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मामले की पृष्ठभूमि: क्या था पूरा विवाद?
- विपक्ष की मुलाकात और विवाद की शुरुआत:विवाद तब शुरू हुआ जब मुख्य न्यायाधीश सूर्या कांत ने भारत निर्वाचन आयोग (ECI) के कामकाज को लेकर विपक्ष के नेता राहुल गांधी के नेतृत्व में पहुंचे प्रतिनिधिमंडल से व्यक्तिगत रूप से मिलने से इंकार कर दिया था।
- अपमानजनक पोस्ट और आरोप:
- निखिल वागले: CJI के रुख के बाद निखिल वागले ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर CJI को लक्षित करते हुए एक अमर्यादित पोस्ट की, जिसे बाद में हटा दिया गया।
- संजय राउत: संजय राउत ने प्रेस वार्ताओं के दौरान आरोप लगाया कि सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के न्यायाधीश सत्ताधारी दल के राजनीतिक कार्यक्रमों में भाग ले रहे हैं और लंदन में नेताओं के साथ बैडमिंटन खेल रहे हैं। इसके अलावा, उन पर अल्बानिया के सुप्रीम कोर्ट में आगजनी का हवाला देकर भारत में वैसी स्थिति बनने का ट्वीट करने का भी आरोप लगा।
- अटॉर्नी जनरल की सहमति से SCBA की याचिका:भारत के अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी द्वारा ‘अदालत की अवमानना अधिनियम, 1971’ की धारा 15(1)(b) के तहत सहमति दिए जाने के बाद सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन (SCBA) ने यह आपराधिक अवमानना याचिका दायर की थी।
अदालत में हुई सुनवाई और कानूनी दलीलें
1. निखिल वागले का माफीनामा:
निखिल वागले की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता इंदिरा जयसिंह (Indira Jaising) ने पीठ को बताया कि उनके मुवक्किल ने बिना शर्त माफी मांगते हुए एक विस्तृत हलफनामा दाखिल किया है: “उन्होंने न केवल उस पोस्ट को हटा दिया है, बल्कि हलफनामे के जरिए बिना शर्त माफी भी मांगी है… उन्होंने अपने 5 दशक लंबे पत्रकारिता करियर में अपनी गलती पर गहरा पछतावा व्यक्त किया है।”
2. संजय राउत के रुख पर SCBA की आपत्ति:
SCBA की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता प्रदीप राय और राहुल कौशिक ने कहा कि सर्वोच्च न्यायिक पद को निशाना बनाकर बेहद अपमानजनक भाषा का इस्तेमाल किया गया। उन्होंने कोर्ट को बताया कि दिल्ली हाईकोर्ट द्वारा न्यायाधीशों के बैडमिंटन खेलने संबंधी फर्जी रिपोर्टों पर रोक लगाने के बावजूद संजय राउत ने ऐसी टिप्पणियां जारी रखीं।
3. कोर्ट की टिप्पणी:
पीठ ने नोट किया कि यद्यपि संजय राउत की ओर से एक एडवोकेट-ऑन-रिकॉर्ड द्वारा वकालतनामा दाखिल किया गया है, लेकिन रजिस्ट्री में आधिकारिक तौर पर कोई उपस्थिति दर्ज नहीं कराई गई है और न ही कोई हलफनामा दायर किया गया है। पीठ ने दोहराया कि यह मामला किसी व्यक्ति विशेष का नहीं, बल्कि संपूर्ण न्यायिक संस्था की गरिमा से जुड़ा है।
