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मामले की पृष्ठभूमि: क्या था पूरा लॉकर विवाद?
- 1998 से संचालित संयुक्त लॉकर:शिकायतकर्ता मोनिका मारवाह और उनके ससुर 1998 से दिल्ली स्थित यूनियन बैंक की नारायणा विहार शाखा में एक संयुक्त लॉकर चला रहे थे। उनके ससुर (जिन्होंने 2005 में अंतिम बार लॉकर संचालित किया था) का 29 अगस्त 2010 को निधन हो गया।
- 2018 में लॉकर खोलने पर हुआ खुलासा:जब मोनिका मारवाह 1 सितंबर 2018 को अपने लॉकर का उपयोग करने बैंक पहुंचीं, तो बैंक अधिकारियों ने उन्हें बताया कि यह लॉकर 22 जनवरी 2015 को ही सरेंडर किया जा चुका है और किसी अन्य ग्राहक को आवंटित कर दिया गया है। मारवाह ने इस दावे का विरोध करते हुए कहा कि उन्होंने कभी लॉकर बंद करने का अनुरोध नहीं किया था और उसमें रखे लगभग ₹47 लाख मूल्य के जेवर गायब थे।
- बैंक के विरोधाभासी दावे:यूनियन बैंक ने आरोपों का खंडन करते हुए दावा किया कि लॉकर असल में 21 मई 2005 को ही सरेंडर कर दिया गया था। बैंक ने तर्क दिया कि सरेंडर के समय केवल खाली लॉकर ही स्वीकार किए जाते हैं, इसलिए आभूषणों के गबन की कोई संभावना नहीं है। बैंक ने लगातार काटे जा रहे लॉकर किराए (Locker Rent) को एक ‘अनजाने में हुई भूल’ (Bona fide mistake) बताया और किराया लौटाने की पेशकश की।
उपभोक्ता आयोग के मुख्य निष्कर्ष और बैंक की पोल
1. “बैंक के अपने रिकॉर्ड ने ही उसके दावों की पोल खोली”:
उपभोक्ता आयोग ने नोट किया कि कथित सरेंडर तिथि (2005 या 2015) के वर्षों बाद तक बैंक मारवाह के खाते से लॉकर रेंट काटता रहा। यहां तक कि 25 सितंबर 2018 को भी खाते से किराया काटा गया था।
2. “कोई लिखित दस्तावेज या रसीद मौजूद नहीं”:
- आयोग ने रेखांकित किया कि बैंक के पास ऐसा कोई आवेदन पत्र मौजूद नहीं है जिसमें मारवाह ने लॉकर बंद करने की मांग की हो।
- बैंक यह दिखाने में भी नाकाम रहा कि लॉकर में रखे ₹47 लाख के आभूषण ग्राहक को वापस सौंपे गए थे। बिना रसीद के लॉकर किसी अन्य को आवंटित करना सीधे तौर पर बैंक प्रबंधन द्वारा गबन (Misappropriation) और सेवा में गंभीर लापरवाही दर्शात है।
नई दिल्ली: उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019 / उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 1986 (Consumer Protection Act) के तहत बैंक सेवाओं में गंभीर कमी (Deficiency in Service), भारतीय अनुबंध अधिनियम, 1872 (Indian Contract Act, 1872) की धारा 148 से 151 (उपनिधान / Bailment—लॉकर में रखी सामग्री के प्रति बैंक का विधिक दायित्व व उचित सावधानी बरतने का कर्तव्य), भारतीय दंड संहिता, 1860 / भारतीय न्याय संहिता, 2023 के तहत आपराधिक दुर्विनियोग (Criminal Misappropriation of Property), तथा बैंक लॉकर सुरक्षा व जवाबदेही पर सर्वोच्च न्यायालय के ऐतिहासिक निर्णय अमिताभ दासगुप्ता बनाम यूनाइटेड बैंक ऑफ इंडिया [(2021) 8 SCC 419] के विधिक सिद्धांतों पर दिल्ली राज्य उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग (Delhi State Consumer Disputes Redressal Commission) ने सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक पर भारी हर्जाना लगाते हुए एक अत्यंत महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है।
