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मामले की पृष्ठभूमि: 2018 की FIR और डिफॉल्ट बेल का पेंच
- 2018 का मामला और डिफ़ॉल्ट जमानत:यह मामला 2018 में सांप्रदायिक सौहार्द बिगाड़ने और आतंकी साजिश रचने के आरोपों के तहत दर्ज एफआईआर से जुड़ा है। मोहम्मद रिफास को गिरफ्तार किया गया था, लेकिन निर्धारित समय सीमा (90/180 दिन) के भीतर चार्जशीट दाखिल न हो पाने के कारण जुलाई 2018 में उसे डिफॉल्ट बेल (Default Bail) मिल गई।
- 2019 की दूसरी FIR और जमानत रद्द करने की मांग:एनआईए (NIA) ने 2019 में जांच संभाली और 2021 में चार्जशीट दाखिल की। इस बीच, नवंबर 2019 में दर्ज एक अन्य एफआईआर में आरोप लगाया गया कि रिफास श्रीलंकाई पासपोर्ट पर भारत आया था, उसने वीजा से अधिक समय तक स्टे किया और फर्जी भारतीय दस्तावेज बनवाए। अप्रैल 2022 में एनआईए ने इस आधार पर उसकी जमानत रद्द करने की अर्जी दी कि उसने विदेशी नागरिकता छिपाई थी और UAPA की धारा 43D(7) के तहत विदेशी नागरिकों को जमानत नहीं दी जा सकती।
- विशेष अदालत और हाईकोर्ट का रुख:विशेष अदालत ने एनआईए की अर्जी स्वीकार कर जमानत रद्द कर दी थी, लेकिन मद्रास उच्च न्यायालय ने दिसंबर 2023 में विशेष अदालत का आदेश रद्द करते हुए रिफास की जमानत बहाल कर दी। इसके खिलाफ केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया था।
सुप्रीम कोर्ट के मुख्य निष्कर्ष और विधिक सिद्धांत
1. “वैध प्रवेश के बाद ओवरस्टे होना ‘अवैध प्रवेश’ नहीं”:
पीठ ने पाया कि अभियोजन पक्ष यह साबित करने के लिए कोई साक्ष्य प्रस्तुत नहीं कर सका कि रिफास का भारत में प्रवेश ही अवैध था। यहां तक कि पुलिस की एफआईआर भी स्वीकार करती है कि वह वैध वीजा पर भारत आया था और बाद में उसका वीजा समाप्त हुआ।
2. धारा 167(2) CrPC के तहत डिफॉल्ट बेल एक वैधानिक अधिकार:
- पीठ ने स्पष्ट किया कि दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 167(2) के तहत निर्धारित समय सीमा में चार्जशीट न आने पर मिलने वाली डिफॉल्ट जमानत एक वैधानिक अधिकार (Statutory Right) है। UAPA की धारा 43D(2) के जरिए इसे UAPA मामलों में भी लागू किया गया है।
- UAPA की धारा 43D(7) इस वैधानिक अधिकार को समाप्त नहीं करती।
3. जमानत रद्द करने के कड़े मानदंड:
सुप्रीम कोर्ट ने दोहराया कि एक गलत या अवैध जमानत आदेश को रद्द करने और आरोपी के बाद के आचरण के आधार पर जमानत रद्द करने में अंतर होता है। केवल बाद में चार्जशीट दाखिल हो जाना जमानत रद्द करने का मजबूत या विशेष आधार नहीं बन सकता, जब तक कि आरोपी द्वारा जमानत की शर्तों के उल्लंघन या साक्ष्यों से छेड़छाड़ का कोई ठोस कारण न दिया जाए।
नई दिल्ली: गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम, 1967 (UAPA) की धारा 43D(7) (विदेशी नागरिकों को ज़मानत पर सांविधिक रोक की संकीर्ण व्याख्या), धारा 43D(2) सहपठित दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (CrPC) की धारा 167(2) / भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) की धारा 187 (डिफ़ॉल्ट ज़मानत / Default Bail का अहस्तांतरणीय वैधानिक अधिकार), भारत में वैध प्रवेश बनाम बाद में वीज़ा समाप्ति पर अनधिकृत ठहराव (Overstay), तथा ज़मानत रद्द करने (Cancellation of Bail) के कड़े न्यायिक मानकों पर भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने एक अत्यंत महत्वपूर्ण विधिक व्यवस्था दी है।
