Saturday, October 31, 2026
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Medicine Price: मरीजों के बिल में दवाओं का खरीद मूल्य दर्शाने वाले सर्कुलर पर फिलहाल नहीं होगी कोई दंडात्मक कार्रवाई; कर्नाटक सरकार का केस जानें

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मामले की पृष्ठभूमि: क्या था विवादित सर्कुलर और अस्पतालों की आपत्तियां?

  1. खाद्य सुरक्षा एवं औषधि प्रशासन आयुक्त का सर्कुलर:1 अक्टूबर 2026 को कर्नाटक के खाद्य सुरक्षा और औषधि प्रशासन आयुक्त द्वारा एक सर्कुलर जारी किया गया था। इसमें सभी निजी अस्पतालों, नर्सिंग होमों और स्वास्थ्य संस्थानों को निर्देश दिया गया था कि वे 1 नवंबर 2026 से मरीजों को दिए जाने वाले मदवार बिलों में दवाओं, मेडिकल डिवाइसेस और कंज्यूमेबल्स के एक्चुअल प्रोक्योरमेंट मूल्य (Landing Price), अधिकतम खुदरा मूल्य (MRP) और मरीज से ली गई अंतिम कीमत को स्पष्ट रूप से दर्शाएं।
  2. अस्पतालों की ओर से मुख्य विधिक व व्यावहारिक आपत्तियां:
    • वैधानिक अधिकार क्षेत्र का अभाव: याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि यह कार्यकारी सर्कुलर बिना किसी वैधानिक अधिकार (Statutory Authority) के जारी किया गया है और मौजूदा कानूनी ढांचे में ऐसा कोई अनिवार्य प्रावधान नहीं है।
    • व्यावसायिक गोपनीयता (Commercial Confidentiality) का हनन: अस्पतालों ने तर्क दिया कि खरीद मूल्य आपूर्तिकर्ताओं, खरीद की मात्रा, छूट, क्रेडिट व्यवस्था और अन्य वाणिज्यिक शर्तों पर निर्भर करते हैं। इनका खुलासा करने से गोपनीय व्यावसायिक समझौते उजागर होंगे और अलग-अलग अस्पतालों के खरीद मूल्य अलग होने पर मरीजों में अनावश्यक भ्रम पैदा होगा।
    • सॉफ्टवेयर व आईटी सिस्टम में बदलाव: इतने कम समय में पूरे बिलिंग सॉफ्टवेयर, अकाउंटिंग सिस्टम और प्रशासनिक वर्कफ़्लो को बदलना व्यावहारिक रूप से कठिन है। इसके अलावा, इस आदेश से पहले हितधारकों (अस्पतालों व फार्मास्यूटिकल्स) से कोई परामर्श नहीं किया गया था।

बेंगलुरु: भारत का संविधान के अनुच्छेद 19(1)(g) (व्यापार और व्यवसाय की स्वतंत्रता—गोपनीय वाणिज्यिक समझौतों की सुरक्षा), अनुच्छेद 14 (मनमानेपन के विरुद्ध समानता का अधिकार), औषधि (मूल्य नियंत्रण) आदेश, 2013 (DPCO, 2013) सहपठित आवश्यक वस्तु अधिनियम, 1955, कर्नाटक निजी चिकित्सा प्रतिष्ठान अधिनियम, 2007 (KPMEA, 2007), तथा राज्य कार्यपालिका द्वारा सांविधिक शक्तियों के अभाव में जारी किए गए प्रशासनिक परिपत्रों (Administrative Circulars issued Ultra Vires) की विधिक वैधता पर कर्नाटक उच्च न्यायालय ने एक अत्यंत महत्वपूर्ण मामले की सुनवाई की है।

