FOLLOW US FOR MORE LEGAL UPDATES ON WhatsApp
मामले की पृष्ठभूमि: क्या था ‘डिजिटल अरेस्ट’ से जुड़ा विवाद?
- देशव्यापी एफआईआर और स्थानांतरण की मांग:याचिकाकर्ता गौरव कुमार साहा और अन्य के खिलाफ देश के विभिन्न राज्यों में डिजिटल अरेस्ट और साइबर धोखाधड़ी के मामले दर्ज किए गए थे। याचिकाकर्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट से गुहार लगाई कि दिल्ली की मंदिर मार्ग साइबर पुलिस पहले से ही मुख्य जांच कर रही है, इसलिए देश भर के अन्य राज्यों की पुलिस जांचों और एफआईआर को एक साथ मिला दिया जाए।
- ‘म्यूल अकाउंट’ (Mule Account) और पीड़ित होने का दावा:याचिकाकर्ताओं के वकील ने तर्क दिया कि उनके मुवक्किल खुद इस संगठित अपराध के शिकार हैं। उनके कंपनी बैंक खाते का इस्तेमाल उनकी जानकारी के बिना महज पैसे घुमाने (Mule Account) के लिए किया गया था और उन्होंने खुद जम्मू-कश्मीर पुलिस में इसकी शिकायत दर्ज कराई थी।
सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य निष्कर्ष और कानूनी तर्क
1. “जबरन वसूली नहीं, यह वीडियो कॉल के जरिए डिजिटल डकैती है”:
पीठ ने सेवानिवृत्त और बुजुर्ग नागरिकों को अपना शिकार बनाने वाले साइबर गिरोहों की निंदा करते हुए कहा कि यह केवल कानून-व्यवस्था का मामला नहीं बल्कि संगठित साइबर डकैती है। CJI ने स्पष्ट कहा कि ऐसे अपराधियों पर मुकदमे से पहले भी सख्त कार्रवाई के रास्ते खोजे जाने चाहिए।
2. “पीड़ितों की परेशानी पर आरोपी की सुविधा भारी नहीं पड़ सकती”:
विभिन्न राज्यों की जांचों को दिल्ली में स्थानांतरित करने की मांग पर न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची ने कड़ी आपत्ति जताई: “जिस स्थान पर पीड़ित ठगी का शिकार हुआ है, जांच उसी स्थान पर होनी चाहिए… हम नहीं मानते कि आपका अधिकार पीड़ितों की असुविधा या राज्य पुलिस की स्वतंत्र जांच से ऊपर है। क्या हमें देश भर के सभी पीड़ितों को दिल्ली घसीटना चाहिए क्योंकि आप दावा करते हैं कि आपको इस संगठित अपराध में बड़े हितधारकों द्वारा मोहरा बनाया गया था?”
