प्राथमिक कर्तव्य), आवश्यक वस्तु अधिनियम, 1955 के तहत जारी दवा मूल्य नियंत्रण आदेश (DPCO, 2013), राष्ट्रीय औषधि मूल्य निर्धारण प्राधिकरण (NPPA), मेडिकल उपकरणों व उपभोग्य सामग्रियों (Consumables) पर अंधाधुंध ट्रेड मार्जिन, तथा जेनेरिक दवाओं की अनिवार्य पर्ची (Generic Prescription) के विधिक विनियमन पर भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने एक अत्यंत ऐतिहासिक व तीखी सुनवाई पूरी करते हुए अपना निर्णय सुरक्षित रख लिया है।
सर्वोच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति विक्रम नाथ (Justice Vikram Nath) और न्यायमूर्ति संदीप मेहता (Justice Sandeep Mehta) की खंडपीठ ने अधिवक्ता किशन चंद जैन द्वारा दायर जनहित याचिका (PIL) पर सुनवाई करते हुए निजी अस्पतालों के अत्यधिक मुनाफेखोरी (Exorbitant Profit Margins) को स्पष्ट शब्दों में “लूट और डकैती” (Loot and Dacoity) करार दिया।
न्यायालय ने निजी अस्पतालों द्वारा लाचार व मोलभाव करने की शून्य क्षमता (Zero Bargaining Power) रखने वाले गंभीर कैंसर रोगियों के शोषण और केंद्र सरकार के ढुलमुल विधिक रुख पर गहरी नाराजगी जताई। खंडपीठ ने कहा कि जब मामला नागरिकों के जीवन और गंभीर बीमारियों का हो, तो राज्य और निजी संस्थान ऐसी अनियंत्रित पूंजीवादी मानसिकता (Capitalistic Thinking) का बचाव नहीं कर सकते।
अदालत कक्ष में तीखी बहस: सुप्रीम कोर्ट बनाम केंद्र सरकार व निजी अस्पताल
सुनवाई के दौरान खंडपीठ ने एक वास्तविक और स्तब्धकारी घटना साझा करते हुए दवा कीमतों में 1,000% से अधिक के मार्जिन पर केंद्र सरकार और निजी अस्पतालों के वकीलों से सीधे सवाल किए:
1. ‘₹11,000 की दवा ₹1,30,000 में: पैसा कहाँ जाता है?’
पीठ ने एक दवा व्यापारी की कैंसर पीड़ित पत्नी का उदाहरण देते हुए पूछा: “उस डीलर ने अस्पताल से विनती की कि ‘सर, मैं खुद दवा डीलर हूँ और मुझे यह कीमोथेरेपी इंजेक्शन ₹11,000 के डीलर मूल्य पर मिलता है।’ अस्पताल ने बाहर से लाया गया इंजेक्शन लगाने से साफ इनकार कर दिया और उसी इंजेक्शन के लिए मरीज से ₹1,30,000 वसूले। क्या आप इस खुली लूट (Loot) का कोई औचित्य दिखा सकते हैं? यह भारी अंतर क्यों है? यह अतिरिक्त पैसा आखिर किसकी जेब में जाता है?”
