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मामले की पृष्ठभूमि: बुजुर्ग दंपति से 1.05 करोड़ की ठगी और SC का कड़ा रुख
- डिजिटल अरेस्ट स्कैम का बढ़ता जाल:यह मामला एक वरिष्ठ नागरिक दंपति की शिकायत के बाद शुरू हुआ, जिन्हें सुप्रीम कोर्ट के फर्जी मुहर लगे न्यायिक आदेश दिखाकर और गिरफ्तार करने की धमकी देकर ₹1.05 करोड़ ठग लिए गए थे।
- आरबीआई की ढिलाई पर सवाल:CJI सूर्यकांत ने आरबीआई द्वारा बैंकों पर नरम रुख अपनाने (Soft-pedalling) पर सवाल उठाए। उन्होंने पूछा कि जब किसी पेंशनभोगी के बचत खाते से अचानक असामान्य और बहुत बड़ी राशि ट्रांसफर होती है, तो बैंक की सुरक्षा प्रणालियां स्वतः हस्तक्षेप क्यों नहीं करतीं?
- अटॉर्नी जनरल की दलील:आरबीआई की ओर से पेश अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी ने बताया कि बैंक कर्मचारियों की सतर्कता से कई ठगियां रोकी भी गई हैं और शिकायतों में 50% की कमी आई है। उन्होंने तकनीकी एकीकरण के लिए समय मांगते हुए 30 नवंबर 2026 तक नियमों को अधिसूचित करने और 31 दिसंबर 2026 तक पूरी तरह लागू करने का प्रस्ताव रखा।
सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य निष्कर्ष और कड़े निर्देश
1. “लापरवाही पर बैंकों को देना होगा पूरा मुआवजा”:
सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में दर्ज किया कि आरबीआई के नए विनियामक ढांचे (Regulatory Framework) में यह अनिवार्य रूप से शामिल होना चाहिए कि यदि वित्तीय संस्थान की ओर से ‘ड्यू डिलिजेंस’ (ड्यूटी में चूक) में कमी पाई जाती है, तो उसे साइबर फ्रॉड या डिजिटल अरेस्ट के शिकार व्यक्ति को कम से कम उतनी राशि का मुआवजा देना होगा, जितना उसने गंवाया है।
2. संदिग्ध लेनदेन पर अनिवार्य रोक (Mandatory Suspension):
कोर्ट ने हर वित्तीय संस्थान के लिए यह अनिवार्य कर दिया है कि:
- यदि किसी खाते के पुराने रिकॉर्ड से असंगत (Inconsistent) कोई असामान्य लेनदेन होता है, तो उस लेनदेन को तुरंत अस्थाई रूप से निलंबित (Temporary Suspension) किया जाए।
- ऐसे ट्रांजेक्शन का स्वचालित रिपोर्टिंग (Automated Reporting) और भौतिक सत्यापन (Physical Verification) किया जाए।
3. व्हाट्सएप (WhatsApp) और सिम (SIM) दुरुपयोग पर नकेल:
अदालत ने व्हाट्सएप के माध्यम से होने वाली ठगी रोकने के लिए एक ऐच्छिक “किल-स्विच” (Optional Kill Switch), लंबे कॉल चलने पर चेतावनी देने वाले अलर्ट और साइबर क्राइम सेल को एक साथ अलर्ट भेजने के तंत्र पर भी विचार-विमर्श किया। पीठ ने सिम कार्ड के दुरुपयोग पर मध्यस्थों (Intermediaries) की जवाबदेही तय करने के निर्देश दिए।
नई दिल्ली: भारत का संविधान के अनुच्छेद 32 व अनुच्छेद 142 (पूर्ण न्याय करने की असाधारण शक्ति), बैंकिंग विनियमन अधिनियम, 1949 (Banking Regulation Act, 1949) की धारा 35A (जनहित व जमाकर्ताओं के संरक्षण हेतु RBI की विनियामक शक्तियां), सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 (IT Act) की धारा 79 (सोशल मीडिया व मैसेजिंग मध्यवर्तियों का दायित्व), कठोर दायित्व का सिद्धांत (Doctrine of Strict Liability), तथा बैंक खातों के माध्यम से करोड़ों रुपये की साइबर ठगी रोकने में वित्तीय संस्थानों के वैधानिक दायित्व (Duty of Care & Due Diligence) पर सुप्रीम कोर्ट ने एक अत्यंत ऐतिहासिक और सख्त विधिक व्यवस्था दी है।
सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की तीन-न्यायाधीशों की विशेष पीठ ने ‘डिजिटल अरेस्ट’ (Digital Arrest) और फर्जी अदालती आदेशों के जरिए बुजुर्ग नागरिकों से ₹1.05 करोड़ की ठगी के मामले में शुरू की गई स्वतः संज्ञान कार्यवाही (Suo Motu Proceedings) पर सुनवाई करते हुए भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) द्वारा तैयार किए जा रहे साइबर सुरक्षा नियमों को अधिसूचना (Notification) से पूर्व स्वयं जांचने का निर्णय लिया है।
शीर्ष अदालत ने दो-टूक व्यवस्था दी कि नए विनियामक ढांचे में वित्तीय संस्थानों की जवाबदेही तय करने वाला एक अनिवार्य हर्जाना खंड (Liability / Indemnity Clause) होना चाहिए। यदि बैंक अपनी उचित सावधानी (Due Diligence) बरतने में विफल रहता है और उसके सिस्टम की चूक के कारण ग्राहक के साथ ठगी होती है, तो बैंक को पीड़ित को खोई हुई संपूर्ण राशि के बराबर क्षतिपूर्ति देनी होगी। अदालत ने कहा कि जब तक बैंकों के विरुद्ध दंडात्मक प्रावधान नहीं होंगे, वे अपनी कार्यप्रणाली में सुधार नहीं करेंगे।
शीर्ष अदालत के मुख्य कानूनी निष्कर्ष एवं विधिक टिप्पणियां
1. ‘रकम अक्षुण्ण रहेगी, बैंक को भुगतान करना होगा; यही एकमात्र रास्ता है’
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने साइबर ठगी में बैंकों के पल्ला झाड़ने के रवैये पर कड़ा प्रहार करते हुए कहा:
“रकम पूरी तरह सुरक्षित रहनी चाहिए। यदि बैंक की लापरवाही से धोखाधड़ी हुई है, तो बैंक को ही भुगतान करना होगा (The amount will remain intact. The bank will have to pay)। यही एकमात्र रास्ता है। यह दायित्व केवल कुछ कनिष्ठ अधिकारियों पर कार्रवाई तक सीमित नहीं रह सकता। विनियमों में अनिवार्य रूप से दायित्व खंड (Liability Clause) शामिल होना चाहिए। यदि RBI इसे शामिल नहीं करता है, तो हम इसे अपने न्यायिक आदेश के माध्यम से लागू करेंगे।”
2. ‘पेंशनभोगी के खाते से असामान्य निकासी पर बैंक हस्तक्षेप क्यों नहीं करता?’:
- CJI ने बैंकों को ग्राहकों के लिए एक ‘सुरक्षात्मक छतरी’ (Protective Umbrella) बनने का निर्देश दिया:“क्या RBI के नियमों में इसे नियंत्रित करने के पर्याप्त दांत (Sufficient Teeth) हैं? जब तक इन बैंकों के खिलाफ कठोर दंडात्मक निर्देश नहीं होंगे, वे कभी अपनी कार्यशैली नहीं सुधारेंगे।जब बैंकों के खिलाफ कार्रवाई की बात आती है, तो RBI बैंकों के साथ परामर्श करके ढुलमुल रवैया (Soft-pedalling) क्यों अपनाता है? एक पेंशनभोगी के बचत खाते से, जिसके इतिहास में कभी बड़ा लेन-देन नहीं हुआ, अचानक असामान्य रूप से भारी रकम ट्रांसफर होने पर बैंक का अलर्ट सिस्टम और मानवीय हस्तक्षेप तुरंत सक्रिय क्यों नहीं होता?”
3. जस्टिस जयमाल्या बागची: वित्तीय संस्थानों पर ‘कठोर दायित्व’ (Strict Liability):
- पीठ के सदस्य न्यायमूर्ति जयमाल्या बागची ने वित्तीय सुरक्षा प्रणाली पर सवाल उठाते हुए कहा:“जब वित्तीय संस्थान अपने ही बैंकिंग उत्पादों (नेट बैंकिंग/UPI) के दुरुपयोग को रोकने के लिए पर्याप्त सुरक्षा उपाय देने में विफल रहते हैं, तो उन पर कठोर दायित्व (Strict Liability) क्यों न लागू किया जाए?”