सर्वोच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति अरविंद कुमार (Justice Aravind Kumar) और न्यायमूर्ति विपुल एम. पंचोली (Justice Vipul M. Pancholi) की खंडपीठ ने केंद्र सरकार (राष्ट्रीय जांच एजेंसी – NIA) द्वारा दायर अपील को खारिज करते हुए मद्रास उच्च न्यायालय के उस आदेश को बरकरार रखा है, जिसके तहत कथित श्रीलंकाई नागरिक मोहम्मद रिफास (Mohamed Rifas) की डिफ़ॉल्ट ज़मानत को बहाल किया गया था।
शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया कि UAPA की धारा 43D(7) के तहत विदेशी नागरिकों को ज़मानत न दिए जाने की बंदिश केवल तभी सक्रिय होती है जब उस व्यक्ति का भारत में प्रारंभिक प्रवेश (Initial Entry) ही अनधिकृत या अवैध रहा हो। यदि किसी विदेशी नागरिक ने वैध पासपोर्ट और वीज़ा पर भारत में प्रवेश किया था, तो बाद में उसका वीज़ा समाप्त हो जाना या उसका ठहराव गैर-कानूनी हो जाना उसे धारा 43D(7) के कठोर प्रतिबंधों के दायरे में नहीं लाता। इसके अलावा, अदालत ने माना कि डिफ़ॉल्ट ज़मानत एक मौलिक व सांविधिक अधिकार है, जिसे विदेशी नागरिकता के आधार पर छीना नहीं जा सकता।
शीर्ष अदालत के मुख्य कानूनी निष्कर्ष एवं विधिक टिप्पणियां
1. ‘केवल विदेशी नागरिक होना धारा 43D(7) के कठोर नियमों को लागू करने के लिए पर्याप्त नहीं’
न्यायमूर्ति अरविंद कुमार और न्यायमूर्ति विपुल एम. पंचोली की खंडपीठ ने UAPA की धारा 43D(7) के वैधानिक दायरे की व्याख्या करते हुए अपने फैसले में दर्ज किया: “केवल इसलिए कि कोई व्यक्ति भारत का नागरिक नहीं है, यह उपधारा (7) के कठोर प्रावधानों को लागू करने के लिए पर्याप्त नहीं होगा। यह आवश्यक और अनिवार्य है कि जब ऐसे व्यक्ति ने प्रारंभ में भारत में प्रवेश किया था, तब उसका वह प्रवेश ही अनधिकृत या गैर-कानूनी (Unauthorised or Illegal Entry) रहा हो।”
2. वैध प्रवेश बाद में अवैध नहीं बन जाता (Lawful Entry vs Overstay):
- अदालत ने अभियोजन पक्ष के इस तर्क को खारिज कर दिया कि वीज़ा समाप्त होने के बाद भारत में रुकने से व्यक्ति का पूरा प्रवेश ही अवैध माना जाना चाहिए:“किसी विदेशी नागरिक का भारत में वैध रूप से किया गया प्रवेश केवल इसलिए अवैध नहीं हो जाता क्योंकि बाद में उसका प्राधिकरण रद्द कर दिया गया था या उसका यहां रुकना अनधिकृत (Overstay) हो गया था।”
- पीठ ने पाया कि एनआईए द्वारा 2019 में दर्ज की गई दूसरी प्राथमिकी में भी यह दर्ज था कि रिफास ने वैध श्रीलंकाई पासपोर्ट और वीज़ा के आधार पर भारत में प्रवेश किया था और वीज़ा अवधि बीत जाने के बाद वह भारत में रुका रहा। अतः यह अवैध घुसपैठ का मामला नहीं था।
3. ‘डिफ़ॉल्ट ज़मानत सांविधिक अधिकार है; धारा 43D(7) इसे रद्द नहीं कर सकती’:
- न्यायालय ने रेखांकित किया कि आरोपी को जुलाई 2018 में इसलिए रिहा किया गया था क्योंकि जांच एजेंसी निर्धारित 90 दिनों की वैधानिक अवधि के भीतर आरोप पत्र (Chargesheet) दाखिल करने में विफल रही थी।
- अदालत ने व्यवस्था दी:“CrPC की धारा 167(2) के तहत डिफ़ॉल्ट ज़मानत एक अनिवार्य सांविधिक अधिकार है, जो UAPA की धारा 43D(2) के माध्यम से आतंकी मामलों में भी लागू होता है। UAPA की धारा 43D(7) उपधारा (2) के वैधानिक प्रभाव को समाप्त (Override) नहीं करती, और इसलिए यह डिफ़ॉल्ट ज़मानत के अधिकार को बाधित नहीं कर सकती।”
4. बाद में चार्जशीट दाखिल होना ज़मानत रद्द करने का स्वतः आधार नहीं:
