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पृष्ठभूमि और विवाद का संदर्भ
- सुप्रीम कोर्ट के निर्देश और बढ़ता दबाव:यह टिप्पणी ऐसे समय में आई है जब NCLAT पर शीर्ष अदालत द्वारा रिमांड या प्राथमिकता के लिए भेजे गए मामलों की सुनवाई का भारी दबाव है। हाल ही में 27 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट (जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की पीठ) ने Sona Bansal v. Vashisht Kumar Goyal मामले में NCLAT की दिल्ली की मुख्य पीठ की खिंचाई की थी कि सुप्रीम कोर्ट के अनुरोध के बाद भी अपील की सुनवाई नहीं की गई। सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा था कि शीर्ष अदालत के अनुरोधों को बाध्यकारी निर्देश माना जाए।
- सुप्रीम कोर्ट के मामलों का अंबार:चेन्नई पीठ ने उल्लेख किया कि उनके पास सुप्रीम कोर्ट द्वारा निर्देशित आधा दर्जन से अधिक मामले लंबित हैं। पीठ ने टिप्पणी की कि लोग यह सोचते हैं कि पूरा NCLAT चेन्नई सिर्फ उन्हीं 5-6 बड़े मामलों को चलाने के लिए बैठा है, जिससे सामान्य वादकारियों के मामले टलते रहते हैं।
NCLAT पीठ के मुख्य विधिक बिंदु और तीखी टिप्पणियां
1. “दिल्ली से आने वाले वकील संयम बरतें”:
पीठ ने विशेष रूप से दिल्ली से वर्चुअल/फिजिकल माध्यम से जुड़ने वाले वकीलों को चेतावनी देते हुए कहा: “खासकर दिल्ली के वकील—जो भी दिल्ली से वकीलों को इंगेज कर रहा है—आपको आगे बढ़ना होगा। अन्यथा मैं एक ऐसी बाहरी समय सीमा (Outer Time Limit) तय कर दूंगा, जिसके बाद पक्षकारों की ओर से बहस करने के लिए खुद भगवान भी आ जाएं, तो हमें रत्ती भर फर्क नहीं पड़ेगा।”
2. क्रिकेट के उदाहरण (गावस्कर, द्रविड़ और सहवाग) से समझाया:
जब एक वकील ने दूसरे वरिष्ठ अधिवक्ता के आने तक समय मांगा और समय लेने का प्रयास किया, तो ट्रिब्यूनल ने क्रिकेट का उदाहरण देते हुए कहा: “अगर सुनील गावस्कर एक खास शैली में बल्लेबाजी करते थे, तो इसका मतलब यह नहीं कि हर बल्लेबाज को वही तरीका अपनाना होगा। जिस टीम में राहुल द्रविड़ थे, उसी में वीरेंद्र सहवाग भी थे। इसलिए आप सहवाग की तरह भी खेल सकते हैं! दूसरी तरफ से लिए गए समय की बराबरी करने की कोई जरूरत नहीं है।”
3. “अपनी ही वाक्पटुता में मग्न वकील”:
अदालत ने कहा कि अनुभवी जजों को अपनी बात समझाने के लिए कई दिनों की जरूरत नहीं होनी चाहिए, मुख्य बिंदु कुछ ही घंटों में रखे जा सकते हैं: “हम इतने बुद्धिमान हैं और पिछले 40 सालों से इस काम में हैं। क्या हम बात नहीं समझ सकते? जो लोग अपनी ही वाक्पटुता (Eloquence) से इतने मंत्रमुग्ध हो जाते हैं, वे खुद अपनी वक्तृता से प्यार करने लगते हैं और कोर्ट का समय नष्ट करते हैं। कृपया अपनी बात कहकर आगे बढ़ें।”
