FOLLOW US FOR MORE LEGAL UPDATES ON WhatsApp
हाईकोर्ट के मुख्य निष्कर्ष और प्रबंधन बोर्ड के अधिकार
- धार्मिक अनुष्ठानों और दान पर व्यवस्था:
- दैनिक पूजा व उत्सव: दैनिक अनुष्ठान और उत्सव पोधु दीक्षितारों का अनन्य सर्वाधिकार (Exclusive Prerogative) बना रहेगा। उन्हें स्थापित परंपराओं और रीति-रिवाजों का पालन करते हुए पूजा संपन्न करने की पूर्ण स्वतंत्रता होगी।
- वित्तीय खाते व दान: मंदिर को मिलने वाले सभी दान सिंगल विंडो ई-पेमेंट (Single Window E-payment) प्रणाली के माध्यम से सीधे बोर्ड ऑफ मैनेजमेंट के खाते में जमा होंगे। दीक्षितारों के पास मौजूद एफडी (FDs) और अन्य संपत्तियों के खातों का पूरा ब्योरा हर महीने की 5 तारीख तक बोर्ड को सौंपना अनिवार्य होगा।
- विरासत की सुरक्षा और वाणिज्यिक गतिविधियों पर रोक:अदालत ने मंदिर के अंदर ‘अन्नादानम’ और ‘अन्नापवादाई’ के नाम पर मेनू कार्ड लगाकर व्यावसायिक भोजन परोसने और मंदिर परिसर को ‘फूड कोर्ट’ बनाने की प्रथा पर कड़ा प्रहार किया। राजस्व और लोक निर्माण विभाग (PWD) को निर्देश दिया गया है कि वे मंदिर के प्राचीन स्थापत्य की रक्षा के लिए प्रबंधन बोर्ड को पूरा सहयोग दें।
चेन्नई: भारत का संविधान के अनुच्छेद 25 व 26 (धार्मिक स्वतंत्रता और धार्मिक संप्रदायों द्वारा अपनी संस्थाओं व संपत्तियों के प्रबंधन का अधिकार), तमिलनाडु हिंदू धार्मिक एवं धर्मार्थ बंदोबस्ती अधिनियम, 1959 (TN HR&CE Act, 1959), सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक नज़ीर डॉ. सुब्रमण्यम स्वामी बनाम तमिलनाडु राज्य [(2014) 5 SCC 75] (जिसमें तय हुआ था कि कुप्रशासन के आधार पर धार्मिक संप्रदाय से प्रबंधन हमेशा के लिए नहीं छीना जा सकता, बल्कि केवल दोष निवारण तक अस्थायी हस्तक्षेप अनुमेय है), तथा प्राचीन स्मारकों व पुरातात्विक धरोहरों के संरक्षण के विधिक मानकों पर मद्रास उच्च न्यायालय ने एक युगांतरकारी फैसला सुनाया है।
मद्रास उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति जी. जयचंद्रन (Justice G Jayachandran) और न्यायमूर्ति ई. मनोहरन (Justice E Manoharan) की खंडपीठ ने ऐतिहासिक चिदंबरम श्री सबानायगर (भगवान नटराज) मंदिर के कुप्रशासन से जुड़ी कई रिट याचिकाओं का निस्तारण करते हुए वंशानुगत पुजारियों—पोधु दीक्षितारों (Podhu Dikshitars) के प्रबंधन में मंदिर की प्राचीन विरासत को पहुंची क्षति, गैर-धार्मिक व्यावसायिक गतिविधियों, वित्तीय अपारदर्शिता और संपत्तियों की दुर्दशा पर गंभीर न्यायिक असंतोष व्यक्त किया।
पीठ ने मंदिर के प्रशासनिक संचालन को पटरी पर लाने के लिए मद्रास हाईकोर्ट के दो सेवानिवृत्त जजों की अध्यक्षता में एक उच्च-स्तरीय प्रबंधन बोर्ड (Board of Management) गठित करने का आदेश दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि जब तक इस प्राचीन मंदिर के कुप्रशासन का निवारण नहीं हो जाता, तब तक यह बोर्ड मंदिर के भौतिक ढांचे, संपत्तियों और वित्तीय पारदर्शिता की देखरेख करेगा; हालांकि दैनिक धार्मिक अनुष्ठानों और पूजा-पद्धति का अनन्य विशेषाधिकार दीक्षितारों के पास ही पूर्ववत रहेगा।