2. ‘₹11,000 से ₹1,30,000 कोई कैलिब्रेशन नहीं है’:
- जब अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल (ASG) ऐश्वर्या भाटी ने कहा कि सरकार लगातार नीतियों का ‘कैलिब्रेशन’ (Calibrating) कर रही है, तो अदालत ने पलटवार किया:“आपका कैलिब्रेशन पूरी तरह दिशाहीन और भटका हुआ है। ₹11,000 की चीज को ₹1,30,000 में बेचना कोई कैलिब्रेशन नहीं होता… जब आप मरीजों और जिंदगी की बात करते हैं, तो क्या हमारे पास ऐसी बेलगाम पूंजीवादी सोच होनी चाहिए?“
3. ‘अस्पताल अन्य तरीकों से चलें, इस डकैती से नहीं’:
- निजी अस्पतालों का बचाव करते हुए वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी ने दलील दी कि सरकारी तंत्र पर भारी दबाव के कारण निजी अस्पतालों को आगे आना पड़ा है। यदि दवाओं और उपकरणों का मार्जिन खत्म किया गया, तो अस्पताल ध्वस्त (Collapse) हो जाएंगे क्योंकि उन्हें 24×7 इमरजेंसी सुविधाएं और भारी बुनियादी ढांचा बनाए रखना होता है।
- अदालत ने रोहतगी की दलील को सिरे से ठुकराते हुए कहा:“अस्पताल अन्य वैध तरीकों से अपने खर्चे निकाल सकते हैं, किंतु इस डकैती (Dacoity) के सहारे नहीं! आप एक व्यावसायिक अस्पताल हैं और हर सेवा का पैसा लेते हैं। फिर दवाओं पर 100 से 200 गुना मार्क-अप क्यों लगाया जाता है? दवा निर्माताओं द्वारा दिया जाने वाला कॉर्पोरेट डिस्काउंट आज भी पर्दे के पीछे छुपा हुआ है। आप सिर्फ इसलिए MRP की आड़ नहीं ले सकते क्योंकि आप एक निजी अस्पताल चला रहे हैं।”
4. ’30 वर्षों में भारतीय फार्मा ने कौन से 5 नए मॉलिक्यूल बनाए?’:
- अदालत ने केंद्र सरकार की इस दलील को भी खारिज किया कि भारी मार्जिन नवाचार (Innovation) और अनुसंधान के लिए आवश्यक है:“दवा पर ₹100 MRP छपी होती है, जबकि रिटेलर को वह ₹10 या ₹20 में मिलती है। फिर उस पर ₹100 क्यों छपने दिया जा रहा है? सरकार यह कहकर नियमन से क्यों बचती है कि यह गैर-शेड्यूल्ड दवा है? आप इनोवेशन की बात करते हैं, हमें पिछले 30 वर्षों में भारतीय फार्मा उद्योग द्वारा विकसित किए गए केवल 5 नए मॉलिक्यूल (Five New Molecules) के नाम बता दीजिए!“
जनहित याचिका (PIL) के प्रमुख विधिक बिंदु एवं मूल्य विसंगतियां
याचिकाकर्ता अधिवक्ता किशन चंद जैन द्वारा प्रस्तुत आंकड़ों और अदालत के संज्ञान में आए मुख्य तथ्य:
- उपभोग्य सामग्रियों (Consumables) में भारी लूट: कोर्ट ने रेखांकित किया कि सलाइन ड्रिप सेट, सीरिंज, कैनुला और ग्लव्स जैसी बुनियादी वस्तुएं, जिनका रिटेलर मूल्य (Price to Retailer – PTR) मात्र ₹15 होता है, अस्पतालों द्वारा मरीजों के बिल में ₹200 से ₹250 की दर से वसूली जाती हैं।
- संसदीय समितियों की अनदेखी: अदालत ने तल्ख टिप्पणी की कि दवा और उपकरण मूल्य नियंत्रण पर अब तक तीन संसदीय समितियां अपनी विस्तृत रिपोर्ट दे चुकी हैं, किंतु उनकी सिफारिशें उन शक्तिशाली लोगों के अनुकूल नहीं हैं “जो पर्दे के पीछे से सत्ता की डोर खींचते हैं (People who pull the strings)”।
