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मामले की पृष्ठभूमि: 3 अगस्त का फैसला और अवमानना का घटनाक्रम
- 3 अगस्त 2026 का ऐतिहासिक फैसला:3 अगस्त को हाईकोर्ट ने पंजाब सरकार को निर्देश दिया था कि वह अपने सभी कर्मचारियों और पेंशनभोगियों को अखिल भारतीय सेवाओं (IAS/IPS/IFS) के अधिकारियों के समान दरों पर अप-टू-डेट बकाया महंगाई भत्ता (DA/DR) तुरंत जारी करे। कोर्ट ने यह भी शर्त रखी थी कि जब तक इन बकायों का भुगतान नहीं हो जाता, तब तक सरकार प्रिंट या सोशल मीडिया में बड़े पैमाने पर विज्ञापन अभियानों जैसे अनुत्पादक खर्चों (Unproductive Expenditures) पर रोक लगाएगी।
- सुप्रीम कोर्ट में अटका मामला और कोर्ट फीस का मुद्दा:पंजाब सरकार ने इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी, लेकिन 1 सितंबर से यह अपील मामूली त्रुटियों (जैसे मात्र ₹520 की कोर्ट फीस जमा न होना) के कारण सुप्रीम कोर्ट रजिस्ट्री में अटकी पड़ी है। इस बीच, 10 अक्टूबर को हाईकोर्ट को पता चला कि पंजाब के वित्त सचिव ने विभागाध्यक्षों को 3 अगस्त के अदालती आदेश को लागू न करने का निर्देश दिया था, जिसके बाद हाईकोर्ट ने आपराधिक अवमानना का नोटिस जारी किया था।
अदालत में तीखी बहस: “आप चांद या मंगल पर होर्डिंग लगाएं, हमें कोई आपत्ति नहीं”
1. विज्ञापनों और चुनावी मुद्दों पर बहस:
पंजाब सरकार की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता विकास सिंह ने तर्क दिया कि चुनाव नजदीक होने के कारण विरोधी इसे राजनीतिक मुद्दा बना रहे हैं। उन्होंने कहा कि यदि सरकारें जनता को अपने अच्छे कामों के बारे में नहीं बताएंगी, तो वे सत्ता में कैसे रहेंगी। इस पर हाईकोर्ट ने दोटूक कहा: “मिस्टर सिंह, यदि आप चांद पर भी अपना विज्ञापन लगाते हैं तो हमें कोई आपत्ति नहीं है। जहां तक वित्तीय प्राथमिकताओं का सवाल है, वह कार्यपालिका का अधिकार क्षेत्र है। आप अपने होर्डिंग चांद या मंगल पर लगाइए, हमें कोई सरोकार नहीं है। लेकिन वैधानिक दायित्वों को किसी लोकलुभावन एजेंडे के अधीन नहीं बनाया जा सकता।”
2. ‘AOR’ की जिम्मेदारी पर सफाई:
विकास सिंह ने तर्क दिया कि ₹520 की कोर्ट फीस जमा करना एडवोकेट-ऑन-रिकॉर्ड (AOR) की तकनीकी जिम्मेदारी है, इसका राज्य के वित्तीय घाटे से कोई लेना-देना नहीं है। इस पर कोर्ट ने कहा कि इतने बड़े मामले में जवाबदेही तय होनी चाहिए और रिकॉर्ड पर मौजूद तथ्यों का न्यायिक संज्ञान (Judicial Notice) लिया जा सकता है।
चंडीगढ़: भारत का संविधान के अनुच्छेद 215 (अभिलेख न्यायालय के रूप में अवमानना हेतु दंडित करने की उच्च न्यायालय की अंतर्निहित शक्ति), न्यायालय की अवमानना अधिनियम, 1971 (Contempt of Courts Act, 1971) की धारा 2(c) व धारा 12 (आपराधिक अवमानना—न्याय प्रशासन में जानबूझकर हस्तक्षेप), राज्य के कर्मचारियों व पेंशनभोगियों के महंगाई भत्ते (DA/DR) के सांविधिक अधिकार बनाम कार्यपालिका की राजकोषीय प्राथमिकताओं, तथा सुप्रीम कोर्ट में दायर SLP में मामूली कमियां (त्रुटियां) दूर न कर आदेशों के क्रियान्वयन को जानबूझकर लटकाने की रणनीति पर पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय ने अत्यंत तल्ख, व्यंग्यात्मक और सख्त रुख अपनाया है।
पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति विनोद एस. भारद्वाज (Justice Vinod S Bhardwaj) और न्यायमूर्ति रविंद्र मलिक (Justice Ravinder Malik) की खंडपीठ ने पंजाब सरकार के कर्मचारियों और पेंशनभोगियों को अखिल भारतीय सेवा (IAS/IPS/IFS) अधिकारियों के समान दरों पर लंबित DA/DR किस्तों के भुगतान से संबंधित अवमानना मामले की सुनवाई की।
पीठ ने पंजाब सरकार के इस आचरण पर गहरी आपत्ति जताई कि वह 3 अगस्त 2026 के हाईकोर्ट के बाध्यकारी निर्णय के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में दायर विशेष अनुमति याचिका (SLP) को पिछले दो महीने (1 सितंबर से) से केवल ₹520 की अदालती फीस (Court Fees) न भरने जैसी छोटी-मोटी रजिस्ट्री त्रुटियों (Defects) के बहाने लंबित रखे हुए है, जबकि राज्य अन्य मामलों में 24 घंटे के नोटिस पर SLP सूचीबद्ध करा लेता है। खंडपीठ ने इसे न्याय प्रशासन में जानबूझकर किया गया हस्तक्षेप (Deliberate interference in the administration of justice) मानते हुए मुख्य सचिव के.ए.पी. सिन्हा (KAP Sinha, Chief Secretary) को 5 नवंबर 2026 को व्यक्तिगत रूप से अदालत में उपस्थित रहने और विस्तृत स्पष्टीकरण हलफनामा दाखिल करने का अंतिम निर्देश दिया है।
उच्च न्यायालय के मुख्य कानूनी निष्कर्ष एवं तल्ख न्यायिक टिप्पणियां
1. ‘₹520 हैं अभी पंजाब सरकार के पास?’: मामूली रजिस्ट्री त्रुटियों पर तीखा व्यंग्य
न्यायमूर्ति विनोद एस. भारद्वाज और न्यायमूर्ति रविंद्र मलिक की पीठ ने सुप्रीम कोर्ट रजिस्ट्री में 1 सितंबर से याचिका के दोषपूर्ण पड़े रहने पर टिप्पणी करते हुए कहा: *”‘₹520 हैं अभी पंजाब सरकार के पास?’ (Does Punjab government even have ₹520 right now?) घटनाक्रम के पूरे क्रम को देखने पर, सुप्रीम कोर्ट में एसएलपी सूचीबद्ध न होने का कोई भी वैध कारण नजर नहीं आता। जब आप अन्य मामलों में मात्र 24 घंटे के अल्पकालिक नोटिस पर सुप्रीम कोर्ट में एसएलपी लिस्ट कराने में पूरी तरह सफल रहे हैं, तो यहाँ ऐसा प्रतीत होता है कि यह एसएलपी को जानबूझकर सूचीबद्ध न होने देने का एक सुविचारित और सुनियोजित प्रयास (Deliberate designed effort) है।”
2. ‘चाँद या मंगल ग्रह पर होर्डिंग लगाइए, हमें फर्क नहीं पड़ता; पर सांविधिक दायित्वों की बलि नहीं दी जा सकती’:
- जब पंजाब सरकार के वरिष्ठ अधिवक्ता विकास सिंह ने दलील दी कि आगामी विधानसभा चुनावों के चलते इस मुद्दे का राजनीतिकरण किया जा रहा है और सरकारों को अपने अच्छे कार्यों का प्रचार करने के लिए विज्ञापनों की आवश्यकता होती है, तो खंडपीठ ने दो-टूक कहा:“मिस्टर सिंह, यदि आप अपना विज्ञापन चाँद पर लगाएं, तो भी हमें कोई आपत्ति नहीं है। हमारे मन में तनिक भी संदेह नहीं है कि राजकोषीय प्राथमिकताओं (Fiscal Priorities) का निर्धारण कार्यपालिका और राजनीतिक नेतृत्व का अनन्य क्षेत्र है।आप अपना होर्डिंग चाँद (Moon) पर लगाएं या मंगल (Mars) पर, हमें इससे कोई सरोकार नहीं है। किंतु वित्तीय निर्णय लेना सरकार का काम हो सकता है, लेकिन राज्य के सांविधिक दायित्वों (Statutory Obligations) को किसी लोक-लुभावन एजेंडे (Populist Agenda) का बंधक नहीं बनाया जा सकता।”
