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विवाद की पृष्ठभूमि: कहां से शुरू हुआ पूरा मामला?
- एसपी (SP) को वकील की कुर्सी पर बिठाने का मुद्दा:विवाद की शुरुआत न्यायमूर्ति अजय भानोट की अदालत से हुई। आरोप है कि कोर्ट रूम में पुलिस अधिकारियों और उच्च पदस्थ अफसरों के लिए वकीलों के बैठने वाली सीट पर एक अलग कुर्सी रखी जा रही थी। जब एक वकील ने वहां बैठे पुलिस अधीक्षक (SP) को पीछे हटने के लिए कहा, तो न्यायमूर्ति भानोट ने उस वकील को SP से माफी मांगने पर मजबूर किया।
- जज पर दुर्व्यवहार और धमकी का आरोप:हाईकोर्ट बार एसोसिएशन का आरोप है कि जज ने वकील को जेल भेजने की धमकी दी और एक वरिष्ठ अधिवक्ता का भी उपहास उड़ाया। मंगलवार को जारी बयान में बार एसोसिएशन ने चेतावनी दी थी कि यदि कोई कार्रवाई नहीं हुई तो वे न्यायमूर्ति भानोट की अदालत का बहिष्कार करेंगे।
- कोर्ट रूम में तोड़फोड़ और वकीलों का हंगामा:यद्यपि बार एसोसिएशन ने आधिकारिक कार्य बहिष्कार का आह्वान नहीं किया था, लेकिन बुधवार को उग्र वकीलों ने कोर्ट रूम नंबर 49 में प्रवेश कर तोड़फोड़ की और फर्नीचर व अन्य संपत्तियों को नुकसान पहुंचाया।
हाईकोर्ट का कड़ा रुख और सीसीटीवी (CCTV) जांच का निर्देश
1. अवमानना और अनुशासनात्मक कार्रवाई की चेतावनी:
बुधवार को जब न्यायमूर्ति अरुण कुमार सिंह देशवाल एक जमानत याचिका की सुनवाई कर रहे थे, तब वकीलों की नारेबाजी सुनकर उन्होंने रजिस्ट्रार (प्रोटोकॉल) को कोर्ट रूम के बाहर के सीसीटीवी (CCTV) फुटेज की जांच करने और घटना में शामिल वकीलों की पहचान करने के निर्देश दिए थे। कोर्ट ने चेतावनी दी थी कि दोषी वकीलों के खिलाफ अनुशासनात्मक और आपराधिक अवमानना (Criminal Contempt) की कार्यवाही शुरू की जाएगी।
2. सुनवाई बाधित और मामले टले:
गुरुवार को भी वकीलों को कोर्ट रूम में प्रवेश करने से रोके जाने के कारण न्यायमूर्ति देशवाल को कई मामलों की सुनवाई स्थगित करनी पड़ी।
3. बार एसोसिएशन की नई कार्यकारिणी से अपील:
हाईकोर्ट ने बार एसोसिएशन की नवनिर्वाचित बॉडी से इस मामले में हस्तक्षेप करने और तुरंत स्थिति को संभालने का अनुरोध किया है ताकि न्यायपालिका (Bench) और वकीलों (Bar) के बीच की गरिमा और सम्मान बना रहे।
प्रयागराज (इलाहाबाद): भारत का संविधान के अनुच्छेद 215 (अभिलेख न्यायालय के रूप में अवमानना पर दंड देने की अंतर्निहित शक्ति), अदालत की अवमानना अधिनियम, 1971 (Contempt of Courts Act, 1971) की धारा 2(c) (आपराधिक अवमानना—अदालती कार्यवाही में प्रत्यक्ष भौतिक बाधा उत्पन्न करना), सर्वोच्च न्यायालय द्वारा एक्स-कैप्टन हरीश उप्पल बनाम भारत संघ [(2003) 2 SCC 45] में निर्धारित विधिक सिद्धांत (कि किसी भी वकील को अदालत में प्रवेश करने से रोकना या वादियों को न्याय से वंचित करना गंभीर अवमानना है), तथा बार और बेंच की संस्थागत मर्यादा के संरक्षण पर इलाहाबाद हाईकोर्ट में लगातार 29 अक्टूबर 2026 को गंभीर संकट की स्थिति उत्पन्न हो गई है।
न्यायमूर्ति अजय भनोट (Justice Ajay Bhanot) द्वारा एक अधिवक्ता से पुलिस अधीक्षक (SP) से माफी मंगवाने के कथित विवाद से भड़का वकीलों का आंदोलन गुरुवार (29 अक्टूबर 2026) को और अधिक आक्रामक हो गया। बुधवार को कोर्ट रूम नंबर 49 में तोड़फोड़ और गलियारों में तीव्र नारेबाजी के बाद, गुरुवार को प्रदर्शनकारी वकीलों ने अदालतों के मुख्य द्वारों को बाहर से ताला लगाकर बंद कर दिया, जिससे अन्य नियमित और निष्पक्ष अधिवक्ताओं का अदालतों में प्रवेश पूरी तरह बाधित हो गया।