- उन्होंने RBI और बैंकों से उन संदिग्ध लेन-देन का डेटा मांगा जिन्हें समय रहते ब्लॉक किया गया, तथा उन लेन-देन का भी ब्योरा तलब किया जिनकी रिपोर्टिंग न होने के कारण बाद में बड़े घोटाले सामने आए।
4. औपचारिक अदालती आदेश: असामान्य लेन-देन पर स्वतः रोक और भौतिक सत्यापन:
अदालत ने अपने आदेश में वित्तीय संस्थानों के लिए निम्नलिखित सुरक्षा उपाय अनिवार्य किए: “हम इस बात पर बल देते हैं कि RBI द्वारा प्रस्तावित विनियामक उपायों में वित्तीय संस्थानों के लिए यह अनिवार्य किया जाना चाहिए कि जहाँ किसी वित्तीय संस्थान द्वारा उचित सावधानी (Due Diligence) बरतने में विफलता के कारण धोखाधड़ी या अपराध घटित पाया जाता है, वहाँ वे डिजिटल अरेस्ट या साइबर धोखाधड़ी के पीड़ितों को उपयुक्त मुआवजे के माध्यम से क्षतिपूर्ति (Indemnify) करेंगे, जो ग्राहक द्वारा गंवाई गई राशि से कम नहीं होगा। …किसी खाते के पूर्व ट्रैक रिकॉर्ड से असंगत असामान्य लेन-देन का अस्थाई निलंबन (Temporary Suspension), स्वचालित रिपोर्टिंग और लेन-देन की प्रामाणिकता सुनिश्चित करने के लिए भौतिक सत्यापन (Physical Verification) प्रत्येक वित्तीय संस्थान के लिए अनिवार्य होना चाहिए।”
मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि एवं प्रक्रियात्मक संदर्भ (अक्टूबर 2026)
| संदर्भ / विवरण | तथ्यात्मक स्थिति एवं अदालती निर्देश |
| मामले की प्रकृति | स्वतः संज्ञान जनहित याचिका (Suo Motu PIL) — डिजिटल अरेस्ट घोटालों, फर्जी न्यायिक आदेशों और साइबर धोखाधड़ी के संबंध में। |
| पीठ | मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जयमाल्या बागची एवं न्यायमूर्ति वी. मोहना। |
| मूल घटना | एक वरिष्ठ नागरिक दंपति ने शिकायत की कि साइबर ठगों ने स्वयं को जांच अधिकारी और जज बताकर तथा सुप्रीम कोर्ट के जाली आदेश दिखाकर उन्हें घर में ‘डिजिटल अरेस्ट’ किया और ₹1.05 करोड़ की जीवन भर की जमा पूंजी ट्रांसफर करवा ली। |
| न्यायालय मित्र (Amicus Curiae) | वरिष्ठ अधिवक्ता एन.एस. नप्पिनई (Senior Advocate NS Nappinai) — उन्होंने बताया कि भारी प्रचार के बावजूद भय और फर्जी अदालती मुहरों के कारण पढ़े-लिखे लोग भी इसका शिकार हो रहे हैं; विलंबित भुगतान (Lagged Payments) और साझा दायित्व के प्रस्ताव अभी भी लंबित हैं। |
| RBI एवं केंद्र का पक्ष | भारत के अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी ने प्रस्तुत किया कि बैंक कर्मचारियों की तत्परता से शिकायतों में 50% की कमी आई है; तकनीकी एकीकरण के लिए समय चाहिए; 30 नवंबर 2026 तक अधिसूचना और 31 दिसंबर 2026 तक इसे पूर्णतः लागू करने का प्रस्ताव दिया। |
| सोशल मीडिया व टेलीकॉम मध्यवर्ती | मैसेजिंग प्लेटफॉर्म (वॉट्सऐप) की भूमिका की जांच; लंबी कॉल के दौरान स्क्रीन पर ‘साइबर फ्रॉड चेतावनी’, संदिग्ध कॉल पर ‘किल-स्विच’ (Kill Switch) और सिम कार्ड के दुरुपयोग पर मध्यवर्तियों को अंतर-विभागीय समिति को सुरक्षा प्रस्ताव देने का निर्देश। वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने बताया कि 9,400 संदिग्ध खातों पर निवारक कार्रवाई की गई है। |