नई दिल्ली: भारत का संविधान के अनुच्छेद 129 (अभिलेख न्यायालय के रूप में सर्वोच्च न्यायालय की अवमानना हेतु दंडित करने की अंतर्निहित शक्ति), अदालत की अवमानना अधिनियम, 1971 (Contempt of Courts Act, 1971) की धारा 2(c) (आपराधिक अवमानना / Criminal Contempt—न्यायालय के प्राधिकार को कलंकित या कम करना) व धारा 15(1)(b) (भारत के महान्यायवादी की पूर्व सहमति), भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) के पद की संस्थागत शुचिता, सोशल मीडिया पर न्यायपालिका के विरुद्ध असंसदीय टिप्पणियों, तथा ‘उचित आलोचना’ (Fair Criticism) बनाम ‘अदालत को बदनाम करने’ (Scandalising the Court) के विधिक मानकों पर सुप्रीम कोर्ट ने एक अत्यंत सख्त निर्देश जारी किया है।
सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूर्ति अरविंद कुमार (Justice Aravind Kumar) और न्यायमूर्ति विपुल एम. पंचोली (Justice Vipul M. Pancholi) की खंडपीठ ने सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन (SCBA) द्वारा दायर आपराधिक अवमानना याचिका पर सुनवाई करते हुए शिवसेना (UBT) के राज्यसभा सांसद संजय राउत (Sanjay Raut) को 17 नवंबर 2026 को दोपहर 2:00 बजे व्यक्तिगत रूप से (Physically) अदालत में उपस्थित रहने का आदेश दिया है। वहीं, वरिष्ठ पत्रकार निखिल वागले (Nikhil Wagle) द्वारा अपनी पोस्ट हटाकर बिना शर्त औपचारिक माफीनामा (Unconditional Apology) हलफनामे के रूप में दाखिल किए जाने के बाद, उन्हें अगली तारीख पर वर्चुअल माध्यम (VC) से पेश होने की अनुमति दी गई है।
शीर्ष अदालत का कड़ा रुख और वकीलों की विधिक दलीलें
सुनवाई के दौरान खंडपीठ ने रेखांकित किया कि यह मामला किसी एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि पूरे न्यायिक संस्थान की गरिमा और विश्वसनीयता पर आघात से जुड़ा है:
1. ‘मुद्दे की गंभीरता को देखते हुए व्यक्तिगत उपस्थिति आवश्यक’:
- खंडपीठ ने अपने आदेश में स्पष्ट दर्ज किया:“मामले की संवेदनशीलता और इसमें शामिल विधिक मुद्दे की व्यापकता (Magnitude of the issue) को ध्यान में रखते हुए, हमारा विचार है कि प्रतिवादी संख्या 1 (निखिल वागले) अगली तारीख पर वर्चुअली उपस्थित रहेंगे… और हम प्रतिवादी संख्या 2 (संजय राउत) को निर्देश देते हैं कि वे अगली सुनवाई की तारीख पर व्यक्तिगत रूप से (Physically) इस न्यायालय के समक्ष उपस्थित रहें।”
- अदालत ने यह भी नोट किया कि राउत की ओर से एक एडवोकेट-ऑन-रिकॉर्ड द्वारा वकालतनामा दाखिल किए जाने की बात कही गई थी, किंतु रजिस्ट्री के आधिकारिक रिकॉर्ड पर न तो औपचारिक उपस्थिति दर्ज थी और न ही उनकी ओर से कोई जवाबी हलफनामा पेश किया गया था।
2. निखिल वागले की बिना शर्त माफी:
- वरिष्ठ पत्रकार निखिल वागले की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता इंदिरा जयसिंह ने अदालत को आश्वस्त किया कि उनके मुवक्किल ने विवादित पोस्ट को न केवल हटा लिया है, बल्कि उन्होंने अदालत के समक्ष बिना शर्त माफी मांगते हुए एक विस्तृत हलफनामा दाखिल किया है: “उन्होंने प्रथम अवसर पर ही हलफनामे के माध्यम से बिना शर्त क्षमा याचना की है। वे अपने किए का तनिक भी औचित्य सिद्ध (Justify) नहीं कर रहे हैं। उनका पांच दशकों का बेदाग पत्रकारिता करियर रहा है और वे किसी राजनीतिक दल से जुड़े नहीं हैं।”