न्यायमूर्ति अरुण कुमार सिंह देशवाल (Justice Arun Kumar Singh Deshwal) की एकल पीठ ने अपने औपचारिक न्यायिक आदेश में इस अभूतपूर्व बाधा को दर्ज किया। पीठ ने कहा कि वकीलों के अदालत में प्रवेश न कर पाने के कारण उन्हें कई महत्वपूर्ण मुकदमों की सुनवाई स्थगित (Adjourn) करनी पड़ी। अदालत ने दोहराया कि वकीलों को कोर्ट में जाने से रोकना आपराधिक अवमानना है, और नवनिर्वाचित इलाहाबाद हाई कोर्ट बार एसोसिएशन (HCBA) से अपील की कि वह बार और बेंच की गरिमा बनाए रखने के लिए इस मामले में तुरंत संज्ञान ले।
उच्च न्यायालय के मुख्य कानूनी निष्कर्ष एवं विधिक टिप्पणियां
1. ‘अधिवक्ता को अदालत में जाने से रोकना सीधे तौर पर अवमानना है’
न्यायमूर्ति अरुण कुमार सिंह देशवाल ने अदालत के दरवाजों पर ताला लगाने की घटना को न्यायिक आदेश में दर्ज करते हुए सर्वोच्च न्यायालय की नज़ीरों का उल्लेख किया: “सर्वोच्च न्यायालय ने कई ऐतिहासिक मामलों में यह सुस्थापित सिद्धांत प्रतिपादित किया है कि किसी भी अधिवक्ता को अदालत में प्रवेश करने से जबरन रोकना सीधे तौर पर अदालत की अवमानना (Contempt of Court) का गठन करता है। इलाहाबाद उच्च न्यायालय में वकालत करने वाले अधिकांश अधिवक्ता न केवल अत्यंत निष्ठावान और गंभीर हैं, बल्कि उनका आचरण भी अत्यंत शिष्ट और अनुकरणीय है। किंतु यह अत्यंत आश्चर्यजनक है कि बार एसोसिएशन की ओर से कार्य बहिष्कार का कोई औपचारिक आह्वान (No formal call from Bar Association) न होने के बावजूद, उच्च न्यायालय के अधिवक्ता होने का दावा करने वाले कुछ व्यक्ति बिना किसी कारण के अन्य वकीलों को अदालत कक्ष में प्रवेश करने से रोक रहे हैं।”
2. कोर्ट रूम का गेट बाहर से बंद करना और मामलों का स्थगन:
- पीठ ने आदेश में यह कटु सत्य दर्ज किया कि प्रदर्शनकारी तत्वों ने अदालत कक्ष के मुख्य द्वार को बाहर से बंद कर दिया था, जिसके चलते वादकारियों के वकील अंदर नहीं आ सके:“प्रदर्शनकारी वकीलों ने अन्य अधिवक्ताओं को अदालत कक्ष में प्रवेश करने की अनुमति नहीं दी, क्योंकि दरवाजे को बाहर से बंद (Locked from the outside) कर दिया गया था। हमें सूचित किया गया कि वकील अंदर आने में असमर्थ हैं, जिसके कारण इस न्यायालय को आज कई मामलों की सुनवाई को विवश होकर स्थगित करना पड़ रहा है।”
3. नवनिर्वाचित बार एसोसिएशन से न्यायिक गरिमा की अपील:
- अदालत ने स्थिति को सामान्य करने के लिए इलाहाबाद हाई कोर्ट बार एसोसिएशन की नवनिर्वाचित कार्यकारिणी से औपचारिक अनुरोध किया:“यह न्यायालय बार एसोसिएशन की नवनिर्वाचित संस्था से यह विशेष अनुरोध करता है कि वह इस गंभीर मुद्दे पर तत्काल विचार करे, ताकि बार और बेंच (Bar and Bench) दोनों की गरिमा और प्रतिष्ठा अक्षुण्ण बनी रहे।”
घटनाक्रम का कालक्रम एवं विवाद की जड़ (27–29 अक्टूबर 2026)
| चरण / तिथि | तथ्यात्मक स्थिति एवं अदालती घटनाक्रम |