दिल्ली राज्य उपभोक्ता आयोग की अध्यक्ष न्यायमूर्ति संगीता ढींगरा सहगल (Justice Sangita Dhingra Sehgal, President) और सदस्य बिमला कुमारी (Bimla Kumari, Member) की पीठ ने यूनियन बैंक ऑफ इंडिया (Union Bank of India) को सेवा में घोर लापरवाही और ग्राहक के लॉकर में रखे आभूषणों के गबन का दोषी ठहराया।
आयोग ने बैंक के विरोधाभासी और झूठे दावों को खारिज करते हुए यूनियन बैंक को निर्देश दिया कि वह शिकायतकर्ता मोनिका मारवाह को ₹47 लाख का मूल मुआवजा 6% वार्षिक साधारण ब्याज सहित (1 सितंबर 2018 से 27 अक्टूबर 2026 तक) अदा करे। आयोग ने स्पष्ट किया कि बैंक को यह संपूर्ण भुगतान 27 दिसंबर 2026 से पूर्व करना अनिवार्य होगा।
राज्य उपभोक्ता आयोग के मुख्य विधिक निष्कर्ष एवं न्यायिक टिप्पणियां
1. ‘सामग्री वापसी की कोई रसीद नहीं; बैंक ने लॉकर का सामान गबन किया’
पीठ ने बैंक द्वारा लॉकर सरेंडर किए जाने के मनगढ़ंत तर्कों को पूरी तरह खारिज करते हुए अपने निर्णय में स्पष्ट रूप से दर्ज किया: “शिकायतकर्ता अथवा उसके दिवंगत ससुर के लॉकर में रखी वस्तुओं की कोई भी रसीद या सूची कथित सरेंडर के समय बैंक (विपक्षी पक्षकार) द्वारा प्रस्तुत नहीं की गई है। अतः यह पूरी तरह स्पष्ट है कि शिकायतकर्ता की संपत्ति का विपक्षी बैंक द्वारा दुर्विनियोग/गबन (Misappropriated) किया गया था, और शिकायतकर्ता ने अपनी लॉकर सुविधा को कभी भी सरेंडर नहीं किया था।”
2. बैंक के अपने ही रिकॉर्ड उसके दावों का खंडन करते हैं:
- बैंक ने आयोग के समक्ष दो अलग-अलग तारीखों पर लॉकर सरेंडर होने का दावा किया: पहले शिकायतकर्ता को 2015 में सरेंडर बताया, जबकि कोर्ट में हलफनामा देकर दावा किया कि लॉकर 21 मई 2005 को ही सरेंडर हो चुका था।
- आयोग ने पाया कि बैंक के अपने ही खाते इस दावे को झूठा साबित करते हैं, क्योंकि बैंक 2005 के बाद भी लगातार लॉकर का वार्षिक किराया काटता रहा। यहां तक कि 25 सितंबर 2018 को भी बैंक ने मोनिका मारवाह के खाते से लॉकर का किराया काटा था।
- आयोग ने बैंक के ‘सद्भावनापूर्ण भूल’ (Bona fide Mistake) के बचाव को खारिज करते हुए कहा:“यदि बैंक की ओर से किराया काटना कोई अनजाने में हुई भूल भी मान ली जाए, तब भी विपक्षी बैंक रिकॉर्ड पर लॉकर के सरेंडर की कोई भी औपचारिक रसीद, पत्र या पावती प्रस्तुत करने में पूरी तरह विफल रहा है।”
3. सरेंडर और आभूषण सौंपने का कोई दस्तावेजी साक्ष्य नहीं:
- आयोग ने रेखांकित किया कि बैंक के पास ऐसा कोई लिखित आवेदन मौजूद नहीं था जिसमें मोनिका मारवाह ने लॉकर बंद करने का अनुरोध किया हो।
- बैंक यह भी साबित नहीं कर सका कि जब लॉकर कथित रूप से खाली कराया गया, तो उसमें रखे बहुमूल्य आभूषण और दस्तावेज किसे सौंपे गए और उसकी सुपुर्दगी रसीद (Handover Acknowledgement) कहां है।
मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि एवं प्रक्रियात्मक कालक्रम (1998–2026)
| चरण / विवरण | तथ्यात्मक स्थिति एवं पक्षों के दावे |
| शिकायतकर्ता | मोनिका मारवाह (Monica Marwah) — निवासी: दिल्ली (लॉकर धारक)। |
| विपक्षी पक्षकार | यूनियन बैंक ऑफ इंडिया (Union Bank of India) — नारायणा विहार शाखा, नई दिल्ली। |
