Friday, October 30, 2026
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Power Theft: बिजली जीवन और आजीविका के लिए आवश्यक वस्तु; बिजली चोरी विवाद में हाईकोर्ट दे सकते हैं बहाली का आदेश, पर उदार रवैया अनुचित

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मामले की पृष्ठभूमि: ₹93 लाख का बिल और हाईकोर्ट का अंतरिम आदेश

  1. बिजली चोरी के आरोप और भारी भरकम बिल:यह विवाद वैभव मेटल क्रशर से जुड़ा है, जिस पर बिजली कंपनियों ने चोरी का आरोप लगाते हुए लगभग ₹93 लाख का पूरक बिल (Supplementary Bill) और ₹23.45 लाख का कंपाउंडिंग शुल्क जमा करने का नोटिस थमाया था। भुगतान न होने पर बिजली काट दी गई थी।
  2. गुजरात हाईकोर्ट का राहत भरा रुख:गुजरात हाईकोर्ट ने उपभोक्ता को बड़ी राहत देते हुए निर्देश दिया था कि यदि वह आकलित राशि का 50 प्रतिशत हिस्सा जमा कर देता है, तो उसकी बिजली सप्लाई तुरंत बहाल कर दी जाए, तथा उपभोक्ता को इस आकलन को वैधानिक रूप से चुनौती देने की अनुमति दी जाए।
  3. बिजली कंपनियों की सुप्रीम कोर्ट में दलील:बिजली कंपनियों ने सुप्रीम कोर्ट में तर्क दिया कि बिजली चोरी (Section 135) के मामलों में प्रक्रियात्मक सुरक्षा उपाय (Procedural Safeguards) उपलब्ध नहीं होते हैं, जो केवल अनधिकृत उपयोग (Unauthorised Use of Electricity – Section 126) में दिए जाते हैं।

सुप्रीम COURT के मुख्य निष्कर्ष और विधिक सिद्धांत

1. “चोरी के मामलों में सतर्कता बरतें अदालतें”:

पीठ ने स्पष्ट किया कि चूंकि बिजली चोरी के मामलों में आपराधिक मंशा (Mens Rea) शामिल होती है, इसलिए अदालतों को बिना सोचे-समझे राहत देने से बचना चाहिए। यदि प्रथम दृष्टया आकलन मनमाना लगता है, तो हाईकोर्ट कम से कम 50% राशि जमा कराने का आदेश दर्ज करके ही बिजली बहाली का आदेश दे सकता है।

2. विद्युत अधिनियम, 2003 की धारा 126 और 127 की व्यापकता:

सर्वोच्च न्यायालय ने बिजली कंपनियों के इस तर्क को खारिज कर दिया कि चोरी के मामलों में प्रक्रियात्मक अधिकार लागू नहीं होते। कोर्ट ने फैसला सुनाया कि जब तक ‘सप्लाई कोड’ में कोई अलग प्रक्रिया न हो, तब तक चोरी के मामलों में भी धारा 126 (अंतिम आकलन और आपत्तियां सुनना) और धारा 127 (अपील का अधिकार) के तहत प्रक्रियात्मक सुरक्षा प्रदान की जानी चाहिए।

3. विशेष अदालत (Special Court) का क्षेत्राधिकार:

अदालत ने स्पष्ट किया कि भले ही अंतरिम तौर पर 50% जमा कराकर बिजली बहाल की जा रही हो, लेकिन सिविल देनदारी (Civil Liability) का अंतिम निर्धारण आपराधिक मुकदमे के साथ धारा 154 के तहत गठित विशेष अदालत द्वारा ही तय किया जाएगा।