3. ‘यह संस्थागत विफलता नहीं, बल्कि न्याय में बाधा डालने का सकारात्मक कृत्य है’:
- अदालत ने राज्य के इस रुख की विधिक धज्जियां उड़ाईं कि वह आदेश का पालन इसलिए नहीं कर पा रहा क्योंकि सुप्रीम कोर्ट में मामला लिस्ट नहीं हो रहा:*”यह एसएलपी सूचीबद्ध न होना कोई संस्थागत विफलता (Institutional Failure) नहीं है। यह आपकी ओर से यह सुनिश्चित करने का एक सकारात्मक कृत्य (Positive Act) है कि याचिका लिस्ट ही न हो।आप एक तरफ बचाव लेते हैं कि ‘मैं पालन करने की स्थिति में नहीं हूँ, मेरी मंशा है किंतु एसएलपी लिस्ट नहीं हो रही’, और दूसरी तरफ ₹520 की अदालती फीस जैसी तुच्छ कमियों को दूर नहीं करते। यह सीधे तौर पर न्याय प्रशासन में हस्तक्षेप करने का सुविचारित प्रयास है।”
4. मुख्य सचिव के विरुद्ध आपराधिक अवमानना का दायरा:
- पीठ ने याद दिलाया कि 6 अक्टूबर को मुख्य सचिव को तथ्यों को गलत तरीके से पेश करने के लिए अवमानना नोटिस जारी किया गया था, और 10 अक्टूबर को वित्त सचिव द्वारा जारी उस प्रशासनिक निर्देश का संज्ञान लिया गया था जिसमें विभागाध्यक्षों को हाईकोर्ट के 3 अगस्त के फैसले पर अमल न करने को कहा गया था:“दस्तावेजों से प्रथम दृष्टया ऐसा आचरण परिलक्षित होता है जो मामले को आपराधिक अवमानना (Criminal Contempt) के दायरे में लाता है।”
मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि एवं प्रक्रियात्मक कालक्रम (अगस्त–अक्टूबर 2026)
| संदर्भ / विवरण | तथ्यात्मक स्थिति एवं पक्षों के दावे |
| मूल न्यायिक आदेश (03.08.2026) | पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को निर्देश दिया था कि वह अपने सभी कर्मचारियों और पेंशनभोगियों को केंद्र व अखिल भारतीय सेवा (AIS) संवर्ग के अनुरूप अद्यतन महंगाई भत्ता (DA) और महंगाई राहत (DR) जारी करे। साथ ही, भुगतान न होने तक अनावश्यक सरकारी विज्ञापनों पर रोक लगाई थी। |
| अवमानना का आधार | निर्धारित समय बीत जाने के बाद भी बकाए का भुगतान न करना और मुख्य सचिव द्वारा आदेश के अनुपालन का हलफनामा पेश न करना। |
| सुप्रीम कोर्ट में SLP का गतिरोध | राज्य सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर तो की, किंतु 1 सितंबर 2026 से यह याचिका रजिस्ट्री में डिफेक्टिव पड़ी रही। मुख्य दोष ₹520 की अदालती फीस का भुगतान न होना था। हाईकोर्ट ने पाया कि इस दौरान सरकार ने अन्य आपात याचिकाओं को सुप्रीम कोर्ट में 24 घंटे में मेंशन व लिस्ट करवा लिया। |
