Friday, October 30, 2026
HomeLaw Firms & Assoc.Ad-hoc Judges: राजस्थान न्यायिक सेवा वरिष्ठता विवाद में CJI सूर्यकांत की दो-टूक...

Ad-hoc Judges: राजस्थान न्यायिक सेवा वरिष्ठता विवाद में CJI सूर्यकांत की दो-टूक टिप्पणी; बार एसो. को नाराज करने का जोखिम कोई मुख्य न्यायाधीश नहीं ले सकता

FOLLOW US FOR MORE LEGAL UPDATES ON WhatsApp

मामले की पृष्ठभूमि और सर्वोच्च न्यायालय में हुई चर्चा

  1. अनुच्छेद 224A और बार एसोसिएशनों का विरोध:भारतीय संविधान का अनुच्छेद 224A किसी उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश को राष्ट्रपति की पूर्व सहमति से उसी या किसी अन्य उच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश से तदर्थ (Ad-hoc) न्यायाधीश के रूप में कार्य करने का अनुरोध करने की शक्ति देता है। हालाँकि, जब सुप्रीम कोर्ट ने लंबित मामलों के बोझ को कम करने के लिए इसे लागू करने का प्रयास किया, तो बार एसोसिएशनों ने यह तर्क देते हुए विरोध शुरू कर दिया कि इससे नए और युवा वकीलों/न्यायाधीशों की पदोन्नति और अवसरों पर असर पड़ेगा।
  2. सेवानिवृत्त जजों का नुकसान और अमेरिकी न्याय प्रणाली का संदर्भ:
    • न्यायामूर्ति जॉयमाल्या बागची ने कहा कि इस योजना के अचानक रुक जाने से कई सेवानिवृत्त न्यायाधीश अधर में लटक गए, क्योंकि तदर्थ जज बनने की वैध उम्मीद में उन्होंने निजी प्रैक्टिस या मध्यस्थता (Arbitration) के काम स्वीकार नहीं किए थे।
    • जस्टिस बागची ने अमेरिका की पूर्व जस्टिस सैंड्रा डे ओ’कॉनर (Sandra Day O’Connor) और 80 वर्ष से अधिक उम्र की एक अमेरिकी महिला जज का उदाहरण देते हुए कहा कि आतंकवाद से जुड़े जटिल मामलों में उनके अनुभव और बुद्धिमत्ता (Judicial Wisdom) का लाभ उठाने के लिए उन्हें सेवानिवृत्ति के बाद भी सेवा में बुलाया गया था।
  3. अदालत में अन्य प्रमुख चर्चाएं:
    • न्यायिक अधिकारियों की पेंशन: वरिष्ठ अधिवक्ता पी.एस. पटवालिया ने न्यायिक अधिकारियों की कम पेंशन का मुद्दा उठाया। CJI ने एक पूर्व न्यायिक अधिकारी से अपनी मुलाकात का जिक्र किया जिसे केवल ₹25,000 मासिक पेंशन मिल रही थी। जस्टिस बागची ने कहा कि सेवानिवृत्ति के बाद उचित पेंशन प्रदान करना न्यायपालिका की स्वतंत्रता (Independence of Judiciary) का ही एक हिस्सा है।
    • ब्यूरोक्रेटिक न्यायपालिका: वरिष्ठ अधिवक्ता मेनका गुरुस्वामी द्वारा अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट की कार्यप्रणाली और जस्टिस जॉन पॉल स्टीवंस का उदाहरण देने पर जस्टिस बागची ने कहा कि भारतीय न्यायपालिका एक ‘ब्यूरोक्रेटिक न्यायपालिका’ (Bureaucratic Judiciary) है, जहाँ एक सख्त पदानुक्रम (Strict Hierarchy) और पदोन्नति व्यवस्था लागू होती है।