- आयुष्मान भारत की सीमा: न्यायालय ने कहा कि सरकार आयुष्मान भारत जैसी योजनाओं का प्रचार करती है, किंतु ₹5 लाख की सीमा ऐसे कृत्रिम रूप से बढ़ाए गए बिलों के सामने कुछ ही दिनों में समाप्त हो जाती है और गरीब व मध्यमवर्गीय परिवार कर्ज के जाल में फंस जाते हैं।
मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि एवं प्रक्रियात्मक कालक्रम
| चरण / विवरण | तथ्यात्मक स्थिति एवं पक्षों के दावे |
| याचिकाकर्ता | अधिवक्ता किशन चंद जैन (जनहित याचिकाकर्ता)। |
| प्रतिवादी पक्ष | एथिक्स एंड मेडिकल रजिस्ट्रेशन बोर्ड (EMRB), राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग (NMC), केंद्रीय रसायन एवं उर्वरक मंत्रालय (NPPA), केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय व अन्य। |
| मुख्य प्रार्थनाएं | 1. सभी डॉक्टरों के लिए जेनेरिक दवाओं का प्रिस्क्रिप्शन अनिवार्य किया जाए। 2. गैर-शेड्यूल्ड दवाओं (Non-scheduled Drugs) के प्रारंभिक मूल्य पर सख्त नियंत्रण लागू हो। 3. चिकित्सा उपकरणों और उपभोग्य सामग्रियों पर DPCO के तहत सांविधिक ट्रेड मार्जिन कैप (Statutory Trade Margin Caps) लगाया जाए। |
| केंद्र सरकार का रुख | सरकार बाजार की शक्तियों और दवाओं की उपलब्धता के बीच संतुलन बना रही है; हाल ही में एंटी-कैंसर दवाओं के ट्रेड मार्जिन को 30% पर सीमित किया गया है। |
| निजी अस्पतालों का रुख | वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी के अनुसार, निजी अस्पतालों का परिचालन व्यय भारी है; बाहर से लाई गई दवाओं पर भरोसा नहीं किया जा सकता क्योंकि बाजार में नकली दवाएं मौजूद हैं; मार्जिन घटाने से अस्पताल बंद हो जाएंगे। |
| सुप्रीम कोर्ट का अंतिम कदम | पीठ ने दोनों पक्षों की विस्तृत बहस पूरी होने के बाद अपना ऐतिहासिक फैसला सुरक्षित (Reserved) रख लिया। |
विधिक एवं संवैधानिक विश्लेषण: ‘जीवन का अधिकार बनाम अनियंत्रित वाणिज्य’
- अनुच्छेद 21 के तहत ‘स्वास्थ्य का मौलिक अधिकार’:
- सर्वोच्च न्यायालय ने पश्चिम बंगाल खेत मजदूर समिति बनाम पश्चिम बंगाल राज्य और उपभोक्ता शिक्षा एवं अनुसंधान केंद्र (CERC) बनाम भारत संघ में स्पष्ट रूप से स्थापित किया है कि स्वास्थ्य का अधिकार जीवन के अधिकार का अनिवार्य और अविभाज्य अंग है।
- यदि कोई जीवन रक्षक दवा केवल अत्यधिक मूल्य और अनियंत्रित ट्रेड मार्जिन के कारण आम नागरिक की पहुंच से बाहर हो जाती है, तो यह अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार का सीधा हनन है।
- दवा मूल्य नियंत्रण आदेश (DPCO, 2013) की विधिक कमियां:
- वर्तमान में राष्ट्रीय आवश्यक औषधि सूची (NLEM) के तहत आने वाली शेड्यूल्ड दवाओं पर ही सख्त सीलिंग मूल्य (Ceiling Price) लागू होता है।
- गैर-शेड्यूल्ड दवाओं (जो बाजार का 80-90% हिस्सा हैं) के लिए निर्माताओं को सालाना 10% तक दाम बढ़ाने की छूट है, और अस्पतालों को थोक खरीद पर मिलने वाली भारी छूट (Hospital Discount) को दरकिनार कर अधिकतम खुदरा मूल्य (MRP) पर दवाएं बेचने की खुली छूट मिली हुई है। न्यायालय इसी विधिक लूपहोल को समाप्त करने के संकेत दे चुका है।
विधिक विवरण एवं उपस्थित वरिष्ठ अधिवक्ता