कर्नाटक उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति सी.एम. पूनाचा (Justice CM Poonacha) की एकल पीठ ने राज्य सरकार द्वारा जारी उस परिपत्र (सर्कुलर) को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई की, जिसमें निजी अस्पतालों और स्वास्थ्य सेवा संस्थानों को 1 नवंबर 2026 से मरीजों के बिलों में दवाओं, चिकित्सा उपकरणों और उपभोग्य सामग्रियों के मूल खरीद मूल्य/लैंडिंग प्राइस (Base Procurement Price) को अंतिम बिल मूल्य के साथ अनिवार्य रूप से प्रदर्शित करने का निर्देश दिया गया था।

राज्य सरकार की ओर से उपस्थित अतिरिक्त महाधिवक्ता (AAG) बी.वी. भानुप्रकाश द्वारा दिए गए स्पष्ट आश्वासन के बाद कि सक्षम अधिकारी इस सर्कुलर पर पुनर्विचार कर रहे हैं और अगली सुनवाई तक इसे लागू करने के लिए अस्पतालों पर कोई दबाव नहीं बनाया जाएगा, उच्च न्यायालय ने राज्य के इस रुख को औपचारिक रूप से रिकॉर्ड पर ले लिया। अदालत ने आश्वासन दिया कि परिपत्र की वैधता पर आगामी सुनवाई तक किसी भी अस्पताल के खिलाफ दंडात्मक या प्रतिकूल कार्रवाई नहीं की जाएगी। मामले की अगली सुनवाई 12 नवंबर 2026 को निर्धारित की गई है।

उच्च न्यायालय की कार्यवाही एवं पारित आदेश का मुख्य सार

1. ‘सर्कुलर पर पुनर्विचार की प्रक्रिया जारी; अगली तारीख तक अमल नहीं होगा’

न्यायमूर्ति सी.एम. पूनाचा ने कर्नाटक सरकार के अतिरिक्त महाधिवक्ता के वक्तव्य को दर्ज करते हुए अपने आदेश में स्पष्ट रूप से दर्ज किया: “प्रतिवादियों की ओर से उपस्थित विद्वान अतिरिक्त महाधिवक्ता ने निर्देशों के आधार पर निवेदन किया है कि संबंधित अधिकारी दिनांक 01.10.2026 के आक्षेपित परिपत्र पर पुनर्विचार (Re-look) करने की प्रक्रिया में हैं। साथ ही, यह भी आश्वस्त किया गया है कि दिनांक 01.10.2026 के आक्षेपित परिपत्र के क्रियान्वयन के लिए मामले की अगली सुनवाई की तारीख तक कोई दबाव नहीं डाला जाएगा (Will not be insisted upon till the next date of hearing)।”

2. अस्पतालों की आशंका और अदालत का कड़ा रुख:

  • सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं के वरिष्ठ वकील ने चिंता व्यक्त की थी कि 1 नवंबर की अंतिम तिथि नजदीक है; यदि 1 नवंबर से बिलों में खरीद मूल्य प्रदर्शित नहीं किया गया, तो विभाग इसे ‘डिफ़ॉल्ट’ या वैधानिक उल्लंघन मानकर अस्पतालों पर भारी जुर्माने या लाइसेंस रद्द करने की कार्रवाई शुरू कर सकता है।
  • इस पर पीठ ने राज्य के वकील से दो-टूक कहा:“यदि आप कुछ दिनों के लिए इसे सख्ती से लागू नहीं करने जा रहे हैं, तो याचिकाकर्ताओं की आशंकाओं के समाधान के लिए रिकॉर्ड पर कोई स्पष्ट वचन आना अनिवार्य है।”
  • इसके उपरांत AAG ने अदालत को आश्वस्त किया कि जब तक अदालत मामले की सुनवाई नहीं करती, अस्पतालों पर कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा।

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मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि एवं प्रक्रियात्मक कालक्रम (अक्टूबर–नवंबर 2026)