उच्च न्यायालय के मुख्य कानूनी निष्कर्ष एवं विधिक टिप्पणियां
1. ‘मंदिर परिसर को फूड कोर्ट में बदल दिया; प्राचीन विरासत संरचनाओं को भारी क्षति’:
न्यायमूर्ति जी. जयचंद्रन और न्यायमूर्ति ई. मनोहरन की खंडपीठ ने मंदिर परिसर में अनियंत्रित व्यावसायिक गतिविधियों पर प्रहार करते हुए दर्ज किया: “अन्नदानम और अन्नपवदई के नाम पर मेन्यू कार्ड वाले बोर्ड लगाकर चंदा एकत्र करना और आयोजकों को मंदिर के भीतर डाइनिंग हॉल का उपयोग करने की अनुमति देना—यह गैर-धार्मिक और व्यावसायिक गतिविधियाँ हैं, जिन्होंने मंदिर परिसर को वस्तुतः एक ‘फूड कोर्ट’ (Food Court) में तब्दील कर दिया है। पोधु दीक्षितारों के प्रबंधन के तहत जिस प्रकार इस प्राचीन मंदिर की संरचना को नुकसान पहुँचाया गया है और उसका रखरखाव उपेक्षित रहा है, वह अत्यंत निराशाजनक है। उनके द्वारा मनमाने ढंग से खड़े किए गए नए निर्माण स्पष्ट करते हैं कि मंदिर की संपत्ति का घोर कुप्रशासन हो रहा है। प्राचीन विरासत को पहुंची भारी क्षति और मंदिर की संपत्तियों को संरक्षित करने में विफलता न्यायिक हस्तक्षेप को अपरिहार्य बनाती है।”
2. ’12 वर्षों से मंदिर की पूरी आय दीक्षितारों के पास, पर वे सच्चा हिसाब देने को तैयार नहीं’:
- सुप्रीम कोर्ट के 2014 के फैसले का हवाला देते हुए खंडपीठ ने कहा:“सर्वोच्च न्यायालय के 2014 के फैसले के बाद मंदिर का प्रशासन वापस पोधु दीक्षितारों के हाथों में चला गया था। पिछले 12 से अधिक वर्षों से मंदिर की संपूर्ण आय पोधु दीक्षितारों के पास है, किंतु वे मंदिर से होने वाली आय का सच्चा और पूर्ण लेखा-जोखा (True and Full Account) साझा करने को तैयार नहीं हैं।अतः मंदिर की संपत्तियों को वापस प्राप्त करने और इस कुप्रशासन को जड़ से समाप्त करने के लिए एक पारदर्शी प्रशासनिक व्यवस्था आवश्यक है।”
3. ‘डॉ. सुब्रमण्यम स्वामी (2014)’ नज़ीर का विधिक संतुलन:
- अदालत ने स्वीकार किया कि सुप्रीम कोर्ट ने डॉ. सुब्रमण्यम स्वामी बनाम तमिलनाडु राज्य में स्पष्ट किया था कि HR&CE विभाग के कार्यकारी अधिकारी (EO) को स्थायी रूप से नियुक्त करके दीक्षितारों के अधिकार को हमेशा के लिए समाप्त नहीं किया जा सकता।
- किंतु शीर्ष अदालत ने यह भी स्पष्ट व्यवस्था दी थी कि अनुच्छेद 26(d) के तहत धार्मिक संप्रदाय के संपत्ति प्रबंधन के अधिकार में कुप्रशासन पाए जाने पर तब तक हस्तक्षेप किया जा सकता है जब तक कि उस बुराई का निवारण न हो जाए (until the evil gets remedied)। इसी सिद्धांत के तहत हाईकोर्ट ने स्थायी सरकारी अधिग्रहण के बजाय एक स्वतंत्र ‘प्रबंधन बोर्ड’ गठित किया।
नव-गठित प्रबंधन बोर्ड (Board of Management) की संरचना एवं कार्यक्षेत्र
अदालत ने मंदिर की महिमा और पारदर्शिता बहाल करने के लिए विषय विशेषज्ञों से युक्त बोर्ड का गठन किया है:
बोर्ड के अधिकार और वित्तीय-धार्मिक व्यवस्था:
- पूजा और दैनिक अनुष्ठान (धार्मिक स्वतंत्रता): दैनिक पूजा, अनुष्ठान और वार्षिक उत्सवों का संचालन पोधु दीक्षितारों का अनन्य विशेषाधिकार (Exclusive Prerogative) रहेगा; इसमें स्थापित परंपराओं और आगमों का पूर्णतः पालन किया जाएगा।
- सावधि जमा और मौजूदा आय: दीक्षितारों द्वारा अब तक प्रबंधित सावधि जमा (FD) और अन्य निवेश उन्हीं के पास बने रहेंगे; किंतु पोधु दीक्षितारों के सचिव को प्रत्येक अंग्रेजी कैलेंडर माह की 5 तारीख तक खातों की पूरी प्रति प्रबंधन बोर्ड को अनिवार्य रूप से सौंपनी होगी।
- एकल-खिड़की डिजिटल दान (Single Window E-payment): मंदिर में भक्तों द्वारा दिए जाने वाले सभी प्रकार के दान अब केवल प्रबंधन बोर्ड द्वारा तय किए गए आधिकारिक बैंक खाते में सिंगल-विंडो ई-पेमेंट के माध्यम से ही स्वीकार किए जाएंगे (नकद वसूली और मनमाने बक्सों पर रोक)।
- प्रशासनिक व तकनीकी सहयोग: राजस्व विभाग (Revenue) और लोक निर्माण विभाग (PWD) बोर्ड को मंदिर संपत्तियों की पैमाइश, अतिक्रमण हटाने और प्राचीन निर्माणों के संरक्षण में पूर्ण लॉजिस्टिक सहायता प्रदान करेंगे।
मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि एवं प्रक्रियात्मक कालक्रम (2014–2026)
| संदर्भ / विवरण | तथ्यात्मक स्थिति एवं अदालती निर्देश |
| मंदिर का नाम | श्री सबानायगर (नटराज) मंदिर, चिदंबरम — तमिलनाडु का अति-प्राचीन एवं विश्व प्रसिद्ध शैव तीर्थ स्थल। |
| प्रबंधन वर्ग | पोधु दीक्षितार (Podhu Dikshitars) — मंदिर के वंशानुगत पुजारी व धार्मिक संप्रदाय। |
| मूल विवाद | मंदिर की अकूत संपत्तियों, आभूषणों और आय के प्रबंधन में अपारदर्शिता, ऑडिट से इनकार, कनकसभाई पर भक्तों के प्रवेश को लेकर विवाद, और ऐतिहासिक पत्थरों व गोपुरमों से छेड़छाड़ कर अवैध निर्माण। |
| अदालत का अंतरिम निष्कर्ष | दीक्षितार मंदिर की प्राचीन विरासत को सहेजने में विफल रहे हैं; अन्नदान के नाम पर व्यावसायिकता फैलाई गई; वित्तीय हिसाब छुपाया गया। |
| बोर्ड का कार्यकाल | बोर्ड तत्काल प्रभाव से कार्यभार संभालेगा और तब तक प्रभावी रहेगा जब तक कि मंदिर प्रशासन पूरी तरह दुरुस्त और पारदर्शी नहीं हो जाता। |
विधिक एवं संवैधानिक विश्लेषण: ‘अनुच्छेद 26(d) और कुप्रशासन के विरुद्ध न्यायिक उपचार’
- ‘डॉ. सुब्रमण्यम स्वामी’ फैसले के सिद्धांत का सही क्रियान्वयन:
- सुप्रीम कोर्ट ने 2014 में स्पष्ट किया था कि राज्य किसी मंदिर के कुप्रशासन को आधार बनाकर उसका स्थायी राष्ट्रीयकरण नहीं कर सकता।
- मद्रास हाईकोर्ट ने इस सिद्धांत का पूर्ण सम्मान करते हुए मंदिर का नियंत्रण राज्य सरकार के HR&CE विभाग को सीधे सौंपने के बजाय सेवानिवृत्त न्यायाधीशों के स्वतंत्र बोर्ड को सौंपा है, ताकि संप्रदाय के धार्मिक अधिकारों का हनन किए बिना वित्तीय व भौतिक कुप्रशासन को ठीक किया जा सके।
- सार्वजनिक न्यास (Public Trust) और वित्तीय जवाबदेही:
- चाहे कोई मंदिर किसी संप्रदाय द्वारा ही क्यों न प्रबंधित हो, यदि वह सार्वजनिक पूजा स्थल है जहां करोड़ों हिंदू आस्था रखते हैं और दान देते हैं, तो वह संपत्ति एक ‘पब्लिक ट्रस्ट’ की प्रकृति धारण करती है।
