Sunday, November 1, 2026
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Tree Protection Officer: पैसा दो और पेड़ काटो; यह कानून बर्बर है और पूरे राज्य को तबाह कर देगा; पंजाब के नए वृक्ष संरक्षण कानून पर पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट सख्त

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मामले की पृष्ठभूमि: राष्ट्रीय औसत से काफी नीचे है पंजाब-हरियाणा का हरित क्षेत्र

  1. मोहाली पेड़ कटाई विवाद और कोर्ट की रोक:दिसंबर 2025 में, हाईकोर्ट ने मोहाली जिले में 251 पेड़ों को काटने के फैसले के खिलाफ दायर जनहित याचिका पर ऐतिहासिक आदेश पारित किया था। कोर्ट ने स्पष्ट आदेश दिया था कि अगले निर्देशों तक पंजाब में उच्च न्यायालय की पूर्व अनुमति के बिना कोई भी पेड़ नहीं काटा जाएगा।
  2. वन क्षेत्र का चिंताजनक आंकड़ा:अदालत ने ‘इंडिया स्टेट ऑफ फॉरेस्ट रिपोर्ट 2023’ का हवाला देते हुए बताया कि पंजाब में केवल 3.67% और हरियाणा में 3.65% वृक्ष व वन आवरण है। यह राष्ट्रीय औसत (25.17%) और राष्ट्रीय वन नीति 1988 द्वारा निर्धारित न्यूनतम मानक 33% से बहुत नीचे है।
  3. नए कानून की मुख्य खामियां:याचिकाकर्ता की ओर से कोर्ट को सूचित किया गया कि सितंबर में लाए गए नए कानून के तहत स्थानीय निकायों के प्रशासनिक अधिकारियों (Executive Officers) को ही “वृक्ष संरक्षण अधिकारी” (Tree Protection Officer) बना दिया गया है, जबकि अधिकतर मामलों में ये अधिकारी स्वयं ही पेड़ काटने की अनुमति मांगने वाले आवेदक होते हैं। इसके अलावा, निर्धारित शुल्क भरकर पेड़ काटने की ‘डीम्ड परमिशन’ का नियम बना दिया गया है।

चंडीगढ़: भारत का संविधान के अनुच्छेद 21 (स्वच्छ पर्यावरण, हरित आवरण एवं जीवन का अधिकार), अनुच्छेद 48A (वनों और वन्यजीवों की सुरक्षा का राज्य नीति निदेशक तत्व), अनुच्छेद 51A(g) (वनों, झीलों, नदियों और वन्यजीवों सहित प्राकृतिक पर्यावरण की रक्षा करने का मौलिक कर्तव्य), राष्ट्रीय वन नीति, 1988 के 33% हरित आवरण मानक, तथा पर्यावरण न्यायशास्त्र के सार्वजनिक ट्रस्ट सिद्धांत (Public Trust Doctrine) के विधिक मानकों पर पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय ने पंजाब सरकार के नव-अधिसूचित पंजाब वृक्ष संरक्षण अधिनियम (Punjab Protection of Trees Act, 2026) पर अत्यंत गंभीर, कठोर और तल्ख विधिक सवाल खड़े किए हैं।

पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश अश्वनी कुमार मिश्रा (Chief Justice Ashwani Kumar Mishra) और न्यायमूर्ति रोहित कपूर (Justice Rohit Kapoor) की खंडपीठ ने प्रणीत कौर द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए सितंबर 2026 में पंजाब सरकार द्वारा अधिसूचित किए गए नए वृक्ष संरक्षण अधिनियम को प्रथम दृष्टया “बर्बर” (Draconian) करार दिया।

पीठ ने तीखी टिप्पणी की कि यह नया कानून पेड़ों की सुरक्षा करने के बजाय केवल “पैसे चुकाने पर पेड़ काटने की छूट” (Felling of trees subject to payment of money) और ‘डीम्ड परमिशन’ (Deemed Permission) देता है, जिससे पंजाब का पहले से ही क्षीण हो चुका वन आवरण पूरी तरह नष्ट हो जाएगा। अदालत ने कहा कि वह इस कानून की संवैधानिक वैधता की पड़ताल करने के लिए पूरी तरह तैयार है, किंतु इससे पूर्व वह पंजाब सरकार को इस कानून पर पुनर्विचार (Relook) करने का अवसर दे रही है। साथ ही, अदालत ने हरियाणा सरकार के उस बयान को भी रिकॉर्ड पर लिया जिसमें उसने पंजाब के मॉडल पर तैयार अपने प्रस्तावित विधेयक की समीक्षा करने और हाईकोर्ट के दिशा-निर्देशों के बाद ही उसे अंतिम रूप देने का वचन दिया है।