नई दिल्ली: भारत का संविधान के अनुच्छेद 226 (उच्च न्यायालय का असाधारण रिट क्षेत्राधिकार—मनमानी प्रशासनिक कार्रवाई के विरुद्ध नागरिक संरक्षण), विद्युत अधिनियम, 2003 (Electricity Act, 2003) की धारा 126 (विद्युत का अनधिकृत उपयोग—अनंतिम व अंतिम निर्धारण प्रक्रिया), धारा 127 (अपीलीय अधिकार), धारा 135 (बिजली चोरी का अपराध—Mens Rea), धारा 152 (शमन शुल्क / Compounding Charges), तथा धारा 154(5) (विशेष अदालत द्वारा दीवानी दायित्व का निर्धारण / Determination of Civil Liability) के परस्पर विधिक संबंधों पर सुप्रीम कोर्ट ने एक अत्यंत संतुलित और महत्वपूर्ण निर्णय सुनाया है।

सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा (Justice Manoj Misra) और न्यायमूर्ति के.वी. विश्वनाथन (Justice KV Viswanathan) की खंडपीठ ने ‘दक्षिण गुजरात विज कंपनी लिमिटेड’ (DGVCL) और ‘पश्चिम गुजरात विज कंपनी लिमिटेड’ (PGVCL) द्वारा दायर अपीलों को खारिज करते हुए गुजरात उच्च न्यायालय के आदेशों को बरकरार रखा है।

शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया कि संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत उच्च न्यायालयों को बिजली चोरी के विवादित मामलों में भी बिजली आपूर्ति बहाल (Restoration of Electricity) करने का आदेश देने का पूर्ण अधिकार है, क्योंकि बिजली जीवन और आजीविका के लिए अनिवार्य है। हालांकि, अदालत ने सचेत किया कि बिजली चोरी के मामलों में आपराधिक मंशा (Mens Rea) शामिल होती है, इसलिए अदालतों को अंधाधुंध ‘उदार रवैया’ (Liberal Approach) अपनाने से बचना चाहिए। यदि अनंतिम निर्धारण प्रथम दृष्टया मनमाना प्रतीत होता है, तो न्यायालय कारणों को दर्ज करते हुए मांग राशि का न्यूनतम 50 प्रतिशत जमा कराने जैसी उचित शर्तों के अधीन ही बिजली बहाली का आदेश दे सकते हैं।

शीर्ष अदालत के मुख्य कानूनी निष्कर्ष एवं विधिक टिप्पणियां

1. ‘बिजली जीवन और आजीविका का अनिवार्य अंग; मनमानी कार्रवाई पर हाईकोर्ट कर सकते हैं हस्तक्षेप’

न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा और न्यायमूर्ति के.वी. विश्वनाथन की पीठ ने बिजली के मूलभूत महत्व को रेखांकित करते हुए अपने 26 अक्टूबर 2026 के निर्णय में दर्ज किया: “बिजली जीवन और आजीविका दोनों के लिए एक अनिवार्य वस्तु (Essential Commodity) है। इससे वंचित किए जाने के गंभीर परिणाम हो सकते हैं। अतः किसी उपयुक्त मामले में, राज्य और उसके उपकरणों (जिनमें वितरण लाइसेंसधारी/डिस्कॉम भी शामिल हैं) की मनमानी कार्रवाई से किसी व्यक्ति की रक्षा के लिए उच्च न्यायालय अपनी संवैधानिक शक्तियों का प्रयोग करने में पूरी तरह उचित (Justified) हो सकता है।”

2. ‘बिजली चोरी में आपराधिक मंशा शामिल; उदार दृष्टिकोण उचित नहीं’:

  • अदालत ने सामान्य अनधिकृत उपयोग और बिजली चोरी के बीच अंतर स्पष्ट करते हुए न्यायिक संयम की आवश्यकता पर बल दिया:“बिजली चोरी के मामलों में, जहाँ अनिवार्य रूप से एक आपराधिक मंशा (Mens Rea) शामिल होती है, उदार दृष्टिकोण (Liberal Approach) अपनाना उचित नहीं हो सकता।प्रत्येक मामले का निपटारा उसके अपने विशिष्ट तथ्यों के आधार पर किया जाना चाहिए। यदि मामले के तथ्य इसकी मांग करते हैं, तो उच्च न्यायालय अनंतिम रूप से निर्धारित पूरी राशि (100% Demand) जमा होने तक बिजली आपूर्ति की बहाली की प्रार्थना को अस्वीकार करने में भी उचित हो सकता है। संक्षेप में, चोरी के आधार पर काटी गई बिजली की बहाली की याचिकाओं से निपटते समय एक अत्यंत सतर्क और विचारशील दृष्टिकोण (Circumspect Approach) अपेक्षित है।”