- जयसिंह ने वागले के मुंबई में रहने और पूर्व में छूट दिए जाने का हवाला देकर वर्चुअल उपस्थिति की प्रार्थना की, जिसे पीठ ने स्वीकार कर लिया।
3. संजय राउत के बयानों पर SCBA की तीखी आपत्तियां:
- एससीबीए का प्रतिनिधित्व कर रहे वरिष्ठ अधिवक्ता प्रदीप राय और राहुल कौशिक ने अदालत को अवगत कराया कि संजय राउत ने प्रेस वार्ताओं और सोशल मीडिया पर न्यायपालिका के विरुद्ध बेहद गंभीर और अपमानजनक टिप्पणियां की हैं:
- राउत ने आरोप लगाया था कि सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के न्यायाधीश सत्ताधारी दल के राजनीतिक कार्यक्रमों में भाग लेते हैं।
- उन्होंने दावा किया था कि जजों ने लंदन में राजनीतिक नेताओं के साथ बैडमिंटन खेला था। (एससीबीए ने रेखांकित किया कि दिल्ली हाईकोर्ट ने इस झूठी तस्वीर के प्रसार पर पहले ही रोक लगा दी थी, जिसमें स्पष्ट हुआ था कि तस्वीर लंदन की नहीं बल्कि नवंबर 2025 में दिल्ली के त्यागराज स्टेडियम के एक कार्यक्रम की थी)।
- इसके अतिरिक्त, राउत ने सोशल मीडिया पर अल्बानिया के सुप्रीम कोर्ट को आग लगाए जाने का संदर्भ देते हुए पोस्ट किया था कि भारत में भी ऐसी स्थिति उत्पन्न हो सकती है।
4. ‘संस्थान से प्रेम दोनों तरफ से होना चाहिए’:
- जब पीठ ने वरिष्ठ अधिवक्ता इंदिरा जयसिंह से इस गंभीर संस्थागत मामले में न्याय मित्र/वरिष्ठ वकील के रूप में सहयोग करने का आग्रह किया, तो जयसिंह ने महत्वपूर्ण टिप्पणी की:“मैं न्यायालय की सहायता के लिए सदैव तत्पर हूँ क्योंकि हम इस संस्था (Judiciary) से प्रेम करते हैं। किंतु संस्थान को भी हमसे उतना ही प्रेम करना चाहिए; यह प्रेम एकतरफा नहीं हो सकता। कई बार ऐसी परिस्थितियाँ आती हैं जहाँ विधिक पेशा (Legal Profession) अत्यधिक हताश महसूस करता है।”
मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि एवं प्रक्रियात्मक कालक्रम (अक्टूबर 2026)
| चरण / विवरण | तथ्यात्मक स्थिति एवं पक्षों के दावे |
| विवाद का मूल स्रोत | 11 अक्टूबर 2026 को भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत ने लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी और राज्यसभा में विपक्ष के नेता मल्लिकार्जुन खड़गे के नेतृत्व वाले विपक्षी प्रतिनिधिमंडल से मिलने से इनकार कर दिया था। सीजेआई ने संविधान के ‘शक्ति पृथक्करण’ (Separation of Powers) का हवाला देते हुए कहा था कि चुनाव आयोग और दिल्ली विरोध प्रदर्शनों से जुड़े मामले न्यायालय में विचाराधीन (Sub-judice) हैं, अतः राजनीतिक मुलाकात के बजाय न्यायिक याचिका दाखिल की जानी चाहिए। |
| विवादित आचरण | 1. निखिल वागले: सीजेआई के इनकार के बाद ‘X’ पर सीजेआई के विरुद्ध अशोभनीय व अभद्र भाषा का प्रयोग किया (बाद में पोस्ट हटाई)। 2. संजय राउत: प्रेस वार्ताओं और ट्वीट्स के जरिए उच्च न्यायपालिका के न्यायाधीशों पर राजनीतिक पूर्वाग्रह, लंदन में नेताओं संग खेल खेलने और अल्बानिया जैसी अदालती आगजनी की धमकी देने के आरोप लगाए। |