| विवाद का मूल उद्गम (27 अक्टूबर) | न्यायमूर्ति अजय भनोट की अदालत (कोर्ट रूम नंबर 49) में पुलिस अधिकारियों/आईपीएस के लिए कथित तौर पर अलग कुर्सी लगाई गई थी। एक वकील ने वकीलों की अग्रिम पंक्ति में बैठे पुलिस अधीक्षक (SP) से पीछे जाने का आग्रह किया। बार का आरोप है कि जज ने वकील को जेल भेजने की चेतावनी दी और एसपी से माफी मांगने पर मजबूर किया, साथ ही एक अन्य वरिष्ठ वकील पर भी अनुचित टिप्पणी की। |
| बार की चेतावनी (28 अक्टूबर) | बार एसोसिएशन ने प्रस्ताव पारित कर जस्टिस भनोट की अदालत के बहिष्कार की चेतावनी दी। हालांकि कोई औपचारिक हड़ताल घोषित नहीं थी, किंतु वकीलों के एक समूह ने कोर्ट रूम 49 में घुसकर डायस की ओर कुर्सियां व फर्नीचर फेंके और तोड़फोड़ की। |
| जस्टिस देशवाल का पहला आदेश (28 अक्टूबर) | ज़मानत मामलों की सुनवाई के दौरान गलियारे में हुए व्यवधान का संज्ञान लेते हुए न्यायमूर्ति देशवाल ने रजिस्ट्रार (प्रोटोकॉल) को सीसीटीवी फुटेज से उपद्रवियों की पहचान करने, उत्तर प्रदेश बार काउंसिल को अनुशासनात्मक कार्रवाई हेतु नाम भेजने और आपराधिक अवमानना शुरू करने का आदेश दिया (सुनवाई: 19 नवंबर 2026)। |
| तालाबंदी की घटना (29 अक्टूबर) | प्रदर्शनकारी वकीलों ने उग्र कदम उठाते हुए जस्टिस देशवाल के अदालत कक्ष के बाहर के दरवाजों पर ताला लगा दिया। अन्य वकीलों को अंदर नहीं जाने दिया गया। |
| अदालत की वर्तमान विवशता | वादियों और वकीलों के न पहुंच पाने के कारण पीठ को कई आवश्यक मामलों को बिना सुनवाई स्थगित करना पड़ा। |
विधिक एवं संवैधानिक विश्लेषण: ‘अदालती बहिष्कार, तालाबंदी और सुप्रीम कोर्ट का सख्त न्यायशास्त्र’
- ‘अदालत में प्रवेश रोकने’ का विधिक अपराध (Obstruction to Court Access):
- भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने एक्स-कैप्टन हरीश उप्पल बनाम भारत संघ में स्पष्ट व्यवस्था दी थी कि किसी भी वकील या बार एसोसिएशन को हड़ताल करने, कोर्ट का बहिष्कार करने या अदालती कार्यों में भौतिक बाधा डालने का कोई कानूनी अधिकार नहीं है।
- अदालत ने विशेष रूप से रेखांकित किया था कि यदि कोई वकील अपनी इच्छा से अदालत में उपस्थित होकर अपने मुवक्किल का पक्ष रखना चाहता है, तो उसे रोकने का प्रयास करने वाला कोई भी व्यक्ति—चाहे वह साथी अधिवक्ता ही क्यों न हो—सीधे तौर पर आपराधिक अवमानना (Criminal Contempt under Section 2(c)) का दोषी होगा।
- संविधान का अनुच्छेद 21 और वादियों के अधिकार:
- उच्च न्यायालय में दूर-दराज के जनपदों से गरीब, बंदी और पीड़ित नागरिक ज़मानत और अपनी रिहाई की गुहार लेकर आते हैं।
- कोर्ट के दरवाजों पर बाहर से ताला लगाकर कार्यवाही ठप कर देना उन निर्दोष नागरिकों के ‘त्वरित न्याय पाने के मौलिक अधिकार’ (अनुच्छेद 21) पर बर्बर कुठाराघात है, जो किसी भी सभ्य समाज में बर्दाश्त नहीं किया जा सकता।
- बार एसोसिएशन का संस्थागत दायित्व:
- न्यायमूर्ति देशवाल ने रेखांकित किया कि जब बार एसोसिएशन ने स्वयं कोई आधिकारिक हड़ताल या बहिष्कार का कॉल नहीं दिया है, तो कुछ स्वयंभू तत्वों द्वारा अदालतों को बंद कराना अनुशासनहीनता की पराकाष्ठा है।
- नवनिर्वाचित बार निकाय का यह विधिक और नैतिक कर्तव्य है कि वह ऐसे तत्वों को नियंत्रित करे ताकि मुट्ठी भर लोगों के अनियंत्रित आचरण के कारण समूची बार और बेंच की ऐतिहासिक साख धूमिल न हो।
विधिक विवरण एवं संबद्ध पीठ
- न्यायालय: इलाहाबाद उच्च न्यायालय (मूल आपराधिक न्यायपीठ)
- पीठासीन न्यायाधीश: न्यायमूर्ति अरुण कुमार सिंह देशवाल (एकल पीठ)