| राज्य सरकार (मुख्य सचिव) का बचाव | वरिष्ठ अधिवक्ता विकास सिंह ने दलील दी कि ₹520 की फीस का मुद्दा सुप्रीम कोर्ट के एडवोकेट-ऑन-रिकॉर्ड (AoR) के स्तर का तकनीकी विषय है, जिसका राज्य के वित्तीय संकट से कोई संबंध नहीं है। उन्होंने कहा कि याचिकाकर्ता आगामी पंजाब विधानसभा चुनावों के कारण इस मामले को तूल दे रहे हैं और सरकारों को अपनी उपलब्धियों के प्रचार का संवैधानिक अधिकार है। |
| अदालत का अंतिम निर्देश | मुख्य सचिव को अपना विस्तृत स्पष्टीकरण हलफनामा दाखिल करने का 5 नवंबर 2026 तक अंतिम अवसर दिया गया; मुख्य सचिव को उस दिन व्यक्तिगत रूप से अदालत में हाजिर रहने का कड़ा आदेश दिया गया। |
विधिक एवं संवैधानिक विश्लेषण: ‘न्यायिक आदेशों की अवहेलना और कार्यपालिका का दायित्व’
- ‘स्टे के अभाव में आदेश का अनुपालन अनिवार्य’ (Absence of Judicial Stay):
- भारत के संवैधानिक कानून का यह सुस्थापित सिद्धांत है कि उच्च न्यायालय द्वारा पारित कोई भी अंतिम आदेश तब तक राज्य और उसके सभी अधिकारियों पर पूरी तरह बाध्यकारी होता है, जब तक कि किसी सक्षम अपीलीय अदालत (सर्वोच्च न्यायालय) द्वारा उस पर औपचारिक स्थगन आदेश (Stay Order) पारित न कर दिया जाए।
- केवल अपील की डायरी संख्या ले लेना और फिर उसमें जानबूझकर कमियां ठीक न कराना ताकि न तो सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हो और न ही हाईकोर्ट के आदेश का पालन करना पड़े, न्यायपालिका की प्रक्रिया का दुरुपयोग (Abuse of Process of Court) है।
- वेतन/पेंशन और महंगाई भत्ता: अनुच्छेद 300A और जीवन का अधिकार:
- सर्वोच्च न्यायालय ने डी.एस. नकारा और हालिया फैसलों में यह स्पष्ट किया है कि कर्मचारियों का वेतन, पेंशन और मुद्रास्फीति को संतुलित करने वाला DA कोई सरकार की ‘खैरात’ या ‘कृपा’ नहीं है, बल्कि यह उनकी आजीविका (अनुच्छेद 21) और संपत्ति के अधिकार (अनुच्छेद 300A) से जुड़ा सांविधिक अधिकार है।
- राज्य सरकार विज्ञापन अभियानों या चुनावी लोक-लुभावन घोषणाओं पर अरबों रुपये खर्च करने का दावा करते हुए कर्मचारियों के इस वैधानिक हक को राजकोषीय घाटे की आड़ में नहीं रोक सकती।
विधिक विवरण एवं उपस्थित वरिष्ठ अधिवक्ता
- न्यायालय: पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय, चंडीगढ़ (अवमानना क्षेत्राधिकार)
- केस संदर्भ: पंजाब राज्य कर्मचारी एवं पेंशनभोगी एसोसिएशन बनाम के.ए.पी. सिन्हा, मुख्य सचिव, पंजाब सरकार [COCP No. … / 2026]
- पीठ: न्यायमूर्ति विनोद एस. भारद्वाज एवं न्यायमूर्ति रविंद्र मलिक (खंडपीठ)
- आदेश की तिथि: 30 अक्टूबर 2026 (शुक्रवार)
- अगली सुनवाई एवं व्यक्तिगत पेशी की तिथि: 5 नवंबर 2026
विधिक प्रतिनिधित्व:
- न्यायालय मित्र (Amicus Curiae): वरिष्ठ अधिवक्ता आर.एस. चीमा (Senior Advocate RS Cheema)।
- याचिकाकर्ता कर्मचारियों/पेंशनभोगियों की ओर से: वरिष्ठ अधिवक्ता संजय कौशल (Senior Advocate Sanjay Kaushal) एवं वरिष्ठ अधिवक्ता चेतन मित्तल (Senior Advocate Chetan Mittal)।
- पंजाब के मुख्य सचिव (KAP सिन्हा) की ओर से: वरिष्ठ अधिवक्ता विकास सिंह (Senior Advocate Vikas Singh)।