चरण / विवरणतथ्यात्मक स्थिति एवं पक्षों के दावे
याचिकाकर्ता पक्ष1. प्राइवेट हॉस्पिटल्स एंड नर्सिंग होम्स एसोसिएशन (PHANA)
2. प्रिस्टीन हॉस्पिटल्स एंड रिसर्च सेंटर प्राइवेट लिमिटेड
3. डॉ. हलगरे मल्लिकार्जुन प्रसन्ना (वरिष्ठ चिकित्सक व संचालक)।
प्रतिवादी पक्षकर्नाटक राज्य, स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग, एवं आयुक्त, खाद्य सुरक्षा एवं औषधि प्रशासन (कर्नाटक)।
विवादित परिपत्रपरिपत्र दिनांक 01.10.2026 — जिसके तहत राज्य के सभी निजी अस्पतालों, नर्सिंग होम और स्वास्थ्य केंद्रों को मरीजों को दिए जाने वाले मद-वार बिलों (Itemised Bills) में दवाओं, सर्जिकल उपकरणों और उपभोग्य सामग्रियों की वास्तविक खरीद दर (Landing / Procurement Price), अधिकतम खुदरा मूल्य (MRP) और मरीज से ली गई वास्तविक कीमत तीनों का स्पष्ट प्रकटीकरण अनिवार्य किया गया था।
अमल की प्रस्तावित तिथि1 नवंबर 2026।
याचिकाकर्ताओं के मुख्य विधिक तर्क1. वैधानिक अधिकार क्षेत्र का अभाव (Lack of Statutory Authority): खाद्य सुरक्षा एवं औषधि प्रशासन आयुक्त के पास ऐसा वित्तीय प्रकटीकरण अनिवार्य करने की कोई विधायी शक्ति नहीं है; यह मौजूदा कानूनी ढांचे से बाहर है।
2. गोपनीय वाणिज्यिक समझौतों का हनन: खरीद मूल्य थोक खरीद मात्रा, वितरक छूट, नकद छूट (Cash Discounts), और साख समझौतों पर निर्भर करता है; इसका सार्वजनिक प्रकटीकरण गोपनीय व्यापारिक अनुबंधों को उजागर करेगा।
3. मरीजों में भ्रम की आशंका: अलग-अलग अस्पतालों की खरीद क्षमता के कारण खरीद मूल्य अलग-अलग हो सकते हैं, जिससे मरीजों में अनावश्यक विवाद उत्पन्न होगा।
4. तकनीकी व तार्किक विफलता: अस्पतालों के संपूर्ण बिलिंग सॉफ्टवेयर, ERP सिस्टम और लेखांकन नियमों को रातों-रात बदलना असंभव है।
5. परामर्श का अभाव: बिना किसी हितधारक या डॉक्टरों से चर्चा किए एकतरफा आदेश थोपा गया।
राज्य सरकार का आधिकारिक पक्षAAG ने दलील दी कि सरकार का इरादा केवल पारदर्शिता लाना और मरीजों को बेस प्राइस की जानकारी देना था; हालांकि सरकार ने स्वीकार किया कि इस पर पुनर्विचार किया जा रहा है और 12 नवंबर तक इसे लागू नहीं किया जाएगा।
अदालत का अंतरिम निर्देशराज्य सरकार के आश्वासन को रिकॉर्ड पर दर्ज किया गया; अस्पतालों के खिलाफ कोई दंडात्मक कदम नहीं उठाया जाएगा; अंतरिम राहत पर विस्तृत सुनवाई 12 नवंबर 2026 को होगी।

विधिक एवं प्रशासनिक विश्लेषण: ‘मूल्य प्रकटीकरण बनाम वाणिज्यिक गोपनीयता’