3. ‘चोरी के मामलों में भी धारा 126 की प्रक्रियात्मक सुरक्षा से पूरी तरह वंचित नहीं किया जा सकता’:

  • डिस्कॉम्स ने तर्क दिया था कि बिजली चोरी (धारा 135) के मामलों में उपभोक्ता को धारा 126 के तहत दी जाने वाली प्रक्रियात्मक सुरक्षा (जैसे अनंतिम निर्धारण पर आपत्ति दर्ज करना या धारा 127 में अपील करना) उपलब्ध नहीं होती।
  • सुप्रीम कोर्ट ने इस अंतर को खारिज करते हुए विधिक व्यवस्था दी:“लागू इलेक्ट्रिसिटी सप्लाई कोड के तहत यदि कोई पृथक प्रक्रिया निर्धारित नहीं है, तो बिजली चोरी के मामलों में किए गए निर्धारण को भी अधिनियम की धारा 126 के तहत निर्धारित प्रक्रिया का अनिवार्य रूप से पालन करना होगा।इसमें उपभोक्ता को अनंतिम निर्धारण (Provisional Assessment) पर आपत्ति दर्ज करने का अवसर देना और अंतिम निर्धारण के विरुद्ध धारा 127 के तहत अपील करने का अधिकार शामिल है।”

4. विशेष अदालत की दीवानी देयता निर्धारण (धारा 154) की अधीनता:

  • पीठ ने स्पष्ट किया कि यद्यपि धारा 126 और 127 के तहत प्रशासनिक व अपीलीय निर्धारण चलेगा, किंतु आपराधिक मुकदमा चलने की स्थिति में यह संपूर्ण निर्धारण विद्युत अधिनियम की धारा 154(5) के तहत विशेष अदालत (Special Court) द्वारा तय की जाने वाली दीवानी देयता (Civil Liability) के अंतिम निर्णय के अधीन रहेगा।

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मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि एवं प्रक्रियात्मक कालक्रम

चरण / विवरणतथ्यात्मक स्थिति एवं पक्षों के दावे
अपीलकर्ता पक्षदक्षिण गुजरात विज कंपनी लिमिटेड (DGVCL) एवं पश्चिम गुजरात विज कंपनी लिमिटेड (PGVCL)।
प्रतिवादी उपभोक्तामेसर्स वैभव मेटल क्रशर (Vaibhav Metal Crusher) व अन्य।
विवाद का मूल स्वरूपबिजली वितरण कंपनी द्वारा औद्योगिक परिसर के औचक निरीक्षण के बाद कथित बिजली चोरी का आरोप लगाकर बिजली कनेक्शन काटा जाना।
वितरण कंपनी द्वारा जारी बिल• कथित बिजली चोरी का पूरक निर्धारण: लगभग ₹93,00,000 (₹93 लाख)।
• अपराध शमन शुल्क (Compounding Charges): ₹23,45,000 (₹23.45 लाख)।
• कुल मांग: ₹1.16 करोड़ से अधिक।
गुजरात हाईकोर्ट का रुखहाईकोर्ट ने उपभोक्ता को राहत देते हुए निर्देश दिया कि यदि वह कुल मांग का 50 प्रतिशत हिस्सा जमा कर देता है, तो उसकी बिजली आपूर्ति तुरंत बहाल की जाए; साथ ही उपभोक्ता को अंतिम निर्धारण के खिलाफ सक्षम अपीलीय मंच पर जाने की छूट दी।
सुप्रीम कोर्ट में डिस्कॉम की दलीलबिजली कंपनियों ने दलील दी कि धारा 135 के तहत चोरी का मामला धारा 126 के ‘अनधिकृत उपयोग’ (Unauthorised Use) से अलग है, अतः उपभोक्ता किसी भी रियायत या आनुपातिक बहाली का हकदार नहीं है।
सुप्रीम कोर्ट का अंतिम निर्णयदोनों अपीलें खारिज; गुजरात हाईकोर्ट का 50% जमा पर बिजली बहाली का आदेश बरकरार; दूसरे मामले में हाईकोर्ट का रिमांड आदेश भी कायम रखा गया।