- सर्वोच्च न्यायालय ने दोहराया कि ज़मानत रद्द करने (Bail Cancellation) की शक्ति का प्रयोग अत्यंत सावधानी और ठोस आधारों पर ही किया जाना चाहिए, क्योंकि इसमें नागरिक की व्यक्तिगत स्वतंत्रता (अनुच्छेद 21) शामिल होती है।
- आरोप पत्र का बाद में पेश किया जाना या यह पता चलना कि आरोपी विदेशी है, अपने आप में ज़मानत रद्द करने का कोई ‘असाधारण या मजबूत आधार’ (Special and Strong Ground) नहीं बनता, विशेषकर तब जब रिफास द्वारा ज़मानत की शर्तों के उल्लंघन या साक्ष्यों से छेड़छाड़ का कोई नया कदाचार सिद्ध न हुआ हो।
मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि एवं प्रक्रियात्मक कालक्रम (2018–2026)
| चरण / विवरण | तथ्यात्मक स्थिति एवं पक्षों के दावे |
| प्रतिवादी / अभियुक्त | मोहम्मद रिफास (Mohamed Rifas) — अभियोजन के अनुसार श्रीलंकाई नागरिक। |
| अपीलकर्ता पक्ष | भारत संघ (गृह मंत्रालय / राष्ट्रीय जांच एजेंसी – NIA)। |
| मूल मामला (2018) | सांप्रदायिक सौहार्द बिगाड़ने और आतंकवादी हमलों की साजिश रचने के आरोप में दर्ज प्राथमिकी; UAPA की धाराएं लागू। |
| डिफ़ॉल्ट ज़मानत (जुलाई 2018) | जांच एजेंसी द्वारा वैधानिक 90-दिवसीय अवधि में आरोप पत्र दाखिल न करने पर सक्षम अदालत ने धारा 167(2) CrPC के तहत ज़मानत दी। |
| NIA द्वारा दूसरी प्राथमिकी (2019) | आरोप लगाया गया कि रिफास श्रीलंकाई नागरिक है, वैध वीज़ा समाप्त होने के बाद अवैध रूप से रुका रहा (Overstayed) और भारतीय पहचान दस्तावेज प्राप्त किए। |
| ज़मानत रद्दीकरण का प्रयास (2022) | NIA ने विशेष अदालत में अर्जी दी कि विदेशी नागरिकता छिपाकर ज़मानत ली गई और UAPA की धारा 43D(7) विदेशी नागरिकों को ज़मानत देने पर रोक लगाती है; विशेष अदालत ने ज़मानत रद्द कर दी। |
| मद्रास हाईकोर्ट का आदेश (दिसंबर 2023) | हाईकोर्ट ने विशेष अदालत के रद्दीकरण आदेश को रद्द कर रिफास की ज़मानत बहाल कर दी। |
| सुप्रीम कोर्ट का अंतिम निर्णय (2026) | केंद्र सरकार की अपील खारिज; मद्रास हाईकोर्ट का फैसला बरकरार। |
विधिक एवं विधायी विश्लेषण: ‘UAPA की धारा 43D(7) बनाम डिफ़ॉल्ट ज़मानत’
- UAPA की धारा 43D(7) का वास्तविक वैधानिक अर्थ:
- धारा 43D(7) में यह प्रावधान है कि किसी ऐसे व्यक्ति को ज़मानत पर रिहा नहीं किया जाएगा जो भारत का नागरिक नहीं है और जिसने बिना वैध दस्तावेजों या अनधिकृत रूप से भारत में प्रवेश किया हो।
- संसद ने इस प्रावधान में जानबूझकर दोहरी शर्त (Cumulative Condition) रखी थी: (i) गैर-नागरिक होना, और (ii) अनधिकृत प्रवेश।
- यदि कोई विदेशी व्यक्ति वैध वीज़ा पर आया था, तो वह केवल ‘गैर-नागरिक’ होने के कारण इस धारा के तहत स्वतः ज़मानत से अयोग्य नहीं हो जाता।
- डिफ़ॉल्ट ज़मानत की सर्वोच्चता (Indefeasible Right):
- सर्वोच्च न्यायालय ने बिक्रमजीत सिंह बनाम पंजाब राज्य [(2020) 10 SCC 616] और संजय दत्त बनाम राज्य [(1994) 5 SCC 410] में स्पष्ट किया है कि डिफ़ॉल्ट ज़मानत का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 21 (व्यक्तिगत स्वतंत्रता) से सीधे प्रवाहित होता है।
- जांच एजेंसी द्वारा समय पर चार्जशीट पेश न कर पाना अभियुक्त को रिहाई का एक पूर्ण वैधानिक अधिकार प्रदान करता है। धारा 43D(5) या 43D(7) में दिए गए सामान्य ज़मानत के कड़े प्रतिबंध डिफ़ॉल्ट ज़मानत के मामले में लागू नहीं होते।
- ज़मानत रद्द करने के नियम (Setting Aside vs Cancellation):
- अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी अवैध आदेश को रद्द करने और बाद की परिस्थितियों के आधार पर ज़मानत वापस लेने में अंतर होता है।