उच्च न्यायालय के मुख्य कानूनी निष्कर्ष एवं न्यायिक टिप्पणियां

1. ‘आवेदन करो, मानी हुई अनुमति पाओ, पैसा चुकाओ और पेड़ काटो—यह राज्य को बर्बाद कर देगा’

मुख्य न्यायाधीश अश्वनी कुमार मिश्रा और न्यायमूर्ति रोहित कपूर की पीठ ने कानून के चिंताजनक प्रावधानों का विश्लेषण करते हुए अपने मौखिक अवलोकनों में दर्ज किया: “प्रत्येक राज्य और सरकार पर्यावरण की रक्षा करना चाहती है और पेड़ों की कटाई एक ऐसा विषय है जिसे बहुत अधिक गंभीरता से देखा जाना चाहिए। दुर्भाग्य से आपके कानून के प्रावधान केवल यह कहते हैं कि—‘आप अनुमति के लिए आवेदन करें, अनुमति दी जाएगी, डीम्ड अनुमति (Deemed Permission) मिल जाएगी, और अधिकतम यह कि कुछ पैसे चुका दिए जाएं’। यह आपके राज्य को पूरी तरह तबाह कर देगा (This will be destroying your State)। जब हमें इस विशेष कानून के गुण-दोषों की जांच करने के लिए कहा जाएगा, तो हमें ऐसा करने में तनिक भी झिझक नहीं होगी। हम प्रथम दृष्टया यह स्पष्ट कर देना चाहते हैं, क्योंकि मेरे भ्राता न्यायाधीश [जस्टिस कपूर] ने सभी प्रावधानों का बारीकी से अध्ययन किया है, हम इस प्रकार के बर्बर/कठोर कानून (Draconian Legislation) की अनुमति बिल्कुल नहीं दे सकते।”

2. ‘अदालत विस्तृत गाइडलाइंस वाले फैसले के साथ तैयार थी; सरकार पुनर्विचार करे’:

  • अदालत ने रेखांकित किया कि जब सितंबर 2026 में पंजाब सरकार ने यह कानून आनन-फानन में अधिसूचित किया, तब हाईकोर्ट पहले से ही मोहाली में पेड़ों की कटाई पर विस्तृत दिशा-निर्देश जारी करने वाला निर्णय तैयार कर रहा था:“हम संबंधित अधिकारियों के लिए विस्तृत दिशा-निर्देशों वाले फैसले के साथ पूरी तरह तैयार थे, किंतु इस नए कानून को देखते हुए, हम चाहते हैं कि राज्य सरकार इन मुद्दों पर नए सिरे से विचार करे।”
  • पंजाब सरकार के वकील द्वारा सोमवार तक निर्देश प्राप्त करने का अनुरोध किए जाने पर पीठ ने आदेश में दर्ज किया:“हमें पूरा विश्वास है कि पंजाब राज्य भी पर्यावरण संरक्षण में समान रूप से रुचि रखेगा और इसलिए पंजाब सरकार के विद्वान वकील को सोमवार को अदालत के समक्ष रखने हेतु उचित निर्देश प्रदान किए जाएंगे।”

3. ‘हितों का खुला टकराव’: नगर निकायों के ईओ (Executive Officers) को ट्री ऑफिसर बनाना हास्यास्पद:

  • अदालत के संज्ञान में लाया गया कि कानून में स्थानीय शहरी निकायों के अधिशासी अधिकारियों (EOs) को ‘वृक्ष संरक्षण अधिकारी’ (Tree Protection Officers) बना दिया गया है।
  • पीठ ने इस विसंगति को रेखांकित किया कि अधिकांश विकास परियोजनाओं में सड़कों को चौड़ा करने या निर्माण के लिए पेड़ काटने की अनुमति मांगने वाले खुद यही अधिकारी होते हैं; ऐसे में वे निष्पक्षता से पेड़ों के संरक्षण का फैसला कैसे कर सकते हैं?

पंजाब और हरियाणा में वन आवरण की भयावह स्थिति (ISFR 2023)

उच्च न्यायालय ने भारत वन स्थिति रिपोर्ट (ISFR 2023) के आधिकारिक आंकड़ों का हवाला देते हुए दोनों राज्यों में हरित संकट को रेखांकित किया:

  • राष्ट्रीय औसत: भारत का औसत वन एवं वृक्ष आवरण 25.17% है।
  • पंजाब का हरित आवरण: मात्र 3.67%।
  • हरियाणा का हरित आवरण: मात्र 3.65%।
  • संवैधानिक चिंता: राष्ट्रीय मानक (33%) की तुलना में दोनों राज्य लगभग 10 गुना पीछे हैं। ऐसी गंभीर पारिस्थितिक स्थिति में पेड़ों की कटाई को आसान बनाने वाला कोई भी कानून पर्यावरण के लिए विनाशकारी सिद्ध होगा।