| पुलिस महानिदेशकों (DGPs) को निर्देश | सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के पुलिस महानिदेशकों को निर्देश दिया गया कि वे दर्ज प्राथमिकी, जांच की स्थिति और निवारक सुझावों की रिपोर्ट केंद्र की अंतर-विभागीय समिति को सौंपें। |
| आगामी निर्णायक सुनवाई | 30 नवंबर 2026। |
विधिक एवं विनियामक विश्लेषण: ‘बैंक का विधिक दायित्व और उपभोक्ता सुरक्षा’
- ‘उचित सावधानी’ का अभाव और बैंकों की जवाबदेही (Duty of Care):
- भारतीय अनुबंध अधिनियम और टॉर्ट कानून (Law of Torts) के अनुसार, बैंक और ग्राहक के बीच एक ‘फिड्यूशरी’ (विश्वास आधारित) संबंध होता है।
- जब कोई बुजुर्ग नागरिक या सामान्य खाताधारक अपनी पूरी जमा पूंजी (जैसे 1 करोड़ रुपये) अचानक कुछ ही मिनटों में अज्ञात खातों में ट्रांसफर करता है, तो बैंकों के स्वचालित ‘फ्रॉड रिस्क मैनेजमेंट सिस्टम’ (FRM) का यह कानूनी कर्तव्य बनता है कि वह लेन-देन को तत्काल रोक दे और ग्राहक से व्यक्तिगत या भौतिक संपर्क करके सत्यापन करे। इस विफलता को अदालत ने बैंक की संविदात्मक लापरवाही माना है।
- RBI के ‘सॉफ्ट-पेडलिंग’ पर न्यायिक अंकुश:
- CJI की यह टिप्पणी कि RBI बैंकों के प्रति नरम रुख अपनाता है, इस तथ्य को उजागर करती है कि वर्तमान में बैंक ग्राहकों पर यह साबित करने का बोझ डाल देते हैं कि उनसे OTP या क्रेडेंशियल शेयर करने में कोई भूल नहीं हुई।
- सुप्रीम कोर्ट अब इस स्थिति को पूरी तरह उलट रहा है—यदि बैंक के पास असामान्य लेन-देन रोकने की मजबूत तकनीक नहीं है, तो नुकसान की भरपाई बैंक को ही करनी होगी।
- मध्यवर्तियों (WhatsApp & Telecom) की वैधानिक सीमाएं:
- डिजिटल अरेस्ट के अधिकांश मामले वॉट्सऐप वीडियो कॉल और जाली पुलिस/सीबीआई पहचान पत्रों के जरिए होते हैं।
- आईटी नियम, 2021 के तहत मध्यवर्तियों को अपने प्लेटफॉर्म को अपराध का माध्यम बनने से रोकने के लिए सक्रिय कदम उठाने होंगे। वॉट्सऐप पर स्क्रीन चेतावनी और पुलिस को रियल-टाइम अलर्ट भेजना तकनीकी मध्यवर्तियों के ‘सेफ हार्बर’ (धारा 79) का नया विधिक मानक बनेगा।
विधिक विवरण एवं उपस्थित वरिष्ठ अधिवक्ता
- न्यायालय: भारत का सर्वोच्च न्यायालय (संवैधानिक जनहित क्षेत्राधिकार)
- केस संदर्भ: स्वतः संज्ञान याचिका: डिजिटल अरेस्ट, साइबर फ्रॉड एवं पीड़ितों को मुआवजा [In Re: Digital Arrest Cyber Fraud Cases]
- पीठ: मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जयमाल्या बागची एवं न्यायमूर्ति वी. मोहना
- आदेश की तिथि: 29 अक्टूबर 2026
- आगामी निर्णायक सुनवाई: 30 नवंबर 2026
विधिक प्रतिनिधित्व:
- भारत संघ एवं RBI की ओर से: भारत के अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी (Attorney General R. Venkataramani)।
- न्यायालय मित्र (Amicus Curiae): वरिष्ठ अधिवक्ता एन.एस. नप्पिनई (Senior Advocate NS Nappinai)।