नई दिल्ली: भारत का संविधान के अनुच्छेद 224A (उच्च न्यायालयों में सेवानिवृत्त न्यायाधीशों की तदर्थ/अस्थायी न्यायाधीश के रूप में पुनर्नियुक्ति का अधिकार), न्यायिक रिक्तियों एवं मामलों के भारी बैकलॉग से निपटने हेतु लोक प्रहरी बनाम भारत संघ [(2021) 8 SCC 501] नज़ीर में तय दिशा-निर्देश, अनुच्छेद 21 (त्वरित न्याय तक पहुंच), न्यायिक अधिकारियों की स्वतंत्रता एवं पेंशन सुरक्षा (Judicial Independence & Pension Security), तथा भारतीय न्यायपालिका की ‘कठोर नौकरशाही संरचना’ (Bureaucratic Hierarchy) बनाम अमेरिकी/वैश्विक न्यायिक व्यवस्था के तुलनात्मक न्यायशास्त्र पर मुख्य न्यायाधीश (CJI) ने एक अत्यंत स्पष्ट और महत्वपूर्ण विमर्श दर्ज किया है।

मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की तीन-न्यायाधीशों की विशेष पीठ के समक्ष राजस्थान न्यायिक सेवा में न्यायिक अधिकारियों की वरिष्ठता (Seniority of Judicial Officers) से संबंधित विवाद की सुनवाई के दौरान सेवानिवृत्त न्यायाधीशों के अनुभव के सदुपयोग और उनकी पेंशन समस्याओं पर विस्तृत चर्चा हुई।

CJI सूर्यकांत ने खुलासा किया कि तत्कालीन CJI एस.ए. बोबडे की अध्यक्षता वाली पीठ के समय उन्होंने अनुच्छेद 224A के तहत सेवानिवृत्त न्यायाधीशों को उच्च न्यायालयों में वापस लाने की प्रथा को पुनर्जीवित करने का गंभीर प्रयास किया था। किंतु विभिन्न बार एसोसिएशनों (Bar Associations) द्वारा अदालती बहिष्कार और कड़े विरोध प्रस्ताव पारित किए जाने के कारण यह ऐतिहासिक पहल परवान नहीं चढ़ सकी, क्योंकि कोई भी मुख्य न्यायाधीश बार को नाराज करने का जोखिम नहीं उठा सकता। वहीं पीठ ने यह भी रेखांकित किया कि सेवानिवृत्ति के बाद न्यायिक अधिकारियों को मिलने वाली मामूली पेंशन (मात्र ₹25,000/माह) उनकी न्यायिक स्वतंत्रता को खतरे में डालती है।

शीर्ष अदालत की मुख्य कानूनी व प्रशासनिक टिप्पणियां

1. ‘बार एसोसिएशनों ने प्रस्ताव पारित कर योजना को जमीन पर उतरने से रोक दिया’: CJI सूर्यकांत

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने बार और बेंच के शक्ति संतुलन पर खुली टिप्पणी करते हुए कहा: “हमने तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश (CJI) एस.ए. बोबडे की अध्यक्षता वाली पीठ में रहते हुए वस्तुतः सेवानिवृत्त न्यायाधीशों में से तदर्थ न्यायाधीशों (Ad-hoc Judges) को नियुक्त करने की प्रथा को पुनर्जीवित किया था। हमने सोचा था कि हम इस व्यवस्था को न्यायिक प्रणाली में चलन में लाएंगे। किंतु बार एसोसिएशनों (Bar Associations) के कड़े विरोध ने इस पहल को शुरू होने से ही रोक दिया… उन्होंने इसके खिलाफ औपचारिक प्रस्ताव (Resolutions) पारित करना शुरू कर दिया… और कोई भी मुख्य न्यायाधीश बार को नाराज करने का जोखिम (Risk annoying the Bar) नहीं ले सकता।”

2. ‘निजी असाइनमेंट छोड़ चुके सेवानिवृत्त जज अधर में लटक गए’: जस्टिस बागची

  • न्यायमूर्ति जयमाल्या बागची ने इस पहल के ठप होने के मानवीय और पेशेवर पहलुओं को उजागर किया:“इसका सबसे दुर्भाग्यपूर्ण पहलू यह रहा कि जिन न्यायाधीशों ने सेवानिवृत्ति के बाद अपनी सेवाएं देने की सहमति दी थी, वे इस वैध अपेक्षा (Legitimate Expectation) के साथ बैठे थे कि उन्हें नियुक्त किया जाएगा, जिसके कारण उन्होंने कोई निजी असाइनमेंट या मध्यस्थता (Arbitration) स्वीकार नहीं की। अंततः वे अधर में लटक गए।”

3. अमेरिकी व वैश्विक न्यायिक अनुभव: ’80 वर्ष की उम्र में आतंकवाद के मुकदमों की सुनवाई’