- पुजारियों का यह विधिक कर्तव्य है कि वे प्रत्येक रुपये का प्रमाणित ऑडिट प्रस्तुत करें। एकल-खिड़की ई-भुगतान प्रणाली लागू करके अदालत ने चढ़ावे और दान के गबन की संभावना को समाप्त किया है।
विधिक विवरण एवं संदर्भ
- न्यायालय: मद्रास उच्च न्यायालय, चेन्नई (प्रथम खंडपीठ / अपीलीय रिट क्षेत्राधिकार)
- केस संदर्भ: चिदंबरम श्री सबानायगर मंदिर कुप्रशासन एवं संरक्षण वाद [Writ Petition Batch / 2026]
- पीठ: न्यायमूर्ति जी. जयचंद्रन एवं न्यायमूर्ति ई. मनोहरन
- आदेश की तिथि: 30–31 अक्टूबर 2026
- प्रासंगिक कानून एवं विधिक प्रावधान:
- भारत का संविधान — अनुच्छेद 25, 26(b), 26(d), एवं अनुच्छेद 49 (राष्ट्रीय महत्व के स्मारकों का संरक्षण)
- तमिलनाडु हिंदू धार्मिक एवं धर्मार्थ बंदोबस्ती अधिनियम, 1959 (TN HR&CE Act, 1959)
- प्राचीन संस्मारक तथा पुरातत्वीय स्थल और अवशेष अधिनियम, 1958 — विरासत की सुरक्षा
- संबद्ध न्यायिक सिद्धांत:
- धार्मिक संप्रदायों के संपत्ति प्रबंधन और न्यायिक सुधार का विधिक मानक: ‘संविधान के अनुच्छेद 26 के तहत धार्मिक मामलों (पूजा-पद्धति) में संप्रदाय की स्वायत्तता अक्षुण्ण है, किंतु संपत्ति और वित्तीय प्रबंधन का अधिकार विधि के शासन के अधीन है; यदि वंशानुगत पुजारी ऐतिहासिक धरोहर को नुकसान पहुंचाते हैं, मंदिर को व्यावसायिक फूड कोर्ट में बदलते हैं और 12 वर्षों तक आय का हिसाब देने से इनकार करते हैं, तो कुप्रशासन को दूर करने के लिए न्यायालय द्वारा सेवानिवृत्त न्यायाधीशों के स्वतंत्र प्रबंधन बोर्ड का गठन करना न्यायसंगत, संवैधानिक और अपरिहार्य है।’
- वर्तमान स्थिति व अनुपालन निर्देश: प्रबंधन बोर्ड को तत्काल प्रभाव से मंदिर की प्रशासनिक व्यवस्था संभालने का निर्देश दिया गया है; लोक निर्माण विभाग और राजस्व अधिकारियों को बोर्ड के साथ समन्वय बनाकर मंदिर की संपत्तियों की सूची तैयार करने और अवैध निर्माणों की समीक्षा करने का आदेश दिया गया है।
Temple Management:मामले का संक्षिप्त विवरण (At A Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | मद्रास उच्च न्यायालय (Madras High Court), चेन्नई |
| पीठ | न्यायमूर्ति जी. जयचंद्रन एवं न्यायमूर्ति ई. मनोहरन |
| मामला/विषय | चिदंबरम श्री सबानायगर (नटराज) मंदिर में कुप्रबंधन और दीक्षितारों के खिलाफ रिट याचिकाएं |
| नवगठित प्रबंधन बोर्ड | अध्यक्ष: सेवानिवृत्त न्यायमूर्ति वी. भारतीदासन सह-अध्यक्ष: सेवानिवृत्त न्यायमूर्ति आर. सुरेश कुमार सदस्य: सेवानिवृत्त आईएएस अधिकारी सी. राजेंद्रन, पोधु दीक्षितार के सचिव और एचआर एंड सीई (HR & CE) विभाग के सचिव (पदेन सदस्य)। |
| मुख्य कानूनी सिद्धांत | सुप्रीम कोर्ट नज़ीर (डॉ. सुब्रमण्यम स्वामी 2014): कुप्रबंधन की स्थिति में अदालत/राज्य केवल अस्थायी अवधि के लिए सुधारात्मक कदम उठा सकता है, जब तक कि कुप्रबंधन की बुराई को दूर न कर दिया जाए। |