| लॉकर का विवरण | वर्ष 1998 में मोनिका मारवाह और उनके ससुर द्वारा संयुक्त रूप से खोला गया सेफ डिपॉजिट लॉकर। |
| ससुर का निधन | 29 अगस्त 2010 (ससुर ने अंतिम बार वर्ष 2005 में लॉकर का संचालन किया था)। |
| घटना का दिन (01.09.2018) | शिकायतकर्ता जब बैंक में लॉकर संचालित करने पहुंची, तो अधिकारियों ने बताया कि लॉकर 22 जनवरी 2015 को ही सरेंडर किया जा चुका है और किसी अन्य ग्राहक को आवंटित कर दिया गया है। |
| लापता संपत्ति | लॉकर में रखे सोने, हीरे और पुश्तैनी आभूषण, जिनका अनुमानित विधिक मूल्यांकन लगभग ₹47,00,000 (₹47 लाख) था। |
| बैंक का आधिकारिक बचाव | 1. लॉकर 21 मई 2005 को ही सरेंडर हो चुका था और बैंक केवल खाली लॉकर स्वीकार करता है, अतः गबन का सवाल नहीं उठता। 2. किराया कटना एक लिपिकीय/सद्भावनापूर्ण भूल थी और बैंक वह शुल्क वापस करने को तैयार है। |
| आयोग द्वारा पाया गया सच | बैंक के पास सरेंडर का कोई आवेदन नहीं था; 25 सितंबर 2018 तक किराया काटा गया; लॉकर की सामग्री लौटाने का कोई सबूत नहीं था। |
| आयोग का अंतिम निर्देश | बैंक को ₹47,00,000 की मूल राशि पर 1 सितंबर 2018 से 27 अक्टूबर 2026 तक 6% वार्षिक साधारण ब्याज जोड़कर भुगतान करने का आदेश (अंतिम तिथि: 27 दिसंबर 2026)। |
विधिक एवं उपभोक्ता न्यायशास्त्र: ‘बैंक लॉकर और उपनिहिती (Bailee) का विधिक दायित्व’
- ‘अमिताभ दासगुप्ता बनाम यूनाइटेड बैंक ऑफ इंडिया’ [(2021) 8 SCC 419] की बाध्यकारिता:
- भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने इस ऐतिहासिक फैसले में देश भर के बैंकों के लिए अनिवार्य दिशानिर्देश जारी किए थे कि बैंक आधुनिक वित्तीय युग में यह नहीं कह सकते कि उन्हें लॉकर में रखी सामग्री की जानकारी नहीं है और इसलिए उनका कोई दायित्व नहीं बनता।
- अदालत ने माना था कि ग्राहक बैंक पर भरोसा करके अपनी जीवन भर की गाढ़ी कमाई और पुश्तैनी जेवर लॉकर में रखते हैं। यदि बैंक नियमों का उल्लंघन कर लॉकर को सरेंडर दिखाता है या उसे किसी अन्य को आवंटित करता है, तो यह बैंक सेवाओं में सबसे गंभीर स्तर की कमी (Gross Deficiency in Service) है।
- उपनिधान (Bailment) और सबूत का भार (Burden of Proof):
- भारतीय अनुबंध अधिनियम, 1872 की धारा 148 और 151 के तहत, बैंक और लॉकर-धारक का संबंध ‘उपनिधाता’ (Bailor) और ‘उपनिहिती’ (Bailee) का होता है।
- एक बार जब ग्राहक यह साबित कर देता है कि लॉकर वैध रूप से चालू था और उसका किराया काटा जा रहा था, तो यह साबित करने का पूरा विधिक भार बैंक पर आ जाता है कि लॉकर कब, कैसे और किसकी सहमति से खोला गया तथा उसका सामान किसे सुपुर्द किया गया। लिखित सुपुर्दगी रसीद के अभाव में कानून गबन और धोखाधड़ी की प्रत्यक्ष उपधारणा करता है।
विधिक विवरण एवं उपस्थित अधिवक्ता
- अधिकरण: दिल्ली राज्य उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग, नई दिल्ली
- केस संदर्भ: मोनिका मारवाह बनाम यूनियन बैंक ऑफ इंडिया [Complaint Case No. … / राज्य आयोग, दिल्ली]
- पीठ: न्यायमूर्ति संगीता ढींगरा सहगल (अध्यक्ष) एवं बिमला कुमारी (सदस्य)
- निर्णय की तिथि: 27/28 अक्टूबर 2026
- भुगतान की अनिवार्य समयसीमा: 27 दिसंबर 2026
विधिक प्रतिनिधित्व:
- शिकायतकर्ता (मोनिका मारवाह) की ओर से: अधिवक्ता प्रमोद कुमार शर्मा (Advocate Pramod Kumar Sharma) एवं अधिवक्ता नीति भारद्वाज (Advocate Neeti Bhardwaj)।
- विपक्षी बैंक (यूनियन बैंक ऑफ इंडिया) की ओर से: अधिवक्ता आराध्य ओकरी (Advocate Aaradhy Okri) एवं अधिवक्ता अनिल कुमार सिंह (Advocate Anil Kumar Singh)।
- प्रासंगिक कानून एवं विधिक प्रावधान:
- उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019 / 1986 — धारा 2(1)(g) / धारा 2(11) (सेवा में कमी / Deficiency in Service) एवं मुआवजा निर्धारण
- भारतीय अनुबंध अधिनियम, 1872 (Indian Contract Act, 1872) — धारा 148 (उपनिधान की परिभाषा) एवं धारा 151 (उपनिहिती द्वारा बरती जाने वाली उचित सावधानी)
- भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) सेफ डिपॉजिट लॉकर मास्टर सर्कुलर — लॉकर आवंटन, सरेंडर, संचालन और विधिक वारिसों की सुरक्षा नियमावली
- संबद्ध न्यायिक सिद्धांत:
- बैंक लॉकर प्रबंधन और वित्तीय जवाबदेही का विधिक मानक: ‘जब किसी बैंक ग्राहक के खाते से नियमित रूप से लॉकर का किराया काटा जा रहा हो, तो बैंक द्वारा ग्राहक की लिखित सहमति और सामान वापसी की हस्ताक्षरित पावती के बिना लॉकर को सरेंडर घोषित करना अथवा उसकी सामग्री को गायब करना कानून की दृष्टि में संपत्ति का आपराधिक दुर्विनियोग और सेवा में अक्षम्य कमी है; ऐसी स्थिति में बैंक लॉकर धारक को हुई संपूर्ण वित्तीय क्षति का बाजार मूल्यांकन और ब्याज सहित भुगतान करने के लिए पूर्णतः विधिक रूप से बाध्य है।’
- वर्तमान स्थिति व अनुपालन निर्देश: दिल्ली राज्य उपभोक्ता आयोग के आदेश के तहत यूनियन बैंक ऑफ इंडिया को 27 दिसंबर 2026 तक मोनिका मारवाह को ₹47 लाख की मूल राशि तथा 1 सितंबर 2018 से 27 अक्टूबर 2026 तक का 6% वार्षिक साधारण ब्याज जोड़कर पूरा भुगतान करना होगा; निर्धारित समय में भुगतान न करने पर बैंक के खिलाफ उपभोक्ता कानून के तहत निष्पादन कार्यवाही (Execution Proceedings) और दंडात्मक प्रावधान लागू किए जा सकेंगे।
Bank Locker:मामले का संक्षिप्त विवरण (At A Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित आयोग | दिल्ली राज्य उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग (Delhi State Consumer Commission) |
| पीठ | न्यायमूर्ति संगीता धींगरा सहगल (अध्यक्ष) एवं विमला कुमारी (सदस्य) |
| मामला/साइटेशन | मोनिका मारवाह बनाम यूनियन बैंक ऑफ इंडिया (Monica Marwah v. Union Bank of India) |
| शिकायतकर्ता | मोनिका मारवाह (नारायणा विहार, दिल्ली निवासी) | प्रतिनिधित्व: अधिवक्ता प्रमोद कुमार शर्मा और नीति भारद्वाज |
| प्रतिवादी पक्ष | यूनियन बैंक ऑफ इंडिया (नारायणा विहार शाखा) | प्रतिनिधित्व: अधिवक्ता आराध्य ओकरी और अनिल कुमार सिंह |
| मूल विवाद | बैंक लॉकर में रखे लगभग ₹47 लाख के सोने-चांदी के जेवर गायब होना और बैंक द्वारा बिना सहमति लॉकर सरेंडर दिखाने का आरोप। |
| आयोग का फैसला | 1. ₹47 लाख का मुआवजा: बैंक को ₹47 लाख की राशि 6% वार्षिक ब्याज के साथ लौटाने का निर्देश। 2. गबन की पुष्टि: लॉकर सरेंडर करने का कोई लिखित प्रमाण या वापसी रसीद न होने पर बैंक को दोषी माना। |