विधिक एवं विधायी विश्लेषण: ‘धारा 126 (अनधिकृत उपयोग) बनाम धारा 135 (चोरी) और धारा 154’

  • प्रक्रियात्मक शून्यता और धारा 126 का सहारा:
    • विद्युत अधिनियम, 2003 की धारा 135 बिजली चोरी को अपराध घोषित करती है और लाइन काटने का अधिकार देती है, किंतु यदि राज्य विद्युत नियामक आयोग (SERC) के ‘सप्लाई कोड’ में चोरी के वित्तीय नुकसान के निर्धारण की कोई अलग पारदर्शी प्रक्रिया नहीं दी गई है, तो डिस्कॉम एकतरफा और मनमाना बिल नहीं थोप सकते।
    • सुप्रीम कोर्ट ने सुस्थापित किया कि प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के तहत धारा 126 की प्रक्रिया (अनंतिम आदेश $\rightarrow$ उपभोक्ता की आपत्ति $\rightarrow$ सुनवाई $\rightarrow$ अंतिम आदेश) को लागू किया जाना चाहिए ताकि उपभोक्ता को अपनी बात रखने का अवसर मिले।
  • संविधान का अनुच्छेद 226 और 50% जमा का संतुलनकारी सिद्धांत:
    • किसी औद्योगिक इकाई (जैसे स्टोन क्रशर) या घरेलू उपभोक्ता की बिजली कट जाने से उसका पूरा व्यवसाय और आजीविका ठप हो जाती है।
    • यदि बिजली कंपनी ₹1 करोड़ का मनमाना बिल थमा दे और कहे कि “पूरी रकम भरे बिना बिजली नहीं जुड़ेगी”, तो यह उपभोक्ता को ब्लैकमेल करने जैसा होगा।
    • इसलिए सुप्रीम कोर्ट ने माना कि कम से कम 50% राशि जमा कराने की शर्त डिस्कॉम के वित्तीय हित और उपभोक्ता के आजीविका के अधिकार (अनुच्छेद 21) के बीच एक संतुलित ‘सुविधा का संतुलन’ (Balance of Convenience) बनाती है।

विधिक विवरण एवं उपस्थित वरिष्ठ अधिवक्ता

  • न्यायालय: भारत का सर्वोच्च न्यायालय (दीवानी अपीलीय क्षेत्राधिकार)
  • केस संदर्भ: दक्षिण गुजरात विज कंपनी लिमिटेड बनाम वैभव क्रशर [Civil Appeal No. … / 2026] (संबद्ध अपील: PGVCL बनाम अन्य)
  • पीठ: न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा एवं न्यायमूर्ति के.वी. विश्वनाथन
  • निर्णय की तिथि: 26 अक्टूबर 2026
  • कार्यवाही का परिणाम: बिजली वितरण कंपनियों की दोनों अपीलें पूर्णतः खारिज; गुजरात हाईकोर्ट द्वारा 50% राशि जमा पर बिजली बहाली का आदेश बरकरार।

विधिक प्रतिनिधित्व:

  • अपीलकर्ता बिजली कंपनियों (DGVCL / PGVCL) की ओर से: वरिष्ठ अधिवक्ता रंजीत कुमार (Senior Advocate Ranjit Kumar), जिन्हें अधिवक्ता इंदु मिश्रा, दलीप ध्यानी एवं सूरज सिंह ने सहयोग दिया।
  • प्रतिवादी उपभोक्ताओं (वैभव क्रशर आदि) की ओर से: वरिष्ठ अधिवक्ता राघेंथ बसंत (Senior Advocate Raghenth Basant), जिन्हें अधिवक्ता ध्रुविक पटेल, हिमा भारद्वाज, शिवांग गोयल एवं ईशान अग्रवाल ने सहयोग दिया।
  • प्रासंगिक कानून एवं विधिक प्रावधान:
    • भारत का संविधान — अनुच्छेद 226 (उच्च न्यायालय का रिट क्षेत्राधिकार) एवं अनुच्छेद 21 (जीवन और आजीविका का अधिकार)
    • विद्युत अधिनियम, 2003 (Electricity Act, 2003):
      • धारा 126 — अनधिकृत विद्युत उपयोग का निर्धारण और प्रक्रियात्मक सुरक्षा
      • धारा 127 — अंतिम निर्धारण आदेश के विरुद्ध अपीलीय प्राधिकारी के समक्ष अपील
      • धारा 135 — विद्युत चोरी (अपराध, दंड एवं कनेक्शन विच्छेदन)
      • धारा 152 — अपराधों का शमन (Compounding of Offences)
      • धारा 154(5) — विशेष अदालत द्वारा दीवानी दायित्व (नुकसान) का अंतिम निर्धारण
  • संबद्ध न्यायिक सिद्धांत:
    • बिजली चोरी विवादों में आपूर्ति बहाली और न्यायिक समीक्षा का विधिक मानक: ‘बिजली एक अनिवार्य वस्तु है और इसकी मनमानी कटौती के विरुद्ध संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत रिट याचिका पूरी तरह पोषणीय है; चूंकि बिजली चोरी में आपराधिक मंशा अंतर्निहित होती है, अतः अदालतों को बिना शर्त बहाली का उदार रवैया नहीं अपनाना चाहिए; जहां अनंतिम निर्धारण प्रथम दृष्टया संदेहास्पद या अत्यधिक प्रतीत हो, वहां उच्च न्यायालय मांग राशि का न्यूनतम 50 प्रतिशत जमा कराने और कारणों को लिपिबद्ध करने के बाद ही बिजली बहाली का आदेश दे सकते हैं; ऐसा प्रशासनिक निर्धारण विशेष अदालत द्वारा धारा 154(5) के तहत तय की जाने वाली अंतिम दीवानी देयता के अधीन रहेगा।’
  • वर्तमान स्थिति व विधिक प्रभाव: सुप्रीम कोर्ट के इस निर्णय के बाद वैभव मेटल क्रशर 50% मांग राशि जमा करने के आधार पर अपनी बिजली आपूर्ति चालू रखने का हकदार रहेगा; साथ ही, वह निर्धारण आदेश को कानून के तहत अपीलीय मंच और विशेष अदालत के समक्ष चुनौती देने के लिए पूरी तरह स्वतंत्र है।

Power Theft:मामले का संक्षिप्त विवरण (At A Glance)

विवरणजानकारी
संबंधित अदालतभारत का सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court of India)
पीठन्यायमूर्ति मनोज मिश्रा एवं न्यायमूर्ति के.वी. विश्वनाथन
मामला/साइटेशनदक्षिण गुजरात विज बनाम वैभव क्रशर (Dakshin Gujarat Vij Vs Vaibhav Crusher)
अपीलकर्ता (बिजली कंपनियां)दक्षिण गुजरात विज कंपनी लि. व अन्य | प्रतिनिधित्व: वरिष्ठ अधिवक्ता रंजीत कुमार व अन्य
प्रतिवादी (उपभोक्ता)वैभव मेटल क्रशर व अन्य | प्रतिनिधित्व: वरिष्ठ अधिवक्ता राघवेंद्र बसंत व अन्य
मूल विवादबिजली चोरी के आरोप में ₹93 लाख का बिल + ₹23.45 लाख कंपाउंडिंग चार्ज का पूरक बिल जारी कर कनेक्शन काटना।
अदालत का फैसला1. गुजरात हाईकोर्ट का आदेश बरकरार: 50% राशि जमा करने पर बिजली कनेक्शन बहाल करने का हाईकोर्ट का निर्देश सही ठहराया।
2. धारा 126 लागू होगी: बिजली चोरी के मामलों में भी अंतिम मूल्यांकन (Assessment) से पहले धारा 126 की प्रक्रिया (आपत्ति दाखिल करने का मौका) लागू होगी।
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