3. जांच को पटरी से उतरने न देने की चेतावनी:
न्यायमूर्ति बागची ने याचिकाकर्ताओं को चेतावनी देते हुए कहा: “आप इस अपराध में केवल एक सिपाही (Foot Soldier) नहीं हैं। आज आपका इस्तेमाल देश भर की विकेंद्रीकृत जांचों को पटरी से उतारने के लिए किया जा रहा है। हम आपकी इस चाल में नहीं आने वाले।”
नई दिल्ली: भारत का संविधान के अनुच्छेद 32 (संवैधानिक उपचारों का अधिकार), भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) की धारा 178, 180 व 193 / दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (CrPC) की धारा 177 व 179 (अपराध के विचारण व अन्वेषण का क्षेत्रीय क्षेत्राधिकार—जहाँ परिणाम निकला हो), सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 (IT Act) की धारा 66D (कंप्यूटर संसाधन द्वारा प्रतिरूपण कर धोखाधड़ी), भारतीय न्याय संहिता, 2023 (BNS) की धारा 308 (जबरन वसूली / Extortion), धारा 310(2) (डकैती / Dacoity) तथा धारा 111 (संगठित अपराध सिंडिकेट / Organised Crime), और ‘टी.टी. एंटनी’ नजीर बनाम अंतर-राज्यीय साइबर वित्तीय अपराधों में देशभर की प्राथमिकियों को क्लब करने (Consolidation/Clubbing of Pan-India FIRs) के विधिक मानकों पर सुप्रीम कोर्ट ने एक अत्यंत कठोर और नजीरपरक रुख अपनाया है।
सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की तीन-न्यायाधीशों की विशेष पीठ ने साइबर ठगी व ‘डिजिटल अरेस्ट’ (Digital Arrest Extortion Racket) के एक अंतर-राज्यीय मामले में आरोपी द्वारा देश के विभिन्न राज्यों में दर्ज प्राथमिकियों (FIRs) को दिल्ली स्थानांतरित व समेकित करने की मांग वाली रिट याचिका पर सुनवाई की।
शीर्ष अदालत ने देशभर के असहाय, सेवानिवृत्त वरिष्ठ नागरिकों को वीडियो कॉल के जरिए डराकर करोड़ों रुपये ऐंठने वाले सिंडिकेट्स की कार्यप्रणाली पर तीखा आक्रोश व्यक्त किया। मुख्य न्यायाधीश ने इसे साधारण वसूली के बजाय “डिजिटल डकैती” (Digital Dacoity) करार दिया और कहा कि ऐसे अपराधियों से कानून के तहत पूरी क्रूरता व बेरहमी (Most Ruthless Manner) से निपटा जाना चाहिए। वहीं, अदालत द्वारा याचिका खारिज करने का कड़ा रुख भांपते हुए याचिकाकर्ता ने अपनी अर्जी वापस (Withdraw) ले ली।
शीर्ष अदालत की तीखी मौखिक टिप्पणियां: ‘यह एक्सटॉर्शन नहीं, डिजिटल डकैती है’
सुनवाई के दौरान जब आरोपी के वकील ने खुद को मात्र ‘म्यूल अकाउंट’ (Mule Account) का अनजाने में शिकार हुआ पीड़ित बताते हुए सभी राज्यों की जांच को दिल्ली के मंदिर मार्ग साइबर थाने में क्लब करने की गुहार लगाई, तो पीठ ने तीखे विधिक सवाल दागे:
1. ‘डिजिटल अपराधियों से बेरहमी से निपटें; यदि ट्रायल से पूर्व सजा संभव हो, तो वह भी दें’
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने वरिष्ठ नागरिकों को निशाना बनाने वाले संगठित साइबर नेटवर्क पर अत्यंत सख्त मौखिक टिप्पणी की: “वसूली (Extortion) तो सबसे साधारण अपराध है। हमारी सुविचारित राय में, यह (डिजिटल अरेस्ट रैकेट) ‘डिजिटल डकैती’ (Digital Dacoity) है। आप वीडियो कॉल के जरिए वर्दी व फर्जी अदालतों का डर दिखाकर लोगों को लूटते हैं। ये बेहद क्रूर और शातिर अपराधी हैं। इनसे सर्वाधिक बेरहम तरीके (Most Ruthless Manner) से निपटा जाना चाहिए। यदि कानून में विचारण (Trial) से पहले भी इन्हें दंडित करने की कोई गुंजाइश या दायरा हो, तो उसे भी पूरी तरह अपनाया जाना चाहिए।”
2. ‘क्या हम देशभर के पीड़ितों को दिल्ली आने के लिए विवश करें?’: जस्टिस जयमाल्या बागची
पीठ ने आरोपी की क्षेत्रीय सुविधा के आधार पर जांच को एक जगह समेटने की दलील को सिरे से खारिज किया: “जहाँ पीड़ित के साथ अपराध हुआ है और जहाँ उसे प्रताड़ित किया गया है, विवेचना का स्थान भी वही होना चाहिए। हम यह कतई नहीं मानते कि अभियुक्त के रूप में आपका प्राथमिकियों को एक जगह जोड़ने (Aggregation) का अधिकार, देश के अलग-अलग कोनों में बैठे पीड़ितों की असुविधा या राज्य पुलिस की स्वतंत्र विवेचना पर हावी हो सकता है। क्या आपकी सुविधा के लिए हम कन्याकुमारी से लेकर कश्मीर तक के बुजुर्ग पीड़ितों को दिल्ली की अदालतों में चक्कर काटने के लिए घसीटें, सिर्फ इसलिए कि आप दावा कर रहे हैं कि इस संगठित अपराध में बड़े खिलाड़ियों ने आपको फुसला लिया था?”
