FOLLOW US FOR MORE LEGAL UPDATES ON WhatsApp
फैसले में मनुस्मृति, वेदों और शास्त्रों का उल्लेख
- मनुस्मृति और वैश्य वर्ण का दायित्व:अदालत ने कहा कि हिंदू शास्त्रों और मनुस्मृति के अनुसार गाय केवल एक पशु नहीं है, बल्कि धर्म की ‘धुरी’ है। महर्षि मनु ने मनुस्मृति में गो-पालन और पशुधन संरक्षण का प्राथमिक उत्तरदायित्व समाज में महत्वपूर्ण स्थान रखने वाले वैश्य वर्ण को सौंपा था। प्राचीन भारतीय परंपरा में गाय और बैल की जोड़ी का आर्थिक व धार्मिक दोनों महत्व है।
- ऋग्वेद में ‘अघ्न्या’ (जिसकी हत्या न की जा सके):अदालत ने ऋग्वेद का हवाला देते हुए कहा कि शास्त्रों में गाय को “अघ्न्या” (Anya/Aghnya) कहा गया है, जिसका अर्थ है वह प्राणी जो कभी भी वध या हत्या करने योग्य नहीं है। इसके अतिरिक्त “गावो विश्वस्य मातरह” का अर्थ है कि गाय संपूर्ण ब्रह्मांड की माता है।
- ब्रह्मा, विष्णु और महेश का निवास:अदालत ने पौराणिक संदर्भ देते हुए उल्लेख किया कि जब भगवान ब्रह्मा के मुख से तपोबल से अमृत की बूंदें पृथ्वी पर गिरीं, तो सुरभि गाय (कामधेनु) का प्राकट्य हुआ। हरिवंश पुराण और मनुस्मृति के अनुसार, गाय के सींगों में ब्रह्मा, विष्णु और महेश तथा आँखों में सूर्य और चंद्रमा का वास माना गया है, इसलिए इसे ‘गोमाता’ कहकर पूजा जाता है।
गांधीनगर (गुजरात): भारत का संविधान के अनुच्छेद 48 (राज्य नीति निदेशक तत्व—कृषि और पशुपालन का संगठन तथा गायों, बछड़ों व अन्य दुधारू मवेशियों के वध पर रोक), अनुच्छेद 51A(g) (प्राणियों के प्रति दयाभाव रखने का मूल कर्तव्य), गुजरात पशु संरक्षण (संशोधन) अधिनियम, 2017 (Gujarat Animal Preservation Amendment Act, 2017), गुजरात पशु संरक्षण अधिनियम, 1954, तथा प्राचीन हिंदू धर्मग्रंथों—ऋग्वेद, मनुस्मृति, और हरिवंश पुराण में प्रतिपादित गो-संरक्षण के आध्यात्मिक व सामाजिक सिद्धांतों पर गुजरात की एक सत्र अदालत ने एक अत्यंत कड़ा और ऐतिहासिक निर्णय सुनाया है।
गांधीनगर जिले के अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश बी.आर. राजपूत (Additional Sessions Judge B R Rajput) ने गोहत्या और अवैध रूप से गोमांस के परिवहन के एक मामले में तीन अभियुक्तों—वसीम कुरैशी (Vasim Qureshi), मोहम्मद रफीक कुरैशी (Mohammad Rafiq Qureshi), और अशफाक बहेलिम (Asfaq Bahelim)—को दोषी ठहराते हुए आजीवन कारावास (Life Imprisonment) की कठोर सजा सुनाई है।
अदालत ने प्रत्येक दोषी पर ₹3,00,000 (तीन लाख रुपये) का जुर्माना भी लगाया। मामले के एक अन्य आरोपी लालाभाई सेनमा की मुकदमे के दौरान मृत्यु हो चुकी थी, जबकि साक्ष्य के अभाव में दो अन्य आरोपियों को बरी कर दिया गया। गुजराती भाषा में लिखे गए अपने विस्तृत निर्णय में न्यायाधीश ने हिंदू धर्मग्रंथों, वेदों और मनुस्मृति का विस्तार से हवाला देते हुए कहा कि गाय केवल एक पशु नहीं है, बल्कि धर्म की धुरी और संपूर्ण जगत की माता है। अदालत ने स्पष्ट किया कि गोहत्या के खिलाफ कानून का कड़ाई से प्रवर्तन ही एक न्यायपूर्ण समाज की स्थापना कर सकता है।
सत्र अदालत के मुख्य विधिक व दार्शनिक निष्कर्ष
1. ‘गाय ब्रह्मांड की माता के समान; गोहत्या पर कानून का कड़ा प्रवर्तन अनिवार्य’:
अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश बी.आर. राजपूत ने अपने फैसले में गो-रक्षा और न्याय के अंतर्संबंधों को रेखांकित करते हुए दर्ज किया: “गाय को संपूर्ण ब्रह्मांड की माता के समान माना गया है। यह मानव जीवन और समाज के लिए अत्यंत उपयोगी है। गो-रक्षा धर्म और करुणा से जुड़ा कार्य है, जबकि न्याय सत्य की रक्षा करता है। जहाँ कहीं भी गोहत्या होती है, उसके विरुद्ध कानून सम्मत कड़ी कार्रवाई होनी चाहिए। यदि साक्ष्यों से अभियुक्तों के खिलाफ अपराध सिद्ध होता है, तो लागू कानून के अनुसार समुचित दंड दिया जाना चाहिए। केवल न्याय के मार्ग पर चलकर ही धर्म और न्याय की स्थापना की जा सकती है। जीवन की रक्षा करना और कानून का प्रवर्तन करना एक न्यायपूर्ण समाज के सबसे महत्वपूर्ण कर्तव्य हैं।”