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मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि एवं प्रक्रियात्मक कालक्रम (दिसंबर 2025–अक्टूबर 2026)

चरण / विवरणतथ्यात्मक स्थिति एवं पक्षों के दावे
याचिकाकर्ताप्रणीत कौर (Praneet Kaur) व अन्य पर्यावरण कार्यकर्ता।
प्रतिवादी पक्ष1. पंजाब राज्य (वन एवं पर्यावरण विभाग)।
2. हरियाणा राज्य (संबद्ध पक्षकार)।
विवादित अधिनियमपंजाब प्रोटेक्शन ऑफ ट्रीज एक्ट, 2026 (Punjab Protection of Trees Act) — सितंबर 2026 में अधिसूचित।
दिसंबर 2025 का ऐतिहासिक आदेशमोहाली जिले में 251 पेड़ों को काटे जाने के खिलाफ दायर जनहित याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए उच्च न्यायालय ने आदेश दिया था कि पंजाब में अदालत की पूर्व अनुमति के बिना कोई भी पेड़ नहीं काटा जाएगा। बाद में वन आवरण की दयनीय स्थिति को देखते हुए इस आदेश का दायरा हरियाणा तक बढ़ा दिया गया था।
विवादित कानून की प्रमुख खामियां1. पेड़ों की कटाई के लिए कड़े पर्यावरण परीक्षण को समाप्त कर दिया गया।
2. निर्धारित शुल्क जमा कराने पर एक निश्चित अवधि के बाद स्वतः अनुमति (Deemed Permission) का प्रावधान।
3. नगर निकायों के अधिशासी अधिकारियों (EOs) को ट्री ऑफिसर नामित किया गया, जो स्वयं विकासात्मक परियोजनाओं के लिए पेड़ काटने के आवेदक होते हैं।
हरियाणा सरकार का रुखहरियाणा सरकार ने अदालत को सूचित किया कि उसने भी पंजाब कानून के मॉडल पर अपना मसौदा तैयार किया था, किंतु अब वह इस पर आगे नहीं बढ़ेगी और हाईकोर्ट की विस्तृत गाइडलाइंस का अध्ययन करने के बाद ही अपने कानून को अंतिम रूप देगी।
अदालत का अंतरिम निर्देशपंजाब सरकार को कानून पर पुनर्विचार करने का निर्देश; पंजाब के वकील द्वारा औपचारिक रुख रखने हेतु मामले को सोमवार (2 नवंबर 2026) के लिए सूचीबद्ध किया गया।

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विधिक एवं पर्यावरणीय विश्लेषण: ‘पब्लिक ट्रस्ट सिद्धांत और अंतर-पीढ़ीगत समता’

  • पब्लिक ट्रस्ट सिद्धांत (Doctrine of Public Trust):
    • सर्वोच्च न्यायालय ने एम.सी. मेहता बनाम कमल नाथ [(1997) 1 SCC 388] में यह सुस्थापित किया था कि राज्य प्राकृतिक संसाधनों—जैसे वायु, जल, वन और परिपक्व वृक्षों का संप्रभु मालिक नहीं है, बल्कि वह जनता की ओर से केवल एक ‘न्यासी’ (Trustee) है।
    • किसी राज्य की विधायिका ऐसा कानून नहीं बना सकती जो प्राकृतिक संपदा के अंधाधुंध विनाश को केवल एक मामूली शुल्क (Fee/Compensatory Charge) लेकर वैध ठहरा दे। यदि सरकार “पैसा दो और पेड़ काटो” की नीति अपनाती है, तो यह पब्लिक ट्रस्ट सिद्धांत का खुला उल्लंघन है।
  • पर्यावरण मामलों में ‘डीम्ड परमिशन’ की विधिक शून्यता:
    • प्रशासनिक कानूनों में व्यावसायिक लाइसेंसों के लिए ‘डीम्ड परमिशन’ (समयसीमा बीतने पर स्वतः अनुमति) का सिद्धांत लागू हो सकता है, किंतु पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में यह अस्वीकार्य है।
    • 50 से 100 वर्ष पुराने पेड़ों की कटाई से होने वाले ऑक्सीजन नुकसान, भूजल संरक्षण और जैव-विविधता की क्षति की भरपाई केवल बैंक खाते में चालान जमा करवाकर नहीं की जा सकती।
  • अंतर-पीढ़ीगत समता (Intergenerational Equity):
    • पंजाब और हरियाणा पहले से ही गिरते भूजल स्तर, कैंसर बेल्ट, रासायनिक प्रदूषण और पराली दहन के गंभीर संकट से जूझ रहे हैं।
    • 3.6% जैसे नगण्य हरित आवरण वाले क्षेत्र में हर एक परिपक्व वृक्ष भावी पीढ़ियों के अस्तित्व के लिए जीवन रेखा है। हाईकोर्ट का यह हस्तक्षेप संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत नागरिकों के जीने के अधिकार की रक्षा के लिए अपरिहार्य है।