  • जस्टिस बागची ने वैश्विक न्यायिक प्रणाली से उदाहरण देते हुए कहा:“मैंने अमेरिका में 9/11 आतंकी हमले के मामले की सुनवाई करने वाली एक महिला जज से मुलाकात की थी। आप विश्वास नहीं करेंगे, वह 80 वर्ष से अधिक उम्र की थीं। आतंकवाद के मामलों की सुनवाई में उनके पास इतना गहरा अनुभव था कि मुख्य न्यायाधीश ने उनसे विशेष रूप से सेवाएं देने का औपचारिक अनुरोध किया था। न्यायिक संसाधन और अनुभव का मूल्य अत्यंत अनमोल (Precious) होता है।”
  • अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जस्टिस जॉन पॉल स्टीवंस (Justice John Paul Stevens) की सादगी का उदाहरण देते हुए उन्होंने बताया कि बारिश में वे मेट्रो ट्रेन (Tube) और छाते के सहारे कार्यक्रम में पहुंचे थे। इसी प्रकार, जर्मन संवैधानिक अदालत की एक महिला न्यायाधीश साइकिल से कोर्ट जाती थीं।

4. न्यायिक अधिकारियों का पेंशन संकट और न्यायिक स्वतंत्रता:

  • CJI सूर्यकांत ने जमीनी स्तर की विवशता साझा करते हुए बताया कि एक न्यायिक अधिकारी ने वर्षों की सेवा के बाद इस्तीफा दे दिया और दोबारा वकालत शुरू की। अधिकारी ने उन्हें बताया कि नई पेंशन नियमावली के तहत उसे सेवानिवृत्ति पर केवल ₹25,000 प्रति माह मिलने की उम्मीद थी।“उस अधिकारी ने मुझसे पूछा था—’आप ही बताइए, मैं इतने में अपना जीवन कैसे चलाऊंगा?'”
  • वरिष्ठ अधिवक्ता पी.एस. पटवालिया द्वारा कम से कम न्यायिक अधिकारियों की पेंशन में हस्तक्षेप की मांग पर जस्टिस बागची ने इसे संवैधानिक सिद्धांत से जोड़ते हुए कहा:“पर्याप्त पेंशन न्यायपालिका की स्वतंत्रता (Independence of the Judiciary) का एक अविभाज्य अंग है, ताकि सेवानिवृत्ति के बाद भी उन्हें स्वतंत्र रखा जा सके।”

5. ‘हमारी न्यायपालिका नौकरशाही की तरह सख्त पदानुक्रम में बंधी है’:

  • जब वरिष्ठ अधिवक्ता मेनका गुरुस्वामी ने अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट की पूर्व न्यायाधीश सांद्रा डे ओ’कॉनर (Sandra Day O’Connor) के सेवानिवृत्ति के बाद विशिष्ट मामलों में बेंच पर लौटने का उल्लेख किया, तो जस्टिस बागची ने भारतीय और अमेरिकी प्रणालियों के ढांचागत अंतर को स्पष्ट किया:“दुर्भाग्य से या सौभाग्य से, हमारे पास एक नौकरशाही न्यायपालिका (Bureaucratic Judiciary) है। हमारे यहां पदोन्नति का एक अत्यंत सख्त पदानुक्रम (Strict Hierarchy) है। अमेरिका की संघीय व्यवस्था में हमारे जैसी नियमित पदोन्नतियों की व्यवस्था नहीं है।”
  • उन्होंने यह भी जोड़ा कि भारत में न्यायपालिका पर मुकदमों का भारी बोझ इसलिए भी है क्योंकि भारत में अंतिम न्यायिक निर्णय (Adjudication) को अत्यधिक महत्व दिया जाता है, जबकि अमेरिका में अधिकांश मामले ट्रायल और अंतिम फैसले से पहले ही समझौतों (Plea bargaining/Settlement) के जरिए निपट जाते हैं।

Also Read; Lawyer Interns: नई इंटर्नशिप नीति में प्रवेश प्रतिबंधों के खिलाफ याचिका; कोर्ट ने केरल के छात्र को अस्थायी प्रवेश पास जारी करने का दिया अंतरिम आदेश