2. मनुस्मृति और वैदिक परंपराओं का उल्लेख:
अदालत ने निर्णय में प्राचीन संहिताओं का उल्लेख करते हुए गोधन के आध्यात्मिक और सामाजिक महत्व का विश्लेषण किया:
- मनुस्मृति का संदर्भ: अदालत ने दर्ज किया कि हिंदू धर्मग्रंथों और मनुस्मृति के अनुसार गोधन को केवल एक जानवर नहीं माना गया है, बल्कि इसे धर्म की “धुरी” के रूप में स्वीकार किया गया है। महर्षि मनु ने पशु संरक्षण और गोपालन का प्राथमिक दायित्व वैश्य वर्ण को सौंपा था; इसी प्रकार प्राचीन भारतीय परंपरा में गाय और बैल की जोड़ी का विशेष सामाजिक व कृषि महत्व रहा है।
- ब्रह्मा के मुख से सुरभि (कामधेनु) का प्राकट्य: वेदों और पौराणिक आख्यानों का हवाला देते हुए न्यायाधीश ने कहा कि जब भगवान ब्रह्मा के मुख से तपस्या के दौरान अमृत की बूंदें पृथ्वी पर गिरीं, तो उन दिव्य अमृत बूंदों से ‘सुरभि’ गाय (कामधेनु) का प्राकट्य हुआ, जिसे पृथ्वी पर समस्त गोवंश की आदि-माता माना जाता है।
3. ऋग्वेद में “अघ्न्या” और हरिवंश पुराण का उद्धरण:
अदालत ने वैदिक ऋचाओं का उल्लेख करते हुए कहा:
- ऋग्वेद का विधिक-धार्मिक सिद्धांत: ऋग्वेद में गाय को “अघ्न्या” (Aghnya) कहा गया है—जिसका शाब्दिक और विधिक अर्थ है कि वह किसी भी स्थिति में मारे जाने या वध किए जाने योग्य नहीं है।
- “गावो विश्वस्य मातरः”: अदालत ने निर्णय में उद्धृत किया:“गावो विश्वस्य मातरः का अर्थ है कि गाय संपूर्ण विश्व की माता है, जिसमें 33 कोटि देवी-देवता वास करते हैं। गाय के चार पैर चारों वेदों के प्रतीक हैं। हरिवंश पुराण और मनुस्मृति के अनुसार, गाय को दक्ष प्रजापति की पुत्री माना गया है और महर्षि के साथ विवाह के बाद पृथ्वी पर गोधन की सृष्टि का विस्तार हुआ। गाय के सींगों में ब्रह्मा, विष्णु और महेश निवास करते हैं तथा उसकी आँखों में सूर्य और चंद्रमा वास करते हैं; इसीलिए श्रद्धापूर्वक उसे ‘गोमाता’ कहा जाता है।”
मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि एवं विधिक कालक्रम
| चरण / विवरण | तथ्यात्मक स्थिति एवं अदालती निष्कर्ष |
| न्यायालय | अतिरिक्त सत्र न्यायालय, गांधीनगर जिला, गुजरात |
| पीठासीन न्यायाधीश | बी.आर. राजपूत, अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश |
| दोषी करार दिए गए व्यक्ति | 1. वसीम कुरैशी (Vasim Qureshi) 2. मोहम्मद रफीक कुरैशी (Mohammad Rafiq Qureshi) 3. अशफाक बहेलिम (Asfaq Bahelim) |
| अन्य आरोपियों की स्थिति | • लालाभाई सेनमा: विचारण (ट्रायल) के दौरान मृत्यु हो गई। • दो अन्य सह-आरोपियों को संदेह का लाभ देते हुए बरी किया गया। |
| बरामद प्रतिबंधित सामग्री | अभियुक्तों के कब्जे से कुल 277 किलोग्राम गोमांस (Beef) बरामद किया गया था, जिसका फॉरेंसिक परीक्षण में गोवंश का मांस होना प्रमाणित हुआ। |
| लागू कानून एवं धाराएं | • गुजरात पशु संरक्षण (संशोधन) अधिनियम, 2017 • गुजरात पशु संरक्षण अधिनियम, 1954 |
| सुनाया गया दंडादेश | • आजीवन कारावास (Life Imprisonment) की सजा। • प्रत्येक दोषी पर ₹3,00,000 (तीन लाख रुपये) का अर्थदंड; जुर्माना न भरने पर अतिरिक्त कारावास। |
विधिक एवं विधायी विश्लेषण: गुजरात पशु संरक्षण (संशोधन) अधिनियम, 2017
- 2017 के संशोधन की कठोरता:
- गुजरात राज्य ने वर्ष 2017 में गुजरात पशु संरक्षण अधिनियम, 1954 में ऐतिहासिक संशोधन करते हुए देश का सबसे कड़ा गो-संरक्षण कानून बनाया था।
- इस संशोधन के तहत गोहत्या, गोमांस की बिक्री, भंडारण या अवैध परिवहन के अपराध के लिए न्यूनतम सजा को 10 वर्ष और अधिकतम सजा को आजीवन कारावास (Life Imprisonment) तक बढ़ा दिया गया था। इसके अतिरिक्त ₹1 लाख से ₹5 लाख तक का जुर्माना और गोमांस के परिवहन में प्रयुक्त वाहनों को स्थाई रूप से जब्त करने का प्रावधान किया गया था।
- सर्वोच्च न्यायालय की संवैधानिक वैधता की मुहर (State of Gujarat v. Mirzapur Moti Kureshi Kassab Jamat – 2005):
- भारत के सर्वोच्च न्यायालय की 7 जजों की संविधान पीठ ने 2005 के अपने ऐतिहासिक निर्णय में गुजरात सरकार द्वारा गोवंश के वध पर लगाए गए पूर्ण प्रतिबंध को संविधान के अनुच्छेद 19(1)(g) (व्यापार की स्वतंत्रता) का उल्लंघन नहीं माना था।
- शीर्ष अदालत ने माना था कि भारतीय कृषि अर्थव्यवस्था, जैविक खाद और ग्रामीण जीवन में गोवंश (गायों और बैलों) की उपयोगिता कभी समाप्त नहीं होती, अतः संविधान के अनुच्छेद 48 और 51A(g) के तहत गोहत्या पर पूर्ण प्रतिबंध लगाना एक उचित प्रतिबंध (Reasonable Restriction) है।
विधिक विवरण एवं संदर्भ
- न्यायालय: अतिरिक्त सत्र न्यायालय, गांधीनगर (गुजरात)
- पीठासीन न्यायाधीश: अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश बी.आर. राजपूत
- निर्णय की भाषा: गुजराती
- दोषी: वसीम कुरैशी, मोहम्मद रफीक कुरैशी और अशफाक बहेलिम
- प्रासंगिक कानून एवं विधिक प्रावधान:
- भारत का संविधान — अनुच्छेद 48 (गोवध निषेध का नीति निदेशक सिद्धांत) एवं अनुच्छेद 51A(g) (जीवों के प्रति दया)
- गुजरात पशु संरक्षण अधिनियम, 1954 (मूल अधिनियम)
- गुजरात पशु संरक्षण (संशोधन) अधिनियम, 2017 (Gujarat Animal Preservation Amendment Act, 2017) — गोहत्या, मांस भंडारण और परिवहन पर आजीवन कारावास एवं भारी जुर्माने के प्रावधान
- संबद्ध न्यायिक सिद्धांत:
- गोहत्या अपराधों में दंडात्मक न्यायशास्त्र का विधिक मानक: ‘गोधन भारतीय संस्कृति, समाज और ग्रामीण अर्थव्यवस्था का अनिवार्य आधार है; धर्मग्रंथों में गाय को अघ्न्या और जगत जननी का स्थान दिया गया है; 2017 के कड़े संशोधन के तहत 277 किलोग्राम गोमांस के अवैध परिवहन व संलिप्तता का अपराध सिद्ध होने पर अभियुक्तों को समाज में कड़ा संदेश देने हेतु कानून के तहत निर्धारित अधिकतम दंड—आजीवन कारावास—दिया जाना न्यायसंगत और विधिक रूप से उचित है।’
- वर्तमान स्थिति: गांधीनगर सत्र न्यायालय द्वारा आजीवन कारावास और ₹3-3 लाख के जुर्माने का वारंट जारी कर तीनों दोषियों को सजा भुगतने के लिए केंद्रीय जेल भेज दिया गया है; दोषियों के पास इस फैसले के विरुद्ध गुजरात उच्च न्यायालय में आपराधिक अपील दाखिल करने का वैधानिक अधिकार उपलब्ध रहेगा।
Cow Slaughter: मामले का संक्षिप्त विवरण (At A Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | जिला एवं सत्र न्यायालय, गांधीनगर, गुजरात |
| न्यायाधीश | अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश बी.आर. राजपूत (BR Rajput) |
| दोषी करार व्यक्ति | वसीम कुरैशी, मोहम्मद रफीक कुरैशी और अशफाक बहेलिम |
| आरोपित कानून/धाराएं | गुजरात पशु संरक्षण (संशोधन) अधिनियम 2017 एवं 1954 कानून |
| बरामदगी | 277 किलोग्राम गोमांस (Beef) |
| अदालत की सजा | तीनों दोषियों को आजीवन कारावास (Life Sentence) और ₹3-3 लाख का जुर्माना। |
| धर्मग्रंथों का संदर्भ | मनुस्मृति, ऋग्वेद, हरिवंश पुराण और वेदों से ‘कामधेनु’ व ‘अघ्न्या’ का उल्लेख। |