3. ‘आप केवल अपराध के सिपाही नहीं, जाँच भटकाने का औजार भी बन रहे हैं’:
- जब वकील ने दावा किया कि याचिकाकर्ता की कंपनी का खाता केवल ‘म्यूल अकाउंट’ था और उन्होंने जम्मू-कश्मीर पुलिस को खुद सूचित किया था, तो न्यायमूर्ति बागची ने चेतावनी भरे लहजे में कहा:“आप केवल इस अपराध के मोहरे (Foot Soldier) ही नहीं हैं। आज इस याचिका के जरिए, आप देशभर में चल रही विकेंद्रीकृत जांचों (Decentralised Investigations) को पटरी से उतारने के लिए एक मोहरे के रूप में इस्तेमाल हो रहे हैं। हम आपके इस चारे (Bait) को कतई निगलने वाले नहीं हैं।”
मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि एवं प्रक्रियात्मक कालक्रम
| चरण / विवरण | तथ्यात्मक स्थिति एवं पक्षों के दावे |
| याचिकाकर्ता | गौरव कुमार साहा व अन्य (साइबर सिंडिकेट के वित्तीय लेन-देन से जुड़ी कंपनी के खाताधारक/निदेशक)। |
| प्रतिवादी पक्ष | भारत संघ (गृह मंत्रालय), दिल्ली पुलिस (साइबर सेल, मंदिर मार्ग) एवं संबंधित राज्य पुलिस बल। |
| याचिका की प्रकृति | भारत का संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत आपराधिक रिट याचिका — देशभर के विभिन्न राज्यों में दर्ज प्राथमिकियों (FIRs) को एक साथ जोड़ने (Clubbing) तथा समानांतर दंडात्मक जांचों पर अंतरिम रोक की मांग। |
| कथित अपराध का स्वरूप (Digital Arrest) | साइबर ठगों द्वारा खुद को सीबीआई, नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो (NCB), प्रवर्तन निदेशालय (ED) या मुंबई/दिल्ली पुलिस का वरिष्ठ अधिकारी बताकर स्काइप/व्हाट्सएप वीडियो कॉल के जरिए बुजुर्गों को फर्जी वारंट दिखाना, कमरे में कैद रहने का आदेश देना (‘डिजिटल अरेस्ट’) और गिरफ्तारी से बचाने के नाम पर उनके बैंक खातों से करोड़ों रुपये ‘म्यूल बैंक खातों’ में ट्रांसफर कराना। |
| याचिकाकर्ताओं का प्राथमिक बचाव | 1. वे मुख्य सिंडिकेट नहीं हैं; उनके बैंक खाते का अनजाने में ‘म्यूल अकाउंट’ के रूप में दुरुपयोग हुआ। 2. उन्होंने धोखाधड़ी का पता चलते ही जम्मू-कश्मीर पुलिस में शिकायत दर्ज कराई थी। 3. दिल्ली की मंदिर मार्ग साइबर पुलिस पहले से मुख्य मनी ट्रेल और लेयरिंग की जांच कर रही है; अतः अन्य राज्यों की समानांतर पुलिस जांचों से अभियुक्तों पर दोहरा वित्तीय व शारीरिक उत्पीड़न हो रहा है। |
| सुप्रीम कोर्ट का दृष्टिकोण | साइबर वित्तीय अपराधों में देशभर के अलग-अलग पीड़ितों के अधिकारों को नजरअंदाज कर सभी मामलों को दिल्ली में केंद्रित नहीं किया जा सकता; विकेंद्रीकृत जांच आवश्यक है। |
| अंतिम परिणाम | सर्वोच्च न्यायालय की कठोर मौखिक टिप्पणियों और याचिका खारिज करने के आदेश की संभावना को देखते हुए याचिकाकर्ताओं ने याचिका बिना शर्त वापस (Withdrawn) ले ली। |