विधिक विवरण एवं संदर्भ

  • न्यायालय: पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय, चंडीगढ़ (मूल जनहित रिट क्षेत्राधिकार)
  • केस संदर्भ: प्रणीत कौर बनाम पंजाब राज्य व अन्य [CWP / PIL No. … / 2026]
  • पीठ: मुख्य न्यायाधीश अश्वनी कुमार मिश्रा एवं न्यायमूर्ति रोहित कपूर (प्रथम खंडपीठ)
  • आदेश की तिथि: 31 अक्टूबर 2026 (शनिवार)
  • आगामी सुनवाई: सोमवार, 2 नवंबर 2026
  • प्रासंगिक कानून एवं विधिक प्रावधान:
    • भारत का संविधान — अनुच्छेद 21 (स्वच्छ पर्यावरण का अधिकार), अनुच्छेद 48A (वनों का संरक्षण), अनुच्छेद 51A(g) (प्राकृतिक पर्यावरण की रक्षा का कर्तव्य) एवं अनुच्छेद 226
    • पंजाब वृक्ष संरक्षण अधिनियम, 2026 (Punjab Protection of Trees Act, 2026) — विवादित धाराएं (शुल्क आधारित कटाई व डीम्ड परमिशन)
    • राष्ट्रीय वन नीति, 1988 — 33% भौगोलिक वन आवरण का राष्ट्रीय लक्ष्य
    • पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 एवं वन (संरक्षण एवं संवर्धन) अधिनियम, 1980/2023
  • संबद्ध न्यायिक सिद्धांत:
    • पर्यावरण संरक्षण और वृक्ष कटाई कानूनों का विधिक मानक: ‘राज्य प्राकृतिक संपदा का मालिक नहीं बल्कि न्यासी (Trustee) है; जिस राज्य का हरित आवरण पहले से ही 3.67% के अत्यंत दयनीय स्तर पर हो, वहां मात्र शुल्क जमा कराकर या डीम्ड अनुमति के आधार पर पेड़ों की कटाई की छूट देने वाला कानून बर्बर (Draconian) और संविधान के अनुच्छेद 21 के विरुद्ध है; नगर निकायों के अधिशासी अधिकारियों को, जो स्वयं परियोजनाओं के प्रस्तावक होते हैं, वृक्ष संरक्षण अधिकारी बनाना हितों का खुला टकराव है; सरकारों को ऐसे कानूनों को निरस्त कर सख्त पर्यावरण मूल्यांकन आधारित दिशा-निर्देश अपनाने चाहिए।’
  • वर्तमान स्थिति व विधिक प्रभाव: पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट द्वारा कानून की वैधता पर सवाल उठाए जाने के बाद पंजाब सरकार सोमवार को अदालत में अपना संशोधित रुख प्रस्तुत करेगी; तब तक पंजाब में बिना अदालत की पूर्व अनुमति के किसी भी पेड़ को काटने पर दिसंबर 2025 से लागू न्यायिक रोक पूर्णतः प्रभावी रहेगी; वहीं हरियाणा सरकार ने स्पष्ट कर दिया है कि वह अदालत के अंतिम दिशा-निर्देश आने तक अपने प्रस्तावित कानून को अधिसूचित नहीं करेगी।

Tree Protection Officer:मामले का संक्षिप्त विवरण (At A Glance)

विवरणजानकारी
संबंधित अदालतपंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय (Punjab and Haryana High Court), चंडीगढ़
पीठमुख्य न्यायाधीश अश्विनी कुमार मिश्रा एवं न्यायमूर्ति रोहित कपूर
मामला/साइटेशनप्रनीत कौर बनाम पंजाब राज्य व अन्य (Praneet Kaur v State of Punjab and Others)
कानून का विषयसितंबर 2026 में अधिसूचित ‘पंजाब प्रोटेक्शन ऑफ ट्रीज एक्ट’ (वृक्ष संरक्षण अधिनियम)
मुख्य विवादपेड़ों की कटाई के पुराने सुरक्षा तंत्र को हटाकर केवल शुल्क भुगतान (Money Payment) के आधार पर स्वतः मंजूरी (Deemed Permission) देने का प्रावधान।
हरियाण सरकार का रुखहरियाणा सरकार ने आश्वासन दिया कि वह पंजाब मॉडल पर आधारित अपने ड्राफ्ट बिल पर हाईकोर्ट के दिशा-निर्देशों के बाद ही विचार करेगी।
अदालत का अंतरिम निर्देशपंजाब सरकार को सोमवार तक कानून पर पुनरीक्षण (Reconsideration) के संबंध में निर्देश प्राप्त कर स्थिति स्पष्ट करने का आदेश दिया गया।
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