- आदेश की तिथि: 29 अक्टूबर 2026
- संबंधित पूर्व आदेश: 28 अक्टूबर 2026 (सीसीटीवी जांच व बार काउंसिल को अनुशासनात्मक कार्रवाई का निर्देश; अगली सुनवाई 19 नवंबर 2026)
- संबद्ध पक्षकार: इलाहाबाद हाई कोर्ट बार एसोसिएशन (HCBA), रजिस्ट्रार (प्रोटोकॉल), एवं विरोध प्रदर्शन में संलिप्त अज्ञात अधिवक्ता
प्रासंगिक कानून एवं विधिक प्रावधान:
- भारत का संविधान — अनुच्छेद 215 (अभिलेख न्यायालय के रूप में अवमानना हेतु दंडित करने की उच्च न्यायालय की अंतर्निहित शक्ति) एवं अनुच्छेद 21 (त्वरित व निष्पक्ष न्याय का अधिकार)
- अदालत की अवमानना अधिनियम, 1971 (Contempt of Courts Act, 1971) — धारा 2(c)(ii) व (iii) (आपराधिक अवमानना—अदालती कार्यवाही में बाधा डालना व न्याय प्रशासन को पंगु बनाना) एवं धारा 14
- अधिवक्ता अधिनियम, 1961 (Advocates Act, 1961) — धारा 35 (व्यावसायिक कदाचार हेतु अनुशासनात्मक कार्यवाही व लाइसेंस का निलंबन)
- संबद्ध न्यायिक सिद्धांत:
- अदालतों के निर्बाध संचालन और वकीलों के आचरण का विधिक मानक: ‘अदालत कक्षों के मुख्य द्वारों को बाहर से बंद करना और अधिवक्ताओं को अपने मामलों की पैरवी करने से रोकना न्याय के प्रशासन में गंभीरतम आपराधिक हस्तक्षेप है; बार एसोसिएशन के किसी औपचारिक प्रस्ताव के बिना मुट्ठी भर वकीलों द्वारा अदालतों को पंगु बनाना अक्षम्य कदाचार है; बार और बेंच की गरिमा बनाए रखने के लिए बार के नवनिर्वाचित पदाधिकारियों का यह कर्तव्य है कि वे ऐसे तत्वों पर अंकुश लगाएं और अदालतों का सामान्य संचालन सुनिश्चित करें।’
- वर्तमान स्थिति व अनुपालन निर्देश: इलाहाबाद उच्च न्यायालय में तनाव की स्थिति बनी हुई है; न्यायमूर्ति देशवाल द्वारा दरवाजों पर ताला लगाने की घटना को रिकॉर्ड पर लिए जाने के बाद सुरक्षा तंत्र और नवनिर्वाचित बार पदाधिकारियों से तत्काल व्यवस्था बहाल करने को कहा गया है; 28 अक्टूबर के आदेश के तहत सीसीटीवी फुटेज के जरिए उपद्रवी वकीलों को चिह्नित करने की प्रक्रिया भी रजिस्ट्रार (प्रोटोकॉल) द्वारा समानांतर रूप से जारी है।
Bar-Bench Clash:मामले का संक्षिप्त विवरण (At A Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | इलाहाबाद उच्च न्यायालय (Allahabad High Court), प्रयागराज |
| न्यायाधीश (जिसके आदेश में घटना दर्ज हुई) | न्यायमूर्ति अरुण कुमार सिंह देशवाल (Justice Arun Kumar Singh Deshwal) |
| संबंधित विवादित जज | न्यायमूर्ति अजय भानोट (Justice Ajay Bhanot) |
| विवाद का मूल कारण | न्यायमूर्ति भानोट की कोर्ट में वकीलों के लिए आरक्षित सीट पर बैठे पुलिस अधीक्षक (SP) से वकील द्वारा हटने को कहने पर जज द्वारा वकील से माफी मंगवाना। |
| घटनाक्रम | 1. तोड़फोड़: वकीलों ने न्यायमूर्ति भानोट के कोर्ट रूम नंबर 49 में तोड़फोड़ की और फर्नीचर तोड़ा। 2. ताला बंद करना: वकीलों ने न्यायमूर्ति देशवाल की कोर्ट का दरवाजा बाहर से बंद किया। 3. सीसीटीवी और अवमानना का आदेश: हाईकोर्ट ने सीसीटीवी (CCTV) फुटेज से उपद्रवी वकीलों की पहचान कर अवमानना व अनुशासनात्मक कार्रवाई का निर्देश दिया। |
| अदालत की अपील | हाईकोर्ट बार एसोसिएशन की नवनिर्वाचित कार्यकारिणी से इस मुद्दे को सुलझाने और बार व बेंच की गरिमा बनाए रखने का अनुरोध किया गया। |