  • ‘अधिकतम खुदरा मूल्य’ (MRP) और खरीद मूल्य (Procurement Price) का कानूनी अंतर:
    • औषधि (मूल्य नियंत्रण) आदेश, 2013 (DPCO) और विधिक मापविज्ञान (पैकेज्ड कमोडिटीज) नियम, 2011 के तहत किसी भी निर्माता या विक्रेता को केवल उत्पाद पर मुद्रित MRP या उससे कम कीमत पर दवा बेचने की अनुमति होती है।
    • कानूनन किसी भी खुदरा विक्रेता (जिसमें अस्पताल की फार्मेसी भी शामिल है) के लिए यह अनिवार्य नहीं है कि वह अपने ग्राहक को यह बताए कि उसने वह उत्पाद वितरक या फार्मास्युटिकल कंपनी से किस थोक मूल्य (Wholesale/Landing Cost) पर खरीदा है।
  • व्यापारिक गोपनीयता (Trade Secrets & Commercial Terms):
    • बड़े अस्पताल थोक में खरीददारी करने के कारण 20% से 40% तक की संस्थागत छूट (Bulk Discount) प्राप्त करते हैं, जबकि छोटे नर्सिंग होम कम मात्रा के कारण ऊंची दरों पर दवाएं खरीदते हैं।
    • यदि खरीद मूल्य का प्रकटीकरण अनिवार्य किया जाता है, तो न केवल अस्पतालों और दवा कंपनियों के बीच के गोपनीय वाणिज्यिक समझौते (Non-Disclosure Agreements) टूटेंगे, बल्कि समान दवा के लिए अलग-अलग अस्पतालों में अलग-अलग खरीद मूल्य देखकर मरीजों के बीच अविश्वास और विवाद की स्थिति बनेगी।
  • सांविधिक प्राधिकार का अभाव (Absence of Substantive Legislation):
    • कर्नाटक निजी चिकित्सा प्रतिष्ठान अधिनियम (KPMEA) या औषधि एवं प्रसाधन सामग्री अधिनियम, 1940 में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है जो औषधि नियंत्रक को यह अधिकार देता हो कि वह निजी चिकित्सालयों के बिलिंग प्रारूप और लाभ मार्जिन (Profit Margin) को नियंत्रित करने के लिए इस प्रकार के मनमाने सर्कुलर जारी करे। ऐसे प्रशासनिक आदेश न्यायपालिका की समीक्षा में प्रथम दृष्टया अधिकार क्षेत्र से परे (Ultra Vires) ठहरते हैं।

विधिक विवरण एवं उपस्थित अधिवक्ता

  • न्यायालय: कर्नाटक उच्च न्यायालय, बेंगलुरु (मूल रिट क्षेत्राधिकार)
  • केस संदर्भ: प्राइवेट हॉस्पिटल्स एंड नर्सिंग होम्स एसोसिएशन (PHANA) व अन्य बनाम कर्नाटक राज्य व अन्य [Writ Petition No. … / 2026]
  • पीठासीन न्यायाधीश: न्यायमूर्ति सी.एम. पूनाचा (एकल पीठ)
  • आदेश की तिथि: 30 अक्टूबर 2026 (शुक्रवार)
  • अगली सुनवाई की तिथि: 12 नवंबर 2026

विधिक प्रतिनिधित्व:

  • याचिकाकर्ताओं (PHANA व डॉक्टरों) की ओर से: वरिष्ठ अधिवक्ता ध्यान चिन्नप्पा (Senior Advocate Dhyan Chinnappa)।
  • प्रतिवादी कर्नाटक राज्य की ओर से: अतिरिक्त महाधिवक्ता (AAG) बी.वी. भानुप्रकाश (Additional Advocate General BV Bhanuprakash)।
  • प्रासंगिक कानून एवं विधिक प्रावधान:
    • भारत का संविधान — अनुच्छेद 19(1)(g) (व्यापार और पेशे की स्वतंत्रता), अनुच्छेद 14 (समानता) एवं अनुच्छेद 226 (रिट क्षेत्राधिकार)
    • कर्नाटक निजी चिकित्सा प्रतिष्ठान अधिनियम, 2007 (KPMEA, 2007) — निजी अस्पतालों का विनियमन व पारदर्शिता उपबंध
    • औषधि (मूल्य नियंत्रण) आदेश, 2013 (Drugs (Prices Control) Order – DPCO, 2013) — आवश्यक दवाओं के मूल्य की सीमाएं
    • आवश्यक वस्तु अधिनियम, 1955 (Essential Commodities Act, 1955) — आवश्यक वस्तुओं का मूल्य निर्धारण
  • संबद्ध न्यायिक सिद्धांत:
    • प्रशासनिक परिपत्रों की सांविधिक वैधता और वाणिज्यिक स्वतंत्रता का विधिक मानक: ‘राज्य की कार्यपालिका केवल प्रशासनिक परिपत्रों के माध्यम से निजी व्यापारिक प्रतिष्ठानों पर ऐसे वित्तीय या प्रकटीकरण दायित्व नहीं थोप सकती जो किसी मूल वैधानिक अधिनियम द्वारा समर्थित न हों; निजी अस्पतालों को दवाओं के खरीद मूल्य (Procurement Cost) को सार्वजनिक करने के लिए विवश करना उनके गोपनीय वाणिज्यिक अनुबंधों और अनुच्छेद 19(1)(g) के तहत संरक्षित व्यावसायिक स्वतंत्रता का गंभीर उल्लंघन है; जब तक राज्य सरकार ऐसे नियमों पर पुनर्विचार पूरी नहीं कर लेती, तब तक हितधारकों के खिलाफ कोई दंडात्मक कार्रवाई नहीं की जा सकती।’
  • वर्तमान स्थिति व अनुपालन प्रभाव: कर्नाटक उच्च न्यायालय में राज्य सरकार के इस औपचारिक आश्वासन के बाद, कर्नाटक के किसी भी निजी अस्पताल या नर्सिंग होम को 1 नवंबर 2026 से मरीजों के बिल में दवाओं का खरीद मूल्य (लैंडिंग प्राइस) दर्शाने की कोई बाध्यता नहीं होगी; अस्पतालों के खिलाफ कोई दंडात्मक कार्रवाई नहीं की जा सकेगी और 12 नवंबर 2026 को अदालत इस सर्कुलर पर औपचारिक अंतरिम रोक के प्रश्न पर अंतिम आदेश पारित करेगी।

Medicine Price: मामले का संक्षिप्त विवरण (At A Glance)

विवरणजानकारी
संबंधित अदालतकर्नाटक उच्च न्यायालय (Karnataka High Court), बेंगलुरु
न्यायाधीशन्यायमूर्ति सी.एम. पूनाचा (Justice CM Poonacha)
मामला/साइटेशनप्राइवेट हॉस्पिटल्स एंड नर्सिंग होम्स एसोसिएशन व अन्य बनाम कर्नाटक राज्य व अन्य (Private Hospitals and Nursing Homes Association and Others v. State of Karnataka and Others)
याचिकाकर्ताप्राइवेट हॉस्पिटल्स एंड नर्सिंग होम्स एसोसिएशन (PHANA), प्रिस्टीन हॉस्पिटल्स और डॉ. हलागेरे मल्लिकाअर्जुन प्रसन्ना | प्रतिनिधित्व: वरिष्ठ अधिवक्ता ध्यान चिन्नप्पा
प्रतिवादी पक्षकर्नाटक सरकार और खाद्य सुरक्षा व औषधि प्रशासन आयुक्त | प्रतिनिधित्व: अतिरिक्त महाधिवक्ता (AAG) बी.वी. भानुप्रकाश
मूल विवाद1 अक्टूबर 2026 को जारी सर्कुलर जिसके तहत 1 नवंबर से अस्पतालों के बिलों में दवाओं के एमआरपी के साथ-साथ उनका मूल खरीद मूल्य दिखाना अनिवार्य किया गया था।
अदालत का अंतरिम आदेशआश्वासन दर्ज: अगली सुनवाई (12 नवंबर 2026) तक सर्कुलर लागू नहीं किया जाएगा।
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