चेन्नई: कंपनी अधिनियम, 2013 (Companies Act, 2013) की धारा 421 व 424 (राष्ट्रीय कंपनी विधि अपीलीय अधिकरण / NCLAT की प्रक्रिया और शक्तियां—प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत एवं समयबद्ध न्याय), दिवाला एवं दिवालियापन संहिता, 2016 (IBC, 2016) का समयबद्ध समाधान अधिदेश (Time-Bound Resolution Mandate), अपीलीय मुकदमों में वरिष्ठ अधिवक्ताओं (Senior Advocates) द्वारा अत्यधिक अदालती समय लेने की प्रवृत्ति, तथा सर्वोच्च न्यायालय द्वारा प्राथमिक सुनवाई के निर्देशों (SC Expedited Hearing Directions) के अनुपालन की चुनौतियों पर राष्ट्रीय कंपनी विधि अपीलीय अधिकरण की चेन्नई पीठ ने एक अत्यंत स्पष्ट, व्यावहारिक और ऐतिहासिक मौखिक अवलोकन दर्ज किया है।
राष्ट्रीय कंपनी विधि अपीलीय अधिकरण (NCLAT) की चेन्नई पीठ के न्यायिक सदस्य न्यायमूर्ति एन. शेशाशायी (Justice N Seshasayee, Judicial Member) और तकनीकी सदस्य जतींद्रनाथ स्वैन (Jatindranath Swain, Technical Member) की खंडपीठ ने विशेष रूप से दिल्ली से शामिल होने वाले ‘सुपरस्टार’ वरिष्ठ वकीलों द्वारा घंटों और दिनों तक बहस खींचने पर गहरी अप्रसन्नता व्यक्त की।
पीठ ने दो-टूक कहा कि वकीलों का पेशेवर कद और उनके मुवक्किलों द्वारा दी जाने वाली भारी-भरकम फीस अन्य वादकारियों के समय पर एकाधिकार जमाने (Monopolising Judicial Time) या न्यायाधीशों को शनिवार को अतिरिक्त काम करने के लिए मजबूर करने का औचित्य नहीं बन सकती। अधिकरण ने चेतावनी दी कि यदि वकीलों ने स्वयं पर संयम नहीं बरता, तो पीठ वरिष्ठता की परवाह किए बिना बहस के लिए एक सख्त बाहरी समयसीमा (Outer Time Limit) निर्धारित कर देगी।
अधिकरण (NCLAT) के मुख्य कानूनी निष्कर्ष एवं विधिक टिप्पणियां
1. ‘आप बार के सुपरस्टार हैं और भारी फीस लेते हैं, इसका कोर्ट से कोई लेना-देना नहीं’
न्यायमूर्ति एन. शेशाशायी की अध्यक्षता वाली पीठ ने वरिष्ठ अधिवक्ताओं द्वारा स्क्रीन और अदालती समय पर हावी होने की आदत पर कड़ा प्रहार करते हुए कहा: “केवल इसलिए कि आप बार के सुपरस्टार (Superstar of the Bar) हैं और आपको भारी फीस दी गई है, आपको स्क्रीन स्पेस पर एकाधिकार जमाने का अधिकार नहीं मिल जाता। यह आपकी समस्या है और आपके मुवक्किल की वहन क्षमता (Affordability) का विषय है। इसका हमारे साथ कोई लेना-देना नहीं है।”
2. ‘शनिवार को हमें काम करना पड़ रहा है; हमें कौन भुगतान करता है?’:
- अधिकरण ने इस बात पर कड़ी आपत्ति जताई कि वकीलों द्वारा उचित समय में बहस समाप्त न करने के कारण जजों को शनिवार को भी अदालत में बैठना पड़ रहा है:“जैसे इस शनिवार को हमें काम करना पड़ रहा है। हमें इसके लिए कौन भुगतान करता है? कोई नहीं। तो हम क्यों काम करें? वकीलों की अंतहीन दलीलों के कारण पीठ को अतिरिक्त घंटे काम करने पर मजबूर क्यों किया जाना चाहिए?”