मामले की पृष्ठभूमि एवं प्रक्रियात्मक संदर्भ

संदर्भ / विषयतथ्यात्मक स्थिति एवं विधिक पृष्ठभूमि
मूल वादराजस्थान राज्य न्यायिक सेवा वरिष्ठता निर्धारण वाद [Supreme Court of India]
संबद्ध संवैधानिक प्रावधानअनुच्छेद 224A — उच्च न्यायालय की बैठकों में सेवानिवृत्त न्यायाधीशों की नियुक्ति (राष्ट्रपति की पूर्व सहमति से मुख्य न्यायाधीश द्वारा अनुरोध)।
सुप्रीम कोर्ट की पूर्व नजीरलोक प्रहरी बनाम भारत संघ [(2021) 8 SCC 501] — तत्कालीन CJI एस.ए. बोबडे, जस्टिस एस.के. कौल और जस्टिस के.एम. जोसेफ की पीठ ने दिशानिर्देश जारी किए थे कि यदि किसी HC में 10% से अधिक पद खाली हों या 5 वर्ष पुराने मामले 20% से अधिक हों, तो अनुच्छेद 224A के तहत सेवानिवृत्त जजों को 2 से 3 वर्ष के लिए तदर्थ नियुक्त किया जा सकता है।
बार का विरोध क्यों था?अधिकांश उच्च न्यायालय बार एसोसिएशनों का मानना था कि सेवानिवृत्त न्यायाधीशों को दोबारा बेंच पर बैठाने से कार्यरत वकीलों की उच्च न्यायालय जज के रूप में पदोन्नति (Elevation from the Bar) की गति धीमी हो जाएगी और न्यायिक नियुक्तियों में देरी होगी।
पेंशन व वेतन का संकटप्रत्यक्ष रूप से न्यायिक सेवा में आने वाले अधिकारियों को अंशदायी पेंशन योजना (NPS) के तहत अल्प पेंशन मिलने का मुद्दा उठा, जिसे खंडपीठ ने न्यायिक शुचिता और स्वतंत्रता के संरक्षण हेतु गंभीर विषय माना।

विधिक एवं संवैधानिक विश्लेषण: ‘अनुच्छेद 224A और न्यायिक स्वतंत्रता’

  • अनुच्छेद 224A की संवैधानिक सार्थकता:
    • संविधान के अनुच्छेद 224A को 15वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1963 द्वारा संविधान में पुनः शामिल किया गया था। इसका उद्देश्य उन उच्च न्यायालयों में मुकदमों के भारी बैकलॉग को समाप्त करना था जहां नियमित नियुक्तियों में कॉलेजियम और सरकार के बीच समय लगता है।
    • लोक प्रहरी (2021) में सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया था कि तदर्थ न्यायाधीश नियमित न्यायाधीशों के विकल्प नहीं हैं, बल्कि वे केवल पुराने लंबित मामलों के त्वरित निस्तारण के लिए एक ‘पूरक बल’ (Transitory/Supplementary Measure) हैं।
  • बार-बेंच संतुलन और व्यावहारिक राजनीति:
    • CJI सूर्यकांत का यह कथन कि “कोई भी मुख्य न्यायाधीश बार को नाराज करने का जोखिम नहीं ले सकता”, उच्च न्यायालयों के दैनिक संचालन में बार एसोसिएशनों के व्यावहारिक प्रभाव और शक्ति को रेखांकित करता है।
    • यदि बार किसी नीति या जज के खिलाफ प्रस्ताव पारित कर दे या हड़ताल पर चली जाए, तो न्यायिक व्यवस्था का कामकाज ठप हो जाता है। यही कारण रहा कि शीर्ष अदालत की न्यायिक मंशा के बावजूद अनुच्छेद 224A भारत में व्यवहार में नहीं आ सका।
  • न्यायिक अधिकारियों की पेंशन और अनुच्छेद 21 व 50:
    • संविधान के अनुच्छेद 50 (कार्यपालिका से न्यायपालिका का पृथक्करण) और ऑल इंडिया जजेस एसोसिएशन बनाम भारत संघ [(2002) 4 SCC 247] के अनुसार, न्यायिक सेवा को किसी सामान्य प्रशासनिक सेवा के समान नहीं माना जा सकता।
    • यदि 20-25 वर्षों तक न्याय करने वाले व्यक्ति को सेवानिवृत्ति के बाद ₹25,000 की पेंशन पर गुजारा करना पड़े, तो यह न केवल उनके गरिमापूर्ण जीवन (अनुच्छेद 21) पर प्रहार है, बल्कि यह न्यायपालिका में प्रतिभाशाली वकीलों के आने के रास्ते में एक बड़ी बाधा भी है।