विधिक एवं आपराधिक न्यायशास्त्र: ‘साइबर डकैती, क्षेत्रीय क्षेत्राधिकार और FIR क्लबिंग की सीमा’
- ‘टी.टी. एंटनी’ और ‘अर्नब गोस्वामी’ नजीरों का अंतर-राज्यीय साइबर अपराधों में अप्रयोज्यता:
- सर्वोच्च न्यायालय ने टी.टी. एंटनी बनाम केरल राज्य [(2001) 6 SCC 181] और अर्नब रंजन गोस्वामी बनाम भारत संघ [(2020) 14 SCC 12] में व्यवस्था दी थी कि एक ही भाषण, एक ही टीवी प्रसारण या एक ही लेन-देन के आधार पर देशभर में दर्जनों FIRs दर्ज नहीं की जा सकतीं और उन्हें क्लब किया जाना चाहिए।
- किंतु डिजिटल वित्तीय ठगी में यह सिद्धांत लागू नहीं होता: साइबर सिंडिकेट द्वारा 50 अलग-अलग राज्यों में 50 अलग-अलग वरिष्ठ नागरिकों को अलग-अलग कॉल करके लूटना ‘एक ही संव्यवहार’ (Same Transaction) नहीं है। प्रत्येक पीड़ित के साथ हुआ छल एक स्वतंत्र संज्ञेय अपराध (Distinct Cognizable Offence) है। अतः आरोपी अपनी सुविधा के नाम पर इन सभी मुकदमों को किसी एक राज्य की पुलिस के पास स्थानांतरित नहीं करवा सकता।
- क्षेत्रीय क्षेत्राधिकार और पीड़ित का अधिकार (CrPC धारा 179 / BNSS धारा 180):
- आपराधिक प्रक्रिया संहिता के अनुसार, किसी अपराध की जांच और विचारण उस स्थानीय अधिकार क्षेत्र की अदालत द्वारा भी किया जा सकता है जहां उस अपराध का परिणाम (Consequence) सामने आया हो।
- यदि केरल, कर्नाटक या ओडिशा के किसी बुजुर्ग ने अपने बैंक से जालसाज के खाते में धन हस्तांतरित किया है, तो अपराध का प्रभाव उस संबंधित राज्य में पड़ा है। पीड़ितों को न्याय पाने के लिए दूसरे राज्यों की यात्रा करने हेतु विवश करना संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत उनके ‘न्याय तक पहुंच’ (Access to Justice) के अधिकार का उल्लंघन होगा।
- म्यूल बैंक खातों (Mule Accounts) की आपराधिक जिम्मेदारी:
- साइबर अपराधों में ‘म्यूल एकाउंट्स’ (किराए के या कमीशन पर दिए गए कॉर्पोरेट/व्यक्तिगत बैंक खाते) अपराध की रीढ़ होते हैं।
- भारतीय न्याय संहिता की धारा 61 (आपराधिक षड्यंत्र) और धारा 318(4) (धोखाधड़ी) के तहत, जो व्यक्ति अपने खाते का उपयोग अवैध धन को छिपाने (Layering) के लिए करने देता है, वह केवल इस आधार पर जिम्मेदारी से नहीं बच सकता कि वह “अनजान” था।
विधिक विवरण
- न्यायालय: भारत का सर्वोच्च न्यायालय (संवैधानिक मूल आपराधिक रिट क्षेत्राधिकार)
- केस संदर्भ: गौरव कुमार साहा व अन्य बनाम भारत संघ व अन्य [Writ Petition (Criminal) No. … / 2026]
- पीठ: मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जयमाल्या बागची एवं न्यायमूर्ति वी. मोहना
- आदेश की तिथि: 28 अक्टूबर 2026
- कार्यवाही का परिणाम: याचिकाकर्ताओं द्वारा याचिका वापस ले ली गई (Dismissed as Withdrawn)