- मध्यवर्ती प्लेटफॉर्म्स (WhatsApp आदि) की ओर से: वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल (Senior Advocate Kapil Sibal)।
- प्रासंगिक कानून एवं विधिक प्रावधान:
- भारत का संविधान — अनुच्छेद 32 (संवैधानिक उपचार), अनुच्छेद 142 (न्यायहित में पूर्ण आदेश), एवं अनुच्छेद 21 (आजीविका व संपत्ति की सुरक्षा)
- बैंकिंग विनियमन अधिनियम, 1949 (Banking Regulation Act, 1949) — धारा 35A (जनहित में बैंकों को निर्देश जारी करने की शक्ति)
- भारतीय रिज़र्व बैंक अधिनियम, 1934 (RBI Act, 1934) — वित्तीय प्रणाली का नियमन व निरीक्षण
- सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 (IT Act, 2000) — धारा 79 (मध्यवर्तियों का दायित्व) एवं धारा 66D (पहचान बदलकर धोखाधड़ी)
- संबद्ध न्यायिक सिद्धांत:
- साइबर फ्रॉड में वित्तीय संस्थानों के दायित्व का विधिक मानक: ‘वित्तीय संस्थान केवल जमा पूंजी के संरक्षक नहीं हैं, बल्कि वे ग्राहकों के वित्तीय हितों के लिए एक सुरक्षात्मक छतरी हैं; यदि किसी बैंक के सुरक्षा ढांचे की विफलता या असामान्य लेन-देन की पड़ताल में लापरवाही के कारण ग्राहक साइबर ठगी या डिजिटल अरेस्ट का शिकार होता है, तो बैंक पीड़ित को शत-प्रतिशत वित्तीय क्षतिपूर्ति देने के लिए कठोर दायित्व (Strict Liability) के तहत बाध्य है; RBI के नए नियम अधिसूचना से पूर्व उच्चतम न्यायालय द्वारा परखे जाएंगे ताकि उनमें अनिवार्य मुआवजा खंड सुनिश्चित किया जा सके।’
- वर्तमान स्थिति व अनुपालन निर्देश: सर्वोच्च न्यायालय ने RBI को अधिकृत वित्तीय संस्थानों की सूची और प्रस्तावित नियमों का मसौदा 30 नवंबर से पहले अदालत में पेश करने का निर्देश दिया है; सभी राज्यों के पुलिस महानिदेशकों को डिजिटल अरेस्ट से संबंधित विस्तृत आंकड़े अंतर-विभागीय समिति को सौंपने का आदेश दिया गया है।
Banking Liability:मामले का संक्षिप्त विवरण (At A Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | भारत का सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court of India) |
| पीठ | मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची एवं न्यायमूर्ति वी. मोहना |
| मामला/विषय | डिजिटल अरेस्ट स्कैम और साइबर फ्रॉड पर स्वतः संज्ञान मामला (In Re: Digital Arrest Scams & Cyber Fraud Regulations) |
| न्यायालय मित्र (Amicus Curiae) | वरिष्ठ अधिवक्ता एन.एस. नप्पिनई (Senior Advocate NS Nappinai) |
| आरबीआई/केंद्र सरकार पक्ष | अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी (AG R Venkataramani) |
| अदालत का फैसला/निर्देश | 1. 100% मुआवजा अनिवार्य: बैंक की ओर से चूक होने पर पीड़ित ग्राहक को पूरा नुकसान (न्यूनतम खोई हुई राशि) का मुआवजा मिलेगा। 2. असामान्य लेनदेन का निलंबन: यदि पेंशनभोगी या सामान्य खाते से अचानक बड़ा असामान्य ट्रांजेक्शन होता है, तो उसका तत्काल ऑटोमेटेड निलंबन और भौतिक सत्यापन अनिवार्य होगा। 3. ड्राफ्ट रेगुलेशन की समीक्षा: RBI के नियमों को लागू होने से पहले SC वेट करेगा। |
| अगली सुनवाई | 30 नवंबर 2026 |