विधिक विवरण एवं उपस्थित वरिष्ठ अधिवक्ता

  • न्यायालय: भारत का सर्वोच्च न्यायालय (संवैधानिक अपीलीय क्षेत्राधिकार)
  • केस संदर्भ: राजस्थान न्यायिक सेवा अधिकारी वरिष्ठता वाद [Supreme Court of India]
  • पीठ: मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जयमाल्या बागची एवं न्यायमूर्ति वी. मोहना
  • तारीख: 29 अक्टूबर 2026
  • मुख्य विषय: अनुच्छेद 224A के तहत तदर्थ न्यायाधीशों की नियुक्ति में बार का विरोध, सेवानिवृत्त न्यायिक अधिकारियों का पेंशन संकट एवं न्यायिक पदानुक्रम।

विधिक प्रतिनिधित्व:

  • न्यायिक अधिकारियों की ओर से: वरिष्ठ अधिवक्ता पी.एस. पटवालिया (Senior Advocate PS Patwalia)।
  • संवाद में उपस्थित वरिष्ठ अधिवक्ता: वरिष्ठ अधिवक्ता डॉ. मेनका गुरुस्वामी (Senior Advocate Menaka Guruswamy)।
  • प्रासंगिक कानून एवं संवैधानिक प्रावधान:
    • भारत का संविधान — अनुच्छेद 224A (उच्च न्यायालयों में सेवानिवृत्त न्यायाधीशों की तदर्थ नियुक्ति)
    • भारत का संविधान — अनुच्छेद 50 (न्यायपालिका का कार्यपालिका से पृथक्करण) एवं अनुच्छेद 21
    • अखिल भारतीय न्यायाधीश संघ दिशा-निर्देश — अधीनस्थ न्यायपालिका के वेतन, भत्ते और पेंशन सुरक्षा
  • संबद्ध न्यायिक सिद्धांत:
    • न्यायिक संसाधनों के संरक्षण और तदर्थ नियुक्तियों का विधिक मानक: ‘अनुच्छेद 224A मुकदमों के भारी बैकलॉग से निपटने के लिए एक वैधानिक तंत्र है, किंतु इसका क्रियान्वयन बार और बेंच के आपसी सहयोग पर निर्भर करता है; सेवानिवृत्त न्यायाधीशों के दशकों के अनुभव को प्रणाली से बाहर करना न्यायिक संसाधनों की भारी क्षति है; इसके साथ ही, न्यायिक स्वतंत्रता बनाए रखने के लिए यह अनिवार्य है कि सेवानिवृत्ति के उपरांत न्यायिक अधिकारियों को एक सम्मानजनक और पर्याप्त पेंशन प्रदान की जाए ताकि उनकी निष्पक्षता अक्षुण्ण रहे।’

Ad-hoc Judges:मामले का संक्षिप्त विवरण (At A Glance)

विवरणजानकारी
संबंधित अदालतभारत का सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court of India)
पीठमुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची एवं न्यायमूर्ति वी. मोहना
मूल विषयराजस्थान न्यायिक अधिकारियों की वरिष्ठता विवाद की सुनवाई के दौरान एड-हॉक जजों की नियुक्ति (अनुच्छेद 224A), सेवानिवृत्त जजों की पेंशन और न्यायिक स्वतंत्रता पर चर्चा।
संबंधित अधिवक्तावरिष्ठ अधिवक्ता पी.एस. पटवालिया एवं वरिष्ठ अधिवक्ता मेनका गुरुस्वामी
संविधान का प्रावधानअनुच्छेद 224A (Article 224A): उच्च न्यायालयों में सेवानिवृत्त जजों को एड-हॉक जज नियुक्त करने का अधिकार देता है।
RELATED ARTICLES

Most Popular

Patna
light rain
21 ° C
21 °
21 °
94 %
5kmh
100 %
Fri
21 °
Sat
27 °
Sun
30 °
Mon
30 °
Tue
31 °

Recent Comments