- एक बार जब किसी व्यक्ति को डिफ़ॉल्ट ज़मानत मिल जाती है, तो केवल बाद में आरोप पत्र पेश हो जाने से वह ज़मानत रद्द नहीं की जा सकती, जब तक कि अभियुक्त ने ज़मानत की स्वतंत्रता का दुरुपयोग न किया हो।
विधिक विवरण एवं संबद्ध प्रावधान
- न्यायालय: भारत का सर्वोच्च न्यायालय (आपराधिक अपीलीय क्षेत्राधिकार)
- केस संदर्भ: भारत संघ (NIA) बनाम मोहम्मद रिफास [Criminal Appeal No. … / 2026]
- पीठ: न्यायमूर्ति अरविंद कुमार एवं न्यायमूर्ति विपुल एम. पंचोली
- निर्णय की तिथि: 27 अक्टूबर 2026
- कार्यवाही का परिणाम: केंद्र सरकार की अपील पूर्णतः खारिज; मद्रास हाईकोर्ट द्वारा दी गई ज़मानत बहाली का आदेश बरकरार।
प्रासंगिक कानून एवं विधिक प्रावधान:
- गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम, 1967 (UAPA):
- धारा 43D(7) — अनधिकृत रूप से भारत में प्रवेश करने वाले गैर-नागरिकों की ज़मानत पर प्रतिबंध
- धारा 43D(2) — आरोप पत्र दाखिल करने की समयसीमा (90 दिन से 180 दिन तक विस्तार)
- धारा 43D(5) — UAPA के तहत नियमित ज़मानत पर विचार करने के कड़े विधिक मानदंड
- दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (CrPC) — धारा 167(2) (डिफ़ॉल्ट ज़मानत का सांविधिक अधिकार) / BNSS 2023 की धारा 187
- विदेशी अधिनियम, 1946 (Foreigners Act, 1946) — धारा 14 (वीज़ा अवधि से अधिक रुकना / Overstay)
- भारत का संविधान — अनुच्छेद 21 (प्राण एवं दैहिक स्वतंत्रता का अधिकार, जो नागरिकों और विदेशियों दोनों को समान रूप से प्राप्त है)
- संबद्ध न्यायिक सिद्धांत:
- UAPA में विदेशी नागरिकों की ज़मानत का विधिक मानक: ‘केवल विदेशी राष्ट्रीयता UAPA के तहत ज़मानत देने से रोकने का कानूनी आधार नहीं है; धारा 43D(7) का प्रतिबंध केवल उन विदेशी नागरिकों पर लागू होता है जिनका भारत में प्रारंभिक प्रवेश ही अवैध या अनधिकृत था; वैध वीज़ा पर आकर समय सीमा से अधिक रुकना (Overstay) अनधिकृत प्रवेश के समतुल्य नहीं माना जा सकता; इसके अतिरिक्त, CrPC की धारा 167(2) के तहत डिफ़ॉल्ट ज़मानत पाने का अधिकार एक सांविधिक अधिकार है, जिसे धारा 43D(7) द्वारा समाप्त नहीं किया जा सकता।’
- वर्तमान स्थिति व विधिक प्रभाव: सुप्रीम कोर्ट के इस निर्णय के बाद मोहम्मद रिफास ज़मानत पर स्वतंत्र रहेगा; यह निर्णय उन सभी मामलों में एक महत्वपूर्ण नजीर बन गया है जहां जांच एजेंसियां केवल विदेशी नागरिकता या बाद के ओवरस्टे के आधार पर UAPA मामलों में डिफ़ॉल्ट ज़मानत का विरोध करती हैं।
Foreigner Bail:मामले का संक्षिप्त विवरण (At A Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | भारत का सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court of India) |
| पीठ | न्यायमूर्ति अरविंद कुमार एवं न्यायमूर्ति विपुल एम. पंचोली |
| मामला/साइटेशन | भारत संघ बनाम मोहम्मद रिफास (Union of India v. Mohamed Rifas) |
| अपीलकर्ता | केंद्र सरकार (राष्ट्रीय जांच एजेंसी – NIA) |
| प्रतिवादी/आरोपी | मोहम्मद रिफास (कथित श्रीलंकाई नागरिक) |
| मूल विवाद | UAPA मामले में आरोपी के विदेशी नागरिक होने और बाद में वीजा ओवरस्टे (Overstay) के आधार पर धारा 43D(7) के तहत default bail रद्द करने की केंद्र की मांग। |
| अदालत का फैसला | केंद्र की अपील खारिज; मद्रास हाईकोर्ट का फैसला बरकरार। वैध प्रवेश वाले विदेशी नागरिकों पर UAPA की धारा 43D(7) का स्वतः प्रतिबंध लागू नहीं होता। |