प्रासंगिक कानून एवं विधिक प्रावधान:
- भारत का संविधान — अनुच्छेद 32 (संवैधानिक उपचारों का अधिकार) एवं अनुच्छेद 21 (पीड़ितों के त्वरित न्याय व संरक्षण का अधिकार)
- दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (CrPC) — धारा 177 व 179 (अपराध की जांच व विचारण का साधारण स्थान जहाँ कार्य किया गया या परिणाम निकला) / BNSS 2023 की धारा 178, 180 व 193
- भारतीय न्याय संहिता, 2023 (BNS):
- धारा 308 — जबरन वसूली (Extortion)
- धारा 310(2) — डकैती के समतुल्य संगठित डिजिटल वसूली
- धारा 318(4) — धोखाधड़ी और संपत्ति का बेईमानी से परिदान (पूर्ववर्ती IPC 420)
- धारा 61(2) — आपराधिक षड्यंत्र (Criminal Conspiracy)
- धारा 111 — संगठित अपराध (Organised Crime)
- सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 (IT Act) — धारा 66D (कंप्यूटर संसाधन द्वारा प्रतिरूपण कर धोखाधड़ी करना)
- संबद्ध न्यायिक सिद्धांत:
- डिजिटल वित्तीय सिंडिकेट और जांच विकेंद्रीकरण का विधिक मानक: ‘डिजिटल अरेस्ट और साइबर वसूली संगठित डकैती की श्रेणी में आते हैं; आरोपी की व्यक्तिगत सुविधा के आधार पर देश भर में दर्ज विभिन्न पीड़ितों की प्राथमिकियों को किसी एक जांच एजेंसी के पास क्लब नहीं किया जा सकता; अपराध जहाँ घटित हुआ और जहाँ पीड़ित को वित्तीय क्षति पहुँची, संबंधित राज्य की स्थानीय पुलिस को स्वतंत्र विवेचना करने का पूर्ण अधिकार है।’
- वर्तमान स्थिति: सर्वोच्च न्यायालय द्वारा राहत देने से इनकार के बाद याचिका वापस ले ली गई है; विभिन्न राज्यों (यथा जम्मू-कश्मीर, दिल्ली, महाराष्ट्र आदि) की पुलिस टीमें आरोपी सिंडिकेट और संबंधित बैंक खातों के विरुद्ध अपनी-अपनी स्वतंत्र आपराधिक जांच और चार्जशीट दाखिल करने की कार्यवाही पूर्ववत जारी रखेंगी।
Cyber Fraud: मामले का संक्षिप्त विवरण (At A Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | भारत का सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court of India) |
| पीठ | मुख्य न्यायाधीश सूर्या कांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची एवं न्यायमूर्ति वी. मोहना |
| मामला/साइटेशन | गौरव कुमार साहा व अन्य बनाम भारत संघ व अन्य (Gourab Kumar Saha & Anr. vs Union of India & Ors.) |
| याचिकाकर्ता | साइबर अपराध में आरोपी बनाए गए व्यक्ति (दावा: वे खुद ‘म्यूल अकाउंट’ के शिकार हैं) |
| मुख्य मांग | देश भर के विभिन्न राज्यों में दर्ज कई एफआईआर को एक साथ मिलाकर दिल्ली में स्थानांतरित करना। |
| अदालत का रुख | याचिका खारिज/वापस ली गई; अपराधियों की सुविधा के लिए पीड़ितों और विभिन्न राज्यों की जांच को बाधित नहीं किया जा सकता। |