3. दिल्ली से आने वाले वकीलों को सख्त चेतावनी:
- पीठ ने विशेष रूप से राष्ट्रीय राजधानी से वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग या व्यक्तिगत रूप से पेश होने वाले वकीलों का उल्लेख किया:“विशेष रूप से दिल्ली के वकील, और जो कोई भी दिल्ली के वकीलों को नियुक्त करता है—आपको आगे बढ़ना होगा (You have to move forward)।अन्यथा मैं बहस की एक ऐसी सख्त बाहरी समयसीमा (Outer Time Limit) तय कर दूंगा जिसके भीतर चाहे स्वयं ईश्वर भी किसी पक्ष की ओर से बहस करने आ जाएं, हमें कोई परवाह नहीं होगी।”
4. ‘सुनील गावस्कर और राहुल द्रविड़ की टीम में सहवाग भी थे; सहवाग की तरह खेलें’:
- जब एक वकील ने दूसरे मामले में व्यस्त वरिष्ठ अधिवक्ता के लिए समय मांगा, तो पीठ ने दोपहर में समय देते हुए क्रिकेट का रोचक रूपक (Cricket Analogy) प्रस्तुत किया:“केवल इसलिए कि सुनील गावस्कर ने एक विशेष बल्लेबाजी शैली अपनाई थी, हर दूसरे बल्लेबाज को उसी धीमी शैली का पालन करने की आवश्यकता नहीं है।जिस टीम में राहुल द्रविड़ थे, उसी टीम में वीरेंद्र सहवाग भी थे। इसलिए आप सहवाग की तरह भी खेल सकते हैं। यह कतई आवश्यक नहीं है कि विपक्षी वकील ने जितना समय लिया है, आप भी अपनी बहस में उतना ही लंबा समय खींचें।”
5. ‘वकील अपनी वाक्पटुता के प्रेम में डूब जाते हैं’ (Consumed by Eloquence):
- अधिकरण ने वकीलों की अनावश्यक बयानबाजी की आलोचना करते हुए इसे ‘अधिवक्ताई गैर-जिम्मेदारी’ (Advocatorial Irresponsibility) करार दिया:“जो लोग अपनी वाक्पटुता (Eloquence) में बह जाते हैं, वे वस्तुतः अपनी ही वाकपटुता के प्रेम में डूब जाते हैं। कृपया मुख्य बिंदु पर आएं और आगे बढ़ें।हम पर्याप्त रूप से समझदार हैं। हम पिछले 40 वर्षों से इस विधिक क्षेत्र में कार्य कर रहे हैं। क्या हम नहीं समझ सकते? यदि मुझे कोई बिंदु समझ नहीं आएगा, तो मैं स्वयं आपसे स्पष्टीकरण मांग लूंगा।”
मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि एवं प्रक्रियात्मक संदर्भ (अक्टूबर 2026)
| संदर्भ / विवरण | तथ्यात्मक स्थिति एवं पीठ की टिप्पणियां |
| अपीलीय अधिकरण | राष्ट्रीय कंपनी विधि अपीलीय अधिकरण (NCLAT) — चेन्नई न्यायपीठ। |
| पीठ के सदस्य | न्यायमूर्ति एन. शेशाशायी (न्यायिक सदस्य) एवं जतींद्रनाथ स्वैन (तकनीकी सदस्य)। |
| सुप्रीम कोर्ट की हालिया पृष्ठभूमि | 27 अक्टूबर 2026 को सुप्रीम कोर्ट (सोना बंसल बनाम वशिष्ठ कुमार गोयल) में जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की पीठ ने NCLAT की प्रधान पीठ (नई दिल्ली) को समय पर अपील न सुनने पर फटकार लगाई थी और कहा था कि सुप्रीम कोर्ट के त्वरित सुनवाई के अनुरोध अदालतों/अधिकरणों के लिए बाध्यकारी निर्देश होते हैं। |