- पंजाब राज्य सरकार की ओर से: अतिरिक्त महाधिवक्ता (AAG) चंचल के. सिंगला (Additional Advocate General Chanchal K Singla) एवं फेरी सोफत।
- प्रासंगिक कानून एवं विधिक प्रावधान:
- भारत का संविधान — अनुच्छेद 215 (उच्च न्यायालय की अवमानना शक्तियां) एवं अनुच्छेद 300A (संपत्ति का अधिकार—पेंशन व भत्ते)
- न्यायालय की अवमानना अधिनियम, 1971 (Contempt of Courts Act, 1971):
- धारा 2(b) — सिविल अवमानना (आदेशों की जानबूझकर अवज्ञा)
- धारा 2(c) — आपराधिक अवमानना (न्याय प्रशासन में बाधा उत्पन्न करना या न्यायिक प्राधिकार को नीचा दिखाना)
- धारा 12 — अवमानना हेतु दंड के प्रावधान
- पंजाब सिविल सेवा नियमावली (Punjab Civil Services Rules) — महंगाई भत्ता (DA) और पेंशनभोगियों हेतु महंगाई राहत (DR) नियम
- संबद्ध न्यायिक सिद्धांत:
- न्यायिक आदेशों के क्रियान्वयन और प्रशासनिक जवाबदेही का विधिक मानक: ‘राज्य सरकारें अपीलीय अदालत में दोषपूर्ण याचिकाएं लंबित रखकर संवैधानिक अदालतों के अंतिम आदेशों के क्रियान्वयन को अनिश्चितकाल के लिए नहीं टाल सकतीं; मामूली अदालती फीस या रजिस्ट्री त्रुटियों के नाम पर अपीलों को लिस्ट न कराना और नीचे आदेश का पालन न करना न्याय प्रशासन में जानबूझकर किया गया गंभीर आपराधिक हस्तक्षेप है; राजकोषीय स्वायत्तता के नाम पर सरकारें अपनी प्राथमिकताओं का चयन कर सकती हैं, किंतु कर्मचारियों के वैधानिक व सांविधिक देयों का भुगतान चुनावी या प्रचार प्राथमिकताओं के अधीन नहीं किया जा सकता।’
- वर्तमान स्थिति व अनुपालन निर्देश: पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने मुख्य सचिव के.ए.पी. सिन्हा को 5 नवंबर 2026 को व्यक्तिगत रूप से अदालत में हाजिर होने का सख्त निर्देश दिया है; यदि उक्त तिथि तक विस्तृत अनुपालन हलफनामा पेश नहीं किया जाता है, तो अदालत राज्य के शीर्ष प्रशासनिक अधिकारियों के विरुद्ध आपराधिक अवमानना के तहत औपचारिक आरोप तय करने की दिशा में आगे बढ़ेगी।
Punjab News: मामले का संक्षिप्त विवरण (At A Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय (Punjab and Haryana High Court), चंडीगढ़ |
| पीठ | न्यायमूर्ति विनोद एस. भारद्वाज एवं न्यायमूर्ति रविंदर मलिक |
| मामला/विषय | पंजाब सरकार के कर्मचारियों/पेंशनभोगियों को डीए/डीआर बकाए का भुगतान न करने पर आपराधिक अवमानना (Criminal Contempt) याचिका |
| मुख्य सचिव (अवमाननाकर्ता) पक्ष | वरिष्ठ अधिवक्ता विकास सिंह (Senior Advocate Vikas Singh) |
| अदालत द्वारा नियुक्त Amicus Curiae | वरिष्ठ अधिवक्ता आर.एस. चीमा (Senior Advocate RS Cheema) |
| कर्मचारियों/आवेदकों का पक्ष | वरिष्ठ अधिवक्ता संजय कौशल एवं वरिष्ठ अधिवक्ता चेतन मित्तल |
| अदालत का अंतरिम निर्देश | 1. 5 नवंबर तक हलफनामा दें: मुख्य सचिव अगली सुनवाई पर व्यक्तिगत रूप से पेश हों और विस्तृत हलफनामा दाखिल करें। 2. लोकलुभावन एजेंडा बनाम वैधानिक दायित्व: सरकार भले अपने होर्डिंग चांद-मंगल पर लगाए, लेकिन वैधानिक बकाए के भुगतान से मुंह नहीं मोड़ सकती। |