- न्यायालय: भारत का सर्वोच्च न्यायालय (संवैधानिक जनहित याचिका क्षेत्राधिकार)
- केस संदर्भ: किशन चंद जैन बनाम एथिक्स एंड मेडिकल रजिस्ट्रेशन बोर्ड (EMRB) व अन्य [Writ Petition (Civil) No. … / 2024]
- पीठ: न्यायमूर्ति विक्रम नाथ एवं न्यायमूर्ति संदीप मेहता
- तारीख: 27 अक्टूबर 2026 (विस्तृत सुनवाई संपन्न; निर्णय सुरक्षित)
विधिक प्रतिनिधित्व:
- याचिकाकर्ता की ओर से: अधिवक्ता किशन चंद जैन (व्यक्तिगत रूप से / काउंसिल के माध्यम से)
- भारत संघ (केंद्र सरकार) की ओर से: अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल (ASG) ऐश्वर्या भाटी (Additional Solicitor General Aishwarya Bhati)
- निजी अस्पतालों एवं एसोसिएशन की ओर से: वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी (Senior Advocate Mukul Rohatgi)
- प्रासंगिक कानून एवं विधिक नीतियां:
- भारत का संविधान — अनुच्छेद 21 (जीवन और स्वास्थ्य का अधिकार), अनुच्छेद 47 (लोक स्वास्थ्य सुधार का निर्देशक सिद्धांत), एवं अनुच्छेद 32
- आवश्यक वस्तु अधिनियम, 1955 — धारा 3 (मूल्य नियंत्रण की शक्तियां)
- दवा मूल्य नियंत्रण आदेश, 2013 (DPCO, 2013) एवं राष्ट्रीय औषधि मूल्य निर्धारण प्राधिकरण (NPPA) दिशा-निर्देश
- राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग अधिनियम, 2019 (NMC Act) एवं पंजीकृत चिकित्सकों हेतु व्यावसायिक आचरण विनियम
- संबद्ध न्यायिक सिद्धांत:
- दवा मूल्य निर्धारण और स्वास्थ्य के अधिकार का विधिक मानक: ‘जीवन रक्षक दवाएं और मेडिकल उपकरण शुद्ध वाणिज्य का विषय नहीं हो सकते; विवश और गंभीर रूप से बीमार मरीजों से अस्पताल में 1,000% तक का अनुचित ट्रेड मार्जिन और मार्क-अप वसूलना खुली लूट है; राज्य का यह संवैधानिक दायित्व है कि वह DPCO और सख्त सांविधिक नियमों के माध्यम से गैर-शेड्यूल्ड दवाओं और उपभोग्य सामग्रियों पर तार्किक ट्रेड मार्जिन कैप लागू करे।’
- वर्तमान स्थिति: सर्वोच्च न्यायालय की खंडपीठ ने सभी पक्षों की विस्तृत दलीलें सुनने के बाद अपना अंतिम निर्णय सुरक्षित (Reserved) रख लिया है।
Cancer Drugs:मामले का संक्षिप्त विवरण (At A Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | भारत का सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court of India) |
| पीठ | न्यायमूर्ति विक्रम नाथ एवं न्यायमूर्ति संदीप मेहता |
| मामला/साइटेशन | किशन चंद जैन बनाम एथिक्स एंड मेडिकल रजिस्ट्रेशन बोर्ड व अन्य (Kishan Chand Jain vs EMRB & Ors.) |
| याचिकाकर्ता | अधिवक्ता किशन चंद जैन (जनहित याचिका) |
| पक्षकार | केंद्र सरकार (ASG ऐश्वर्या भाटी) एवं निजी अस्पताल (वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी) |
| मुख्य मांग | 1. जनरिक दवाएं: जेनेरिक दवाओं का अनिवार्य प्रिस्क्रिप्शन। 2. DPCO विस्तार: गैर-अनुसूचित दवाओं की शुरुआती कीमतों पर कड़ा नियंत्रण और कंज्यूमेबल्स पर ट्रेड मार्जिन कैप। |
| अदालत का फैसला | फैसला सुरक्षित (Verdict Reserved); जीवनरक्षक दवाओं पर असीमित मुनाफे की कड़ी भर्त्सना। |