| चेन्नई पीठ का दबाव | पीठ ने स्पष्ट किया कि उसके समक्ष शीर्ष अदालत द्वारा प्राथमिकता पर सुनने के लिए निर्देशित आधा दर्जन से अधिक मामले लंबित हैं। ऐसा प्रतीत होने लगा है मानो पूरी चेन्नई पीठ केवल उन्हीं 5-6 मामलों के लिए संचालित हो रही हो। |
| वादकारियों पर प्रभाव | सूची में पहले 10 या 12 नंबर पर दर्ज मामलों का नंबर भी दोपहर 12 बजे तक नहीं आ पाता क्योंकि शुरुआत के मामलों में वरिष्ठ वकील अत्यधिक समय खपा देते हैं, जिससे अन्य सामान्य वादकारियों का पूरा शेड्यूल बर्बाद हो जाता है। |
| ‘सिक्के के दो पहलू’ के तर्क पर आपत्ति | पीठ ने कहा कि वकील अक्सर यह दलील देते हैं कि बार और बेंच एक ही सिक्के के दो पहलू हैं, किंतु वे जजों पर पड़ने वाले अत्यधिक मानसिक और शारीरिक दबाव तथा शनिवार को भी काम करने की विवशता को समझने में पूरी तरह विफल रहते हैं। |
विधिक एवं प्रक्रियात्मक विश्लेषण: ‘NCLAT की प्रक्रिया, IBC का समयबद्ध ढांचा और अदालती समय का प्रबंधन’
- IBC और कंपनी अधिनियम में समयबद्धता का सांविधिक महत्व:
- दिवाला एवं दिवालियापन संहिता (IBC) का पूरा दर्शन ही 330 दिनों के भीतर कॉरपोरेट समाधान सुनिश्चित करने पर टिका है। यदि अपीलीय स्तर (NCLAT) पर वरिष्ठ अधिवक्ताओं की अंतहीन बहसों के कारण एक-एक अपील कई महीनों तक लटकी रहेगी, तो दिवालिया कंपनी की परिसंपत्तियों का मूल्य घटता जाता है।
- कंपनी अधिनियम, 2013 की धारा 424 अधिकरण को प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के अधीन अपनी प्रक्रिया को स्वयं विनियमित (Regulate its own procedure) करने की शक्ति देती है। अधिकरण को यह पूर्ण अधिकार है कि वह मौखिक तर्कों के लिए 30 मिनट, 1 घंटा या लिखित सारांश (Written Submissions) दाखिल करने की कठोर समयसीमा निर्धारित कर दे।
- वरिष्ठ अधिवक्ताओं का वैधानिक दायित्व:
- बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) नियमों के तहत प्रत्येक अधिवक्ता का यह प्राथमिक कर्तव्य है कि वह अदालत के समय का सम्मान करे।
- कानून के स्थापित सिद्धांतों को दोहराने के बजाय मुख्य कानूनी बिंदुओं (Pith and Substance) पर केंद्रित बहस करना ही वरिष्ठ अधिवक्ता के दर्जे की वास्तविक पहचान है। NCLAT की यह तल्ख टिप्पणी भारतीय कॉर्पोरेट अदालतों में वरिष्ठ वकीलों द्वारा समय की बर्बादी पर नियंत्रण लगाने की दिशा में एक कड़ा संदेश है।
विधिक विवरण एवं संबद्ध पीठ
- अधिकरण: राष्ट्रीय कंपनी विधि अपीलीय अधिकरण (NCLAT), चेन्नई पीठ
- पीठ: न्यायमूर्ति एन. शेशाशायी (न्यायिक सदस्य) एवं जतींद्रनाथ स्वैन (तकनीकी सदस्य)
- तारीख: 29 अक्टूबर 2026
- विषय: अपीलीय कार्यवाहियों में वरिष्ठ अधिवक्ताओं द्वारा समय प्रबंधन, अदालती समय का संरक्षण एवं शनिवार को अतिरिक्त अदालती कार्य की विवशता।