| अटॉर्नी जनरल की वैधानिक सहमति | भारत के महान्यायवादी आर. वेंकटरमणी ने 15 अक्टूबर 2026 को धारा 15(1)(b) के तहत अवमानना की सहमति देते हुए दर्ज किया कि ये टिप्पणियां प्रथम दृष्टया आपराधिक अवमानना हैं और सर्वोच्च न्यायालय तथा सीजेआई के प्राधिकार को कम करने के उद्देश्य से की गई हैं। |
| 16 अक्टूबर 2026 की सुनवाई | CJI सूर्यकांत और जस्टिस जयमाल्या बागची की पीठ ने स्वतः नोटिस जारी करते हुए तल्ख टिप्पणी की थी: “जब व्यक्तिगत स्वतंत्रता या अधिकार खतरे में पड़ते हैं, तो यही लोग सुरक्षा के लिए अदालत आते हैं… और फिर वही लोग अदालतों पर ऐसे हमले करें, तो यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है।” |
| 28 अक्टूबर 2026 का आदेश | संजय राउत को 17 नवंबर 2026 को दोपहर 2 बजे व्यक्तिगत रूप से उपस्थित रहने का सख्त आदेश; निखिल वागले को वर्चुअल उपस्थिति की छूट। |
विधिक एवं संवैधानिक विश्लेषण: ‘आपराधिक अवमानना बनाम वाक्-अभिव्यक्ति की सीमा’
- आपराधिक अवमानना (Criminal Contempt) का विधिक तत्व:
- अदालत की अवमानना अधिनियम, 1971 की धारा 2(c)(i) के अनुसार, किसी भी ऐसे शब्द, कथन या दृश्य रूपण को आपराधिक अवमानना माना जाता है जो किसी अदालत के प्राधिकार को बदनाम (Scandalises or tends to scandalise) करता है या उसे नीचा दिखाता है (Lowers the authority)।
- सी. रविचंद्रन अय्यर बनाम जस्टिस ए.एम. भट्टाचार्जी [(1995) 5 SCC 457] में सुप्रीम कोर्ट ने माना था कि यदि सार्वजनिक हस्तियों या सांसदों द्वारा न्यायपालिका की ईमानदारी पर बिना किसी आधार के आक्षेप लगाए जाते हैं, तो यह न्याय के शासन की नींव को हिला देता है।
- संजय राउत के बयानों की विधिक संवेदनशीलता:
- दिल्ली हाईकोर्ट द्वारा पहले से ही रोके जा चुके फर्जी दावों (लंदन में बैडमिंटन खेलने संबंधी झूठी तस्वीरों) को दोहराना और संसद सदस्य के रूप में विदेशी अदालतों में आगजनी का उदाहरण देकर जनता को भड़काना प्रथम दृष्टया अदालत के प्राधिकार में प्रत्यक्ष हस्तक्षेप माना जाता है।
- न्यायालय द्वारा व्यक्तिगत उपस्थिति का आदेश देना यह दर्शाता है कि अदालत राउत के स्पष्टीकरण और उनके आचरण को अत्यधिक गंभीरता से ले रही है।
- माफीनामे (Apology) का विधिक प्रभाव:
- अवमानना अधिनियम की धारा 12 के स्पष्टीकरण के अनुसार, बिना शर्त मांगी गई माफी को अदालत स्वीकार कर सकती है, बशर्ते वह वास्तविक पश्चाताप (Bona fide remorse) से प्रेरित हो। निखिल वागले द्वारा प्रथम अवसर पर हलफनामा देकर माफी मांगने के कारण अदालत ने उनके प्रति उदारता बरतते हुए वर्चुअल उपस्थिति की अनुमति दी।
विधिक विवरण एवं उपस्थित वरिष्ठ अधिवक्ता
- न्यायालय: भारत का सर्वोच्च न्यायालय (आपराधिक अवमानना क्षेत्राधिकार / Criminal Contempt Jurisdiction)
- केस संदर्भ: सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन (SCBA) बनाम निखिल वागले व अन्य [Contempt Petition (Criminal) No. … / 2026]
- पीठ: न्यायमूर्ति अरविंद कुमार एवं न्यायमूर्ति विपुल एम. पंचोली
- आदेश की तिथि: 28 अक्टूबर 2026
- आगामी निर्णायक सुनवाई: 17 नवंबर 2026 (दोपहर 2:00 PM)
Sanjay Raut Vs CJI: विधिक प्रतिनिधित्व:
- याचिकाकर्ता (SCBA) की ओर से: वरिष्ठ अधिवक्ता प्रदीप राय (Senior Advocate Pradeep Rai) एवं वरिष्ठ अधिवक्ता राहुल कौशिक (Senior Advocate Rahul Kaushik)।
- प्रतिवादी संख्या 1 (निखिल वागले) की ओर से: वरिष्ठ अधिवक्ता इंदिरा जयसिंह (Senior Advocate Indira Jaising)।
- प्रतिवादी संख्या 2 (संजय राउत) की ओर से: अधिवक्ता-ऑन-रिकॉर्ड (औपचारिक उपस्थिति लंबित)।
- सहमति प्रदाता प्राधिकारी: भारत के महान्यायवादी (Attorney General for India) आर. वेंकटरमणी।
- प्रासंगिक कानून एवं विधिक प्रावधान:
- भारत का संविधान — अनुच्छेद 129 (अभिलेख न्यायालय की अवमानना शक्ति) एवं अनुच्छेद 19(2) (न्यायालय की अवमानना के आधार पर अभिव्यक्ति पर युक्तियुक्त निर्बंधन)
- अदालत की अवमानना अधिनियम, 1971 — धारा 2(c) (आपराधिक अवमानना), धारा 12 (दंड व क्षमा याचना के प्रावधान), एवं धारा 15(1)(b) (महान्यायवादी की सहमति से कार्यवाही)
- संबद्ध न्यायिक सिद्धांत:
- न्यायिक स्वतंत्रता और अवमानना का विधिक मानक: ‘न्यायालय के निर्णयों की विधि-सम्मत और आलोचनात्मक समीक्षा अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के दायरे में आती है, किंतु देश के मुख्य न्यायाधीश और उच्चतर न्यायपालिका पर व्यक्तिगत, असंसदीय और राजनीतिक पूर्वाग्रह से प्रेरित झूठे लांछन लगाना सीधे तौर पर आपराधिक अवमानना है; सार्वजनिक हस्तियों और सांसदों से यह अपेक्षा की जाती है कि वे न्याय के मंदिर की मर्यादा का सम्मान करें।’
- वर्तमान स्थिति व अनुपालन निर्देश: सर्वोच्च न्यायालय ने निखिल वागले के बिना शर्त माफीनामे को रिकॉर्ड पर लिया है और उन्हें 17 नवंबर को वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग से जुड़ने की अनुमति दी है; वहीं राज्यसभा सांसद संजय राउत को 17 नवंबर 2026 को दोपहर 2:00 बजे व्यक्तिगत रूप से सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष सशरीर हाजिर होने का अनिवार्य निर्देश जारी किया गया है।
Sanjay Raut Vs CJI: मामले का संक्षिप्त विवरण (At A Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | भारत का सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court of India) |
| पीठ | न्यायमूर्ति अरविंद कुमार एवं न्यायमूर्ति विपुल एम. पंचोली |
| मामला/साइटेशन | सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन बनाम निखिल वागले व अन्य (SCBA v. Nikhil Wagle & Anr.) |
| याचिकाकर्ता | सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन (SCBA – भारत के अटॉर्नी जनरल की सहमति से दर्ज अवमानना याचिका) |
| प्रतिवादी | 1. निखिल वागले (वरिष्ठ पत्रकार) | प्रतिनिधित्व: वरिष्ठ अधिवक्ता इंदिरा जयसिंह 2. संजय राउत (राज्यसभा सांसद, शिवसेना UBT) |
| मूल विवाद | CJI द्वारा विपक्षी प्रतिनिधिमंडल से मिलने से मना करने के बाद CJI और न्यायपालिका पर अपमानजनक एवं विवादित टिप्पणियां। |
| अदालत का फैसला | 17 नवंबर (दोपहर 2 बजे) की सुनवाई: संजय राउत को सशरीर (In-person) उपस्थित होने का आदेश, वागले को वर्चुअली जुड़ने की छूट। |