- प्रासंगिक कानून एवं विधिक प्रावधान:
- कंपनी अधिनियम, 2013 (Companies Act, 2013) — धारा 421 (NCLAT के समक्ष अपील) एवं धारा 424 (अधिकरण और अपीलीय अधिकरण की प्रक्रिया व शक्तियां)
- दिवाला एवं दिवालियापन संहिता, 2016 (IBC, 2016) — धारा 12 (समयबद्ध समाधान प्रक्रिया) एवं धारा 61 (NCLAT में अपील)
- राष्ट्रीय कंपनी विधि अपीलीय अधिकरण नियम, 2016 (NCLAT Rules, 2016) — मौखिक बहसों के नियमन और संक्षिप्त लिखित दलीलें दाखिल करने की शक्तियां
- भारत का संविधान — अनुच्छेद 21 (त्वरित सुनवाई का अधिकार) एवं अनुच्छेद 14 (न्यायालय के समक्ष सभी वादकारियों के साथ समय आवंटन में समानता)
- संबद्ध न्यायिक सिद्धांत:
- न्यायिक समय प्रबंधन और अधिवक्ताओं के आचरण का विधिक मानक: ‘अदालती समय एक सार्वजनिक संपत्ति (Public Resource) है, जिस पर किसी भी मुवक्किल की आर्थिक संपन्नता या किसी वरिष्ठ अधिवक्ता के पेशेवर कद के आधार पर एकाधिकार नहीं जमाया जा सकता; अधिकरणों पर सर्वोच्च न्यायालय के त्वरित निर्देशों का पालन करने का भारी दबाव है; वकीलों को अपनी मौखिक दलीलों में आत्म-संयम बरतना चाहिए और संक्षेप में अपनी बात रखनी चाहिए; यदि वकील समय का सम्मान नहीं करते हैं, तो अधिकरण को मौखिक दलीलों पर अनिवार्य समय-सीमा (Time Cap) लगाने का पूर्ण सांविधिक अधिकार प्राप्त है।’
- वर्तमान स्थिति व भावी संकेत: NCLAT की चेन्नई पीठ ने वकीलों को स्पष्ट रूप से सचेत कर दिया है कि वे अपनी बहसों को संक्षिप्त करें; यदि यह प्रथा जारी रही तो अधिकरण द्वारा औपचारिक रूप से प्रत्येक मामले के लिए अधिकतम समय सीमा (Outer Time Limit) अधिसूचित कर दी जाएगी और अतिरिक्त समय की किसी भी मांग को सीधे खारिज कर दिया जाएगा।
Superstar Lawyer:मामले का संक्षिप्त विवरण (At A Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित ट्रिब्यूनल | नेशनल कंपनी लॉ अपीलीय न्यायाधिकरण (NCLAT), चेन्नई पीठ |
| पीठ | न्यायमूर्ति एन. शेषसायी (न्यायिक सदस्य) एवं जतींद्रनाथ स्वैन (तकनीकी सदस्य) |
| मुख्य मुद्दा | वरिष्ठ और ‘सुपरस्टार’ वकीलों द्वारा लंबे समय तक बहस चलाकर कोर्ट का समय बर्बाद करना, जिससे अन्य मामले लंबित रहते हैं और जजों को शनिवार को काम करना पड़ता है। |
| अदालत की मुख्य टिप्पणियां | 1. फीस और नाम का कोई विशेषाधिकार नहीं: भारी फीस लेने वाले वकील अन्य वादकारियों का समय नहीं छीन सकते। 2. बाहरी समय सीमा (Outer Time Limit): दलीलें न समेटने पर वकीलों का कद देखे बिना समय सीमा तय की जाएगी। 3. शनिवार के काम पर सवाल: वकीलों की लेती-देती के कारण जजों को बिना किसी अतिरिक्त भुगतान के वीकेंड पर काम करना पड़ता है। |

